चरक संहिता (प्रथम भाग: सूत्र, निदान, विमान, शारीर व इन्द्रिय स्थान)
Charaka Samhita Part 1 with Hindi Translation
महर्षि चरक व अग्निवेश द्वारा
स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)
अ० २५ ] सूत्रस्थानम् २८७
अ० २५ ] सूत्रस्थानम् २८७ प्रकृति के अनुसार आहार विहार करना; आरोग्यकारक वस्तुओं में, समय पर भोजन करना; अनारोग्योत्पादक वस्तुओं में, वेगों का रोकना; मन की प्रसन्नता करने वालों में मद्य; बुद्धि, धैर्य और स्मृतिनाशक वस्तुओं में, मद्य का अधिक उपयोग; पचने में कठिन वस्तुओं में, गुरु, गरिष्ठ भोजन; सुगमता से पचाने वाली वस्तुओं में, एक समय भोजन करना; शोष और क्षय करने वाली वस्तुओं में, स्त्री संग की अधिकता; नपुंसक करनेवाले कारणोंमें शुक्र के उपस्थित वेग का रोकना; अन्न में अश्रद्धा पैदा करने वालों में वध्यस्थान; आयु का ह्रास करने वाले कारणों में न खाना; क्षीण, निर्बल करने वालों में थोड़ा खाना; ग्रहणी रोग को करने वाले कारणों में अजीर्णावस्था में अध्यशन अर्थात् खाने के ऊपर खाना; अग्नि को विषम करने वाले कारणों में विषम (ठीक समय पर न खाना) खाना; कुष्ठ आदि निन्दित रोगों को पैदा करने में विरुद्ध वीर्य (जैसे दूध और मछली आदि) वस्तुओं का खाना; सब पथ्यों में शान्ति; सब अपथ्यों में परिश्रम थकान (शक्ति से बाहर परिश्रम करना); व्याधियों में मुख्य वमन, विरेचन, आहार-विहार का मिथ्यायोग; दारिद्र या अमंगलता के कारणों में रजस्वला स्त्री के साथ सम्भोग; आयुवर्धक वस्तुओं में ब्रह्मचर्य; वृष्य-वस्तुओं में संकल्प; अवृष्य वस्तुओं में मन की अप्रसन्नता; प्राणहारक वस्तुओं में बल से बाहर काम करना; रोग के बढ़ाने में शोक; श्रमनाशक वस्तुओं में स्नान; प्रीणन, पुष्टिकारक वस्तुओं में प्रसन्नता; सुखाने वाली वस्तुओं में शोक; पुष्ट करने वाली वस्तुओं में बेफ़िकरी (सन्तोष); नींद लाने वाली वस्तुओं में पुष्टि; आलस्य करने वाली वस्तुओं में नींद; बलकारक वस्तुओं में सब रसों का अभ्यास, निर्बल करने वालों में एक ही रस का निरन्तर सेवन; अनाहार्य अर्थात् खींच कर निकालने में अयोग्य वस्तुओं में गर्भ रूपी शल्य; बाहर निकालने वाली वस्तुओं में अजीर्ण, कोमल औषधियों के उपचार में बालक; याप्य रोगों में वृद्ध; तीक्ष्ण वेग की औषध और व्यायाम त्याग करनेवालों में गर्भिणी; गर्भ स्थिर कराने वालों में मन की प्रसन्नता; दुश्चिकित्स्य रोगों में सन्निपात जन्य रोग; विषम चिकित्सा (कठिन) व ले रोगों में आमजन्य रोग; सब रोगों में ज्वर; दीर्घ रोगों में कुष्ठ; रोग समूहों में राजयक्ष्मा; आनुषङ्गिक रोगों में प्रमेह; अनुशस्त्रों में, जोंक, तंत्रों में बस्ति; औषध-भूमियों में हिमालय, आरोग्य देशों में मरुभूमि; अहितकारी देशों में जल- प्राय प्रदेश (जैसे बंगाल), रोगी के चारों गुणों में वैद्य के आदेशानुसार काम करना; चिकित्सा के चारों अंगों में वैद्य; त्याज्य वस्तुओं में नास्तिक; दुःखदायक कारणों में लोभ; अरिष्ट अर्थात् मृत्यु-कारणों में कहे के अनुसार न चलना; रोग
२८८ चरकसंहिता [ अ० २५ के लक्षणों में मन की दुश्चिन्ता; शोक, सन्देह मिटानेवालों में वैद्यों का समूह अर्थात् बहुत वैद्यों का होना; वैद्य के गुणों में देश काल के अनुसार चिकित्सा करना; ओषधियों में यथार्थ ज्ञान; ज्ञानसाधनों में शास्त्र सहित तर्क; काल ज्ञान समयानुसार काम करना; व्यवसाय न करना-समय के नाश करने वाले कारणों में, कर्म का देखना सन्देह को मिटाने वाली वस्तुओं में; भय करनेवाले कार्योंमें असामर्थ्य; बुद्धि बढ़ाने वाले कारणों में उस विद्या को जानने बालों से बात- चीत; शास्त्र के तत्त्व को जानने के लिये आचार्य; अमृर्तों में आयुर्वेद, कर्त्तव्य कार्यों में उत्तम सत्य बचन, सब अहितकारी वस्तुओं में 'असत्य' का सेवन; सब प्रकार के सुखों में; संन्यास ( सर्वस्व त्याग ) श्रेष्ठ अर्थात् श्रेयस्कर है ॥ भवन्ति चात्र—अग्र्याणां शतमुद्दिष्टं यद् द्विपञ्चाशदुत्तरम् । अलमेतद्विकाराणां विघातायोपदिश्यते ॥ ३९ ॥ इस प्रकार से १५२ ( एक सौ बावन ) श्रेष्ठ पदार्थ कहे हैं, ये विकार अर्थात् रोगों के नाश करने के लिये पर्याप्त हैं ॥ ३६ ॥ समानकारिणो येऽर्थास्तेषां श्रेष्ठस्य लक्षणम् । ज्यायस्त्वं कार्यकारित्वेऽवरत्वं चाप्युदाहृतम् ॥ ४० ॥ वातपित्तकफेभ्यश्च यद्यत्प्रशमने हितम् । प्राधान्यतश्च निर्दिष्टं यद् व्याधिहरमुत्तमम् ॥ ४१ ॥ एतन्निशाम्य निपुणं चिकित्सां संप्रयोजयेत् । एवं कुर्वन् सदा वैद्यो धर्मकामौ समश्नुते ॥ ४२ ॥ पथ्यं पथोऽनपेतं यद्यच्चोक्तं मनसः प्रियम् । यच्चाप्रियमपथ्यं च नियतं तन्न लक्षयेत् ॥ ४३ ॥ मात्रा-काल-क्रिया-भूमि-देह-दोष-गुणान्तरम् । प्राप्य तत्तद्धि दृश्यन्ते ते ते भावास्तथा तथा ॥ ४४ ॥ तस्मात्स्वभावो निर्दिष्टस्तथा मात्रादिराश्रयः । तदपेक्ष्योभयं कर्म प्रयोज्यं सिद्धिमिच्छता ॥ ४५ ॥ जो पदार्थ शरीर के दोषों को समान करते हैं, या समान अवस्था में रहने देते हैं वे श्रेष्ठ का लक्षण है । इन के कार्य करने की शक्ति से ही श्रेष्ठ और हीन भेद किये हैं । ( यथा—लोहितशालयः शूकधान्यानां श्रेष्ठतमाः, उदकमा- श्वासकराणां श्रेष्ठम् ) । इसी प्रकार वात, पित्त, कफ के नाश के लिये जो वस्तु मुख्य रूप में श्रेष्ठ है और जो रोग को नष्ट करने के लिये उत्तम है, इन को जानकर चिकित्सा का आरम्भ करना चाहिये । इस प्रकार करने से वैद्य को
अ० २५ ] १६ सूत्रस्थानम् २८६
अ० २५ ] १६ सूत्रस्थानम् २८६ धर्म और काम दोनों मिलते हैं। शरीर और मन के लिये जो प्रिय या हितकर हों, वे पथ्य हैं और जो शरीर और मन के लिये अप्रिय हों वे अपथ्य हैं, ऐसा लक्षण नहीं समझना चाहिये । क्योंकि मात्रा (जैसे-घृत पथ्य होते हुए भी अधिक मात्रा में अपथ्य है), काल (वसन्त में घी अपथ्य है), क्रिया (घृत विरुद्ध द्रव्य के साथ अपथ्य है), भूमि (जल बहुत देश में अपथ्य है)। देह (अतिस्थूल शरीर में घी अपथ्य है), दोष (कफ दोष में घी अपथ्य है) से भेद हो जाता है। इसी प्रकार विष भी पथ्य हो जाता है (यथा—'उदरे विषं तिलं दद्यात्।' उदर रोगों में तिलमात्र विष देना चाहिये)। इस प्रकार पथ्य वस्तु अपथ्य हो जाती है और अपथ्य वस्तु पथ्य बन जाती है, इसलिये जो वैद्य यश की इच्छा करते हों, उन को वस्तु के स्वभाव, प्राकृतिक गुण और मात्रा, काल आदि का विचार करके प्रयोग करना चाहिये ॥ ४०-४५ ॥ तदात्रेयस्य भगवतो वचनमनुनिशम्य पुनरपि भगवन्तमात्रेयमग्नि- वेश उवाच—यथोद्देशमभिनिर्दिष्टः केवलोऽयमर्थो भगवता श्रुतस्त्व- स्माभिः । आसवद्रव्याणामिदानीं लक्षणमनतिसंक्षेपेणोपदिश्यमानं शुश्रूषामह इति ॥ ४६ ॥ आत्रेय ऋषि के वचन को सुनकर फिर भी अग्निवेश भगवान् आत्रेय मुनि से पूछने लगे। हे महाराज ! आपने प्रतिज्ञानुसार पथ्यापथ्य का प्रधान विषय सम्पूर्ण रूप से प्रतिपादन कर दिया है। इस समय आसव द्रव्यों के लक्षणों को विस्तार में आपसे सुनना चाहते हैं ॥ ४६ ॥ तमुवाच भगवानात्रेयः—धान्य-फल-मूल-सार-पुष्प-काण्ड-पत्र-त्वचो भवन्त्यासवयोनयोऽग्निवेश ! संग्रहेणाष्टौ शर्करा नवमीकाः, तास्वेव द्रव्य- संयोगकरणतोऽपरिसंख्येयासु यथापथ्यतमानामासवानां चतुरशीतिं निबोध । तद्यथा—सुरा-सौवीर-तुषोदक-मैरेय-मेदक-धान्याम्लाः षड् धान्यासवा भवन्ति, मृद्वीका-खर्जूर-काश्मर्य-धन्वन-राजादन-तृणशून्य- परूषकाभयामलक-मृगलिण्डिका-जाम्बव- कपित्थ-कुवल - बदर-कर्कन्धु- पीलु-प्रियाल-पनस-न्यग्रोधाश्वत्थ-प्लक्ष-कपीतनोदुम्बराजमोद-शृङ्गाटक- शङ्खिनीभिः फलासवाः पञ्चविंशतिः। विदारिगन्धाश्वगन्धा-कृष्णगन्धा- शतावरी - श्यामा - त्रिवृद्दन्ती - बिल्बोत्थुबुक - चित्रक - मूलैरेकादश मूलासवाः। शालप्रियकैकवकर्ण-चन्दन-स्यन्दन-खदिर - कदर-सप्तप- र्णार्जुनासनारिमेद-विन्दुक-किणिही-शमी-शुक्ति-शिंशपा-शिरीष-वञ्जुल - धन्वन-मधूकैः सारासवा विंशतिः। पद्मोत्पल-नलिन-कुमुद-सौगन्धिक-
पुण्डरीक-शतपत्र-मधूक-प्रियङ्गु-धातकीपुष्पैर्दश पुष्पाप्तवा भवन्ति । इक्षु- काण्डेक्ष्विक्षुबालिका-पुण्ड्रक-चतुर्थाः काण्डाप्तवा भवन्ति । पटोल-ता- डपत्रासवौ द्वौ भवतः । तिल्वक-लोध्रैलबालुक-क्रमुक-चतुर्थास्त्वगासवा भवन्ति, शर्करासब एक एवेति । एवमेषामासवानां चतुरशीतिः परस्प- रेणासंस्पृष्टानामासवद्रव्याणामुपनिर्दिष्टा भवति । एषामासवानामासु- तत्त्वादासकसंज्ञा । द्रव्य-संयोग-विभागस्त्वेषां बहुविकल्पः संस्कारश्च । यथास्वं योनिसंस्कारसंस्कृताश्चाऽऽसवाः स्वकर्म कुर्वन्ति । संयोग- संस्कार-देश-काल-स्थापन-मात्रादयश्च भावास्तेषां तेषामासवानां ते ते समुपदिश्यन्ते तत्तत्कार्यमभिसमीक्ष्येति ॥ ४७ ॥ अग्निवेश को भगवान् आत्रेय ने कहा—हे अग्निवेश ! संक्षेप से उन सब के उत्पत्ति स्थान ६ ( नौ ) हैं । यथा— धान्य, फल, मूल, सार, पुष्प, काण्ड, पत्र, त्वचा, (छाल) और शर्करा । इन्हीं में द्रव्यसंयोग (मिश्रण), करण (संस्कार) द्वारा असंख्येय आसव बन जाते हैं । इनमें अधिक हितकारी (मुख्य) आसव २४ ( चौबीस ) हैं । उनको कहते हैं— सुरा, सौवीरक, तुषोदक, मैरेय और मेदक और धान्याम्ल—ये छः धान्या- म्बुक (कांजी) आसव होते हैं १ । द्राक्षा, खजूर, गम्भारी, धान्वन, राजादन (खिरनी), तृणशून्य (केतकी), परूषक (फालसा), अभया (हरड़), आमलक (आंवला), मृगलिण्डिका (बहेड़ा ?), जाम्भव (जामुन), कपित्थ (कैथ), कुवल (बड़ा बेर), बदर (छोटा बेर), कर्कन्धु (झाड़ी का बेर), पीलु, पियालु (प्याल), पनस (कटहल), न्यग्रोध (बड़), अश्वत्थ (पीपल), प्लक्ष (पिलखन), कपीतन, उदुम्बर (गूलर), अजमोद (अजवायन), शृङ्गाटक (सिंघाड़ा), और शंखिनी, ये छब्बीस फलासव हैं । विदारीगन्धा (शालपर्णी), अश्वगन्धा (असगन्ध), कृष्णागन्धा (शोभाञ्जन), शतावरी, निशोथ, जमाल गोटा, द्रवन्ती (मुगलई ऐरण्ड), बेलगिरी, एरण्डमूल, चीतामूल, ये ग्यारह मूलासव हैं । बड़ासाल, अश्वकर्ण (साल भाग), चन्दन, तीनस, खैर, सफेद खैर, सलवन, अर्जुन, असन, अरिमेद (विट् खदिर), तिन्दुक, किणिही (अपामार्ग), शमी (जंड), शुक्ति (बेर), शीशम, सिरस, अशोक, | धान्वन और मुलेहठी ये बीस 'सारासव' है । पद्म (लाल आठ पत्तों वाला), उत्पल (नील कमल), कुमुद, सौगन्धिक, पुण्डरीक, (श्वेत कमल), शतपत्र_
१. सौवीरं निष्तुषयवकृतम्, मैरेयं सुरासवकृता सुरा, मेदकः श्वेतसुर जगलाख्या, धान्याम्बु (काञ्जि) ।
अ० २५ ] सूत्रस्थानम् २६१
अ० २५ ] सूत्रस्थानम् २६१ कमल, मधूक ( महुवे के फूल ), प्रियंगु, धाय के पुष्प, ये दस 'पुष्पासव' हैं । गन्ना, इक्षुवालिका ( गन्ने के ऊपर का भाग ), गन्ने की जड़, पौण्डा ये चार 'काण्डासव' हैं । परवल और ताड़ के पत्ते ये दो 'पत्रासव' होते हैं । तिल्वक ( शाबर लोध ), लोध ( पठानी लोध ), एलवालुक, क्रमुक ये चार 'त्वगासव' हैं । शर्करासव एक ही है । इस प्रकार एक एक द्रव्य से बनने वाले ये ८४ ( चौरासी ) आसव हैं । आसुत अर्थात् सत के खिंच जाने से इन को 'आसव' कहते हैं । द्रव्यों के संयोग और विभाग से ये बहुत प्रकार के और असंख्य बन जाते हैं । आसव अपने संयोग तथा संस्कार के अनुसार अपना कार्य करते हैं । संयोगसंस्कार से अभिप्राय देश ( भस्मराशि, धान्यराशि ), काल ( पन्द्रह दिन, एक मास ), स्थापन ( सन्धान ), मात्रा आदि ( द्रव्यस्वभाव ) से है । कार्य की अपेक्षा से ही आसवों के संयोग संस्कार रूपी कार्य किये जाते हैं ॥ ४७ ॥ भवति चात्र-मनःशरीराग्नि-बल-प्रदानाम्स्वप्न-शोकारुचि-नाशनानाम् । संहर्षणानां प्रवरासवानांमशीतिरुक्ता चतुरुत्तरैषा ॥ ४८ ॥ तत्र श्लोकः— शरीररोगप्रकृतौ मतानि तत्त्वेन चाऽऽहारविनिश्चयो यः । उवाच यज्जःपुरुषादिकेऽस्मिन्मुनिस्तथाऽग्र्याणि वरासवांश्च ॥ ४९ ॥ मन, शरीर, अग्नि को बल देनेवाले, नींद न आना, शोक और अरुचि को मिटाने वाले, मन में प्रसन्नता करने वाले ये उत्तम ( श्रेष्ठ ) ८४ आसव कह दिये । शरीर एवं रोगों की उत्पत्ति, ऋषियों के मत, आहार की हिताहित-विधि का अन्तिम सार, पथ्यापथ्य और श्रेष्ठ आसव इस अध्याय में कह दिये हैं। इत्यग्निवेशकृते तन्त्रे चरकप्रतिसंस्कृते सूत्रस्थाने अन्नपानचतुष्के यज्जःपुरुषीयोऽध्यायः पञ्चविंशतितमः समाप्तः ॥ ————— षड्विंशोऽध्यायः । ————— अथात आत्रेयभद्रकाप्यीयमध्यायं व्याख्यास्यामः ॥ १ ॥ इति ह स्माऽऽह भगवानात्रेयः ॥ २ ॥ अब 'भद्रकाप्यीय' अध्याय का व्याख्यान करेंगे जैसा भगवान् आत्रेय ने कहा था ॥ १-२ ॥
२६२ चरकसंहिता [ अ० २६
आत्रेयो भद्रकाप्यश्च शाकुन्तेयस्तथैव च । पूर्णाक्षश्चैव मौद्गल्यो हिरण्याक्षश्च कौशिकः ॥ ३ ॥ यः कुमारशिरा नाम भरद्वाजः स चानघः । श्रीमान् वार्योविदश्चैव राजा मतिमतां वरः ॥ ४ ॥ निमिश्च राजा वैदेहो बडिशश्च महामतिः । काङ्कायनश्च बाह्लीको बाह्लीकभिषजां वरः ॥ ५ ॥ एते श्रुतवयोवृद्धा जितात्मानो महर्षयः । वने चैत्ररथे रम्ये समीयुर्विजिहीर्षवः ॥ ६ ॥ तेषां तत्रोपविष्टानामित्यर्थवती कथा । बभूवार्थविदां सम्यग्रसाहारविनिश्चये ॥ ७ ॥ आत्रेय, भद्रकाप्यीय, शाकुन्तेय, पूर्णाक्ष, मौद्गल्य, हिरण्याक्ष, कौशिक, भरद्वाज कुमारशिर, विद्वच्छ्रेष्ठ वार्योविद, वैदेहमहाराज निमि, महाराज बडिश, बाह्लीक देशी भिषजों में श्रेष्ठ बाह्लीक (बलख देशीय), कांकायन ये ज्ञानवृद्ध वयोवृद्ध और जितेन्द्रिय महर्षि चैत्ररथ नामक सुन्दर वन में बिहार करते थे । वहां इन के एक साथ बैठने पर रस द्वारा आहार के निर्णय करने के लिये आपस में गोष्ठी आरम्भ हुई ॥३-७॥ एक एव रस इत्युवाच भद्रकाप्यो यं पञ्चानामिन्द्रियार्थानामन्य- तमं जिह्वावैषयिकं भावमाचक्षते कुशलाः, स पुनरुदकानन्य इति । द्वौ रसाविति शाकुन्तेयो ब्राह्मणश्छेदनीयश्चोपशमनीयश्चेति । त्रयो रसा इति पूर्णाक्षो मौद्गल्यश्छेदनीयोपशमनीयौ साधारणश्चेति । चत्वारो रसा इति हिरण्याक्षः कौशिकः स्वादुहितश्च स्वादुरहितश्चास्वादुर्हि- तश्चेति । पञ्च रसा इति कुमारशिरा भरद्वाजो भौमोदकाग्नेयवायवी- यान्तरिक्षाः । षडूसा इति निमिर्वैदेहो मधुरारम्ल-लवण-कटुक-तिक्त-कषाय- क्षाराः । अष्टौ रसा इति बडिशो धामार्गवो मधुरारम्ल-लवण-कटु-तिक्त-क- षाय-क्षाराव्यक्ताः । अपरिसंख्येया रसा इति काङ्कायनो बाह्लीक-भिष- क्,आश्रय-गुण-कर्म-संस्वाद-विशेषाणामपरमेयत्वात् ॥ ८ ॥ भद्रकाप्य ऋषि बोले कि—'रस' एक ही है जिसको कि पांचों इन्द्रियों के विषयों में से एक जिह्वा का ही विषय कहते हैं, वह 'रस' पानी से अभिन्न है और एक ही है । शाकुन्तेय ब्राह्मण ने कहा कि—'रस' दो हैं, एक छेदनीय और दूसरा उपशमनीय (अर्थात् अपतर्पण-कारक और बृंहणकारक) । पूर्णाक्ष मोद्गल्य ऋषि बोले कि—तीन रस हैं । यथा—छेदनीय, उपशमनीय और साधारण अर्थात् आग्नेय और सौम्य गुणों की समानता से लंघन, बृंहण दोनों कार्य करने वाला । हिर-
अ० २६ । सूत्रस्थानम् २८३
अ० २६ । सूत्रस्थानम् २८३ ण्याक्ष कौशिक ने कहा कि—'रस' चार हैं। स्वादु ( प्रिय ) हितकारी, स्वादु अहित, अस्वादु हित और अस्वादु अहित । कुमारशिरा भरद्वाज ने कहा कि—रस पांच हैं। भौम ( पृथ्वी का ), उदक (पानी का), आग्नेय (तेज का), वायवीय ( वायु का ) और आन्तरिक्ष (आकाश का) ये पांच रस हैं। राजर्षि वार्योविद बोले—'रस' छः हैं। गुरु, लघु, शीत, उष्ण, स्निग्ध और रूक्ष । बदेह निमि ने कहा— रस सात हैं। मधुर, अम्ल, लवण, तिक्त, कटु, कषाय और क्षार । धामार्गव बडिश बोले—रस आठ हैं। यथा—मधुर, अम्ल, लवण, कटु, तिक्त, कषाय, क्षार और अव्यक्त । बाह्लीकभिषक् कांकायन ने कहा कि—'गुण ( गुरु लघु आदि ), कर्म ( धातु वर्धन क्षयण आदि ), संस्वाद ( रसों के नाना अवान्तर भेद ) भेदों से रस अगणित बन जाते हैं ॥ ८ ॥ षडेव रसा इत्युवाच भगवानात्रेयः पुनर्वसुर्मधुराम्ल-लवण-कटु-तिक्त- कषायाः । तेषां षण्णां रसानां योनिरुदकं, छेदनोपशमने द्वे कर्मणी, तयो- र्मिश्रीभावात्साधारणत्वं, स्वाद्वस्वादुता भक्तिः, हिताहितौ द्वौ प्रभावौ । पञ्चमहाभूतविकारास्त्वाश्रयाः प्रकृति-विकृति-विचार-देश-कालवशाः, तेष्वाश्रयेषु द्रव्यसंज्ञकेषु गुणा गुरु-लघु-शीतोष्ण-स्निग्ध-रूक्षाद्याः । क्षरणात्क्षारो नासौ रसः, द्रव्यं तदनेकरससमुत्पन्नमनेकरसं कटुक-ल- वण-भूयिष्ठमनेकेन्द्रियार्थसमन्वितं करणाभिनिर्वृत्तम् । अव्यक्तीभावस्तु खलु रसानां प्रकृतौ भवत्यनुरसेऽनुरससमन्विते वा द्रव्ये । अपरिसंख्ये- यत्वं पुनस्तेषामाश्रयादीनां भावानां विशेषापरिसंख्येयत्वान्न युक्तं, एकैकोऽपि हि पुनरेषामाश्रयादीनां भावानां विशेषानाश्रयते विशेषाप- रिसंख्येयत्वात् । न च तस्मादन्यत्वमुपपद्यते । परस्पर-संसृष्ट-भूयिष्ठ- त्वान्न चैषामभिनिर्वृत्तेर्गुणप्रकृतीनामपरिसंख्येयत्वं भवति, तस्मान्न संसृष्टानां रसानां कर्मोपदिशन्ति बुद्धिमन्तः । तञ्चैव कारणमपेक्षमाणाः षण्णां रसानां परस्परेणांसंसृष्टानां लक्षणपृथक्त्वमुपदेक्ष्यामः ॥ ६ ॥ पुनर्वसु भगवान् आत्रेय ने कहा कि—रस छः ही हैं। यथा—मधुर, अम्ल, लवण, कटु, तिक्त और कषाय । इन छः रसों की उत्पत्ति का स्थान पानी ही है। छेदन और उपशमन ये दोनों कर्म हैं, इन दोनों कर्मों के मिल जाने से साधारण हो जाता है । स्वादु और अस्वादु यह रुचि हैं, हित और अहित प्रभाव हैं । पंच महाभूत विकार हैं । वे रस के आश्रय स्थान हैं, वे रस नहीं हैं। गुरु, लघु, शीत, उष्ण, स्निग्ध, रूक्ष ये द्रव्यों में आश्रित गुण हैं, जो कि प्रकृति ( यथा—मूं ग, कषाय और मधुर स्वभाव से ही हैं इसलिये लघु हैं ),
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विकृति (चावलोँ से बने ताज़ा खील लघु और सत्तू बड़े भारी होते हैं), विचार (द्रव्यान्तर संयोग यथा—मधु और घी का मेल विष बनता है), देश (दो प्रकार का है यथा—भूमि और रोगी। भूमि जैसे—श्वेतकपोती वल्मीकाधिरूढ़ा विषहरी होती है, हिमालय की ओषधियां अधिक गुण युक्त होती हैं, शरीर देश जैसे टांग के मांस से कन्धे आदि का मांस गुरु होता है) और काल इन के भेद से बनते हैं। क्षार रस नहीं है। क्योंकि क्षरण किया जाने से, अनेक पदार्थों से उत्पन्न होने के कारण अनेक रस होने से, कटुक, लवण आदि रसों का अनुभव होने से, क्षार में स्पर्श और गन्ध होने से यह द्रव्य है, रस नहीं, और हेत्वन्तर अर्थात् अन्य कारण—भस्म स्राव आदि से बनने के कारण, रस नहीं है। 'अव्यक्त' भी रस नहीं। क्योंकि अव्यक्तता तो कारण में ही है। (रसों के कारण जल में ही अव्यक्तता है)। इस के अतिरिक्त अनुरस में अव्यक्तीभाव होता है। रस के पीछे जो रस होता है, वह अनुरस है। यथा— रूक्षः कषायानुरसो मधुरः कफपिच्छला। यथा—विष के विषय में ('उष्णमनिर्दें- श्यरसम्')। अथवा अनुरसयुक्त द्रव्य में अव्यक्तता होती है। और जो यह कहा है कि रसों के आश्रय आदि भावों के असंख्य होने से रस भी असंख्य हैं, यह ठीक नहीं। क्योंकि एक-एक रस इन आश्रय रूपी भावों में से किसी एक भाव का आश्रय करके विशेष रूप से रहता है (यथा—चावल, मूंग, घृत, दूध आदि वस्तुओं में मधुर रस के आश्रय की भिन्नता रहने पर भी मधुरत्व रस समान है, जिस प्रकार की बगुला, दूध, और कपास में आश्रय भेद होने पर भी सफेद रंग समान है)। आश्रय आदि असंख्य हैं। इसलिये छः से भिन्न अन्य रस का होना सम्भव नहीं। और यदि कहो कि रसों के परस्पर मिलने से रस असंख्य हो जायेंगे ? यह भी ठीक नहीं, क्योंकि परस्पर मिलने पर भी इनके गुरु, लघु आदि गुण या मधुर आदि स्वभाव अथवा आयुष्यवर्द्धक आदि असंख्य भेद हो जाते हैं। यहां पर भी मधुर आदि के प्रत्येक के गुण और प्रकृतियां जो कहीं हैं वे ही परस्पर मिलती हैं। इसलिये एक रस के दूसरे रस के साथ मिलने से और दोषों के दूसरे दोषों से मिलने पर भी रस असंख्य, अगणित नहीं होते। इसीलिये मिले हुए रसों के कर्मों का बुद्धिमान् उपदेश नहीं करते। और इसी कारण से परस्पर न मिले हुए छः रसों के लक्षणों को पृथक्-पृथक् कहेंगे ॥ ९ ॥
अग्रे तु तावद् द्रव्यभेदमभिप्रेत्य किंचिदभिधास्यामः। सर्वं द्रव्यं पाञ्चभौतिकमस्मिन्नर्थे। तच्चेतनावदचेतनं च, तस्य गुणाः शब्दादयो
अ० २६ ] सूत्रस्थानम् ७६५
अ० २६ ] सूत्रस्थानम् ७६५ गुर्वादयश्च द्रवान्ताः, कर्म पञ्चविधमुक्तं वमनादि । तत्र द्रव्याणि गुरु- खर-कठिन-मन्द-स्थिर-विशद-सान्द्र-स्थूल-गन्धगुण- बहुलानि पार्थिवानि, तान्युपचय-संघात-गौरव-स्थैर्य-कराणि; द्रव-स्निग्ध-शीतमन्द-मृदु-पि- च्छिल-रस-गुण-बहुलान्याप्यानि, तान्युत्क्लेद-स्नेह-बन्ध-विष्यन्द-मार्दव- प्रह्लाद-कराणि; उष्ण-तीक्ष्ण-सूक्ष्म-लघु-रूक्ष-विशद-रूपगुण-बहुलान्याग्ने- यानि, तानि दाह-पाक-प्रभा-प्रकाश-वर्ण-कराणि । लघु-शीत-रूक्ष-खर- विशद-सूक्ष्म-स्पर्श-गुणबहुलानि वायव्यानि, तानि रौक्ष्य-ग्लानि-विचार- वैशद्य-लाघव-कराणि; मृदु-लघु-सूक्ष्म-श्लक्ष्ण-शब्द-गुण-बहुलान्याकाशा- त्मकानि, तानि मार्दव-सौषिर्य-लाघव-कराणि ॥ १० ॥ इस के आगे आयुर्वेद के उपयोगी द्रव्यों के भेद को लेकर कुछ कहेंगे-यहां पर जो भी द्रव्य कहेंगे वे सब पांचभौतिक अर्थात् पांच महाभूतों से बने हैं। ये दो प्रकार के हैं, चेतना से युक्त और अचेतन । इस द्रव्य के जहां शब्दादि गुण हैं, वहां गुरु आदि (बीस) गुण हैं । द्रव्य का कर्म पांच प्रकार का है। यथा वमन, विरेचन, शिरोविरेचन, आस्थापन, अनुवासन । इन द्रव्यों में जो द्रव्य पार्थिव (पृथ्वीजन्य) है वे गुरु, कर्कश, कठोर, धीमे, स्थिर, विशद, (पृथक् पृथक् ), सान्द्र, स्थूल और गन्ध युक्त इन गुणों वाले प्रायः करके होते हैं। ये पार्थिव पदार्थ उपचय संघात, गौरव (भारीपन) और स्थिरता करते हैं। जलीय पदार्थ तरल, स्निग्ध शीत, मन्द, पिच्छिल और जलीयगुण युक्त प्रायः करके होते हैं। ये द्रव्य उत्क्ले द नमी, स्नेह, बन्धन परस्पर मिलाने वाले, कोमलता, प्रह्लाद शरीर इन्द्रियों का तर्पण करनेवाले हैं। अग्नि-गुणयुक्त अर्थात् आग्नेय द्रव्य गरम, तीक्ष्ण, सूक्ष्म, लघु, रूक्ष, विशद एवं रूप गुण में (अग्निबत्) होते हैं। ये द्रव्य जलन, पकाना, कान्ति, प्रकाश और वर्ण (रंग) को उत्पन्न करते हैं। वायवीय पदार्थ लघु, शीत, रूक्ष, खर, विशद, सूक्ष्म, स्पर्श गुण (वायवीय गुण) वाले होते हैं। ये शरीर में रूक्षता, ग्लानि, विचारों की निर्मलता और लघुता उत्पन्न करते हैं। आकाश गुण वाले द्रव्य मृदु, लघु, सूक्ष्म, स्रोतों में पहुंचाने वाला, चिकना एवं शब्द गुण आकाश गुण युक्त होते हैं। ये द्रव्य शरीर में मृदुता, सौषिर्य (छिद्राधिक्य) और लघुता उत्पन्न करते हैं ॥१०॥ अनेनोपदेशेन नानौषधिभूतं जगति किंचिद् द्रव्यमुपलभ्यते तां तां युक्तिमर्थं च तं तमभिप्रेत्य । न तु केवलं गुणप्रभावादेव कार्मुकाणि भवन्ति। द्रव्याणि हि द्रव्यप्रभावाद् गुणप्रभावाद् द्रव्यगुणप्रभावाच्च तस्मि- स्तस्मिन् काले तत्तदधिष्ठानमासाद्य तां तां च युक्तिमर्थं च तं तमभिप्रेत्य यत्कु-
२६६ चरकसंहिता [ अ० २६
र्व्वन्ति तत्कर्म, येन कुर्व्वन्ति तद्वीर्यं, यत्र कुर्व्वन्ति तदधिकरणं, यदा कुर्व्वन्ति स कालः, यथा कुर्व्वन्ति स उपायः, यत्साधयन्ति तत्फलम् ॥११। इस उपरोक्त उपदेश द्वारा जगत् में जो भी द्रव्य मिलते हैं, वे सब उपाय, प्रयोजन के उद्देश्य से औषध समझने चाहियें अर्थात् वे सब द्रव्य दोष- नाशक हैं, निरुपयोगी नहीं हैं। पार्थिवादि द्रव्य केवल गुरु खर आदि गुणों से औषध या दोष नष्ट करने वाले नहीं बन जाते, परन्तु द्रव्य द्रव्य के प्रभाव से, गुण के प्रभाव से, द्रव्य एवं गुण दोनों के प्रभाव से, उस उस समय में, उस अधिष्ठान का आश्रय लेकर, और उस योजना तथा प्रयोजन को लक्ष्य में करके जो करते हैं, उसका नाम 'कर्म' है, यथा-द्रव्य के प्रभाव से दन्ती ( जमाल गोटा ) विरेचक है, मणि आदि का धारण विष को दूर करता है । गुण के प्रभाव से—ज्वर में तिक्त रस, शीत में अग्नि । द्रव्य एवं गुण के प्रभाव से जैसे—कृष्णाजिन ( काली मृगछाला ) । यहां पर मृगछाला द्रव्य और कृष्ण गुण है। उसपर वे जो कार्य करते हैं। यथा—शिरोविरेचन द्रव्य शिर का विरेचन करते हैं, यह कर्म है। जिस के द्वारा ( उष्ण गुण के द्वारा शिरो विरेचन ) करते हैं वह 'वीर्य' अर्थात् 'शक्ति' है। जहां कर्म करते हैं, वह 'अधिकरण' है जैसे शिर । जिस समय करते हैं वह 'काल' है। जिस प्रकार करते है वह उपाय है । इस प्रकार से जो सिद्ध करते हैं वह फल है ॥११॥ भेदश्चैषां त्रिषष्टिविधविकल्पो द्रव्यदेशकालप्रभावाद् भवति, तमु- पदेक्ष्यामः ॥ १२ ॥ रसों के भेद इन छः रसों के द्रव्य प्रभाव से, देश प्रभाव से ( यथा-- हिमालय की द्राक्षा और दाडिम मीठे होते हैं दूसरे स्थानों के खट्टे ), काल प्रभाव से ( यथा-कच्चा आम और कसैला, कुछ बड़ा होने पर भी कच्चा आम खट्टा और पकने पर मीठा, इसी प्रकार हेमन्त में ओषधियां मीठी और वर्षा में खट्टी ), ( ६३ ) भेद बन जाते हैं ॥१२॥ यथा— स्वादुरम्लादिभिर्योगे शेषैरम्लादयः पृथक् । यान्ति पञ्चदशैतानि द्रव्याणि द्विरसानि तु ॥ १३ ॥ दो रस वाले पन्द्रह भेद हैं यथा—स्वादु ( मधुर ) और अम्ल के योग से पांच, अम्ल और लवण के योग से चार, लवण और कटु के योग से तीन, कटु, तिक्त और कषाय के योग से दो, तथा तिक्त और कषाय के योग से एक। जैसे— (१) मधुराम्ल ( २ ) मधुरलवण (३) मधुरकटु (४) मधुरतिक्त (५) मधुरकषाय ( ६ ) अम्ललवण ( ७ ) अम्लकटु ( ८ ) अम्लतिक्त ( ६ ) अम्लुकषाय (१०)
अ० २६ ] सूत्रस्थानम् २६७
अ० २६ ] सूत्रस्थानम् २६७ लवणकटु ( ११ ) लवणतिक्त ( १२ ) लवणकषाय ( १३ ) कटुतिक्त ( १४ ) कटुकषाय ( १५ ) तिक्तकषाय । १३॥ पृथगम्लादियुक्तस्य योगः शेषैः पृथग्भवेत् । मधुरस्य तथाऽम्लस्य लवणस्य कटोस्तथा ॥ १४ ॥ त्रिरसानि यथासंख्यं द्रव्याण्युक्तानि विंशतिः । तीन तीन रसों के २० भेद हैं, जैसे—( १ ) मधुर, अम्ल के साथ लवण आदि चारों का पृथक् २ योग होने से चार भेद । ( २ ) मधुर, लवण के साथ कटु आदि तीन का पृथक् २ योग होने से तीन भेद । ( ३ ) मधुर कटु का कटु, कषाय से पृथक् २ योग होने से दो भेद । (४) मधुर तिक्त का कषाय से योग होने से एक भेद । ( ४ ) अम्ल लवण का कटु आदि तीन के साथ योग होने से तीन भेद । ( ५ ) अम्ल कटु का तिक्त कषाय दो के साथ पृथक् पृथक् योग होने से दो भेद । ( ६ ) अम्ल तिक्त का कषाय से योग होने से एक भेद । ( ७ ) लवण कटु का तिक्त और कषाय दो से योग होने से दो भेद। ( ८ ) लवण तिक्त का कषाय से योग होने से एक भेद । ( ६ ) कटु तिक्त का कषाय से योग होने से १ भेद । जैसे—(१) मधुर अम्ल लवण, (२) मधुर अम्ल कटु, ( ३ ) मधुर अम्ल तिक्त ( ४ ) मधुर अम्ल कषाय । ( ५ ) मधुर लवण कटु, ( ६ ) मधुर लवण तिक्त, ( ७ ) मधुर लवण कषाय । ( ८ ) मधुर कटु तिक्त, ( ९ ) मधुर कटु कषाय । ( १० ) मधुर तिक्त कषाय । (११) अम्ल कटु तिक्त, ( १२ ) अम्ल कटु कषाय । ( १३ ) अम्ल तिक्त कषाय । ( १४ ) लवण कटु तिक्त, ( १५ ) लवण कटु कषाय । ( १६ ) अम्ल लवण कटु ( १७ ) अम्ल लवण तिक्त ( १८ ) अम्ल लवण कषाय । ( १६ ) कटु तिक्त कषाय, ( २० ) लवण तिक्त कषाय ॥१४॥ वक्ष्यन्ते तु चतुष्केण द्रव्याणि दश पञ्च च ॥ १५ ॥ स्वाद्वम्लौ सहितौ योगं लवणाद्यैः पृथग्गतौ । योगं शेषैः पृथग्यातश्चतुष्करससंख्यया ॥ १६ ॥ चार रसों के भेद पन्द्रह हैं । यथा---चार रसों ( स्वादु, अम्ल, लवण और कटु ), में एक एक रस का ( कटु, तिक्त, कषाय ) संयोग होने से छः रस बनते । इन में स्वादु और अम्ल रस स्थिर रहते हैं ॥१५-१६॥ सहितौ स्वादुलवणौ तद्वत्कट्वादिभिः पृथक् । युक्तौ शेषैः पृथग्योगं यातः स्वादूषणौ तथा ॥ १७ ॥ कट्वाद्यैरम्ललवणौ संयुक्तौ सहितौ पृथक् ।
२६८ चरकसंहिता [ अ० २६ यात: शेषै: पृथग्योगं शेषैरम्लकडू तथा ॥ १८ ॥ युज्येते तु कषायेण सतिक्तौ लवणोषणौ । स्वादु और लवण के साथ कटु, तिक्त, कषाय के योग से तीन, और लवण को छोड़कर स्वादु, कटु, तिक्त, कषाय के योग से एक, इस प्रकार से दस भेद हुए । अब स्वादु (मधुर) रस के छोड़ने से (अम्ल, लवण इन का कटु, तिक्त, कषाय के साथ योग होने से) तीन, लवण के छोड़ने से अम्ल, कटु, तिक्त और कषाय के योग से एक और मधुर, अम्ल रस को छोड़ने से लवण, कटु, तिक्त, कषाय, यह एक भेद, इस प्रकार से पन्द्रह भेद बन जाते हैं। जैसे—(१) मधुराम्ललवणकटु, (२) मधुराम्ललवणतिक्त, (३) मधुराम्ल- लवणकषाय, (४) मधुराम्लकटुतिक्त, (५) मधुराम्लकटुकषाय, (६) मधुराम्ल- तिक्तकषाय, (७) मधुरलवणकटुतिक्त, (८) मधुरलवण तिक्तकषाय, (६) मधुरलवणकषायकटु, (१०) मधुरकटुतिक्तकषाय, (११) अम्ललवणकटुतिक्त, (१२) अम्ललवणतिक्तकषाय, (१३) अम्ललवण कषायकटु, (१४) अम्ल- कटुतिक्तकषाय, (१५) लवणकटुतिक्तकषाय ॥ १७-१८ ॥ षट् तु पञ्चरसान्याहुरेकैकस्यापवर्जनात् ॥ १९ ॥ षट् चैवैकरसानि स्युरेकं षड्समेव तु । इति त्रिषष्टिर्द्रव्याणां निर्दिष्टा रससंख्यया ॥ २० ॥ त्रिषष्टिः स्यात्त्वसंख्येया रसानुरसकल्पनात् । रसास्तरतमत्वाभ्यां तां संख्यामतिपतन्ति हि ॥ २१ ॥ संयोगाः सप्तपञ्चाशत्कल्पना तु त्रिषष्टिधा । रसानां तत्र योग्यत्वात्कल्पिता रसचिन्तकैः ॥ २२ ॥ एक एक रस के छोड़ने से छः रस बनते हैं, (यथा—मधुर को छोड़ने से अम्ल, लवण, तिक्त, कटु, कषाय; अम्ल को छोड़ने से स्वादु, लवण, कटु, तिक्त, कषाय, इसी प्रकार लवण, कटु, तिक्त, कषाय के छोड़ने से छः रस)। (१) अम्ललवणकटुतिक्तकषाय (२) मधुरलवणकटुतिक्तकषाय (३) मधुराम्लकटु- तिक्तकषाय (४) मधुराम्ललवणतिक्तकषाय (५) मधुराम्ललवणकटुकषाय (६) मधुराम्ललवणकटुतिक्त । एक एक रस के छः भेद (यथा—मधुर, अम्ल, आदि) और सब मिलित होने से एक भेद, इस प्रकार से कुल मिलाकर तिरसठ (६३) रस जाते हैं। ये जो तिरसठ (६३) प्रकार के रसों के भेद कहे हैं, इन में एवं अनुरस की कल्पना नहीं की गई है। और यदि रस और अनुरस मिला दें,
[अ० २६ ] सूत्रस्थानम् : ६६
[Header] [अ० २६ ] सूत्रस्थानम् : ६६
[Body] तो असंख्य हो जाते हैं । इसी प्रकार रसों के तर-तम ( यथा—मधुरतर, मधुरतम आदि ) भेद से भी रस असंख्य-अगणित बन जाते हैं । इस प्रकार रसों के असंख्य होने पर भी आचार्यों ने चिकित्सा व्यवहार के लिये रसों के सत्तावन ( ५७ ) संयोग और मधुर, अम्ल, लवण, तिक्त, कटु, कषाय इन को मिलाकर तिरसठ ( ६३ ) भेदों की कल्पना कर रक्खी है ॥ १६-२२ ॥ क्वचिदेको रसः कल्प्यः संयुक्ताश्च रसाः क्वचित् । दोषौषधादीन् संचिन्त्य भिषजा सिद्धिमिच्छता ॥ २३ ॥ द्रव्याणि द्विरसादीनि संयुक्तांश्च रसान् बुधः । रसानेकैकशो वाऽपि कल्पयन्ति गदान् प्रति ॥ २४ ॥ यः स्याद्रसविकल्पज्ञः स्याच्च दोषविकल्पवित् । न स मुह्येद्विकाराणां हेतुलिङ्गोपशान्तिषु ॥ २५ ॥ कहीं पर एक रस की, कहीं पर मिलित रसों की, दोष ओषधि आदि ( देश, काल ) का विचार करके सफलता चाहने वाले वैद्य को कल्पना करनी चाहिये। जैसे—दो रस वाले द्रव्य ( मूं ग कषाय और मधुर होते हैं ), तीन रस वाले ( मधुराम्लकषायं च विष्टम्भि गुरु शीतलम्, पित्त-श्लेष्महरं भव्यम् ), चार रस वाले (जैसे-तिल, स्निग्धोष्णमधुरस्तिक्तकषायः कटुकस्तिलः । ) पांच रस ( जैसे- हरीतकी, शिवा पंचरसा ), छः रस ( अव्यक्त हो यथा—विष । 'विषन्त्वव्यक्तं षड्रससंयुक्तम्' या हरिण का मांस ) । एवं दो रस वाले रसों की या मिलित द्रव्य या रसों की कल्पना, अथवा एक एक रस की कल्पना रोगों के अनुसार करते हैं । जो मनुष्य रस के भेदों को भली प्रकार जानता है ( वह रोगों के कारण द्रव्य ज्ञान को भी अनिवार्य रूप से जान ही जायेगा ), एवं दोषों ( वातादि ) के लक्षणों को भी भली प्रकार से पहिचानता है, अथवा जो मनुष्य भेषज द्रव्यों को स्वरूप से एवं इन के प्रयोग विषय को जानता है, वह रोगों के कारण लक्षण, और शान्ति ( चिकित्सा ) में नहीं घबराता और भ्रम में नहीं फंसता ॥ २३-२५ ॥ व्यक्तः शुष्कस्य चाऽऽदौ च रसो द्रव्यस्य लक्ष्यते । विपर्ययेणानुरसो रसो नास्ति हि सप्तमः ॥ २६ ॥ अनुरस—शुष्क या गीले द्रव्य में जो रस जिह्वा के स्पर्श से स्पष्ट होता है, वह व्यक्त रस है । परन्तु जो रस इस प्रकार से ज्ञात नहीं होता अर्थात् पीछे द्वारा जाना जाता है, वह 'अनुरस' है । अथवा जो रस गीले द्रव्य में वह व्यक्त ( अनुरस ) और जो रस शुष्क होने पर स्पष्ट होता है वह
३०० चरकसंहिता [ अ० २६ 'रस' है । यथा—पिप्पली आर्द्रावस्था में मधुर, और शुष्क अवस्था में 'कटु' रस है । इसलिये कटु व्यक्त रस, और मधुर अव्यक्त अनुरस है । अथवा पीछे से जो रस अनुभव होता है, वह 'अनुरस' है । यथा—कांजी, तक्र आदि पदार्थों के पीने पर प्रथम जिस रस का अनुभव हो वह रस और जो पीछे स्पष्ट हो वह 'अनुरस' है । सातवां रस कोई पृथक् नहीं है ॥ २६ ॥ परापरत्वे युक्तिश्च संख्या संयोग एव च । विभागश्च पृथक्त्वं च परिमाणमथापि च ॥ २७ ॥ संस्कारोऽभ्यास इत्येते गुणा ज्ञेयाः परादयः । सिद्धयुपायाश्चिकित्सायां लक्षणैस्तान् प्रचक्ष्महे ॥२८॥ दस गुण—पर, अपर, युक्ति, संख्या, संयोग, विभाग, पृथक्त्व, परिणाम, संस्कार और अभ्यास ये दस गुण हैं । चिकित्सा में सफलता इन दस गुणों में आश्रित है । इनके लक्षण कहते हैं ॥ २७-२८ ॥ देश-काल-वयो-मान-पाक-वीर्य-रसादिषु । परापरत्वे, युक्तिस्तु योजना या च युज्यते ॥ २६ ॥ संख्या स्याद् गणितं, योगः सहसंयोग उच्यते । द्रव्याणां द्वन्द्वसर्वैककर्मजोऽनित्य एव च ॥ ३० ॥ विभागस्तु विभक्तिः स्याद्वियोगो भागशो ग्रहः । पृथक्त्वं स्यादसंयोगो वैलक्षण्यमनेकता ॥ ३१ ॥ परिमाणं पुनर्मानं, संस्कारः करणं मतम् । भावाभ्यसनमभ्यासः शीलनं सततक्रिया ॥ ३२ ॥ इति स्वलक्षणैरुक्ता गुणाः सर्वे परादयः । चिकित्सा यैरविदितैर्न यथावत् प्रवर्तते ॥ ३३ ॥ गुणा गुणाश्रया नोक्तास्तस्माद्रसगुणान भिषक् । विद्याद् द्रव्यगुणान् कर्तुरभिप्रायाः पृथग्विधाः ॥ ३४ ॥ अतश्च प्रकृतं बुद्ध्वा देशकालान्तराणि च । तत्र कर्तुरभिप्रायानुपायांश्चार्थमादिशेत् ॥ ३५ ॥ देश-मरुदेश पर और आनूप अपर । काल-विसर्ग पर, आदान अपर । वय-तरुण पर, बाल, वृद्ध अपर । मान-शरीर का कहा हुआ पर, इस के अन्य अपर । पाक, वीर्य और रस ये जिस योग के प्रति हों उसके लिये पर दूसरों के प्रति अपर पर-अपर यह देश, काल, वय, मान, वीर्य, रस आदि के अपेक्षा से हैं। जैसे मरुदेश-बंगाल की अपेक्षा पर है, और बंगाल-मरुदेशों वालो की अपेक्षा मे पर
अ० २६ ] सूत्रस्थानम् ३०१
अ० २६ ] सूत्रस्थानम् ३०१
है; इसी प्रकार वयमें बाल्यावस्था से योवनावस्था पर है और बाल्यावस्था अपर है पर-अपर अपेक्षा से है। अथवा सन्निकृष्ट, और विप्रकृष्ट भेद से पर-अपर भाव होता है। युक्ति योजना दोषादि के अपेक्षा से औषध की भली प्रकार कल्पना करना । संख्या-गिनती, एक, दो, तीन आदि । संयोग-द्रव्यों का परस्पर संयुक्त होना संयोग है। यह संयोग तीन प्रकार का होता है। १ द्वन्द्व (दो का जैसे-लड़ते हुए दो मेढ़ों का), २ सबका (जैसे-एक पात्र में रक्खे उड़दों का), और ३. एककर्मजन्य, (जैसे-वृक्ष पर बैठे कौवे का) यह संयोगजन्य कर्म अनित्य है। विभाग-विभजन, बांटना, भाग करना । संयोग का वियोग या विभाग रूप में ग्रहण होना विभाग है। पृथक्त्व-जिसके द्वारा यह बुद्धि उत्पन्न होती है कि यह वस्तु घड़े से भिन्न है वह पृथक्त्व है। यह तीन प्रकार का है। १ सर्वथा अभिन्न वस्तुओं का जैसे-मेरु और हिमालय का । २. विजातियों में जैसे- भैंस और सूअर का । ३. विलक्षणताजन्य-विशिष्ट लक्षण युक्त विजातियों से भेद, अनेकता-एक जातीय द्रव्यों के संयोग में रहने वाली भिन्नता का नाम 'अने कता' है, यथा-उड़दों में अनेकता मिलती है, सब उड़द एक समान नहीं होते । परिमाण-मान, तोल, वजन । संस्कार-किसी द्रव्य में जिस क्रिया से गुणान्तर उत्पन्न किया जाता है, उस क्रिया का नाम संस्कार है (संस्कारो हि गुणान्तराधानमुच्यते )। अभ्यास-किसी द्रव्य या क्रिया का निरन्तर उपयोग करना, व्यवहार करना, अभ्यास कहाता है। इस 'अभ्यास' को शील या निर- न्तर करना या आदत भी कहते हैं। इस प्रकार से पर आदि दस गुणों के लक्षण कह दिये हैं। यदि वैद्य को इनका पूरा ज्ञान न होगा तो चिकित्सा पूर्ण रूप में सफल नहीं हो सकेगी। अब तक रसों के परस्पर संयोगी गुण कहे हैं। अब स्निग्धत्वादि गुण कहते हैं। जो गुण कहे हैं, वे गुण रूप, रस आदि में आश्रित नहीं, अपितु रस के आधारभूत द्रव्य में आश्रित हैं। इसलिये रस के गुणों को भी द्रव्य का गुण समझना चाहिये, रस का नहीं। यथा-मधुर रस, स्निग्ध, शीत, गुरु है, इस का अर्थ यह है कि मधुर रस वाला द्रव्य स्निग्ध, शीत गुरु इन गुणों से युक्त है। गुण गुण का आश्रय करके नहीं रह सकते । इस प्रकार कहना ग्रन्थकार की शैली है। प्रत्येक ग्रन्थ को समझने के लिए ग्रन्थकार के अभि- प्राय को (उस के अभिप्राय के पृथक् होने से), प्रकरण, देश, और काल को भी जानना चाहिये । प्रकरण जैसे—"क्षारः क्षीरं फलं पुष्पम्” यहां पर वनस्पति प्रकरण होने से थूहर का दूध लेना चाहिये, गाय, भैंस का नहीं। देश-शिर शोधन कहने में, 'कृमिव्याधि' अर्थात् शिरोजन्य कृमि रोग में ऐसा समझना
३०२ चरकसंहिता [ अ० २६ चाहिये । काल—वमन काल में कहने पर 'प्रतिग्रहं चोपहारयेत्' अर्थात् वमन का पात्र लाओ । इसी प्रकार भोजन के समय 'सैन्धवमानय' कहने से नमक का लाना उचित है, न कि घोड़े का । इसलिये ग्रन्थकर्ता के अभिप्राय से रसों में गुणों का कथन समझना चाहिये । जहां पर प्रकरणगत देश काल आदि द्वारा ग्रन्थकर्ता का अभिप्राय स्पष्ट नहीं होता, वहां उपायों द्वारा तन्त्र-युक्ति रूपी उपायों से अर्थ को समझना चाहिये ।२९-३५॥ परं चातः प्रवक्ष्यन्ते रसानां षड् विभक्तयः । षट्पञ्च भूतप्रभवाः संख्याताश्च यथारसाः ॥ ३६ ॥ सौम्याः खल्वापोऽन्तरिक्षप्रभवाः प्रकृतिशीता लघ्व्यश्चाव्यक्त- रसाश्च; तास्त्वन्तरिक्षाद् भ्रश्यमाना भ्रष्टाश्चपञ्चमहाभूत-विकार-गुण-सम न्विता जङ्गमस्थावराणां भूतानां मूर्तीरभिप्रीणयन्ति, तासु मूर्तिषु षड- भिमूर्च्छन्ति रसाः ॥ ३७ ॥ पञ्च महाभूतों से उत्पन्न छः रसों को विभाग करके कहते हैं किस प्रकार से छः रस उत्पन्न होते हैं। सब रसों का उत्पत्तिस्थान पानी है। यह पानी सौम्य (सोमगुणी), अन्तरिक्ष से उत्पन्न होने वाला, स्वभाव से शीतल, लघु एवं 'अव्यक्त रस' है। यह पानी अन्तरिक्ष से नीचे गिरता हुआ अन्तरिक्ष में स्थित पृथिवी आदि के परमाणुओं से दूषित होकर, पञ्च महाभूतों से बने स्थावर (जड़) और जंगम (चल) पदार्थों को तर्पण करता है, इन पदार्थों के स्वरूप को बनाता है, उत्पन्न करता है। इन पदार्थों से ही छः रस अभिव्यक्त होते हैं॥३७॥ तेषां षण्णां रसानां सोमगुणातिरेकान्मधुरो रसः पृथिव्यग्नि- भूयिष्ठत्वादम्लः, सलिलाग्निभूयिष्ठत्वाल्लवणः, वाय्वग्निभूयिष्ठत्वा- त्कटुकः, वाय्वाकाशातिरेकात्तिक्तः, पवनपृथिव्यतिरेकात्कषाय इति। एवमेषां रसानां षट्त्वमुत्पन्नं, ऊनातिरेकविशेषान्महाभूतानां भूताना- मिव जङ्गमस्थावराणां नानावर्णाकृतिविशेषाः, षडृतुकत्वाच्च काल- स्योपपन्नो महाभूतानामूनातिरेकविशेषः ॥ ३८ ॥ यहां पर अन्तरिक्ष स्थित पानी को रसोत्पत्ति में मुख्य कारण माना है। इस से पृथिवी पर स्थित पानी भी स्थावर और जंगम पदार्थों में रस उत्पन्न करने में कारण है। इन छः रसों में सोम गुण के अधिक होने से (अर्थात् अन्य भूत भी थोड़ी २ मात्रा में हैं) मधुर रस, पृथिवी और अग्नि गुण की अधिकता से अम्ल, पानी और अग्नि गुण की अधिकता से लवण, वायु और अग्नि की अधिकता से कटु, वायु और आकाश गुण की अधिकता से तिक्त
अ० २६ ] सूत्रस्थानम् ३०३
अ० २६ ] सूत्रस्थानम् ३०३
वायु और पृथिवी गुण की अधिकता से कषाय रस उत्पन्न होता है । इस प्रकार से पञ्च महाभूतों के कम अधिक होने से छः रस उत्पन्न होते हैं । जिस प्रकार सम्पूर्ण स्थावर और जंगम पदार्थों में महाभूतों के कम अधिक होने से नाना प्रकार के वर्ण, रंग, आकृति, रूप आदि बन जाते हैं, उसी प्रकार छः रस भी बन जाते हैं। इसी प्रकार महाभूतों के कम अधिक होने से ही काल, संवत्सर छः ऋतुओं में विभक्त हो जाता है। यथा—हेमन्त काल में सोम गुण की अधिकता होती है, शिशिर ऋतु में वायु और आकाश गुण की अधिकता होती है । 'तावेतावर्कवायू' (च० सू० अ० ६) में स्पष्ट कर चुके हैं । बीजाङ्कुरवत् कार्य कारण की भांति संसार के अनादि होने से, पंच महाभूत और ऋतुओं का कार्यकारण सम्बन्ध समझना चाहिये ॥३८॥ तत्राग्निमारुतात्मका रसाः प्रायेणोर्ध्वभाजः, लाघवात्पवनत्वाच्च वायोरूर्ध्वज्वलनत्वाच्च वह्नेः, सलिलपृथिव्यात्मकस्तु प्रायेणाधोभाजः, पृथिव्या गुरुत्वान्निम्नगत्वाच्चोदकस्य, व्यामिश्रात्मकाः पुनरुभयतो- भाजः ॥ ३६ ॥ इन में अग्नि और वायु गुण की अधिकता वाले रसयुक्त द्रव्य प्रायः ऊर्ध्वगामी (वमनकारक) होते हैं। क्योंकि वायु हल्की और उड़ने वाली है। अग्नि का स्वभाव ऊपर को जलने का है, वह ऊपर को गति करता है, इसलिए इन गुणों वाले द्रव्य ऊर्ध्वगामी हैं। जल और पृथिवी गुण युक्त रस वाले द्रव्य प्रायः करके अधोगामी (विरेचनकारक) होते हैं। क्योंकि पृथिवी गुरु है और पानी का स्वभाव नीचाई की ओर बहना है। जिन पदार्थों में चारों तत्त्व मिले रहते हैं वे ऊर्ध्वगामी और अधोगामी दोनों तरह के होते हैं ॥ ३६ ॥ तेषां षण्णां रसानामेकैकस्य यथाद्रव्यं गुणकर्माण्यनुव्याख्यास्यामः। तत्र मधुरो रसः शरीरसात्म्याद्रस-रुधिर-मांस-मेदोऽस्थि-मज्जौजः-शुक्राभिव- र्धन आयुष्यः षडिन्द्रियप्रसादनो बलवर्णकरः पित्त-विष-मारुत-घ्नस्तृष्णा- प्रशमनस्त्वच्यः कण्ठ्यः प्रीणनो जीवनस्तर्पणो बृंहणः स्थैर्यकरः क्षीणक्षतसंधानकरो घ्राण-मुख-कण्ठौष्ठ-जिह्वा-प्रह्लादनो दाहमूर्च्छाप्रशमनः षट्पदपिपीलिकानामभीष्टतमः स्निग्धः शीतो गुरुश्च । स एवंगुणोऽप्येक एवात्यर्थमुपयुज्यमानः स्थौल्यं मार्दवमालस्यमतिस्वप्नं गौरवमनन्ना- भिलाषमग्निदौर्बल्यमास्यकण्ठमांसाभिवृद्धिं श्वास-कास-प्रतिश्यायालस- क-शीत-ज्वरानाहास्य-माधुर्य-वमथु-संज्ञास्वरप्रणाश-गलगण्डगण्डमा-
३०४ चरकसंहिता [अ० २६
ङा-श्लीपद-गलशोफ-बस्ति-धमनीगण्डोपलेपाक्ष्यामयानभिष्यन्दमित्येवं प्रभृतीन् कफजान् विकारानुपजनयति ॥ (१)॥ इन छः रसों में से एक-एक रस के आधार द्रव्य के अनुसार गुण, कर्म की व्याख्या करेंगे। इन में मधुर रस—जन्म से ही शरीर के अनुकूल (सात्म्य) है। (जन्म से ही मधुर रसयुक्त दूध को पीकर बच्चा बढ़ता है)। रस, रक्त, मांस, मेद, मज्जा, अस्थि, ओज और शुक्र को बढ़ाता है, आयुवर्द्धक, श्रोत्र, त्वक्, नासिका, चक्षु, रसना ये पांच ज्ञानेन्द्रिय और मन इन को प्रसन्न, निर्मल करता है। बलकारक, कान्तिकारक पित्त- नाशक, विषनाशक, वायुनाशक, तृष्णानाशक, त्वचा, केश, और स्वर के लिये हितकारी, आह्लादजनक, अभिघात आदि से बेहोश पुरुष को जीवन देने वाला, तृप्ति करने वाला, वृद्धि करने वाला, स्थिरकारक, क्षीण और क्षत व्यक्ति का पोषण करने एवं सन्धान अर्थात् टूटे का जोड़ने वाला नासिका, मुख, कण्ठ, ओष्ठ और जीभ का आह्लाद करने वाला, जलन और मूर्च्छानाशक, भ्रमर और चिऊंटियों का प्रिय, स्निग्ध, शीत और गुरु है। यद्यपि इस मधुर रस में इतने गुण हैं, तो भी इस अकेले रस को ही निरन्तर अधिक मात्रा में खाने से स्थूलता कोमलता, आलस्य, नींद की अधिकता, भारीपन, अन्न में अरुचि, अग्नि की निर्बलता, मुख (गाल), गले में मांस की वृद्धि, श्वास, कास, प्रतिश्याय, अलसक, शीत ज्वर, आनाह (अफारा), मुख की मधुरता, वमन, संज्ञानाश, स्वर नाश, गलगण्ड, गण्डमाला, श्लीपद, गले की सूजन, बस्ति, धमनी गुदा (गले में) में मांस, चर्बी या कफ कोई पदार्थ बढ़ जाता है, नेत्र रोग, अभिष्यन्द, कफ रोग (कफस्राव) आदि रोग उत्पन्न हो जाते हैं॥ अम्लो रसो भक्तं रोचयति, अग्निं दीपयति, देहं बृंहयति ऊर्जयति, वातमनुलोमयति, हृदयं तर्पयति, आस्यमास्रावयति, भुक्तमपकर्षयति, क्लेदयति, जरयति, प्रीणयति, लघुरुष्णः स्निग्धश्च । स एवंगुणोऽप्येक एवात्यर्थमुपयुज्यमानो दन्तान् हर्षयति, तर्षयति, संवीजयति लोमानि, कफं विलापयति, पित्तमभिवर्धयति, रक्तं दूषयति, मांसं विदहति, कायं शिथिलीकरोति, क्षीण-क्षत-कृश-दुर्बलानां श्वयथुमापादयति, अपिच क्षताभिहत-दष्ट-दग्ध-भग्न-शून-प्रच्युतावमूत्रित-परिसर्पित-मर्दित-च्छिन्न- भिन्न-विश्लिष्ट-विद्धोत्पिष्टादीन् पाचयत्याग्नेयस्वभावात् परिदह्यं कण्ठ-मुरो हृदयं च ॥ (२)॥ अम्ल रस अन्न में रुचि पैदा करता है, अग्नि को बढ़ाता है, शरीर
बढ़ाता है, तेज देता है, मन को उत्तेजित ( जाग्रत ) करता है । इन्द्रियों को बलवान् करता है, बल को बढ़ाता है वायु का अनुलोमन करता हैं, हृदय के लिये हितकारी है । मुख में लार चुआता है, खाये हुए भोजन को बाहर निका- लता है, क्लिन्न ( शरीर को गीला ) बनाता है । खाये भोजन को पचाता है, प्रसन्नता करता है लघु, उष्ण, स्निग्ध गुण वाला है ।। यही एक रस यदि अधिक मात्रा में सेवन किया जाय, तो दांतों को खोट करता है, ( खट्टा करता है ), तृप्ति अर्थात् भोजन में अनिच्छा उत्पन्न करता है, आंखों को मीचाता है, शरीर के बालों को कंपा देता है, ( रोमांचित करता है ), कफ को पिघलाता है, पित्त को बढ़ाता है, रक्त को दूषित करता है, मांस में जलन पैदा करता है, शरीर को ढीला ( सुस्त करता है ), क्षीण, उरः- क्षत रोगी, निर्बल, कमजोर पुरुषों में सूजन उत्पन्न करता है और भी जख्म, चोट, दांत लगे, जले, अस्थि आदिका टूटना, सूजन, सन्धिभ्रंश, प्राणियों के मूत्रजन्य विष, स्पर्शजन्य विष ( मकड़ी के ), रगड़ लगे हुए, दो टुकड़े हुए, चुभे हुए पिसे हुए आदि व्रणों को पका देता है । अग्निगुण होने से कण्ठ, छाती और हृदय में जलन उत्पन्न करता है ॥ (२) ॥ लवणो रसः पाचनः क्लेदनो दीपनश्च्यावनश्छेदनो भेदनस्तीक्ष्णः सरो विकाश्यधः संस्रंस्यवकाशकरो वातहरः स्तम्भ-बन्ध संघात-विधमनः सर्वरसप्रत्यनीकभूतः, आस्यमास्त्रावयति, कफं विष्यन्दयति, मार्गान् विशोधयति, सर्वशरीरावयवान्मृदूकरोति, रोचयत्याहारमाहारयोगी, नात्यर्थं गुरुः स्निग्ध उष्णश्च; स एवंगुणोऽप्येक एवात्यर्थमुपयुज्यमानः पित्तं कोपयति, रक्तं वर्धयति, तर्षयांत्, मूर्च्छयति, तापयति, दारयति, कुष्णाति मांसानि, प्रगाळयति कुष्ठानि, विषं वर्धयति, शोफान् स्फोटयति, दन्तांश्च्यावयति, पुंस्त्वमुपहन्ति, इन्द्रियाण्युपरुणद्धि, वली-पलित- खालित्यमापादयति, अपि च लोहित-पित्ताम्ल-पित्त-वीसर्प-वात-रक्त- विचर्चिकेन्द्रलुप्त-प्रभृतीन्वकारानुपजनयति ॥ ( ३ )॥ लवण रस—पाचक, नरम बनाने वाला, अग्निदीपक, नीचे गिराने वाला, छेदन भेदन करने वाला, तीक्ष्ण, सर ( मल लाने वाला ), विकाशी ( क्लेद का छेदन करने वाला ) अधःस्रंसी, विष्यन्दशील ( रेचक ) विरलता करने वाला वातनाशक, मल-मूत्रादि के अवरोध को नाश करने वाला और जहां पर जरा सा अधिक हो जाता है, वहां पर और कोई दूसरा रस स्पष्ट नहीं में थूक उत्पन्न करता है, कफ को पिघलाता है, मागों का शोधन
३०६ चरकसंहिता [ अ० २६ करता है, शरीर के सब अवयवों को कोमल करता है, आहार में रुचि उत्पन्न करता है, आहार में सदा बरता जाता है, बहुत भारी नहीं होता, स्निग्ध और उष्ण गुणवाला है। यही एक रस यदि अधिक सेवन किया जाय तो पित्त को कुपित करता है, रक्त को बढ़ाता है, प्यास उत्पन्न करता है, संज्ञा नाश करता है, शरीर को गरम करता है, फाड़ता है, मांस को गलाता है, कुष्ठों को द्रवित करता है, विष को बढ़ाता है, सूजन को फाड़ता है, दांतों को गिरा देता है, पुरुषत्व का नाश करता है, इन्द्रियों को जड़ बनाता है। झुर्रियां पैदा करता, बालों को श्वेत करता, गंज अर्थात् बालों को गिराता है। इसके अतिरिक्त रक्तपित्त, अम्लपित्त, वीसर्प, वातरक्त, विचर्चिका, इन्द्रलुप्त आदि रोगों को उत्पन्न करता है ॥(३)॥ कटुको रसो वक्त्रं शोधयति, अग्निं दीपयति, भुक्तं शोषयति, घ्राण- मास्रावयति, चक्षुर्विरेचयति, स्फुटीकरोतीन्द्रियाणि, अलसक-श्वयथूप- चयोदर्दाभिष्यन्द-स्नेह-स्वेद-क्लेद-मलानुपहन्ति, रोचयत्यशनं कण्डूर्विनाश- यति, क्रिमीन् हिनस्ति, मांसं विलिखति, शोणितसंघातं भिनत्ति, बन्धां- श्छिनत्ति, मार्गान्विवृणोति, श्लेष्माणं शमयति, लघुरुष्णो रूक्षश्च । स एवंगुणोऽप्येक एवात्यर्थमुपयुज्यमानो विपाकप्रभावात् पुंस्त्वमुपहन्ति, रसवीर्यप्रभावान्मोहयति, ग्लपयति, सादयति, कर्षयति, मूर्च्छयति, नमयति, तमयति, भ्रमयति, कण्ठं परिदहति, शरीरतापमुपजनयति, बलं क्षिणोति, तृष्णां चोपजनयति । अपिच वाय्वग्निबाहुल्याद् भ्रम-म- द-द्रवथु¹ कम्प-तोद भेदंश्चरण-भुज-पार्श्वपृष्ठ-प्रभृतिषु मारुतजान्विका- रानुपजनयति ॥ (४) ॥ कटु रस मुख का शोधन करता है, अग्नि को बढ़ाता है, खाये हुए भोजन को सुखाता है, नाक से कफ बहाता है, आंखों में आंसू लाता है, इन्द्रियों को उत्तेजित करता है, अलसक, सूजन, वृद्धि, उदर्द, अभिष्यन्द, स्नेह, पसीना, क्लेद, मल का नाश करता है। कृमियों को मारता है, मांस का लेखन करता है (स्थूलता को कम करता है)। खाये हुए भोजन का रेचन करता है, खाज को मिटाता है, व्रणों को बैठाता है, भरता है । जमे हुए रक्त को तोड़ता है, सन्धि-बन्धनों को छेदन करता है, मार्गों को साफ़ बनाता है, कफ को शान्त करता है । लघु, उष्ण और रूक्ष होता है । यही एक रस यदि अधिक मात्रा में सेवन किया जाय तो कटु । १. 'भ्रममदवमथु' इति च पाठः ।