भारतकोश
सन्त दादू दयाल वाणी (सन्त दादू दयाल जी - सम्पूर्ण साखी एवं पद सटीक)

सन्त दादू दयाल वाणी (सन्त दादू दयाल जी - सम्पूर्ण साखी एवं पद सटीक)

Sant Dadu Dayal Vani with Hindi Commentary

सन्त दादू दयाल जी द्वारा

DevanagariHindipublished504 पृष्ठ

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पृष्ठ 207

श्री दादूवाणी-सारग्राही का अंग 17

स्मरण नाम दादू काम धणी के नाम सौं, लोगन सौं कुछ नाहिं। लोगन सौं मन ऊपली, मन की मन ही मांहि ॥ 17 ॥ जाके हिरदै जैसी होइगी, सो तैसी ले जाइ। दादू तू निर्दोष रह, नाम निरंतर गाइ ॥ 18 ॥ दादू साध सबै कर देखना, असाध न दीसै कोइ। जिहिं के हिरदै हरि नहीं, तिहिं तन टोटा होइ ॥ 19 ॥ साधू संगति पाइये, तब द्वन्द्वर दूर नशाइ। दादू बोहिथ बैस करि, डूँडे निकट न जाइ ॥ 20 ॥ जब परम पदार्थ पाइये, तब कंकर दिया डार। दादू साचा सो मिले, तब कूड़ा काज निवार ॥ 21 ॥ जब जीवन-मूरी पाइये, तब मरबा कौन बिसाहि। दादू अमृत छाड़ कर, कौन हलाहल खाहि ॥ 22 ॥ जब मानसरोवर पाइये, तब छीलर को छिटकाइ। दादू हंसा हरि मिले, तब कागा गये बिलाइ ॥ 23 ॥ जहँ दिनकर तहँ निशि नहीं, निशि तहँ दिनकर नाहिं। दादू ऐकै द्वै नहीं, साधुन के मत मांहि ॥ 24 ॥ दादू ऐकै घोड़े चढ चलै, दूजा कोतिल होइ। दुहुँ घोड़ों चढ बैसतां, पार न पहुंता कोइ ॥ 25 ॥ इति श्री दादूदास-विरचिते सतगुरु-प्रसादेन प्रोक्तं भक्ति योगनाम तत्वसारमत-सर्वसाधुर्बुद्धिज्ञान-सर्वशास्त्र-शोधितं रामनाम सतगुरुशिक्षा धर्मशास्त्र-सत्योपदेश-ब्रह्मविद्यायां मनुष्य जीवनाम् नित्य-श्रवणं पठनं मोक्षदायकम् श्री दादूवाणीनाम् माहात्म्य सत्रहवां सारग्राही का अंग सम्पूर्ण ॥ अंग 17 ॥ साखी 25 ॥

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