सन्त दादू दयाल वाणी (सन्त दादू दयाल जी - सम्पूर्ण साखी एवं पद सटीक)
Sant Dadu Dayal Vani with Hindi Commentary
सन्त दादू दयाल जी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंश्री दादूवाणी-कस्तूरिया मृग का अंग 31 दादू जा कारण जग ढूंढ़िया, सो तो घट ही मांहि। मैं तैं पड़दा भरम का, तातैं जानत नांहि ॥ 5 ॥ दादू दूर कहैं ते दूर हैं, राम रह्या भरपूर। नैनहुं बिन सूझै नहीं, तातैं रवि कत दूर ॥ 6 ॥ ओडो हूवो पाण खे, न लघाऊं मंझ। न जाताऊं पाण में, तांई क्या ऊंपंध ॥ 7 ॥ दादू केई दौड़े द्वारिका, केई काशी जांहि। केई मथुरा को चले, साहिब घट ही मांहि ॥ 8 ॥ दादू सब घट मांही रम रह्या, बिरला बूझै कोइ। सोई बूझै राम को, जे राम सनेही होइ ॥ 9 ॥ दादू जड़मति जीव जाणै नहीं, परम स्वाद सुख जाइ। चेतन समझै स्वाद सुख, पीवै प्रेम अघाइ ॥ 10 ॥ जागत जे आनन्द करै, सौ पावै सुख स्वाद। सूते सुख ना पाइये, प्रेम गँवाया बाद ॥ 11 ॥ दादू जिसका साहिब जागणा, सेवक सदा सचेत। सावधान सन्मुख रहै, गिर गिर पड़े अचेत ॥ 12 ॥ दादू साँई सावधान, हम ही भये अचेत। प्राणी राख न जानहि, तातैं निष्फल खेत ॥ 13 ॥ सगुना निगुना कृतघ्नी दादू गोविन्द के गुण बहुत हैं, कोई न जाणै जीव। अपणी बूझै आप गति, जे कुछ किया पीव ॥ 14 ॥ इति श्री दादूदास-विरचिते सतगुरु-प्रसादेन प्रोक्तं भक्तियोगनाम तत्वसारमत- सर्वसाधुर्बुद्धिज्ञान-सर्वशास्त्र-शोधितं रामनाम सतगुरुशिक्षा धर्मशास्त्र- सत्योपदेश-ब्रह्मविद्यायां मनुष्य जीवनाम् नित्य-श्रवणं पठनं मोक्षदायकम् श्री दादूवाणीनाम् माहात्म्य इकतीसवां कस्तूरिया कअंग सम्पूर्ण ॥ अंग 31 ॥ साखी 14 ॥
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