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सन्त दादू दयाल वाणी (सन्त दादू दयाल जी - सम्पूर्ण साखी एवं पद सटीक)

Sant Dadu Dayal Vani with Hindi Commentary

सन्त दादू दयाल जी द्वारा

DevanagariHindipublished504 पृष्ठ

श्री दादूवाणी-कस्तूरिया मृग का अंग 31 दादू जा कारण जग ढूंढ़िया, सो तो घट ही मांहि। मैं तैं पड़दा भरम का, तातैं जानत नांहि ॥ 5 ॥ दादू दूर कहैं ते दूर हैं, राम रह्या भरपूर। नैनहुं बिन सूझै नहीं, तातैं रवि कत दूर ॥ 6 ॥ ओडो हूवो पाण खे, न लघाऊं मंझ। न जाताऊं पाण में, तांई क्या ऊंपंध ॥ 7 ॥ दादू केई दौड़े द्वारिका, केई काशी जांहि। केई मथुरा को चले, साहिब घट ही मांहि ॥ 8 ॥ दादू सब घट मांही रम रह्या, बिरला बूझै कोइ। सोई बूझै राम को, जे राम सनेही होइ ॥ 9 ॥ दादू जड़मति जीव जाणै नहीं, परम स्वाद सुख जाइ। चेतन समझै स्वाद सुख, पीवै प्रेम अघाइ ॥ 10 ॥ जागत जे आनन्द करै, सौ पावै सुख स्वाद। सूते सुख ना पाइये, प्रेम गँवाया बाद ॥ 11 ॥ दादू जिसका साहिब जागणा, सेवक सदा सचेत। सावधान सन्मुख रहै, गिर गिर पड़े अचेत ॥ 12 ॥ दादू साँई सावधान, हम ही भये अचेत। प्राणी राख न जानहि, तातैं निष्फल खेत ॥ 13 ॥ सगुना निगुना कृतघ्नी दादू गोविन्द के गुण बहुत हैं, कोई न जाणै जीव। अपणी बूझै आप गति, जे कुछ किया पीव ॥ 14 ॥ इति श्री दादूदास-विरचिते सतगुरु-प्रसादेन प्रोक्तं भक्तियोगनाम तत्वसारमत- सर्वसाधुर्बुद्धिज्ञान-सर्वशास्त्र-शोधितं रामनाम सतगुरुशिक्षा धर्मशास्त्र- सत्योपदेश-ब्रह्मविद्यायां मनुष्य जीवनाम् नित्य-श्रवणं पठनं मोक्षदायकम् श्री दादूवाणीनाम् माहात्म्य इकतीसवां कस्तूरिया कअंग सम्पूर्ण ॥ अंग 31 ॥ साखी 14 ॥

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निंदा का अंग www.dadooram.org अथ निन्दा का अंग ३२ मंगलाचरण दादू नमो नमो निरंजनं, नमस्कार गुरुदेवतः । वन्दनं सर्व साधवा, प्रणामं पारंगत: ॥ 1 ॥ मत्सर ईर्ष्या साधु निर्मल मल नहीं, राम रमै सम भाइ । दादू अवगुण काढ कर, जीव रसातल जाइ ॥ 2 ॥ दादू जब ही साधु सताइये, तब ही ऊँघ पलट। आकाश धँसै, धरती खिसै, तीनों लोक गरक ॥ 3 ॥

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श्री दादूवाणी-निंदा का अंग 32 निन्दा दादू जिहिं घर निंदा साधु की, सो घर गये समूल । तिनकी नींव न पाइये, नांव न ठांव न धूल ॥ 4 ॥ दादू निंदा नाम न लीजिये, स्वप्नै ही जनि होइ । ना हम कहैं, न तुम सुनो, हमें जनि भाषै कोइ ॥ 5 ॥ दादू निन्दा किये नरक है, कीट पड़ैं मुख मांहि । राम विमुख जामै मरै, भग-मुख आवै जाहि ॥ 6 ॥ दादू निंदक बपुरा जनि मरै, पर उपकारी सोइ । हम को करता ऊजला, आपण मैला होइ ॥ 7 ॥ दादू जिहिं विधि आतम उद्धरै, परसे प्रीतम प्राण । साधु शब्द क्यूं निंदणां, समझैं चतुर सुजाण ॥ 8 ॥ मत्सर ईर्ष्या अनदेख्या अनरथ कहैं, कलि पृथिवी का पाप । धरती अंबर जब लगै, तब लग करैं कलाप ॥ 9 ॥ अनदेख्या अनरथ कहैं, अपराधी संसार । जद तद लेखा लेइगा, समर्थ सिरजनहार ॥ 10 ॥ दादू डरिये लोक तैं, कैसी धरहिं उठाइ । अनदेखी अजगैब की, ऐसी कहैं बनाइ ॥ 11 ॥ अमिट पाप प्रचंड दादू अमृत कूँ विष, विष को अमृत, फेरि धरैं सब नाम । निर्मल मैला, मैला निर्मल, जाहिंगे किस ठाम ॥ 12 ॥ मत्सर ईर्ष्या दादू साचे को झूठा कहैं, झूठे को साचा । राम दुहाई काढिये, कंठ तैं वाचा ॥ 13 ॥ दादू झूठ न कहिये सच को, सच न कहिये झूठ । दादू साहिब मानै नहीं, लागै पाप अखूट ॥ 14 ॥

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श्री दादूवाणी-निंदा का अंग 32 दादू झूठ दिखावै साच को, भयानक भयभीत । साचा राता साच सौं, झूठ न आनै चीत ॥ 15 ॥ साचे को झूठा कहैं, झूठा साच समान । दादू अचरज देखिया, यहु लोगों का ज्ञान ॥ 16 ॥ निन्दा दादू निन्दक बुरा न कहिये, पर उपकारी अस कहाँ लहिये । ज्यों ज्यों निन्दैं लोग विचारा, त्यों त्यों छीजै रोग हमारा ॥ 17 ॥ इति श्री दादूदास-विरचिते सतगुरु-प्रसादेन प्रोक्तं भक्ति योगनाम तत्वसारमत-सर्वसाधुबुद्धिज्ञान-सर्वशास्त्र-शोधितं रामनाम सतगुरुशिक्षा धर्मशास्त्र-सत्योपदेश-ब्रह्मविद्यायां मनुष्य जीवनाम् नित्य-श्रवणं पठनं मोक्षदायकम् श्री दादूवाणीनाम् माहात्म्य बत्तीसवां निन्दा का अंग सम्पूर्ण ॥ अंग 32 ॥ साखी 17 ॥

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निगुणा का अंग www.dadooram.org अथ निगुणा का अंग ३३ मंगलाचरण दादू नमो नमो निरंजनं, नमस्कार गुरुदेवतः । वन्दनं सर्व साधवा, प्रणामं पारंगतः ॥ 1 ॥ सगुणा निगुणा कृतघ्नी दादू चंदन बावना, बसै बटाऊ आइ । सुखदाई शीतल किये, तीनों ताप नसाइ ॥ 2 ॥ काल कुहाड़ा हाथ ले, काटन लागा ढाइ । ऐसा यहु संसार है, डाल मूल ले जाइ ॥ 3 ॥

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श्री दादूवाणी-निगुणा का अंग 33 अज्ञ स्वभाव अपलट सतगुरु चन्दन बावना, लागे रहें भुवंग। दादू विष छाडैं नहीं, कहा करै सत्संग ॥ 4 ॥ दादू कीड़ा नरक का, राख्या चंदन मांहि। उलट अपूठा नरक में, चन्दन भावै नांहि ॥ 5 ॥ सतगुरु साधु सुजान है, शिष का गुण नहिं जाइ। दादू अमृत छाड़ कर, विषय हलाहल खाइ ॥ 6 ॥ कोटि बर्ष लौं राखिये, बंसा चन्दन पास। दादू गुण लिये रहै, कदे न लागै बास ॥ 7 ॥ कोटि वर्ष लौं राखिये, पत्थर पानी मांहि। दादू आडा अंग है, भीतर भेदै नांहि ॥ 8 ॥ कोटि वर्ष लौं राखिये, लोहा पारस संग। दादू रोम का अन्तरा, पलटै नांही अंग ॥ 9 ॥ कोटि वर्ष लौं राखिये, जीव ब्रह्म संग दोइ। दादू मांहीं वासना, कदे न मेला होइ ॥ 10 ॥ सगुणा निगुणा कृतघ्नी मूसा जलता देख कर, दादू हंस दयाल। मान सरोवर ले चल्या, पंखा काटे काल ॥ 11 ॥ सब जीव भुवंगम कूप में, साधु काढैं आइ। दादू विषहर विष भरे, फिर ताही को खाइ ॥ 12 ॥ दादू दूध पिलाइये, विषहर विष कर लेइ। गुण का औगुण कर लिया, ताही को दुख देइ ॥ 13 ॥ अज्ञ स्वभाव अपलट बिन ही पावक जल मुवा, जवासा जल मांहि। दादू सूखै सींचतां, तो जल को दूषण नांहि ॥ 14 ॥

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श्री दादूवाणी-निगुणा का अंग 33 सगुणा निगुणा कृतघ्नी सुफल वृक्ष परमार्थी, सुख देवै फल फूल। दादू ऊपर बैस कर, निगुणा काटै मूल ॥ 15 ॥ दादू सगुणा गुण करै, निगुणा मानै नांहि। निगुणा मर निष्फल गया, सगुणा साहिब मांहि ॥ 16 ॥ निगुणा गुण मानै नहीं, कोटि करै जे कोइ। दादू सब कुछ सौंपिये, सो फिर बैरी होइ ॥ 17 ॥ दादू सगुणा लीजिये, निगुणा दीजे डार। सगुणा सन्मुख राखिये, निगुणा नेह निवार ॥ 18 ॥ सगुणा गुण केते करै, निगुणा न मानै एक। दादू साधू सब कहैं, निगुणा नरक अनेक ॥ 19 ॥ सगुणा गुण केते करै, निगुणा नाखै ढाहि। दादू साधू सब कहैं, निगुणा निष्फल जाइ ॥ 20 ॥ सगुणा गुण केते करै, निगुणा न मानै कोइ। दादू साधु सब कहैं, भला कहाँ तैं होइ ॥ 21 ॥ सगुणा गुण केते करै, निगुणा न मानै नीच। दादू साधू सब कहैं, निगुणा के सिर मीच ॥ 22 ॥ साहिबजी सब गुण करै, सतगुरु के घट होइ। दादू काढै काल मुख, निगुणा न मानै कोइ ॥ 23 ॥ साहिबजी सब गुण करै, सतगुरु मांही आइ। दादू राखै जीव दे, निगुणा मेटै जाइ ॥ 24 ॥ साहिबजी सब गुण करै, सतगुरु का दे संग। दादू परलै राखिले, निगुणा न पलटै अंग ॥ 25 ॥ साहिब जी सब गुण करै, सतगुरु आडा देइ। दादू तारै देखतां, निगुणा गुण नहिं लेइ ॥ 26 ॥

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श्री दादूवाणी-निगुणा का अंग 33 सतगुरु दिया राम धन, रहै सुबुद्धि बताइ। मनसा वाचा कर्मणा, बिलसै वितड़ै खाइ ॥ 27 ॥ किया कृत मेटै नहीं, गुण ही मांहि समाइ। दादू बधै अनन्त धन, कबहुँ कदे न जाइ ॥ 28 ॥ इति श्री दादूदास-विरचिते सतगुरु-प्रसादेन प्रोक्तं भक्तियोगनाम तत्वसारमत-सर्वसाधुर्बुद्धिज्ञान-सर्वशास्त्र-शोधितं रामनाम सतगुरुशिक्षा धर्मशास्त्र-सत्योपदेश-ब्रह्मविद्यायां मनुष्य जीवनाम् नित्य-श्रवणं पठनं मोक्षदायकम् श्री दादूवाणीनाम् माहात्म्य तैंतीसवां निगुणा का अंग सम्पूर्ण ॥ अंग 33 ॥ साखी 28 ॥

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विनती का अंग अथ विनती का अंग ३४ मंगलाचरण दादू नमो नमो निरंजनं, नमस्कार गुरुदेवतः । वन्दनं सर्व साधवा, प्रणामं पारंगत: ॥ 1 ॥ करूणा दादू बहुत बुरा किया, तुम्हें न करना रोष। साहिब समाई का धनी, बन्दे को सब दोष ॥ 2 ॥ दादू बुरा बुरा सब हम किया, सो मुख कह्या न जाइ । निर्मल मेरा सांइयाँ, ताको दोष न लाइ ॥ 3 ॥ साँई सेवा चोर मैं, अपराधी बन्दा । दादू दूजा को नहीं, मुझ सरीखा गन्दा ॥ 4 ॥

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श्री दादूवाणी-विनती का अंग 34 तिल तिल का अपराधी तेरा,रती रती का चोर । पल पल का मैं गुनही तेरा, बख्शो अवगुण मोर ॥ 5 ॥ महा अपराधी एक मैं, सारे इहि संसार । अवगुण मेरे अति घणे, अन्त न आवैं पार ॥ 6 ॥ बे मर्यादा मित नहीं, ऐसे किये अपार । मैं अपराधी बापजी, मेरे तुम्हीं एक अधार ॥ 7 ॥ दोष अनेक कलंक सब, बहुत बुरे मुझ मांहि । मैं किये अपराध सब, तुम तैं छाना नांहि ॥ 8 ॥ गुनहगार अपराधी तेरा, भाजि कहाँ हम जाहिं । दादू देख्या शोध सब, तुम बिन कहीं न समाहिं ॥ 9 ॥ आदि अंत लौं आय कर, सुकृत कछू न कीन्ह । माया मोह मद मत्सरा, स्वाद सबै चित दीन्ह ॥ 10 ॥ विनती काम क्रोध संशय सदा, कबहूँ नाम न लीन । पाखंड प्रपंच पाप में, दादू ऐसे खीन ॥ 11 ॥ दादू बहु बंधन सौं बंधिया, एक बिचारा जीव । अपने बल छूटै नहीं, छोड़नहारा पीव ॥ 12 ॥ दादू बंदीवान है, तूँ बन्दी छोड़ दीवान । अब जनि राखो बंदि में, मीरां मेहरबान ॥ 13 ॥ दादू अंतर कालिमा, हिरदै बहुत विकार । प्रकट पूरा दूर कर, दादू करै पुकार ॥ 14 ॥ सब कुछ व्यापै राम जी, कुछ छूटा नांही । तुम तैं कहाँ छिपाइये, सब देखो मांही ॥ 15 ॥ सबल साल मन में रहै, राम बिसर क्यों जाइ । यहु दुख दादू क्यों सहै, साँई करो सहाइ ॥ 16 ॥

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श्री दादूवाणी-विनती का अंग 34 राखणहारा राख तूँ, यहु मन मेरा राखि । तुम बिन दूजा को नहीं, साधू बोलैं साखि ॥ 17 ॥ माया विषय विकार तैं, मेरा मन भागे । सोई कीजे साँईयाँ, तूँ मीठा लागे ॥ 18 ॥ साँई दीजे सो रति, तूँ मीठा लागे । दूजा खारा होइ सब, सूता जीव जागे ॥ 19 ॥ ज्यों आपै देखे आपको, सो नैना दे मुझ । मीरां मेरा मेहर कर, दादू देखे तुझ ॥ 20 ॥ विनती दादू पछतावा रह्या, सके न ठाहर लाइ । अर्थ न आया राम के, यहु तन योंही जाइ ॥ 21 ॥ दादू कहै- दिन दिन नवतम भक्ति दे, दिन दिन नवतम नांव । दिन दिन नवतम नेह दे, मैं बलिहारी जांव ॥ 22 ॥ साँई संशय दूर कर, कर शंका का नाश । भान भ्रम दुविध्या दुख दारुण, समता सहज प्रकाश ॥ 23 ॥ दया विनती नांही प्रकट ह्वै रह्या, है सो रह्या लुकाइ । संइयाँ पड़दा दूर कर, तूँ ह्वै प्रकट आइ ॥ 24 ॥ दादू माया प्रकट ह्वै रही, यों जे होता राम । अरस परस मिल खेलते, सब जीव सब ही ठाम ॥ 25 ॥ दया करै तब अंग लगावै, भक्ति अखंडित देवै । दादू दर्शन आप अकेला, दूजा हरि सब लेवै ॥ 26 ॥ दादू साध सिखावैं आत्मा, सेवा दिढ कर लेहु । पारब्रह्म सौं विनती, दया कर दर्शन देहु ॥ 27 ॥

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श्री दादूवाणी-विनती का अंग 34 साहिब साधु दयालु हैं, हम ही अपराधी । दादू जीव अभागिया, अविद्या साधी ॥ 28 ॥ सब जीव तोरैं राम सौं, पै राम न तोरे । दादू काचे ताग ज्यों, टूटै त्यों जोरे ॥ 29 ॥ सजीवन फूटा फेरि संवार कर, ले पहुँचावे ओर । ऐसा कोई ना मिलै, दादू गई बहोर ॥ 30 ॥ ऐसा कोई ना मिलै, तन फेरि संवारै । बूढे तैं बाला करै, खै काल निवारै ॥ 31 ॥ परच करूणा विनती गलै विलै कर बीनती, एकमेक अरदास । अरस परस करुणा करै, तब द्रवै दादू दास ॥ 32 ॥ साँईं तेरे डर डरूँ, सदा रहूँ भैभीत । अजा सिंह ज्यों भय घणा, दादू लिया जीत ॥ 33 ॥ पोख प्रतिपाल रक्षक दादू पलक मांहि प्रकटै सही, जे जन करैं पुकार । दीन दुखी तब देखकर, अति आतुर तिहिं बार ॥ 34 ॥ आगे पीछे संग रहै, आप उठाये भार । साधु दुखी तब हरि दुखी, ऐसा सिरजनहार ॥ 35 ॥ सेवक की रक्षा करै, सेवक की प्रतिपाल । सेवग की वाहर चढै, दादू दीन दयाल ॥ 36 ॥ विनती सागर तरण दादू काया नाव समंद में, औघट बूड़े आइ । इहि अवसर एक अगाध बिन, दादू कौन सहाइ ॥ 37 ॥ यहु तन भेरा भौजला, क्यों कर लंघे तीर । खेवट बिन कैसे तिरै, दादू गहर गंभीर ॥ 38 ॥

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श्री दादूवाणी-विनती का अंग 34 पिंड परोहन सिन्धु जल, भव सागर संसार । राम बिना सूझै नहीं, दादू खेवनहार ॥ 39 ॥ यहु घट बोहित धार में, दरिया वार न पार । भैभीत भयानक देखकर, दादू करी पुकार ॥ 40 ॥ कलियुग घोर अंधार है, तिसका वार न पार । दादू तुम बिन क्यों तिरै, समर्थ सिरजनहार ॥ 41 ॥ काया के वश जीव है, कस कस बँध्या मांहि । दादू आत्माराम बिन, क्यों ही छूटै नांहि ॥ 42 ॥ दादू प्राणी बँध्या पंच सौं, क्योंही छूटै नांहि । निधणी आया मारिये, यहु जीव काया मांहि ॥ 43 ॥ तुम बिन धणी न धोरी जीव का, यों ही आवै जाइ । जे तूँ साँई सत्य है, तो बेगा प्रकटहु आइ ॥ 44 ॥ निधणी आया मारिये, धणी न धोरी कोइ । दादू सो क्यूं मारिये, साहिब सिर पर होइ ॥ 45 ॥ दया विनती राम विमुख जुग जुग दुखी, लख चौरासी जीव । जामै मरै जग आवटै, राखणहारा पीव ॥ 46 ॥ पोष प्रति पाल रक्षक समर्थ सिरजनहार है, जे कुछ करै सो होइ । दादू सेवक राख ले, काल न लागै कोइ ॥ 47 ॥ विनती साँई साचा नाम दे, काल झाल मिट जाइ । दादू निर्भय ह्वै रहे, कबहूँ काल न खाइ ॥ 48 ॥ कोई नहिं करतार बिन, प्राण उधारणहार । जियरा दुखिया राम बिन, दादू इहि संसार ॥ 49 ॥

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श्री दादूवाणी-विनती का अंग 34 जिनकी रक्षा तूँ करै, ते उबरे करतार। जे तैं छाड़ै हाथ तैं, ते डूबे संसार ॥ 50 ॥ राखणहारा एक तूँ, मारणहार अनेक। दादू के दूजा नहीं, तूँ आपै ही देख ॥ 51 ॥ दादू जग ज्वाला जम रूप है, साहिब राखणहार। तुम बिच अन्तर जनि पड़ै, तातैं करूँ पुकार ॥ 52 ॥ जहँ तहँ विषय विकार तैं, तुम ही राखणहार। तन मन तुम को सौंपिया, साचा सिरजनहार ॥ 53 ॥ दया विनती दादू कहै- गरक रसातल जात है, तुम बिन सब संसार। कर गहि कर्त्ता काढि ले, दे अवलम्बन आधार ॥ 54 ॥ दादू दौं लागी जग प्रज्वलै, घट घट सब संसार। हम तैं कछू न होत है, तुम बरसि बुझावणहार ॥ 55 ॥ दादू आत्म जीव अनाथ सब, करतार उबारै। राम निहोरा कीजिये, जनि काहू मारै ॥ 56 ॥ अर्श जमीं औजूद में, तहाँ तपै अफताब। सब जग जलता देख कर, दादू पुकारैं साध ॥ 57 ॥ सकल भुवन सब आत्मा, निर्विष कर हरि लेइ। पड़दा है सो दूर कर, कश्मल रहण न देइ ॥ 58 ॥ तन मन निर्मल आत्मा, सब काहू की होइ। दादू विषय विकार की, बात न बूझै कोइ ॥ 59 ॥ विनती समर्थ धोरी कंध धर, रथ ले ओर निवाहि। मार्ग मांहि न मेलिये, पीछे बिड़द लजाहि ॥ 60 ॥ दादू गगन गिरै तब को धरै, धरती-धर छंडै। जे तुम छाड़हु राम रथ, कंधा को मंडै ॥ 61 ॥

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श्री दादूवाणी-विनती का अंग 34 ज्यों वह बरत गगन तैं टूटै, कहाँ धरणी कहाँ ठाम। लागी सुरति अंग तैं छूटै, सो कत जीवे राम ॥ 61 ॥ अन्तरयामी एक तूं, आतम के आधार। जे तुम छाड़हु हाथ तैं, तो कौन संभालणहार ॥ 62 ॥ तेरा सेवक तुम लगै, तुम्हीं माथै भार। दादू डूबत रामजी, बेगि उतारो पार ॥ 63 ॥ सत छूटा शूरातन गया, बल पौरुष भागा जाइ। कोई धीरज ना धरै, काल पहूँता आइ ॥ 64 ॥ संगी थाके संग के, मेरा कुछ न वशाइ। भाव भक्ति धन लूटिये, दादू दुखी खुदाइ ॥ 65 ॥ परिचय करुणा विनती दादू जियरे जक नहीं, विश्राम न पावै। आत्म पाणी लौंण ज्यों, ऐसे होइ न आवै ॥ 66 ॥ दया विनती दादू तेरी खूबी खूब है, सब नीका लागे। सुन्दर शोभा काढ़ ले, सब कोई भागे ॥ 67 ॥ विनती तुम हो तैसी कीजिये, तो छूटेंगे जीव। हम हैं ऐसी जनि करो, मैं सदके जाऊँ पीव ॥ 68 ॥ अनाथों का आसरा, निरधारों आधार। निर्धन का धन राम है, दादू सिरजनहार ॥ 69 ॥ साहिब दर दादू खड़ा, निशदिन करै पुकार। मीरां मेरा मिहर कर, साहिब दे दीदार ॥ 70 ॥ दादू प्यासा प्रेम का, साहिब राम पिलाइ। प्रकट प्याला देहु भर, मृतक लेहु जिलाइ ॥ 71 ॥

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श्री दादूवाणी-विनती का अंग 34 अल्लह आली नूर का, भर-भर प्याला देहु । हम को प्रेम पिलाइ करि, मतवाला कर लेहु ॥ 72 ॥ तुम को हमसे बहुत हैं, हमको तुमसे नांहि । दादू को जनि परिहरै, तूँ रहु नैनहुँ मांहि ॥ 73 ॥ तुम तैं तब ही होइ सब, दरश परश दर हाल । हम तैं कबहुं न होइगा, जे बीतहिं जुग काल ॥ 74 ॥ तुम्हीं तैं तुम को मिलैं, एक पलक में आइ । हम तैं कबहुँ न होइगा, कोटि कल्प जे जाइ ॥ 75 ॥ छिन बिछोह साहिब सौं मिल खेलते, होता प्रेम सनेह । दादू प्रेम सनेह बिन, खरी दुहेली देह ॥ 76 ॥ साहिब सौं मिल खेलते, होता प्रेम सनेह । प्रकट दर्शन देखते, दादू सुखिया देह ॥ 77 ॥ करुणा तुम को भावै और कुछ, हम कुछ किया और । मिहर करो तो छूटिये, नहीं तो नांहीं ठौर ॥ 78 ॥ मुझ भावै सो मैं किया, तुझ भावै सो नांहि । दादू गुनहगार है, मैं देख्या मन मांहि ॥ 79 ॥ खुशी तुम्हारी त्यों करो, हम तो मानी हार । भावै बन्दा बख्शिये, भावै गह कर मार ॥ 80 ॥ दादू जे साहिब लेखा लिया, तो शीश काट शूली दिया । मिहर मया कर फिल किया, तो जीये जीये कर जिया ॥ 81 ॥ इति श्री दादूदास-विरचिते सतगुरु-प्रसादेन प्रोक्तं भक्ति योगनाम तत्वसारमत- सर्वसाधुर्बुद्धिज्ञान-सर्वशास्त्र-शोधितं रामनाम सतगुरुशिक्षा धर्मशास्त्र-सत्योपदेश- ब्रह्मविद्यायां मनुष्य जीवनाम् नित्य-श्रवणं पठनं मोक्षदायकम् श्री दादूवाणीनाम् माहात्म्य चौंतीसवां विनती का अंग सम्पूर्ण ॥ अंग 34 ॥ साखी 81 ॥

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साक्षीभूत का अंग अथ साक्षीभूत का अंग ३५ मंगलाचरण दादू नमो नमो निरंजनं, नमस्कार गुरुदेवतः । वन्दनं सर्व साधवा, प्रणामं पारंगत: ॥ 1 ॥ भ्रम विध्वंसन सब देखणहारा जगत का, अंतर पूरै साखि । दादू साबित सो सही, दूजा और न राखि ॥ 2 ॥ मांही तैं मुझ को कहै, अन्तरजामी आप । दादू दूजा धंध है, साचा मेरा जाप ॥ 3 ॥

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श्री दादूवाणी-साक्षीभूत का अंग 35 कर्त्ता साक्षीभूत करता है सो करेगा, दादू साक्षीभूत। कौतिकहारा ह्वै रह्या, अणकर्ता अवधूत ॥ 4 ॥ दादू राजस कर उत्पत्ति करै, सात्विक कर प्रतिपाल। तामस कर परलै करै, निर्गुण कौतिकहार ॥ 5 ॥ दादू ब्रह्म जीव हरि आत्मा, खेलैं गोपी कान्ह। सकल निरन्तर भर रह्या, साक्षीभूत सुजान ॥ 6 ॥ स्वकीय मित्र-शत्रुता दादू जामण मरणा सान कर, यहु पिंड उपाया। साँईं दिया जीव को, ले जग में आया ॥ 7 ॥ दादू विष अमृत सब पावक पाणी, सतगुरु समझाया। मनसा वाचा कर्मणा, सोई फल पाया ॥ 8 ॥ दादू जानै बूझै जीव सब, गुण औगुण कीजे। जान बूझ पावक पड़ै, दई दोष न दीजे ॥ 9 ॥ मन ही मांहीं ह्वै मरै, जीवै मन ही मांहि। साहिब साक्षीभूत है, दादू दूषण नांहि ॥ 10 ॥ बुरा बला सिर जीव के, होवै इस ही मांहि। दादू कर्त्ता कर रह्या, सो सिर दीजै नांहि ॥ 11 ॥ साधु साक्षीभूत कर्त्ता ह्वै कर कुछ करै, उस मांहि बँधावै। दादू उसको पूछिये, उत्तर नहीं आवै ॥ 12 ॥ दादू केई उतारैं आरती, केई सेवा कर जांहि। केई आइ पूजा करैं, केई खिलावैं खांहि ॥ 13 ॥ केई सेवक ह्वै रहे, केई साधु संगति मांहि। केई आइ दर्शन करैं, हम तैं होता नांहि ॥ 14 ॥

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श्री दादूवाणी-साक्षीभूत का अंग 35 ना हम करैं करावैं आरती, ना हम पिवैं पिलावैं नीर । करै करावै सांइयाँ, दादू सकल शरीर ॥ 15 ॥ करै करावै सांइयाँ, जिन दिया औजूद । दादू बन्दा बीच में, शोभा को मौजूद ॥ 16 ॥ देवै लेवै सब करै, जिन सिरजे सब कोइ । दादू बन्दा महल में, शोभा करैं सब कोइ ॥ 17 ॥ कर्त्ता साक्षीभूत दादू जुवा खेले जाणराइ, ताको लखै न कोइ । सब जग बैठा जीत कर, काहू लिप्त न होइ ॥ 18 ॥ इति श्री दादूदास-विरचिते सतगुरु-प्रसादेन प्रोक्तं भक्तियोगनाम तत्वसारमत-सर्वसाधुर्बुद्धिज्ञान-सर्वशास्त्र-शोधितं रामनाम सतगुरुशिक्षा धर्मशास्त्र-सत्योपदेश-ब्रह्मविद्यायां मनुष्य जीवनाम् नित्य-श्रवणं पठनं मोक्षदायकम् श्री दादूवाणीनाम् माहात्म्य पैंतीसवां साक्षीभूत काअंग सम्पूर्ण ॥ अंग 35 ॥ साखी 18 ॥

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बेली का अंग अथ बेली का अंग ३६ मंगलाचरण दादू नमो नमो निरंजनं, नमस्कार गुरुदेवतः । वन्दनं सर्व साधवा, प्रणामं पारंगत: ॥ 1 ॥ दादू अमृत रूपी नाम ले, आत्म तत्त्वहि पोषै । सहजैं सहज समाधि में, धरणी जल शोषै ॥ 2 ॥ पसरै तीनों लोक में, लिप्त नहीं धोखे । सो फल लागै सहज में, सुन्दर सब लोके ॥ 3 ॥ दादू बेली आत्मा, सहज फूल फल होइ । सहज सहज सतगुरु कहै, बूझै बिरला कोइ ॥ 4 ॥

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