गदनिग्रह (आचार्य सोढल - कायचिकित्सा एवं रोग-विनिश्चय सटीक)
Gadanigraha of Acharya Sodhala with Commentary
आचार्य सोढल द्वारा
४ विषयः पृ. पं. विषयः पृ. पं. ग्रहण्यां दाडिमाष्टकम्,, ७२ २६ अग्निमान्द्ये वैश्वानरं चूर्णम् ८३ ८ अतिसारे द्वितीयं ,, ७३ ४ गुल्मे द्वितीयं ,, ,, ,, ११ गलरोगे एलाद्यं चूर्णम् ,, १३ ,, तृतीयं ,, ,, ,, १८ अरोचके वृद्धैलाद्यं ,, ,, १८ अग्निदीप्त्यर्थे ज्वाला- ,, कर्पूराद्यं ७४ २ मुखं ,, ,, २५ ,, त्वगेलाद्यं ,, ८ उदावर्ते नाराचकं ,, ८४ ४ गुल्मे त्रिलवणाद्यं ,, ,, १३ मेधावृद्ध्यर्थे सारस्वतं ,, ,, ११ अरोचके सूक्ष्मैलाद्यं ,, ७५ २ ,, बृहत्सारस्वतं ,, ,, २० ,, लवङ्गाद्यं ,, ,, १० अर्शोरोगे यवानिकाद्यं ,, ८५ ४ ,, द्वितीयं ,, ,, २३ कासश्वासे बिभीतकाद्यं ,, ,, १२ ,, तृतीयं ,, ७६ ३ हिक्काश्वासे रेणुकाद्यं ,, ,, १७ रक्तपित्ते चन्दनाद्यं ,, ,, १० ,, सुरसाद्यं ,, ,, २४ प्रतिश्याये व्योषादि चूर्णम् ,, २४ तमकश्वासे शठ्याद्यं ,, ८६ २ शोषे षाडवं ,, ७७ ४ दन्तरोगे तिक्तकं ,, ,, ७ ,, महाषाडवं ,, ,, १२ ,, पीतकं ,, ,, १४ अरोचके दाडिमाद्यं ,, ,, २१ गलरोगे कालकं ,, ,, २१ कासे लघुतालीसाद्यं ,, ,, २५ मुखरोगे द्वितीयं पीतकं,, ,, २६ गुल्मे शार्दूलं ,, ७८ ८ कासे जीवन्त्याद्यं ,, ८७ ४ उदरे नारायणं ,, ,, १३ अतिसारे भूनिम्बाद्यं ,, ,, १३ ,, हपुषाद्यं ,, ७९ २ ग्रहण्यां पाठाद्यं ,, ,, १८ ,, नाराचकं ,, ,, ११ ,, नागराद्यं ,, ,, २२ ,, सुवर्णसमंकं ,, ,, १९ राजयक्ष्मणि सितोपलाद्यं ,, ,, २७ कुष्ठे पटोलाद्यं ,, ८० ६ योनिदोषे पुष्यानुगं ,, ८८ ६ ,, द्राक्षाद्यं ,, ,, १३ पाण्डुरोगे योगराजं ,, ,, १९ आमवाते अलम्बुषाद्यं ,, ,, २० कुष्ठे त्रिफलाद्यं ,, ८९ ९ ,, द्वितीयमल- मन्दाग्नौ व्योषाद्यं ,, ,, १४ म्बुषाद्यं ,, ८१ २ पाण्डुरोगे खण्डसमकं,, ,, १९ श्वासकासे विडङ्गाद्यं ,, ,, ८ शोफे पाठाद्यं ,, ९० ४ मन्दाग्नौ वडवानलं ,, ,, १७ कुष्ठे बाकुचिकाद्यं ,, ,, ८ ,, द्वितीयं ,, ,, २० ,, पृथुनिम्बपञ्चकं,, ,, १३ ग्रहण्यामग्निसुखं ,, ,, २३ ,, बृहत्पञ्चनिम्बकं,, ,, १८ गुल्मे द्वितीयमग्निसुखं ,, ८२ २ मन्दाग्नौ लवणभास्करं ,, ९१ १६ ,, बृहदग्निसुखं ,, ,, ५
५ विषय: पृ. पं. | विषय: पृ. पं. शूले सामुद्राद्यं चूर्णम् ९२ ६ | मन्दाग्नौ शतपुष्पाद्यं ,, १०० १७ ,, तुम्बर्वाद्यं ,, ,, १४ | गुल्मे नारायणं ,, ,, २० ,, हिङ्ग्वष्टकं ,, ,, १९ | ,, त्र्यूषणाद्यं ,, ,, २८ अरोचके द्वितीयं ,, ,, २४ | मन्दाग्नौ सैन्धवाद्यं ,, १०१ ५ मन्दाग्नौ रामठाद्यं ,, ९३ २ | आमातीसारे पिप्प- सर्वाङ्गशूले चित्रकाद्यं ,, ,, ७ | ल्याद्यं ,, ,, ११ मन्दाग्नौ सैन्धवाद्यं ,, ,, २० | पीनसे चव्याद्यं ,, ,, १६ वातव्याधौ सामुद्राद्यं ,, ,, २५ | कासेऽजमोदादिभस्मचूर्णम् ,, २१ रसायनार्थं नारसिंहं ,, ९४ ५ | दाहरोगे द्राक्षादिचूर्णम् १०२ ४ अतिसारे गङ्गाधरं ,, ९५ २ | पाण्डुरोगे नवाsystemयसं चूर्णम् ,, ११ गुल्मे कट्टत्रिकाद्यं ,, ,, ९ | राजयक्ष्मणि द्वितीयं स्थौल्ये व्योषाद्यं ,, ,, १७ | बृहन्नवायसं ,, ,, १५ वातकासे विडङ्गाद्यं ,, ,, २६ | गुटिकाधिकारश्चतुर्थः । गुल्मे वचाद्यं चूर्णम् ९६ ३ | अग्निमान्द्येऽभयाद्या पाण्डुरोगे किरातात्तिक्ताद्यं | गुटिका १०२ २३ चूर्णम् ,, ११ | अर्शसि काङ्कायनवटकः १०३ १० कुष्ठादौ खण्डसमं ,, ,, १८ | गुल्मे काङ्कायनगुटिका ,, २० कुष्ठे बाकुच्याद्यं ,, ९७ ३ | ,, निकुम्भाद्या गुटिका १०४ ९ उदरे भस्मार्कचूर्णम् ,, २० | विड्बन्धेऽभयावटकाः ,, १६ अर्शसि पूतीकरञ्जाद्यं ,, ९८ १६ | पाण्डुरोगे वज्रकगुटिका १०५ २ गुल्मे यवक्षाराद्यं ,, ,, २१ | शूले शम्बूकाद्या गुटिका ,, २१ ज्वरातिसारे व्योषाद्यं ,, ,, २६ | अग्निमान्द्ये कल्याणवटकाः१०६ ४ शोफे कृष्णाद्यं ,, ९९ ८ | क्षतक्षीणे एलाद्या गुटिका ,, १७ श्वासहृद्रोगयोर्हिङ्गुपञ्चकं ,, ,, १३ | ,, सर्पिर्गुटिका ,, २६ श्लीषे तिलाद्यं ,, ,, १६ | पाण्डुरोगे मण्डूरवटकाः १०७ १२ वर्ध्मरोगे बिल्वमूलाद्यं ,, ,, १९ | ,, द्वितीयो ,, ,, २१ सर्वमेहेष्विन्द्रयवाद्यं ,, ,, २४ | शोषे क्षारगुटिका १०८ ४ शूले शर्कराद्यं ,, १०० २ | कुष्ठे विडङ्गसाराद्या गुटिका ,, १३ आनाहे द्विरुत्तरं | ,, मणिभद्रवटकः ,, २० हिङ्ग्वाद्यं ,, ,, ५ | अर्शसि सूरणवटकाः ,, २५ पानीयच्छायायां | ,, लघुसूरणवटिकाः १०९ १६ मुक्ताद्यं ,, ,, ८ | ,, मरीचाद्या गुटिकाः ,, १९
६ विषय: पृ. पं. | विषय: पृ. पं. अर्शसि कलिङ्गाद्या गुटिका: १०९ २४ | प्लीहोदरे रोहितकवटका: ११७ २३ गुल्मे गुडवटका: ,, २७ | गुडपाकविधि: ११८ २ अतिसारेऽभयाद्या वटका: ११० ३ | धातुक्षये महाकल्याणको सर्वातिसारेऽङ्कोलवटिका ,, ६ | गुड: ,, ९ ,, बृहदङ्कोलवटिका ,, १३ | ग्रहण्यां कल्याणको ,, ११९ ३ अतिसारे कट्फलाद्या गुटिका ,, १९ | ,, यवान्याद्या गुटिका ,, ९ ग्रहण्यां चित्रकाद्या ,, १११ ८ | प्रमेहे चन्द्रप्रभा गुटिका ,, १६ ,, क्षारगुटिका ,, १३ | पित्ते कल्याणका ,, १२० ४ ,, तालीसाद्या गुटिका ,, २४ | अर्शसि प्राणदा ,, ,, १३ क्षयरोगे लघुतालीसादि- | अग्निमान्द्ये वार्ताकगुटिका १२१ ६ वटिका ११२ १२ | पाण्डुरोगेऽभयाद्यो मोदक: ,, १२ लवङ्गाद्या गुटिका ,, १८ | गुल्मेऽभयाद्या वटका: ,, २४ कुष्ठे तुवरास्थिवटका: ११३ ३ | विषूचिकायां जीरकाद्या ,, खदिरादिवटिका ,, १५ | गुटिका १२२ ९ ,, विषगुटिका: ११४ २ | बृहच्छिवगुटिका ,, १४ ,, लाङ्गलीगुटिका: ,, ९ | पाण्डुरोगे लघुशिव- कण्ठ्यां त्रिजातगुटिका: ,, १८ | गुटिका १२४ ८ मुखरोगे खदिरगुटिका ,, २३ | कुष्ठे वज्रकगुटिका: ,, २१ ,, द्वितीया ,, ११५ १३ | विषे सर्षपाद्या गुटिका १२५ २१ ,, तृतीया ,, ,, १९ | भूतदोषे सिद्धार्थ- गलरोगे मरीचाद्या गुटिका ,, २४ | क्वाथ ,, १२६ १० ,, पिप्पल्यादि- | शोषेऽश्वत्थवटका: ,, १७ क्षारगुटिका ११६ २ | पाण्डुरोगे पुनर्नवामण्डूर: १२७ २० कफरोगे वत्सनाभाद्या ,, ७ | वातव्याधौ रसोनपिण्ड: १२८ ३ श्वासे भार्ङ्गया ,, ,, १७ | वातव्याधौ बृहल्लशुनपिण्ड: ,, १४ ज्वरे त्रिवृताद्यो मोदक: ,, २० | ,, व्योषाद्या गुटिका १२९ २ तृषायां कम्पिल्लाद्यो ,, ,, २३ | कुष्ठे स्वायम्भुवो गुग्गुलु: ,, ११ पार्श्वशूले त्रिफलाद्यो ,, ,, २७ | ,, सप्तविंशतिका ज्वरे सगुलाद्यो ,, ११७ ४ | गुग्गुलुवटिका ,, २१ भ्रमे कृष्णाद्या गुटिका ,, १३ | रास्नाद्यो गुग्गुलु: १३० १३ ज्वरातिसारे कट्फलाद्या | आमवाते द्वात्रिंशत्का वटका: ,, १६ | गुग्गुलुवटिका ,, १६
७ विषयः पृ. पं. विषयः पृ. पं. वातव्याधौ बिल्वाद्यो रक्तपित्ते खण्डकूष्माण्डा- गुग्गुलुः १३१ ४ वलेहः १४१ २ अर्शसि योगराजो गुग्गुलुः ,, १३ अर्शसि खण्डसूरणावलेहः ,, ७ नाडीव्रणे त्रिफलाद्यो ,, १३२ ४ क्षये गुडकूष्माण्डकावलेहः ,, १० प्रमेहे गोक्षुरगुग्गुलु- शोषे एलाद्यवलेहः ,, २४ वटिका ,, ६ अर्शसि भल्लातकावलेहः १४२ ८ वातगुल्मवातरक्तयोः ग्रहण्यां कल्याणको कैशोरको गुग्गुलुः ,, १३ गुडावलेहः ,, २१ कार्ये पञ्चजीरकावलेहः १४३ ७ वातरोगे त्रिफलाद्यो ,, १३३ ९ योनिरोगे ,, ,, १६ गृध्रस्यां कंसाह्वयो गुग्गुलुः ,, १८ अर्शसि बाहुशालो गण्डमालायां त्रिफलाद्या गुडावलेहः १४४ २ गुग्गुलुवटिका १३४ ४ श्वासकासे बिभीतकावलेहः ,, २१ वातरक्ते बृहत्त्वायम्भुव- कासेऽगस्त्यहरीतक्यवलेहः ,, २४ गुग्गुलुः ,, १९ ,, द्वितीयो ,, १४५ ७ कासे सप्तचत्वारिंशत्तिका वासिष्ठहरीतक्यवलेहः १४६ २ गुग्गुलुगुटिका १३५ ८ वासाहरीतक्यवलेहः ,, ११ वातरक्ते कन्थडिका गुल्मे दन्तीहरीत- गुग्गुलुगुटिका ,, २४ क्यवलेहः १४७ ९ गण्डमालायामष्टचत्वारिंश- कासे व्याघ्रीहरीतक्यवलेहः ,, २४ त्संज्ञा गुग्गुलुगुटिका १३६ १४ सर्वकासे द्वितीयो ,, १४८ ७ भगन्दरे अमृताद्या गुटिका १३७ ५ प्लीहोदरे रोहीतकावलेहः ,, १६ शोफे गुडार्द्रकगुटिकाः ,, ८ शोफे पुनर्नवाहरीत- गुल्मे आरोग्यलवणम् ,, १३ क्यवलेहः ,, २१ गण्डमालायां काञ्चनार- ,, कंसहरीतक्यवलेहः १४९ ५ गुग्गुलुः १३८ ९ ,, हरीतक्यवलेहः ,, १२ ,, काञ्चनगुटिकाः ,, २१ अर्शःपीनसयोश्चित्रक- लेहाधिकारः पञ्चमः । हरीतक्यवलेहः ,, १९ अर्शसि पथ्यावलेहः १३९ ३ मन्दाग्नौ द्वितीयश्चित्रक- ,, चित्रकावलेहः ,, १८ हरीतक्यवलेहः १५० ६ ,, द्वितीयः ,, १४० ४ हलीमके आमलकावलेहः ,, २२ रक्तपित्ते कूष्माण्डावलेहः ,, १३ कामलायां विडङ्गाद्य-वलेहः १५१ ४
८ विषयः पृ. पं. | विषयः पृ. पं. श्वासे हरीतक्यवलेहः १५१ ११ | नवविधा आसवयोनिः १६६ १८ अर्शसि कुटजावलेहः ,, २५ | षड्विधान्यासवाः ,, २४ ,, द्वितीयः ,, १५२ १७ | षड्विंशतिः फलासवाः ,, २७ ,, कुटजाष्टकोऽवलेहः ,, २७ | एकादश मूलासवाः १६७ ६ ग्रहण्यां मधुपाकविधिः १५३ १० | विंशतिः सारासवाः ,, १० कासे कण्टकार्यवलेहः ,, २० | दश पुष्पासवाः ,, १५ शोषे निदिग्धिकायोऽ- | चत्वारः काण्डासवाः ,, १९ वलेहः १५४ ७ | द्वौ पत्रासवौ ,, २१ उदावर्ते पटोलमूलावलेहः ,, १९ | चत्वारस्त्वगासवाः ,, २३ मुखरोगे दार्ब्यवलेहः १५५ ७ | शर्करासवः ,, २५ आमवाते नागराद्योऽवलेहः ,, १६ | आसवानां विकल्पसंस्कार- कासे कसेर्वाद्योऽवलेहः ,, २१ | गुणाः ,, २७ अर्शसि भल्लातकावलेहः १५६ ३ | वातव्याधौ विडङ्गासवः १६८ १० पीनसे चित्रकावलेहः ,, २० | प्रमेहे रोध्रासवः ,, २२ रक्तपित्ते खण्डखाद्योऽ- | प्रमेहे देवदार्वासवः १६९ ४ वलेहः १५७ ५ | कुष्ठे कनकारिष्टः ,, १८ ,, द्वितीयो वासावलेहः १५८ ८ | अर्शसि द्वितीयः ,, १७० २ श्वासकासयोर्भार्गी- | ग्रहण्यां दुरालभारिष्टः ,, २५ गुडावलेहः ,, १६ | अर्शसि दन्त्यरिष्टः १७१ ७ ,, कुलत्थगुडावलेहः १५९ २ | ,, अभयारिष्टः ,, १६ ,, पिप्पलीगुडावलेहः ,, ११ | ग्रहण्यां द्वितीयो ,, १७२ २ अतीसारे कुटजावलेहः ,, १६ | प्रमेहे तृतीयो ,, ,, ११ ,, द्वितीयः ,, १६० ८ | पाण्डुरोगे मण्डूरारिष्टः ,, २१ अर्शस्सु ,, ,, १६ | क्षयरोगे पिप्पल्यारिष्टः १७३ ५ जरायां च्यवनप्राशावलेहः ,, २५ | शोफेऽष्टशतारिष्टः ,, १५ ,, ब्राह्माद्यावनावलेहः १६१ २५ | अर्शसि तक्रारिष्टः ,, २० क्षतक्षीणेऽमृतप्राशावलेहः १६३ ८ | अरोचके लघुचुक्रसन्धा- लघुच्यवनप्राशोऽवलेहः ,, २४ | नम् १७४ ३ शोषेऽमृतप्राशोऽवलेहः १६४ १० | मन्दाग्नौ बृहच्चुक्रसन्धानम् ,, ८ आसवाधिकारः षष्ठः । | ,, लवङ्गासवः ,, १९ उदरे कुमार्थासवः १६५ ३ | प्लीहे रोहीतकासवः १७५ ३ गुल्मे द्वितीयः १६६ ७ | अर्शस्सु गण्डिकाद्रोणः ,, ९
९
| विषयः | पृ. | पं. | विषयः | पृ. | पं. |
|---|---|---|---|---|---|
| कुष्ठे खदिरासवः | १७५ | १८ | ज्वरे धान्यकाद्यरिष्टः | १९१ | १६ |
| ,, द्वितीयः खदिरारिष्टः | १७६ | ६ | धातुक्षये लवङ्गासवः | ,, | २५ |
| क्षयरोगे बब्बूल्यासवः | ,, | १५ | विद्रधौ वरुणासवः | १९२ | १६ |
| ,, पुष्करमूलासवः | ,, | २३ | प्लीहरोगे रोहीतकासवः | १९३ | १८ |
| ,, माचिकासवः | १७७ | १० | शोषादौ गण्डीरासवः | १९४ | ५ |
| शोफे पुनर्नवासवः | ,, | २० | प्लीहरोगे रोहीतकासवः | १९५ | ४ |
| ,, त्रिफलारिष्टः | १७८ | ४ | क्षये योगराजासवः | ,, | ११ |
| सर्वशोफे वासकासवः | ,, | ८ | अशोरोगे पील्वासवः | १९६ | ८ |
| अर्शस्सु शर्करासवः | ,, | १६ | प्रमेहे मध्वासवः | ,, | १५ |
| ग्रहण्यां द्राक्षासवः | १७९ | २ | पाण्डुरोगे लोहासवः | ,, | २१ |
| अर्शसि द्वितीयो ,, | ,, | १६ | प्रयोगखण्डस्य परिशिष्टम् । | ||
| ग्रहण्यां बीजकासवः | १८० | २ | परिशिष्टे घृताधिकारः प्रथमः । | ||
| अर्शसि पील्वासवः | ,, | १२ | रक्तपित्ते कटुकाद्यं घृतम् | १९७ | ११ |
| रक्तपित्ते उशीरासवः | ,, | २१ | गुल्मे दाधिकं ,, | ,, | १८ |
| श्वासकासयोस्त्रायमाणा- | ,, लशुनघृतम् | १९८ | २२ | ||
| सवः | १८१ | ५ | ,, महाषट्पलं घृतम् | १९९ | २ |
| गुल्मे चविकासवः | ,, | १६ | उन्मादे कल्याणकं ,, | ,, | १५ |
| ग्रहण्यां मूलासवः | १८२ | ४ | उन्मादे द्वितीयं कल्याणकं | ||
| क्षयरोगे बृहन्मूलासवः | ,, | १३ | घृतम् | २०० | ५ |
| धातुक्षये भृङ्गराजासवः | १८३ | ६ | ,, तृतीयं ,, ,, | ,, | १३ |
| भगन्दरे गुग्गुल्वासवः | ,, | १५ | ,, महाकल्याणकं ,, | ,, | २५ |
| अर्शस्सु ताम्बूलासवः | १८४ | ८ | विसर्पे महागौरं ,, | २०१ | ४ |
| अपस्मारे पञ्चमूत्रासवः | ,, | २६ | मेधावृद्ध्यर्थे सप्ताङ्गं ,, | ,, | २० |
| धातुक्षये हरीतक्यासवः | १८५ | ८ | ,, अष्टाङ्गं ,, | ,, | २५ |
| दद्रौ आवर्तक्याद्यासवः | १८६ | १३ | बालग्रहे फलघृतम् | २०२ | ८ |
| क्षये दशमूलासवः | ,, | १८ | चातुर्थकज्वरे महापैशाचकं | ||
| राजयक्ष्मणि खर्जूरासवः | १८७ | २६ | घृतम् | ,, | १५ |
| ग्रहण्यां मस्त्यासवः | १८८ | १८ | शोषे जीवन्त्याद्यं ,, | ,, | २४ |
| ज्वरे कुब्जकासवः | १८९ | ५ | कुष्ठे महातिक्तकं ,, | २०३ | ४ |
| धातुक्षये नालिकेरासवः | ,, | १५ | वातव्याधौ दशमू- | ||
| ,, कूष्माण्डासवः | ,, | २७ | लाद्यं ,, | ,, | २१ |
| ,, रसायनारिष्टः | १९० | २६ | कासे बृहत्कण्टकारीघृतम् | २०४ | २ |
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| विषय: | पृ. | पं. | विषय: | पृ. | पं. |
|---|---|---|---|---|---|
| व्रणे जात्याद्यं घृतम् | २०४ | १२ | ऊरुस्तम्भे द्विपञ्च- | ||
| प्रवाहिकायां | मूल्याद्यं तैलम् | २१४ | १८ | ||
| त्र्यूषणाद्यं | ,, | १७ | अर्शसि कासीसाद्यं ,, | २१५ | ९ |
| रक्तपित्ते कशेरुकं | ,, | २२ | कृमिरोगे महावीर्यं | ,, | १२ |
| नेत्ररोगे द्राक्षाद्यं | २०५ | २ | अन्त्रवृद्धौ गन्धर्वतैलम् | २१६ | १० |
| रक्तपित्ते दाडिमाद्यं | ,, | ८ | कर्णरोगे लाङ्गल्याद्य तैलं | ,, | १६ |
| योनिरोगे बृहत्पञ्च- | शिरोरोगे महानीलं | ,, | २४ | ||
| मूलाद्य | ,, | १६ | कुष्ठे गुञ्जाद्यं | २१७ | १२ |
| अर्शसि पिप्पल्याद्यं | ,, | २३ | मञ्जिष्ठाद्यं | ,, | २१ |
| शोषे जीवन्त्याद्यं | २०६ | ९ | कुष्ठे सिद्धार्थकतैलम् ,, | २१८ | ५ |
| शिरोरोगे मायूरं | ,, | १६ | परिशिष्टे चूर्णाधिकारस्तृतीयः। | ||
| ,, महामायूरं ,, | ,, | २३ | मन्दाग्नौ शुण्ठ्याद्यं चूर्णम् | २१८ | १५ |
| अक्षीरोगे अवाक्पु- | हृद्रोगे तिक्तकं | ,, | १८ | ||
| ष्याद्यं | २०७ | १४ | कुष्ठे लाक्षाद्यं | ,, | २४ |
| अपतन्त्रके शुक- | ग्रहण्यां पञ्चामृतरसः | २१९ | ४ | ||
| नासाद्यं | २०८ | ६ | मन्दाग्नौ पञ्चसमं | ,, | १३ |
| उन्मादे चेतसं | ,, | १३ | छर्द्यां बदराद्यं | ,, | १८ |
| क्षीणक्षते समदुग्धकं | ,, | १८ | उदरे नवक्षारकं | ,, | २५ |
| वातगुल्मे हिङ्ग्वाद्यं | २०९ | ४ | मन्दाग्नावजमोदाद्यं | २२० | ४ |
| परिशिष्टे तैलाधिकारो द्वितीयः। | दन्तरोगे जातीपत्राद्यं | ,, | ७ | ||
| कुष्ठे सहचरतैलम् | २०९ | १० | कासे जातीफलाद्यं | ,, | १२ |
| तरक्षाद्यं तैलम् | २१० | ४ | ग्रहण्यां दाडिमाद्यं | ,, | २२ |
| व्याघ्रतैलम् | ,, | १२ | मन्दाग्नावामलक्यादि ,, | २२१ | ७ |
| वातारितैलम् | २११ | १८ | स्त्रीरोगे मेथिकाद्यं | ,, | १० |
| दारुणके सास्थ्याद्यं | २१२ | ३ | कामवृद्धौ राजयोगः | ,, | १९ |
| वातरोगे दशाङ्गं | ,, | ७ | क्षये आभाद्यं | २२२ | ९ |
| ,, कर्पूराद्यं | ,, | २२ | पिप्पल्याद्यं चूर्णम् ,, | ,, | १९ |
| ज्वरे त्र्यूषादिकं | २१३ | ५ | मन्दाग्नौ रुचकाद्यं | २२३ | २ |
| कुष्ठे अन्वासनं | ,, | १५ | ,, सिंहणचूर्णम् | ,, | ७ |
| ,, महानीलं | ,, | २३ | अर्शसि सूरणाद्यंचूर्णम् | ,, | १२ |
| पलिते नील्याद्यं | २१४ | ९ | वातरोगे हरीतकीयोगः | ,, | १७ |
११ विषयः पृ. पं. | विषयः पृ. पं. विद्रधौ भूनिम्बाद्यं चूर्णम् २२३ २० | रसायनार्थे विजया ज्वरे किराततिक्ताद्यं ,, २२४ २ | गुटिका २३२ १६ कासे दुरालभाद्यं ,, ,, ९ | वातरोगे योगोत्तमा ग्रहण्यां पिप्पली- | गुटिका २३३ १७ मूलाद्यं ,, ,, १२ | प्रमेहे कर्पूरादिगुटिका २३४ १३ ग्रहण्यां कुठेरकार्थं ,, ,, १७ | गुल्मे गुडवटकाः ,, २० शोफे अयोरजश्चूर्णम् २२५ २ | पाण्डुरोगे क्षारवटकाः ,, २३ पाण्डुरोगे नवायसं चूर्णम् ,, २६ | कुष्ठे पथ्या वटकाः २३५ १६ प्रवाहिकायां कूट- | ज्वरे फलत्रिकाद्यो जाद्यं ,, २२६ ६ | मोदकः ,, २५ गुल्मे समशर्करं ,, ,, ११ | रसायने त्रिफलाद्या शोषे तिलाद्यं ,, ,, १६ | वटकाः २३६ २ मन्दाग्नौ आमलकादि ,, ,, १९ | अरचौ लाजाद्यो मोदकः ,, १६ ,, सौवर्चलाद्यं ,, २४ | राजयक्ष्मणि त्रिफलाद्या ,, अग्निचूर्णम् २२७ २ | गुटिका ,, २० ,, सिंहनचूर्णम् ,, ६ | अर्शसि चित्रकगुटिका २३७ २ परिशिष्टे गुटिकाधिकार- | प्रमेहे वामदेवेन कथिता श्चतुर्थः । | गुटिका ,, २ क्षतक्षीणे सर्पिर्गुटिका २२७ १४ | जरायां गुग्गुलुगुटिका ,, १४ ,, क्षीरादिलेह- | शोफे लघुत्रिफलागुग्गुलु- गुटिका ,, २३ | गुटिका ,, २१ सर्वरोगे प्रभावतीवटिका २२८ १५ | वातव्याधौ पृथुत्रिफलाद्या वातरोगे अभ्रमुखवटी ,, २१ | गुग्गुलुगुटिका ,, २४ श्वासादौ सूर्यचन्द्रप्रभा | गुल्मे त्रिवृताद्या गुटिका २२९ ४ | गुटिका २३८ ११ अतिसारे विशल्या | भ्रमरोगे कृष्णाद्या ,, ,, २२ गुटिका २३० ९ | परिशिष्टे पञ्चमोऽवले- वातरोगे त्रोटहरी ,, ,, २० | हाधिकारः कासे चन्द्रप्रिया ,, २३१ ४ | शोषे पिप्पल्याद्योऽव- मुखरोगे खादिरगुटी ,, ८ | लेहः २३९ ३ ,, द्वितीया ,, २३२ २ | ,, द्वितीयः ,, ,, १६ क्षतरोगे त्वगेलाद्या गुटिका १३ २
१२ विषयः पृ. पं. | विषयः पृ. पं. क्षये रसाङ्गहरीतक्य- | धातुक्षये मधुपकामलकी २४२ १९ वलेहः २४० २ | स्वरभङ्गे कुलिञ्जनाद्योऽ- जीर्णज्वरे खण्डा- | वलेहः २४३ ४ र्द्रकावलेहः ,, ८ | कासे भागर्याद्यवलेहः ,, १५ अतिसारेऽङ्कोलमूला- | हृद्रोगे चन्दनावलेहः ,, २३ वलेहः ,, १७ | शुक्रक्षयेऽश्वगन्धाद्य- अर्शसि भल्लातकावलेहः ,, २६ | वलेहः २४४ ७ अतिसारे कुटजाष्टका- | वलेहः २४२ २ |
१. प्रयाग खण्ड: ज्वर, अतीसार, ग्रहणी व अर्श रोग चिकित्सा
गदनिग्रहपाठसंशोधनम् अपपाठः \qquad\qquad\qquad सुपाठः वन्ध्या च \qquad\qquad\qquad वन्ध्यालं \qquad\qquad\qquad २ \quad १८ हिङ्गुतक्षाक्षमात्रेण त- \qquad हिङ्गुश्चैषामक्षमात्रैस्त \qquad ,, \quad १४ पाण्डुरोगतां \qquad\qquad\qquad पाण्डुरोगकं \qquad\qquad\qquad ३ \quad १६ सुकृतादतः \qquad\qquad\qquad त्रिवृतस्तथा \qquad\qquad\qquad ,, \quad २१ दत्वा \qquad\qquad\qquad\qquad दत्त्वा \qquad\qquad\qquad\qquad ,, \quad २४ नक्तमालं च \qquad\qquad\qquad नक्तमालञ्च \qquad\qquad\qquad ४ \quad ८ कटुरोहिणीम् \qquad\qquad\qquad कटुरोहिणी \qquad\qquad\qquad ६ \quad २५ हपुषा \qquad\qquad\qquad\qquad हपुषां \qquad\qquad\qquad\qquad ८ \quad १९ अजमोदा \qquad\qquad\qquad अजमोदां \qquad\qquad\qquad ,, \quad २० कृष्णामजाजीपूतिकं \qquad\qquad कृष्णामजाजीं पूतीकं \qquad\qquad ,, \quad २१ शुद्धात् \qquad\qquad\qquad\qquad शुद्धेः \qquad\qquad\qquad\qquad १० \quad १९ आगन्तुसहजाश्चैव शिरः- \qquad आगन्तुसहजांश्चैव शिरः- \quad श्लिष्टाश्च ये व्रणाः \qquad\quad श्लिष्टांस्तथा व्रणान् \qquad\quad १३ \quad १ निदिष्टं \qquad\qquad\qquad\qquad निर्दिष्टं \qquad\qquad\qquad\qquad ,, \quad २६ -गोक्षुरकं तथा \qquad\qquad\qquad -गोक्षुरकस्तथा \qquad\qquad\qquad १४ \quad ४ पृष्ठसर्पिणा- \qquad\qquad\qquad पीठसर्पिणा- \qquad\qquad\qquad ,, \quad १० शूलहत् \qquad\qquad\qquad\qquad शूलहा \qquad\qquad\qquad\qquad १५ \quad २६ यद्याहं \qquad\qquad\qquad\qquad यच्छ्याहं \qquad\qquad\qquad\qquad १७ \quad २ चतुर्थभागो \qquad\qquad\qquad तुर्यभागो \qquad\qquad\qquad\qquad ,, \quad ३ -बदराढके \qquad\qquad\qquad -बदराढकम् \qquad\qquad\qquad १८ \quad २ द्रव्यानिमांश्चैव \qquad\qquad\qquad दद्यादिमांश्चैव \qquad\qquad\qquad ,, \quad ५ एभिर्द्रव्यैर्घृतप्रस्थं \qquad\qquad एतत्सिद्धं घृतप्रस्थं \qquad\qquad ,, \quad १० सभागर्गी \qquad\qquad\qquad सभार्गी \qquad\qquad\qquad\qquad ,, \quad २५ शिलाह्वयं \qquad\qquad\qquad सुरोह्वयं$^२$ \qquad\qquad\qquad १९ \quad २ देवदार्तृद्धिः \qquad\qquad\qquad देवदार्वृद्धी \qquad\qquad\qquad ,, \quad २० जातीक्षीरक- \qquad\qquad\qquad जातीक्षारक- \qquad\qquad\qquad २० \quad १ मारुतास्रकप्रभेदि \qquad\qquad\qquad मारुतासृक्प्रभेदि \qquad\qquad\qquad ,, \quad १९ १ 'चान्नं' ख । २ पाठान्तरम्
२ अपपाठः सुपाठः पृ. पं. पिप्पली शर्करा द्राक्षा त्रिफला नी- पिप्पलीशर्कराद्राक्षात्रिफला- लमुत्पलम् । नीलकोत्पलैः- २१ १० मधुकं क्षीरकाकोली मधुपर्णी मधुकक्षीरकाकोलीमधुपर्णी- निदिग्धिका निदिग्धिकैः ,, ११. चित्रकं तथा चित्रकस्तथा २३ ८ अशीतिर्वातजान् अशीतिं वातजान् २३ २१ विंशतिः विंशतिं ,, २२ दाडीमयावशूकं दाडिमायावशूकं २५ ३ विष्या त्रिवृता ,, २२ चाक्षकसंमितम् चाक्षसंमितम् २६ २० शिंशपाखदिरं तथा शिंशपाखदिराक्षकान् ,, २६ बीजकं च तथाऽक्षकम् बीजकश्चूर्णमायसम् ,, २७ विदारी विदारीं २७ २५ वचा वचाम् ,, ,, काकोलीमेदे काकोलिमेदे २९ १९ कुशातिवृद्धाः कुशातिवृद्धा ,, २७ यौवनपुष्टिन्तो यौवनपुष्टिमन्तो *३० ७ पैष्य विपाचयेत् निष्पेष्य पाचयेत् ३१ ४ सनागरकेशरैः सनागकेशरैः ३३ २१ -स्तदैकतः -स्तदेकतः ३४ ११ मृन्मयेऽपि मृण्मयेऽपि ,, १६ अशीतिर्वातरोगार्णा अशीतिं वातरोगाणां ३५ १२ पलशतं पलशतं ,, २५ अशीतिर्वातजान् अशीतिं वातजान् ३७ १३ विंशतिः विंशतिं ,, १४ मेघाभिजनता शुभा मेघाभिजनताः शुभाः ,, १८ तथा जनकपूजिता । ?) तप्ताजनसुपूजिता । ,, १९ अशीतिर्नरनारीणां अशीतिं नरनारीणां ३८ ३ कुष्ठमेलां चांशुमतीं कुष्ठमेला चांशुमती ४१ ८ -च्छलक्षणकुट्टितं -च्छूक्ष्णकुट्टितम् ,, २२ -कमलोत्पलैः -कमलोत्पलम् ४३ १६
३ सुपाठः पृ. पं. मिश्रितं तु मिश्रितं ५० १८ केशवर्धनं केशवर्धनकरं ,, ,, दन्तानाबद्धमूलांश्च दन्तानबद्धमूलांश्च ५२ १ शिरीषाङ्गितुले शिरीषाङ्गे तुले ५५ १७ स्यादृद्धः तु वृद्धः ६२ ८ समधुच्छिष्टो समधूच्छिष्टो ६५ ४ -गुल्मोदरादीनयं -गुल्मोदरादीनिदं ७० ८ -नवस्य नवानां ७१ १३ आमातीसारशमनं आमातीसारशमनः ७३ ९ -शूलनुत् -शूलहा ,, ,, सुगन्धी हृद्यः क्षयरोहन्ता सुगन्धिहृद्यः क्षयरोगहन्ता ७६ ७ कामदयग्निवृद्धिं कामदमग्निविवृद्धिं ८१ १८ यथाक्रमकृतान् भागां- यथाक्रमकृता भागा- ८४ ६ कवलंः प्रतिसारिणम् केवलं प्रतिसारणात् ८६ ११ वातश्लेष्मामयाहम् वातश्लेष्मामयापहम् ९१ २४ हिङ्गु हिङ्गं ९३ २६ अशीतिर्वातजान् अशीतिं वातजान् ९४ १९ विंशतिः विंशतिं ,, २० संजनयेद्धिमा- संजनयेद्दीमा- ,, २४ शकुभिः शक्तुभिः ९५ २१ दशैन्दुराज्या दशैन्दुराज्याः ९७ ३ खादेद्यथामिः खादेद्यथाग्नि ,, ९ द्विजीरकं द्वे जीरके १०० ,, पलमानि पलमानानि १०१ २५ क्षयविबन्धं क्षयं विबन्धं १०३ ७ पथ्याभिसहितं पथ्याभिः सहितं १०४ ११ स्थौल्याम्लवात- स्थौल्यामवात- ,, २६ तत्रैव भक्षयेत्कल्के तत्रैकं भक्षयेत्कल्यं १०५ ११ पार्श्वशूलसमरोचकम् पार्श्वशूलमरोचकम् १०६ २२ कृमिप्लीहानमुदरं कृमीन् प्लीहानमुदरं १०७ १९ सहिङ्ककर्षत्वणु- सहिङ्गुकर्षं त्वणु- १०८ ७
४ अपपाठः सुपाठः पृ. पं. -पाण्डाययारोचक- -पाण्ड्वामयारोचक- ,, १० पूत्वा पूतं ११० २७ खर्जिक्संज्ञिकं खर्जिक्संज्ञकं १११ १६ -युक्ताः खदिरगुटिकाश्च रोगघ्न्यः -युक्ता खादिरगुटि- काऽऽस्वरोगघ्नी ११५ १२ मुखेन धारिता मुखे सुधारिता ११६ ५ वत्सनाभवल्लयुगं वल्लषट्कं वत्सनाभं वल्लयुगं षड् वल्लानि त्रिकटुकचूर्णस्य त्रिकटुचूर्णस्य ११६ ७ पिप्पलीमूलस्य कृष्णमूलस्य ,, ८ -दंशमूली -दंशमूली ११७ ५ -जम्बाम्रकपित्थं -जम्ब्वाम्रकपित्थं ,, १६ क्षिप्तोऽप्सु क्षिप्तस्तु ११८ ४ विंशतिः विंशतिम् ,, २१ व्याधिसमूह- व्याधिगणं च ११ ९ २४ हन्यादशांसि हन्यादशांसि १२० २२ चेति चैव १२२ १ वलीपलिंतरोगरहितो वलिपलिंतरोगरहितो १२४ ३ रसायनवरिष्ठम् रसायनश्रेष्ठम् ,, ५ मधुत्रिफल- मधुत्रिपल- ,, १३ भुक्तैस्तथाऽमुक्तवति भुक्ते तथाऽमुक्तवति १२५ १३ उच्चटा 'सूचटा १२६ २६ भक्षयित्वा तु भक्षयित्वा १३० २३ नाडीव्रणक्लेद- नाडीव्रणक्लेद- १३२ ४ पलमेकं पलमेकं तु ,, २३ उपयोक्षियो उपयोगात्स्त्रियो १४४ १ -चिरिबिल्वमूलं -चिरबिल्वमूलं १४६ २ त्रिकटुं तथा च कटुत्रयम् १४८ २६ मासद्वयोपयोगाद्वेद्दिनाशय- मासद्वयोपयोगाद्विनाश्य- १५० २ एतान्येकपलीकानि एतेषां पलिकान् भागान् १५३ २५ तद्यथाग्निबलं तं यथाग्निबलं १५५ २६ -दौर्बत्यानाहनाशनः -दौर्बल्यानाहनाशनम् ,, २७
५ अपपाठः \t सुपाठः \t पृ. \t पं. यथाविधिः \t यथाविधि \t १६७ \t ” तन्मात्रया \t तं मात्रया \t १७१ \t १३ पलविंशतिः \t पलविंशतिम् \t १७७ \t ३ -त्पेयं तत्र \t -त्पेयस्तस्य \t १७९ \t २२ विंशतिः \t विंशतिम् \t १८१ \t २७ आमहत्कफहृद्रोग- \t आमहा कफहृद्रोग- \t १८२ \t ११ द्रवो पेयः \t द्रवः पेयः \t १८३ \t २६ नेत्रंभेषज- \t नेत्रैर्भेषज- \t १८६ \t १३ पलमितमिति \t पलमिह हि \t १९६ \t १० सूर्यातपे स्थाप्य ततस्तु \t संस्थाप्य सूर्यातप एष \t १९७ \t ४ प्रस्थमुत्तमम् \t प्रस्थमुत्तमा \t २०५ \t १७ अशीतिवातजाम् \t अशीतिं वातजान् \t २११ \t १० गजानां शिशूनामपि \t शिशूनां दन्तिनामपि \t ” \t ११ -मजिष्ठारवग्व- \t -मञ्जिष्ठारग्वध- \t २१८ \t ७ -गरादिशमनं \t -गरादिदोषशमनं \t २१९ \t १६ वचा । \t वचा \t २२० \t ७ दतांश्च \t दन्तांश्च \t ” \t १० सिंहचूर्णम् । \t सिंहणचूर्णम् । \t २२३ \t ६ पित्तरक्तातिसारं \t पित्तरक्तातीसारं \t २२६ \t ९ चतुः पलमिदं \t चतुः पलमितं \t २२७ \t २३ भागश्वार्थस्तापितरोद्भवस्य \t भागश्वार्थस्तापितीरोद्भवस्य \t २२९ \t १० परिक्लुताम् \t परिप्लुताम् \t ” \t १४ शोषे द्वितीयो \t शोषे द्वितीयः \t २३९ \t १५ १ पञ्चमपृष्ठे एकादशपङ्क्त्यनन्तरं 'चाङ्गेरीस्वरसं तुल्यं दधि सर्पिश्चतुर्गुणम्' इत्यधिकं पठनीयम् । २ अष्टाविंशत्यधिकद्विशततमे पृष्ठे एकोनविंशतिपङ्क्त्यनन्तरं 'सर्वरोगान्निह- न्त्याशु अनुपानविशेषतः' इत्यधिकं पठनीयम् । ३ भूमिकायां चतुर्दशपञ्चदशपङ्क्त्योः 'नित्योपयोगिनश्च प्रयोगरत्ना उक्ताः' इत्यत्र 'नित्योपयोगीनि प्रयोगरत्नान्युक्तानि' इति पठनीयम् । समाप्तमिदं गदनिग्रहप्रयोगखण्ड शुद्धिपत्रम् ।
गदनिग्रहकारेण प्रयोगखण्डे उपात्तानां ग्रन्थानां ग्रन्थकर्तॄणां च नामानि । —❖— नाम | पृ. | पं. | काङ्कायनः | ८० | २५ हारीतः | ४ | २ | आचार्यलोकसेनः | ८४ | १७ अग्निवेशः | ५ | १६ | भास्करः | ९१ | २३ सिद्धसारः | ८ | ८ | माणिभद्रः | १०८ | १८ भेडः | ,, | २६ | कालपादः | १२९ | ९ खरनादः | ११ | १९ | भारद्वाजः | १४० | २ वाग्भटः | १२ | ६ | अगस्तिः | १४५ | ५ कृष्णात्रेयः | ,, | २० | वशिष्ठः | १४६ | २१ वैदेहः | १३ | १४ | भृगुः | १४८ | १४ क्षारपाणिः | १८ | १७ | शूलपाणिः | १६६ | ५ चिकित्साकलिका | २३ | १ | सिंहणभूमिपालः | २२३ | १० आश्विनसंहिता | ७० | ६ | सिंहगुप्तः | २३२ | ११
आयुर्वेदीयग्रन्थमाला ।
श्रीशोधलविरचितो
गदनिग्रहः।
मङ्गलाचरणम् ।
करकिसलयसङ्गी यस्य पीयूषकुम्भः परममरवधूनां भूयसे मङ्गलाय । स खलु निखिलदुग्धाम्भोधिरत्नेषु रत्नं हरतु दुरितराशीनाशु धन्वन्तरिर्वः ॥ १ ॥ त्रिभुवनजनरोगग्रामसंग्रामजेताऽ- मृतभृतधृतकुम्भोदूर्णहस्तायुधश्रीः । अमरमथितदुग्धाम्भोभिल्लब्धोदयोऽसौ दलयतु दुरितौघानाद्यवैद्याधिपो वः ॥ २ ॥ नानामुनिकृतैः श्लोकैः शोधलेनाल्पमेधसा । विबुधप्रतिबोधाय ग्रथ्यते गदनिग्रहः ॥ ३ ॥
ग्रन्थानुक्रमणिका ।
घृतं तैलं च चूर्णानि गुटिलेहौ तथासवाः । आदावेते ह्यनेकार्था ग्रन्थेऽस्मिन् गदनिग्रहे ॥ ४ ॥ ज्वरोऽतिसारो ग्रहणी चार्शोऽजीर्णे विषूचिका । अलसश्च विलम्बी च कृमिरुक् पाण्डुकामले ॥ ५ ॥ हलीमकं रक्तपित्तं राजयक्ष्मोरसः क्षतम् । कासो हिक्का सह श्वासैः स्वरभेदस्त्वरोचकः ॥ ६ ॥ छर्दिस्तृषा च मूर्च्छा च रोगाः पानानमदात्ययः । दाहो वातविकाराश्च वातरक्तोरुरुक् तथा ॥ ७ ॥
२ आयुर्वेदीयग्रन्थमाला । आमवातस्तथा शूलं शूलं च परिणामजम् । जरत्पित्तमथानाह उदावर्त्तोऽथ गुल्मरुक् ॥ ८ ॥ हृद्रोगो मूत्रकृच्छ्रं च मूत्राघातस्तथाऽश्मरी । प्रमेहो मधुमेहश्च पिटिकाश्च प्रमेहजाः ॥ ९ ॥ मेदोदोषोदरं शोफो विद्रधिर्वृद्धिरेव च । कुष्ठं श्वित्रं शीतपित्तमुदर्दः कोठ एव च ॥ १० ॥ अम्लपित्तं विसर्पश्च विस्फोटाऽथ मसूरिका । इति कायचिकित्सायां मया रोगाः प्रकीर्तिताः॥ ११॥ शालाक्ये शिरसो रोगाः कर्णनेत्रामयास्तथा । नासामुखामयांश्चैव द्वितीयेऽङ्गे चिकित्सिताः ॥ १२ ॥ गण्डमालाऽपची गण्डः पिटिकार्बुदग्रन्थयः । श्लीपदं व्रणशोफश्च सद्योव्रणचिकित्सितम् ॥ १३ ॥ भग्ननाडीव्रणौ चैव भगन्दरोपदंशकौ । शूकदोषः क्षुद्ररोगाः शल्ये चाङ्गे चिकित्सिताः ॥ १४ ॥ भूतोन्मादस्तथोन्मादस्तथाऽपस्मार एव च । भूततन्त्रे चतुर्थेऽङ्गे सनिदानाश्चिकित्सिताः ॥ १५ ॥ प्रदरो योनिव्यापच्च गर्भास्रावचिकित्सितम् । मूढगर्भोऽथ वन्ध्या च योनिशुक्रगदास्तथा ॥ १६ ॥ सूतिका स्तन्यदोषाश्च गाढनिर्लोमभेषजम् । बालरोगचिकित्सा च बालतन्त्रेऽथ पञ्चमे ॥ १७ ॥ सर्पलूताविषे चैव वृश्चिकोन्दुरुजं विषम् । नखदन्तविषं चैव स्थावरं कृत्रिमं विषम् ॥ १८ ॥ षष्ठे तन्त्रे विषारूख्ये च प्रोक्तं चैषां चिकित्सितम् । रसायनं सप्तमं च वाजीकरणमष्टमम् ॥ १९ ॥ पञ्चकर्माधिकारे च स्नेहस्वेदविधिस्तथा । वमनं च विरेकश्च नस्यकर्मेत्यनुक्रमः ॥ २० ॥
१.] गदनिग्रहः । ३ अथातो घृताधिकारः प्रारभ्यते ॥ ज्वरे मञ्जिष्ठाद्यं घृतम् । मञ्जिष्ठाऽतिविषा पथ्या वचा नागररोहिणी ॥ १ ॥ देवदारु हरिद्रा च द्रोणेऽपां पलिकान् पचेत् । क्वाथेऽस्मिन् साधयेत् पिष्टैर्घृतप्रस्थं पिचुन्मितैः ॥ २ ॥ शृङ्गवेरकणाहिङ्गुद्विक्षारपडुपञ्चकैः । तत्कफावृतसर्वोत्थज्वरिणाममृतोपमम् ॥ ३ ॥ वर्ध्मगुल्मानिलश्वासकासपाण्डुविकारिणाम् । गलग्रन्थिप्रमेहार्शःप्लीहापस्मारशोफिनाम् ॥ ४ ॥ उदावर्तपरीतानां मन्दाग्निकृमिकुष्ठिनाम् । द्वितीयं मञ्जिष्ठाद्यं घृतम् । मञ्जिष्ठा च हरिद्रा च देवदारु हरीतकी ॥ ५ ॥ शृङ्गवेरं ह्यतिविषा वचा कटुकरोहिणी । हिङ्गुतश्चाक्षमात्रेण तत्सिद्धमवतारयेत् ॥ ६ ॥ एतन्माञ्जिष्ठकं सर्पिर्बहून् रोगान्नियच्छति । हिक्कां श्वासं ज्वरं दुष्टं ग्रहणीं पाण्डुरोगताम् ॥ ७ ॥ प्रमेहान्मधुमेहांश्च कृमीन् कुष्ठमरोचकम् । कासं शोषमुदावर्तमपस्मारं तथैव च ॥ ८ ॥ अर्शांसि श्वयथुं चैव गण्डमालां प्लीहोदरम् । ज्वरे तिल्वकाद्यं घृतम् । तिल्वकस्य पलान्यष्टौ त्वचस्तु सुकृतादतः ॥ ९ ॥ अंशुमत्युरुबूकं च बिल्वाद्यं च पृथक् पलम् । यवकोलकुलत्थानां प्रस्थं प्रस्थं फलत्रिकात् ॥ १० ॥ तत्साधयेज्जलद्रोणे चाष्टभागावशेषितम् । घृतप्रस्थं पचेत्तेन दत्वा दम्नस्तथाढकम् ॥ ११ ॥ कर्षेण यावशूकस्य पर्कं तदवचूर्णयेत् । एतत्तु तैल्वकं नाम जीर्णज्वरविषापहम् ॥ १२ ॥
कृमिकुष्ठहरं चैव शोफपाण्ड्वामयापहम् । जीर्णज्वरे हारीताल्कटुकं घृतम् । त्रिफलां पञ्चमूल्यौ द्वे कुलत्थान् बदरान् यवान् ॥ १३ ॥ द्विपलिकान् जलद्रोणे त्वष्टभागावशेषितम् । निःस्राव्य विपचेत्कल्कं दत्वा प्रस्थं च सर्पिषः ॥ १४ ॥ पिप्पली पिप्पलीमूलं चव्यचित्रकनागरम् । पुष्करातिविषे भार्गी शठी सप्तच्छदं वचा ॥ १५ ॥ रजन्यौ नक्तमालं च पाठे द्वे शिग्रुतुम्बरु । सोमवल्कोऽर्कमूलानि मदनं कटुरोहिणी ॥ १६ ॥ तेजस्विनी सगोजिह्वा चन्दनं कण्टकारिका । किराततिक्तकं मुस्तं पटोलं सदुरालभम् ॥ १७ ॥ वयस्थां पिचुमन्दं च कटुकं हिङ्गुना सह । एतानक्षसमान् दत्वा क्षारौ द्वयर्धपलोन्मितौ ॥ १८ ॥ लवणानां च पञ्चानां कर्षं कर्षं प्रदापयेत् । सिद्धं तन्मात्रया पीतं सर्वजीर्णज्वरापहम् ॥ १९ ॥ हृत्प्लीहग्रहणीदोषश्वासकासार्शसां हितम् । गुल्मघ्नं कटुकं नाम कृष्णात्रेयेण पूजितम् ॥ २० ॥ दीर्घकालानुबद्धानां ज्वराणाममृतोपमम् । अग्निमान्द्ये अग्निघृतम् । मद्यातकान्पलशतं जलद्रोणे विपाचयेत् ॥ २१ ॥ चतुर्थांशावशेषं तु कषायमवतारयेत् । त्र्यूषणं पिप्पलीमूलं चित्रको हस्तिपिप्पली ॥ २२ हिङ्ग्वजमोदं च पञ्चैव लवणानि च । द्वौ क्षारौ दाडिमं चात्र दद्यादर्धपलोन्मितान् ॥ २३ मस्त्वम्लरसचुक्राणां प्रस्थं प्रस्थं प्रदापयेत् । आर्द्रकस्य रसप्रस्थं घृतप्रस्थं विपाचयेत् ॥ २४ ॥ एतदग्निघृतं नाम मन्दाग्नीनां प्रशस्यते ।
गदनिग्रहः । ५ अर्शांसि वातरोगं च प्लीहोदरजलोदरम् ॥ २५ ॥ ग्रन्थ्यर्बुदापचीशोफकुष्ठमेदोऽनिलांस्तथा । ये च कुक्षिगता रोगा ये च बस्तिसमाश्रिताः ॥ २६ ॥ तान् सर्वान्नाशयेदेतत्सूर्यस्तम इवोदितः । ग्रहण्यां चाङ्गेरीघृतम् । पिप्पली नागरं पाठा यवानी विश्वभेषजम् ॥ २७ ॥ भागांस्त्रिपलिकान् कृत्वा कषायमुपकल्पयेत् । भार्गी च पिप्पलीमूलं व्योषं चव्यं सचित्रकम् ॥ २८ ॥ श्वदंष्ट्रा पिप्पली धान्यं बिल्वं पाठा यवानिका । एतैः पलार्थकैर्द्रव्यैः कृत्वा कल्कं विपाचयेत् ॥ २९ ॥ पलानि सर्पिषस्तस्मिन् चत्वारिंशत्समावपेत् । मृद्वग्निना ततः साध्यं सिद्धं सर्पिर्निधापयेत् ॥ ३० ॥ ग्रहण्यर्शोविकारघ्नं गुल्महृद्रोगनाशनम् । शोफप्लीहोदरानाहमूत्रकृच्छ्रज्वरापहम् ॥ ३१ ॥ कासहिकारुचिश्वाससूदनं सर्वगुल्मनुत् । अग्निवेशात् गुदभ्रंसे द्वितीयं चाङ्गेरीघृतम् । नागरं पिप्पलीमूलं चित्रको हस्तिपिप्पली ॥ ३२ ॥ श्वदंष्ट्रा पिप्पली धान्यं बिल्वं पाठा यवानिका । चाङ्गेरीस्वरसे सर्पिः कल्कैरेभिर्विपाचयेत् ॥ ३३ ॥ चतुर्गुणेन दध्ना तु तद्धृतं कफवातनुत् । अर्शांसि ग्रहणीरोगं मूत्रकृच्छ्रं प्रवाहिकाम् ॥ ३४ ॥ गुदभ्रंशार्तिमानाहं घृतमेतद्व्यपोहति । गुल्मे दाधिकं घृतम् । विडदाडिमसिन्धूत्थहुतभुग्व्योषजीरकैः ॥ ३५ ॥ हिङ्गुसौवर्चलक्षाररुग्वृक्षाम्लाम्लवेतसैः । बीजपूररसोपेतं सर्पिर्दधि चतुर्गुणम् ॥ ३६ ॥ साधितं दाधिकं नाम गुल्महृत् प्लीहशूलनुत् ।