गीतगोविन्दम् (महाकवि जयदेव - सम्पूर्ण १२ सर्ग व २४ अष्टपदी सटीक)
Gita Govinda of Jayadeva with Hindi Commentary
महाकवि जयदेव / पं. रामचन्द्र मिश्र द्वारा
४१२ श्रीगीतगोविन्दम् इत्थं केलिततीर्विहृत्य यमुनाकूले समं राधया तद्रोमावलि-मौक्तिकावलि-युगे वेणी भ्रमं बिभ्रति। तत्राह्लादि-कुच-प्रयागफलयोर्लिप्सावतोर्हस्तयो- र्व्यापाराः पुरुषोत्तमस्य ददतु स्फीतां मुदा सम्पदम् ॥४ ॥ अनुवाद—इस प्रकार यमुना कूलपर श्रीराधाके साथ विविध केलि क्रीड़ाओंके द्वारा विहार करके श्रीराधाकी रोमावली एवं मुक्तावली दोनों ही प्रयागके संगमका भ्रम उत्पन्न कर रहे थे। उस प्रयागके फल आह्लादकारी दोनों कुच हैं। उनको प्राप्त करनेकी इच्छावाले पुरुषोत्तम श्रीकृष्णके दोनों हस्त कमलोंमें समस्त व्यापार पाठमें और श्रोताओंको आनन्दरूप सम्पत्ति प्रदान करें। बालबोधिनी—कवि जयदेव कहते हैं कि श्रीपुरुषोत्तमके हस्त व्यापार अपने पाठकों एवं श्रोताओंको अतिशय आनन्द सम्पत्ति प्रदान करें। इन हाथोंका यह वैशिष्ट्य है कि ये नित्य-निरन्तर वेणी संगममें आनन्दित होते रहते हैं। प्रयागका फल कुच है। स्वाधीनभर्तृका श्रीराधाके साथ यमुनाके तट पर श्रीकृष्ण स्वेच्छापूर्वक अनेक प्रकारकी क्रीड़ाएँ करते हैं। श्रीराधाकी रोमावली एवं मुक्तावलीका संगम गंगा-यमुना नदीके संगम विलासका स्मरण कराता है। रोमावलीकी उपमा यमुनासे की गई है; क्योंकि वह कृष्णवत् नीलवर्णा है। मुक्तावली उज्ज्वल है। अतः उसकी तुलना गंगासे की गई है। उनका संगम ही प्रयाग होता है। कुच द्वय उस प्रयाग स्नानके फल हैं, उसकी प्राप्ति ही स्नानके फलकी प्राप्ति है। नीली-नीली यमुनाकी धारा और उजली-उजली मौक्तिकावलीके संगमके कारण श्रीराधा ही प्रयाग हैं। इस प्रयागके आनन्दप्रद फलको प्राप्त करनेकी इच्छासे श्रीकृष्ण जो हस्त व्यापार कर रहे हैं, वे व्यापार समस्त पाठकोंके लिए अभिवृद्धिशील आनन्दका विधान करें। प्रस्तुत प्रबन्धका नाम 'सुप्रीतपीताम्बर तालश्रेणी' है।
द्वादशः सर्गः—सुप्रीत—पीताम्बरः ४१३ प्रस्तुत श्लोकमें सांगरूपकालंकार ही शार्दूलविक्रीड़ित छंद है, स्वाधीनभर्तृका नायिका है। पाञ्चाली रीति एवं गीति है। भारती वृत्ति है। धीरोदात्त गुणोंसे युक्त उत्तम नायक है। पर्यङ्कीकृत—नाग—नायक—फणा—श्रेणी मणीनां गजे संक्रान्त—प्रतिबिम्ब—संकलनया विभ्रद्विभू—प्रक्रियाम्। पादोम्भोरुहधारि—वारिधि सुतामक्ष्णां दिदृक्षुः शतैः कायव्यूहमिवाचरन्नुपचितीभूतो हरिः पातु वः॥ अन्वय—[अथ श्रीराधायाः पूर्वोक्तभावदर्शनात् तृप्तोत्कण्ठा- वगुण्ठितः श्रीकृष्णे नेत्रबाहुल्यमिच्छन् श्रीनारायणस्य लक्ष्मीदर्शनं श्लाघितवान् इति स्मरन् कविः आशिषं प्रयुङ्क्ते]—पर्यङ्कीकृत- नागनायक-फणा-श्रेणी-मणीनां गणे (पर्यङ्कीकृतस्य नागनायकस्य शेषस्य फणाश्रेण्यां ये मणयः रत्नानि तेषां गणे समूहे) संक्रान्तप्रतिविम्ब संकलनया (संक्रान्तानां मिलितानां प्रतिबिम्बानां प्रतिकृतीनां संकलनया प्रसरणेन) विभुप्रक्रियां (सर्वव्यापिभावं) विभ्रत् (धारयन्) उपचितीभूतः (वृद्धिं प्राप्तः) पादाम्भोरुहधारि- वारिधिसुतां (चरणकमल-सेविनी या वारिधिसुता लक्ष्मीः तां) अक्ष्णां शतैः (नेत्रशतैः) दिदृक्षुः (द्रष्टुमिच्छुः) [अतएव] कायव्यूहमिव (शरीरसमूहमिव) आचरन् हरिः (युष्मान्) पातु (रक्षतु) ॥२॥ अनुवाद—जिस नाग-नायक शेषराजको जिन्होंने अपनी शय्या बना रखा है, उसकी असंख्य फनोंकी मणियोंमें प्रतिबिम्बित होनेसे जिनका विभुत्व विस्तारको प्राप्त कर रहा है, श्रीलक्ष्मीजी सदैव जिनके चरण कमलोंका संवाहन करती हैं और जिन्हें वे सहस्र-सहस्र नेत्रोंसे देखना चाहती हैं, जो कायव्यूहकी भाँति अनेकों विग्रह-स्वरूपोंमें स्फीत हो रहे हैं, वे श्रीहरि आप सबकी रक्षा करें। त्वामप्राप्य मयि स्वयम्बरपरां क्षीरोद—तीरोदरे शंके सुन्दरि! कालकूटमपिवन्मूढ़ो मृडानीपतिः।
४१४ श्रीगीतगोविन्दम् इत्थं पूर्वकथाभिरन्य मनसो विक्षिप्य वक्षोञ्चलं पद्मायाः स्तनकोरकोपरि मिलन्नेत्रोहरिः पातु वः ॥ अन्वय—[एवं चिन्तयन् अत्युच्छलितोत्कण्ठया तदवलोकनाय तस्य वैचित्त्यापत्तेः पुनः श्रीनारायण-चरित-वर्णन-कौतुकमातनोदिति स्मरन् पुनः अशिशयति]—अयि सुन्दरि (त्रिलोकसौन्दर्यसारभूते) क्षीरोदतीरोदरे (क्षीरोदस्य क्षीरसागरस्य तीरोदरे तटमध्ये) मयि स्वयंवरपरां (मदेकचित्तामित्यर्थः) त्वाम् अप्राप्य मूढः (तव सौन्दर्यविमुग्धः) मृडानीपतिः (गिरिजानाथः) कालकूटं (विषं) अपिबत् (वृथैव मे जीवितमिति मन्यमानः तत्त्यागार्थमिति भावः] [इति अहं] शङ्के (सम्भावयामि); [एतेन गिरिजाया अपि पद्मायाः सौन्दर्याधिक्यं सूचितम्], इत्थं (एवं) पूर्वकथाभिः (पुराणप्रसिद्धाभिस्तदश्रुतपूर्वाभिः) अन्यमनसः (विस्मितचित्तायाः) पद्मायाः (लक्ष्म्याः) वक्षोऽञ्चलं (वक्षःस्थमुत्तरीयवसनं) विक्षिप्य (अपसार्य) स्तनकोरकोपरि (कुचकुट्मलयोः उपरि) मिलन्नेत्रः (संक्रान्तदृष्टिः) हरिः वः (प्रेमरसज्ञान् भक्तान् युष्मान्) पातु ॥ अनुवाद—हे सुन्दरि! मूढ़ मृड़ानीपति रुद्र क्षीर-सागरके तटपर जब तुम्हें प्राप्त नहीं कर सके, तब तुमने स्वयं मुझे वरण कर लिया। इस प्रकार पूर्ण कथाको मनमें स्मरण कर महापद्मारूपा श्रीराधाके स्तन कोरकके ऊपर जिन्होंने नेत्र भर-भरकर दर्शन प्राप्त किये, वे श्रीहरि आप सबकी रक्षा करें। श्रीभोज-देव-प्रभवस्य रामा-देवीसुत श्रीजयदेवकस्य। पराशरादिबन्धुवर्गकण्ठे श्रीगीतगोविन्दकवित्वमस्तु ॥ इति श्रीजयदेवकृतौ गीतगोविन्द सुप्रीतपीताम्बरो नाम द्वादशः सर्गः। अन्वय—[अथ स्वमातृपितृस्मरणपूर्वकं पराशरादिमत-ज्ञातार एव अस्य अधिकारिणः इति तान् प्रति अशिशयति]—श्रीभोजदेव- प्रभवस्य (श्रीभोजदेवः प्रभवः जनको यस्य श्रीभोजदेव-सुतस्य)
द्वादशः सर्गः—सुप्रीत-पीताम्बरः ४१५ वामादेवी-सुत-श्रीजयदेवकस्य (वामादेवी जयदेवजननी तस्याः सुतस्य श्रीजयदेवकस्य) पराशरादिप्रिय-बन्धुकण्ठे (पराशरादीनां ये प्रियाः तन्मतज्ञाः तेषु अपि ये बन्धवः तन्मतसार- श्रीराधामाधवरहः-केलिज्ञानेन बन्धुत्वं प्राप्ताः तेषां कण्ठे) [भूषणवत्] [सर्वदा] श्रीगीतगोविन्दकवित्वं (श्रीगीतगोविन्दाख्यं काव्यं) अस्तु [अनेन अस्य प्रबन्धस्य सर्व-वेदेतिहास-पुराणादि- वेत्तॄणां सम्मत्या सर्वसारत्वं दुरूहत्वञ्च बोधितम्]॥ सर्गोऽयं समृद्धिदाख्य-सम्भोग-रसानन्दितः पीताम्बरः प्रियाधीनत्वेन तद्वर्ण- वसन-प्रियः श्रीकृष्णो यत्र स इति सुप्रीत-पीताम्बरो नाम द्वादशः ॥६॥ अनुवाद—श्रीभोजदेवसे उत्पन्न रामादेवीके पुत्र श्रीजयदेव कवि द्वारा प्रस्तुत इस प्रबन्ध काव्य श्रीगीतगोविन्दका काव्यत्व पराशर आदि प्रिय बन्धुओंके कण्ठमें सुशोभित हो। बालबोधिनी—श्रीभोजदेव और श्रीरामादेवी (श्रीराधादेवी) के पुत्र श्रीजयदेवने भगवान्के प्रिय भक्तों पराशर आदि प्रिय मित्रोंके कण्ठमें मुखरित विभूषित होनेके लिए और प्रखरित होकर गगनमें अनुगूंजित होनेके लिए इस पदावलीकी रचना की है। रसरूप श्रीकृष्णके स्मरणमें अनोखे लीला-चित्र भक्त हृदयोंमें सदैव सुशोभित होते रहें, प्रिय-प्रियतर-प्रियतम-प्राण सर्वस्व बन जावें। समाप्तोऽयं ग्रन्थः
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