गोपथ ब्राह्मण (अथर्ववेद - क्षेमकरणदास त्रिवेदी हिन्दी भाष्य)
Gopatha Brahmana with Hindi Bhashya by Pt. Kshemkarandas Trivedi
महर्षि गोपथ / पं. क्षेमकरणदास त्रिवेदी द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान · चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान · 1950 (उद्गम)
५५० गोपथब्राह्मणे उत्तरभागे प्र० ६ । क० १६ (नृमणाः) नरों के समान मन वाले (इन्द्रः) इन्द्र [बड़े प्रतापी शूर] ने (तम् धमन्तम्) उस हांफते हुये को (शच्या) बुद्धि से (आवत्) बचाया है और (स्नेहिताः) अपनी मारू सेनाओं को (अप अधत्त) हटा लिया है ॥
इति श्रीमद्राजाधिराज प्रथितमहागुणमहिम श्रीसयाजीराव गायक वाडा- धिष्ठित बड़ोदेपुरीगतश्रावणमासदक्षिणापरीक्षायाम् ऋक्सामार्थववेदभाष्येषु लब्धदक्षिणेन श्री पण्डित 'क्षेमकरणदासत्रिवेदी' अथर्ववेदभाष्यकारेण कृते गोपथब्राह्मणभाष्य उत्तरभागे षष्ठः प्रपाठकः समाप्तः ॥
अयं प्रपाठको ग्रन्थश्च प्रयागनगरे भाद्रमासे कृष्णजन्माष्टमीं तिथौ १९८१ तमे [एकाशीत्युत्तरैकोनविंशतिशतके] विक्रमीये संवत्सरे सुसमाप्तिमगात् ॥
[मुद्रितम्-मार्गशीर्षकृष्णा ८ संवत् १९८१ वि० ता० १६ नवम्बर सन् १९२४ ई० ॥]
क्षेमकरणदास त्रिवेदी । ५२ लूकरगंज, प्रयाग, जन्म, कार्तिक शुक्ला ७ संवत् १९०५ [इलाहाबाद] विक्रमीय [ता० ३ नवम्बर १८४८ ईस्वी] भाद्रकृष्ण ८ संवत् १९८१ वि० जन्मस्थान, ग्राम शाहपुर-मडराक, ता० २२ अगस्त १९२४ ई० ॥ जिला अलीगढ़ ॥ समाप्तम्
कण्डिका कण्डिका
ओं३म् गोपथब्राह्मण भाष्य में वेदमन्त्र, ब्राह्मण वचन आदि की वर्णानुक्रमणसूची ॥ भाग, भाग; मन्त्र आदि प्रपाठक, पृष्ठ मन्त्र आदि प्रपाठक, पृष्ठ कण्डिका कण्डिका अ अभि तष्टेव दीधया उ ६, २ ४१६ अभि प्र वः सुरा उ ६, ७ ५१२ अथँ शुग्गुँशुष्टे उ २, ४ ३१३ अभूद् देवः सवि उ ४, ७ ४२५ अग्न आ याहि पू १, २६ ५३ अमेव नः सुहवा उ २, २२ ३५८ अग्निं होतारं मन्ये उ ६, १० ५२१ अमोऽहमस्मि सा त्वं उ ३, २० ४०४ अग्निं दूतं वृणीमहे पू २; २३ १२६ अयं त इध्म आत्मा उ १, ४ २७० अग्निं दूतं वृणीमहे उ ३, १२ ३८५ अयं ते योनिऋतं उ ४, ६ ४२६ अग्निमीडे पुरोहितम् पू १, २९ ५२ अयं नो नमसस्प उ ४, ६ ४२८ अग्निमीडे पुरोहितम् उ १, ४ २७० अयमु त्वा विचर्ष उ ३, १४ ३६१ अग्निर्विद्वान् यज्ञं पू १, १२ २५ अथर्वदधातुरप्रत्ययः पू १, २६ ४५ अग्निवासाः पृथि पू २, ६ ६७ अवर्डेहि सोमकामं उ २, २१ ३५४ अग्नीषोमावदधु उ २, ६ ३२७ अव द्रप्सो अंशु उ ६, १६ ५४७ अग्ने पत्नीरिहा उ २, २० ३५१ असि यमो अस्यादि पू २, २१ १२५ अच्छा म इन्द्रं उ ४, १६ ४४४ अस्तम्नाद् द्यामसुरो उ ४, १५ ४४६ अदितेऽनुमन्यस्व उ १, ४ २७१ अस्मा इदु प्र तवसे उ ५, १५ ४८५ अघा हीन्द्र गिर्वण उ ४, १७ ४४७ अस्मे प्र यन्धि मघ उ ४, ३ ४१९ अधिपतिरसि उ २, १४ ३३६ अस्य देवाः प्रदिशि उ ५, ८ ४७२ अनितिरसि उ २, १३ ३३५ अहन् वृत्रं वृत्रतरं उ ५, ६ ४६७ अनुख्यात्रे नमः उ २, १६ ३४८ आ अनुमतेऽनुमन्यस्व उ १, ४ २७१ आक्रमो ऽसि उ २, १४ ३४० अनुरोहोऽसि उ २, १४ ३३६ आग्निरगामि भारतो उ ४, १५ ४३६ अनुवृदसि उ २, १४ ३३६ आचार्यो ब्रह्मचारी पू २, ५ ८५ अन्तरिक्षे पथिभिः पू २, ६ ६७ आदित्या रुद्रा वसव उ ६, १४ ५४२ अप प्राच इन्द्र विश्वाँ उ ६, ८ ५१६ आदित्या ह जरितर उ ६, १४ ५४२ अपेन्द्र प्राचो मध उ ६, ४ ५२५ आ नो याहि सुता उ ३, १४ ३६१ अपेन्द्र प्राचो मध उ ६, १२ ६४७ आपतये त्वा परि उ २, ३ ३१० अभिजिदसि उ २, १३ ३३८ आ पूर्णो अस्य कलश उ २, २१ ३५५ अभि तष्टेव दीधया उ ६, १२ ४६३
आपोवत्सं जनयन्ती ( ५५२ ) उत्क्रमोऽसि भाग, भाग, मन्त्र आदि प्रपाठक, पृष्ठ मन्त्र आदि प्रपाठक, पृष्ठ कण्डिका कण्डिका आपो वत्सं जनयन्ती पू १, २ ४ इन्द्रस्य बाहू स्थविरो उ १, १८ २८६ आपो वत्सं जनयन्ती पू १, ३६ ७४ इन्द्रस्यौजो मरुताम पू २, २१ १२५ आ प्यायस्व मदिन्तम उ ३, ६ ३७० इन्द्राग्नी अपसस्प उ ३, १५ ३६३ आ यातं मित्रावरुणा उ ३, १३ ३८६ इन्द्राग्नी आगतं सुतं उ ३, १५ ३६३ आ याहि सुषुमाहि उ ३, १४ ३६१ इन्द्राग्नी उपह्वये उ ३, १५ ३६३ आ याह्यर्वाङुप व उ ६, २ ४६५ इन्द्राय मद्धने सुतं उ ५, ३ ४५८ आरोहोऽसि उ २, १४ ३३६ इन्द्राय सोमाः प्रदिवो उ २, २१ ३५४ आ वात वाहि भेषजं पू ३, १३ १६१ इन्द्रावरुणा मधुम उ ४, १५ ४४० आ वां राजानावध्व उ ४, १५ ४४० इन्द्रा वरुणा सुतपा उ २, २२ ३५७ आ वो वहन्तु सप्तयो उ २, २२ ३५८ इन्द्राय हि द्यौरसुरो उ ६, १ ४६४ आ सत्यो यातु मघवाँ उ ५, १५ ४८६ इन्द्रावरुणा युवमध्व उ ४, १५ ४४० आहं सरस्वतीवतो उ ५, १३ ४८३ इन्द्रावरुणा सुतपौ उ ४, १५ ४३७ इन्द्राविष्णू पिबतं उ २, २२ ३५८ इ इन्द्राविष्णू पियतं उ ४, १७ ४४८ इग्यणः सम्प्रसा पू १, २६ ४५ इन्द्राविष्णू मदपती उ ४, १७ ४४७ इच्छन्ति त्वा सोम्यासः उ ६, १ ४६४ इन्द्रेण रोचना दिव उ ५, १३ ४८३ इदं वसो सुतमन्धः उ ५, ३ ४५८ इमं स्तोममर्हते उ २, २२ ३५६ इदं ह्यन्वोजसा उ ५, ३ ४५८ इमा उ वां दिविष्टय उ ५, ३ ४६० इदं जना उपश्रुत उ ६, १२ ६४७ इमा उ वां दिविष्टय उ ५, १० ४७६ इदं ते सोम्यं मध्व उ २, २० ३५१ इमा ते वाजिन्त्रव पू २, २१ १२५ इदमित्था रौद्रं गूर्तं उ ६, ७ ५१२ इमा नु कं भुवना उ ६, १२ ५३० इन्द्रः कारूमबूबुधत् उ ६, १२ ५२८ इमामू षु प्रभृतिं उ ४, ३ ४१८ इन्द्रः पूर्भिदाति उ ४, २ ४१५ इमामू षु प्रभृतिं उ ६, १ ४६४ इन्द्रः पूर्भिदाति उ ६, १ ४६३ इयं त इन्द्र गिर्वणो उ ४, १७ ४४७ इन्द्रं वो विश्वतस्प उ ५, १२ ३८७ इयं पित्र्या राष्ट्र्च्रे उ २, ६ ३२० इन्द्र ऋभुभिर्वाज उ २, २२ ३५७ इषे त्वोर्जे त्वा पू १, २६ ५२ इन्द्र एषां नेता उ २, २ ३०८ इहेत्थ प्रागपागु उ ६, १३ ५३६ इन्द्र ऋतुविदं सु उ ३, १४ ३६१ इहेन्द्राग्नी उपह्वये उ ३, १५ ३६३ इन्द्र जीव सूर्यं जीव पू १, ३६ ७५ इन्द्र त्वा वृषभं उ २, २० ३५१ उ इन्द्र पिब प्रतिकामं उ ३, १४ ३६० उक्षाणाय वशानाय उ २, २० ३५२ इन्द्रश्च सोमं पिबतं उ २, २२ ३५८ उच्चा पतन्तमरुणं पू २, ६ ६७ इन्द्रश्च सोमं पिवतं उ ४, १६ ४४३ उत श्वेत आशुषत्त्वा उ ६ १४ ५४२ इन्द्रस्य नु वीर्याणि उ ३, १२ ३८६ उत्क्रमोऽसि उ २, १४ ३४०
कण्डिका कण्डिका
उत्क्रान्तिरसि ( ५५३ ) चन्द्रमा अप्स्वन्त भाग, भाग, मन्त्र आदि प्रपाठक, पृष्ठ मन्त्र आदि प्रपाठक पृष्ठ कण्डिका कण्डिका उत्क्रान्तिरसि उ २, १४ ३४० एवा पाहि प्रत्नथा उ २, २१ ३५४ उदप्रुतो न वया उ ४, १६ ४४४ एवेदिन्द्रं वृषणं वज्र उ ४, २ ४१६ उदिन्वस्यरिच्य उ ४, ३ ४१८ एवेदिन्द्रं वृषणं वज्र उ ६, ५ ५०६ उदुत्ये मधुमत्तमा उ ४, २ ४१५ एह्यू षु ब्रवाणि ते उ ४, ११ ४३४ उदु ब्रह्माण्यैरत उ ४, २ ४१६ एह्यू षु ब्रवाणि ते उ ४, १५ ३३८ उदु ब्रह्माण्यैरत उ ६, १ ४६३ ओ उदु ब्रह्माण्यैरत उ ६, २ ४१५ ओजोऽसि पितृभ्य उ २, १३ ३३७ उदुस्रियाः सृजते उ ५, ३ ४५६ ओम्भ्यादाने पू १, २७ ४६ उद् गा आजदङ्गिरो उ ५, १३ ४८३ ओं भुवोजनत् उ २, १४ ३४० उद् घेदभि श्रुता उ ३, १४ ३६१ ओं मूर्जनत् उ २, १४ ३४० उद्बुध्यस्वाग्ने उ १, ४ २७० ओं भूर्भुवः स्वर्जनत उ २, १४ ३४१ उपद्रष्ट्रे नमः उ २, १६ ३४७ ओं स्वर्जनत् उ २, १४ ३४० उपनीय तु यः शिष्यं पू २, १ ७७ क उपश्रोत्रे नमः उ २, १६ ३४८ कः सप्त खानि पू १, ३६ ७४ उपास्मै गायता नरः उ ३, १२ ३८५ कथं गायत्री त्रिवृ पू १, २१ ३६ उभा जिरयथुनं परा उ ४, १७ ४४८ कथा महामवृधत् उ ६, १ ४६२ उरुं नो लोकमनुनेषि उ ६, ४ ५०४ कद्रव्यो अतसीनां उ ६, ३ ५०१ उशन्नु षु णः उ ४, १ ४१२ कदू न्वस्याकृत उ ६, ३ ५०१ उशिगसि उ २, १३ ३३७ कया त्वं न ऊत्या उ ४, १ ४१२ ऋ कया नश्चित्र उ ४, १ ४११ कस्तमिन्द्र त्वा उ ४, १ ४१२ ऋचो अक्षरे परमे पू १, २२ ३६ कस्तमिन्द्र त्वा उ ६, ३ ५०१ ऋजीषी वज्री वृप उ ४, २ ४१६ किमित्ते विष्णो परि उ ५, ८ ४७३ ऋजुनीती नो वरुणो उ ५, १२ ४८० कुह स्विद् दोषा पू ३, १२ १५६ ऋतुर्जनित्री तस्या उ ४, १७ ४४७ को अद्य नर्यो दे उ ६, २ ४६७ ए ग एकपाद् द्विपदो भूयो पू २, ६ ६६ गोमूत्रं गोमयं पू २, २२ १२६ एतन्नो गोपाय उ ४, ६ ४२८ च एना वो अग्निं नमसो उ ५, ३ ४५६ एवा त्वामिन्द्र वज्रि उ ४, १ ४१२ चक्षुः श्रोत्रं यशो पू २, ८ ६२ एवा त्वामिन्द्र वज्रि उ ४, २ ५०३ चत्वारि शृङ्गा पू २, १६ १०६ एवा त्वामिन्द्र वज्रि उ ६, १ ४२२ चन्द्रमा अप्स्वन्त पू २, ६ ६७
कण्डिका कण्डिका
चन्द्रमा मनसो जातः ( ५५४ ) परोक्षेण परोक्षप्रिया भाग, भाग, मन्त्र आदि प्रपाठक, पृष्ठ मन्त्र आदि प्रपाठक, पृष्ठ कण्डिका कण्डिका चन्द्रमा मनसो जातः पू १, १२ २५ दिवि त्वात्तिरधार पू २, १७ १११ चर्षणीधृतं मघवा उ ४, १५ ४३६ दिवो न तुभ्यमन्वि उ ६, ६ ५२० ज दिवो नु मां बृहतो पू २, ७ ८६ देव संस्फान सह उ ४, ६ ४२६ जीवा स्थ जीव्यासं पू १, ३६ ७४ देव सवितः प्रसुव उ १, ४ २७१ जीवेम शरदः शतम् पू २, ८ ६२ जुष्टो वाचे भूयासं उ २, १७ ३४४ देवस्य त्वा सवितुः उ १, २ २६६ देवस्य त्वा सवितुः उ १, २ २६६ त देवस्य त्वा सवितुः उ २, १० ३३० तं वो दस्ममृती उ ४, २ ४१५ देवाः पितरः पितरो पू ५, २१ २४६ तत् त्वा यामि उ ४, २ ४१५ देवा ददत्वासुरं उ ६, १४ ५४३ तत् सवितुर्वरेण्यं पू १, ३२ ७१ देवानामेतत् परि पू २, ७ ८६ तदण्डमभवद् घैमं पू १, ३ ६ द्यौर्नय इन्द्राभि उ ६, ६ ५२० तदेवाग्निस्तदादि पू १, ६ १४ द्रप्सश्चस्कन्द उ २, १२ ३३४ तन्तुरसि प्रजा उ २, १३ ३३७ द्रप्सश्चस्कन्द उ ४, ७ ४२४ तं त्वा समिद्भिर उ १, ४ २७० ध तरणिरित् सिषा उ ४, ३ ४१८ धृष्णोऽसि उ २, १४ ३३६ तवायं सोमस्त्वमे उ २, २१ ३५४ तस्माद् यज्ञात् सर्वं पू १, ६ १४ न तस्मिन्नण्डे स भगवा पू १, ३ ६ न ते गिरो अपि मृ उ ६, १ ४६४ तां ह जरितर्नः प्र उ ६, १४ ५४२ नमोऽस्तु सर्पेभ्य पू १, १० २३ तानि कल्पद् ब्रह्मचारी पू २, ८ ६२ नहि ते पूर्तंममक्षि उ ४, ११ ४३४ ताभ्यां स शकलाभ्यां पू १, ३ ६ नाके राजन् प्रति पू ५, २१ २४६ तरोभिर्बो विद उ ४, ३ ४१७ नामुरसि उ २, १३ ३३५ तुभ्यं हिन्वानो वसिष्ठ उ ६, १० ५२१ नूनं सा ते प्रतिवरं उ ६, ५ ५०६ ते स्याम देव वरुण उ ५, १३ ४८२ नू मर्तो दयते सनि उ ४, १७ ४४८ तोशा वृत्रहणा हुवे उ ३, १५ ३६३ नू ष्टुत इन्द्र नू गृ उ ६, ५ ५०६ त्रिवृदसि उ २, १४ ३३६ प त्रीणि त आहुर्दिवि पू २, २१ १२५ त्वं नो नमसस्प उ ४, ६ ४२८ पञ्चभूतात्मके देहे उ ६, २ ४६६ त्वमिन्द्र शर्म रि उ ६, १४ ५४३ परोक्षेण परोक्षप्रिया पू १, १ १ त्वं सोम प्र चिकितो उ ४, ७ ४२४ परोक्षेण परोक्षप्रिया पू १, ७ १६ परोक्षेण परोक्षप्रिया पू १, ७ १६ द परोक्षेण परोक्षप्रिया पू १, ७ १६ दधिक्राव्णो अकारि उ ६, १६ ५४६ परोक्षेण परोक्षप्रिया पू १, ३६ ७२
परोक्षेण परोक्षप्रिया ( ५५५ ) यमेन दत्तं त्रित एनमा मन्त्र आदि भाग, प्रपाठक, कण्डिका पृष्ठ मन्त्र आदि भाग, प्रपाठक, कण्डिका पृष्ठ परोक्षेण परोक्षप्रिया पू २, २१ १२४ भ परोक्षेण परोक्षप्रिया पू ३, १६ १७१ भुगित्यभिगतः उ ६, १३ ५३६ परोक्षेण परोक्षप्रिया पू ४, २३ २०८ भूय इदद् वावृधे उ ४, ३ ४१८ पिबा वर्धस्व तव उ ४, ३ ४१६ भूयसीः शरदः श पू २, ८ ६२ पिबा सोममभि उ २, २१ ३५३ भूर्भुवः स्वद्यौरिच उ १, ४ २७० पूर्णात् पूर्णमुदचति पू १, ७ १७ म पृतनाषाडसि उ २, १३ ३३८ पृथिव्यै श्रोत्राय पू १, १४ २६ मरुतां मन्वे अधि मे उ २, ८ ४७२ प्रकेतो ऽसि उ २, १३ ३३७ मरुता मा गणैर उ ५, ८ ४७२ प्रतिधिरसि उ २, १३ ३३७ मरुतो यस्य हि उ २, २० ३५१ प्रतीपं प्राति सुत्वनम् उ ६, १३ ५३६ मित्रं वयं हवामहे उ २, २० ३५१ प्रत्ययलोपे प्रत्यय पू १, २६ ४५ प्रत्यु अदश्ययित्यु उ ५, १ ४५६ य प्र मंहिष्ठाय बृहते उ ४, १६ ४४४ यः सभेयो विदथ्यः उ ६, १२ ५३२ प्र मित्रयोर्वरुणयोः उ ३, १३ ३८६ य एक इद् धव्यश्च उ ६, १ ४६३ प्ररोहो ऽसि उ २, १४ ३३६ यच् चिद्धि सत्य उ ६, १ ४६४ प्रवृदसि उ २, १४ ३३६ यजामह इन्द्रं उ ६, १ ४९४ प्र वो महे मतयो य उ ६, ७ ५१२ यजूंषि यज्ञे समिधः उ २, ११ ३३२ प्र वो मित्राय गायत उ ३, १३ ३८८ यज्ञकर्मण्यजप उ ६, १ ४६४ प्राणापानौ जनयन् पू २, ८ ६२ यज्ञेन यज्ञमयजन्त उ २, ११ ३३२ प्रातर्यावभिरागंतं उ २, २१ ३६३ यत्र क्व च ते उ ४, ११ ४३४ प्रातर्यावभिरागंतं उ ३, १५ ३५२ यत् ते अन्नं भुवस्प उ ५, ८ ४७१ प्रावोस्यह्वां१३सीति उ २, १३ ३३५ यत् सोम आ सुते नर उ ५, १२ ४८० प्रेतिरसि उ २, १३ ३३६ यदक्रन्दः प्रथमं पू २, १८ ११४ प्रेन्द्रस्य वोचं प्र उ ३, २३ ४१० यदक्रन्द; प्रथमं पू २, २१ १२५ ब यदस्य कर्मणोऽत्य उ ३, १ ३६२ बृहस्पतिर्नः परिपातु उ ४, १६ ४४४ यदस्य कर्मणोऽत्य उ ३, १६ ३६५ बृहस्पते युवमिन्द्रश्च उ ४, १६ ४४५ यदस्य कर्मणोऽत्य उ ४, १८ ४५० बृहस्पतये स्तुत उ २, १४ ३३६ यदस्य अंहुभेद्याः उ ६, १५ ५४५ ब्रह्मचर्यंप्रतिष्ठायां पू २, १ ७७ यदिन्द्रादो दाश उ ६, १२ ५३२ ब्रह्मचारीष्णं पू २, १ ७६ यद् गायत्रे अधि उ ३, १० ३८२ ब्रह्मचार्येति समिधा पू २, १ ७७ यन्न इन्द्रो जुजुपे उ ६, १ ४६२ ब्रह्म जज्ञानं प्रथमम् उ २, ६ ३२० यमेन दत्तं त्रित एनमा पू २, २१ १२५ ब्रह्मणा ते ब्रह्मायुजा उ ६, ४ ५०३ ब्रह्मा स्यात् स्तुते उ २, १५ ३४१
यस्तिग्म शृङ्गो ( ५५६ ) सद्यो ह जातो वृषभः भाग, भाग, मन्त्र आदि प्रपाठक, पृष्ठ मन्त्र आदि प्रपाठक, पृष्ठ कण्डिका कण्डिका यस्तिग्म शृङ्गो उ ६, १ ४६३ वि हि सोतोरसृक्षत उ ६, १२ ५३१ यस्ते द्रप्स स्कन्दति उ २, १२ ३३५ वीमे देवा अक्रंसत उ ६, १३ ५३७ या ते अग्नेऽयः शया उ २, ७ ३३२ वेषश्रीरसि उ २, १४ ३३८ या ते अग्नेर्यज्ञिया उ ४, ६ ४२६ वो वसून् वो दे उ २, १५ ३४१ युवं चित्रं ददथुः उ ५, ३ ४६० व्य॑न्तरिक्षमतिरन्म उ ५, १३ ४८३ ये अग्नयो अप्स्व१न्त उ २, १२ ३३५ व्य॑न्तरिक्षमतिरन्म उ ६, ५ ५०६ ये यज्ञेन दक्षिणया उ ६, ७ ५१२ योजनाक्ताक्षो अनभ्य उ ६, १२ ५३२ यो न इदमिदं पुरा उ ४, १६ ४४३ श यो विद्यात् सप्त पू २, १६ ११० र शतमिन्नु शरदो पू ४, १७ २०१ शं नो देवः सविता उ ५, १० ४७६ रश्मिरसि क्षयाय उ २, १३ ३३५ शन्नो देवीरभिष्टये पू १, १४ २६ राज्ञो विश्वजनीनस्य उ ६, १२ ५३१ शन्नो देवीरभिष्टये पू १, २६ ५२ रेवदस्योषधी उ २, १३ ३३५ शं नो भव हृद उ ३, ६ ३६६ शासद् वह्निर्दु॑हितु उ ५, १५ ४८५ व शासद् वह्निर्दु॑हितु उ ६, १ ४६४ वर्चस्व रम वर्चस्व उ ६, १२ ५३१ शुनं हुवेम मघवान उ ६, ४ ५०४ वनस्पते वीड्वङ्गो पू २, २१ १२५ श्येनोऽसि पू ५, १२ ५३५ वने न वा योन्यधा उ ६, २ ४६८ वयमु त्वामपूर्वयं उ ४, १६ ४४३ स वयोधा असि उ २, १४ ३३८ वसन्त इन्धु रत्न्यो पू ४, २४ २११ संरोहो ऽसि उ २, १४ ३३८ वसन्तेन ऋतुना उ ३, ७ ३७२ सं वां कर्मणा समि उ ४, १७ ४४८ वसुकोऽसि उ २, १४ ३३८ सं वां कर्मणा समि उ ६, २ ४४८ वस्यष्टिरसि उ २, १४ ३३८ सध॑स॒र्पो ऽसि उ २, १४ ३३८ वषट्कारमा मां प्रमृ उ ३, ५ ३६८ सं सं स्रवन्तु पशवः उ ५, ८ ४७२ वागोजः सह ओज उ ३, ६ ३६६ स ईं पाहि य ऋञ्जी उ २, २१ ३५४ वायवा याहि दर्शते उ ३, १२ ३८६ सङ्क्रमोऽसि उ २, १४ ३३८ वायो शुक्रो अयामि उ ५, ८ ४७१ सजूरृतुभिः सजूः उ ३, ७ ३७२ विततौ किरणो द्वौ उ ६, १३ ५३६ सदृशं त्रिषु लिङ्गेषु पू १, २६ ४६ विश्वमित् सवनं सुत उ ३, १६ ३६६ सद्योह जातो वृषभः उ ४, १ ४१२ विष्टम्भोऽसि उ २, १३ ३३५ सद्यो ह जातो वृषभः उ ६, १ ४६३ वि हि सोतोरसृक्षत उ ६, ७ ५१२ सद्यो ह जातो वृषभः उ ६, २ ४६८
स नः पितेव सूनवे ( ५५७ ) होता यक्षदिन्द्रम् भाग, भाग, मन्त्र आदि प्रपाठक, पृष्ठ मन्त्र आदि प्रपाठक, पृष्ठ कण्डिका कण्डिका स नः पितेव सूनवे उ १, ४ २७० सरस्वत्यनुमन्यस्व उ १, ४ २७० सं ते पयांसि समु उ ३, ६ ३७० सविता प्रसवा उ २, ६ ३२० सन्चिरसि उ २, १३ ३३५ सुतासो मधुमत्तमाः उ ६, १६ ५४६ स पचामि स ददामि पू ५, २१ २४६ सुदितिरसि उ २, १३ ३३५ सप्तास्यासन् परि पू १, १२ २५ सुसमिद्धाय शोचिषे उ १, ४ २७० सप्त ऋषयः प्रतिहिताः पू ३, १२ १५७ सोऽभिध्याय शरीरात् पू १, ३ ६ सप्त ऋषयः प्रतिहिताः उ २, १३ ३३६ सोमः पवते जनिता उ ५, ४ ४६३ सप्त ऋषयः प्रतिहिताः उ ३, ८ ३७६ सोमं मन्यते पपिवान् पू २, ६ ६७ स बृहतीं दिश पू १, १० २२ स्रुताद् यमत्ति पू २, १७ १११ समं ज्योतिः सूर्येण उ ३, १६ ३६५ स्वरादिनिपातम पू १, २६ ४५ समं ज्योतिः सूर्येण उ ४, ४ ४२० स्ववृदसि उ २, १४ ३३६ समं ज्योतिः सूर्येण उ ४, १८ ४५० ह समिधार्गिंन दुवस्यत उ १, ४ २७० हलोऽनन्तराः संयोगः पू १, २७ ४७ समिधार्गिंन दुवस्यत उ ३, १२ ३८५ हिरण्यगर्भः समवर्त्तत पू १, २ ४ सम्राडसि पू ४, १३ ३४८ होता यक्षत् समिधा उ ३, ८ ३७६ स योजते अरुषा उ ५, ३ ४५६ होता यक्षदिन्द्रम् उ ६, १० ५२०
॥ ओ३म् ॥ प्रियं मा कृणु देवेषु प्रियं राजसु मा कृणु । प्रियं सर्वस्य पश्यत उत शूद्र उतार्ये ॥ १ ॥ अथर्व० १९।६२।१ ॥ प्रिय मोहि करौ देव तथा राज समाज में। प्रिय सब दृष्टि वाले औ शूद्र और अर्य में ॥ Make me beloved the Gods, beloved among the princes, make. Me dear to every one who sees, To sudra and to Aryanman, Griffith's Trans, Atharva 19. 62. 1
संकेत सूची
सङ्केत सङ्केत विषय अ० अथर्व० अथर्ववेद, काण्ड, सूक्त, मन्त्र अष्टा० अष्टाध्यायी अध्याय, पाद, सूत्र उ० उणादिकोष, पाद सूत्र (स्वामी दयानन्द सरस्वती संशोधित) ऋ० ऋग्० ऋग्वेद, मण्डल, सूक्त, मन्त्र ऐ० ब्रा० ऐतरेय ब्राह्मण, पञ्चिका, कण्डिका गो० ब्रा० उ० गोपथ ब्राह्मण उत्तरभाग प्रपाठक कण्डिका गो० ब्रा० पू० गोपथ ब्राह्मण पूर्वभाग प्रपाठक कण्डिका ज०सं० जर्मनसंस्करण निघ० निघण्टु, अध्याय, खण्ड (यास्क मुनिकृत) निरु० निरुक्त अध्याय खण्ड (यास्क मुनिकृत) पा० पाणिनि व्याकरण-अष्टाध्यायी, अध्याय पाद सूत्र पू० सं० पूर्व संस्करण य० यजु० यजुर्वेद अध्याय मन्त्र वा० वार्त्तिक श० क० द्रु० शब्दकल्पद्रुम कोष (राजा राधाकान्त देव बहादुर विरचित) सा० वे० उ० सामवेद, उत्तरार्चिक, प्रपाठक, अर्धप्रपाठक, सूक्त वा तृच सा० वे० पू० सामवेद, पूर्वार्चिक, प्रपाठक, दशति, मन्त्र ( ) इस कोष्ठ में मूल ग्रन्थ के पद हैं। [ ] ऐसे कोष्ठ के शब्द व्याख्या वा अध्याहार हैं।
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❖ शिक्षादिवेदषडङ्गानि । पाणिनीयशिक्षा, लघधस्य ज्यौतिषं, पिंगलनागस्य छन्दः, यास्कस्य निघण्टुः, यास्कस्य निरुक्तः, आश्वलायनीयं श्रौतसूत्रम्, आश्वलायनीयं गृह्यसूत्रम् एवं पाणिनीय अष्टाध्यायी-सूत्रपाठ । सम्पादक-वासुदेवशर्मा ❖ ऋग्वेद प्रातिशाख्यम् । 'उव्वट-भाष्य' एवं हिन्दी टीका सहित । डॉ. वीरेन्द्रकुमार वर्मा ❖ V.S. Ghate's Lectures on Rigveda : Dr. V.S. Sukthankar ❖ कात्यायनश्रौतसूत्रम् । महर्षि कात्यायन प्रणीत । शुल्बसूत्रवृत्ति सहित । श्रीविद्याधरशर्मा विरचित 'सरला' वृत्ति सहित । ❖ ताण्ड्यमहाब्राह्मणम् । सायणाचार्यकृतभाष्य सहित । सम्पादक-पं. आनन्दचन्द्र- वेदान्तवागीश (1-2 भाग) ❖ निरुक्तम् । कश्यपप्रजापतिकृत 'निघण्टुभाष्य' तथा दुर्गाचार्यकृत अन्वर्थाख्या-व्याख्या- नुसारिणी 'निरुक्तविवृति' सहित । पं. मुकुन्द झा बख्शी ❖ भारद्वाजसंहिता (नारदपाञ्चरात्रम्) । हिन्दीटीका सहित । व्याख्याकार-श्री शिवप्रसाद द्विवेदी ❖ शुक्लयजुर्वेद-प्रातिशाख्यम् अथवा वाजसनेयिप्रातिशाख्यम् । उव्वटभाष्य तथा अनन्तभट्टकृत भाष्य सहित । डॉ. वीरेन्द्रकुमार वर्माकृत हिन्दी अनुवाद सहित । ❖ सामवेद-कौथुमशाखीयः । ग्रामेगेय (गेय, प्रकृति) गानात्मकः प्रथमो भाग । आरण्य गानात्मकः द्वितीयो भाग । सम्पादक-रा. नारायणस्वामिदीक्षितः ❖ तैत्तिरीय-संहिता । (कृष्णयजुर्वेदीय) । मूलमात्र ❖ ऋग्वेदसंहिता । मूलमात्र | ❖ मैत्रायणीसंहिता । मूलमात्र ❖ अथर्ववेदसंहिता । मूलमात्र | ❖ ऋक्संहितापदपाठः । ❖ सामवेदसंहिता । मूलमात्र | ❖ काठक-संहिता । (यजुर्वेदीय) । | मूलमात्र ❖ शुक्लयजुर्वेदसंहिता । मूलमात्र | ❖ काण्व-संहिता । (शुक्लयजुर्वेदीय) । | मूलमात्र चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान दिल्ली