ईशादि नौ उपनिषद्

ईशादि नौ उपनिषद्
Ishadi Nau Upanishad
ऋषिगण द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariHindipublished548 पृष्ठ
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( १३ )
मन्त्र
विषय
पृष्ठ
प्रथम मुण्डक
( प्रथम खण्ड )
| १-२ | ब्रह्मविद्याके उपदेशकी परम्परा | ..... २२९ |
|---|---|---|
| ३ | शौनकका महर्षि अङ्गिराके पास जाना और 'किसके जान लेनेपर सब कुछ जाना हुआ हो जाता है'—यह पृष्ठना | ..... २३१ |
| ४ | उत्तरमें अङ्गिराद्वारा परा और अपरा इन दो विद्याओंको जानने-योग्य बताया | ..... २३१ |
| ५ | संक्षेपमें परा और अपरा विद्याका स्वरूप | ..... २३२ |
| ६ | परा विद्याद्वारा जाननेयोग्य अविनाशी ब्रह्मके स्वरूपका वर्णन | ..... २३३ |
| ७ | परमेश्वरसे सम्पूर्ण जगत्की उत्पत्तिमें तीन दृष्टान्त | ..... २३४ |
| ८ | संक्षेपमें जगत्की उत्पत्तिका क्रम | ..... २३५ |
| ९ | सर्वज्ञ परमेश्वरके संकल्पमात्रसे जगत्की उत्पत्तिका वर्णन | ..... २३६ |
( द्वितीय खण्ड )
| १ | अपरा विद्याका स्वरूप और फल | ..... २३७ |
|---|---|---|
| २-३ | अग्निहोत्रका वर्णन तथा उसके साथ करनेयोग्य कर्म और विधिका उल्लेख | ..... २३८ |
| ४-६ | अग्निकी लपटोंके प्रकारभेद तथा प्रदीप्त अग्निमें नित्य हवनका विधान एवं उसका स्वर्गप्राप्तिरूप फल | ..... २४० |
| ७-१० | उपर्युक्त स्वर्गके साधनभूत यज्ञादि सकाम कर्मोंको सर्वोपरि माननेवाले पण्डिताभिमानी लोगोंकी निन्दा और उन कर्मोंका फल बारंबार जन्म-मृत्यु होनेका कथन | ..... २४२ |
| ११ | सांसारिक भोगोंसे विरक्त मनुष्योंके आचार-व्यवहार और उनके फलका वर्णन | ..... २४५ |
| १२ | परमेश्वरको जाननेके लिये श्रोत्रिय ब्रह्मनिष्ठ सद्गुरुके पास जानेका आदेश... | २४६ |
| १३ | गुरुको अधिकारी शिष्यके प्रति तत्त्वविवेचनपूर्वक उपदेश देनेकी प्रेरणा | ..... २४७ |
द्वितीय मुण्डक
( प्रथम खण्ड )
| १ | अग्निसे चिन्तागारियोंकी भाँति ब्रह्मसे जगत्की उत्पत्ति और उसीमें उसके लय होनेका वर्णन | ..... २४८ |
|---|