ईशादि नौ उपनिषद्
Ishadi Nau Upanishad
ऋषिगण द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
( १३ )
मन्त्र
विषय
पृष्ठ
प्रथम मुण्डक
( प्रथम खण्ड )
| १-२ | ब्रह्मविद्याके उपदेशकी परम्परा | ..... २२९ |
|---|---|---|
| ३ | शौनकका महर्षि अङ्गिराके पास जाना और 'किसके जान लेनेपर सब कुछ जाना हुआ हो जाता है'—यह पृष्ठना | ..... २३१ |
| ४ | उत्तरमें अङ्गिराद्वारा परा और अपरा इन दो विद्याओंको जानने-योग्य बताया | ..... २३१ |
| ५ | संक्षेपमें परा और अपरा विद्याका स्वरूप | ..... २३२ |
| ६ | परा विद्याद्वारा जाननेयोग्य अविनाशी ब्रह्मके स्वरूपका वर्णन | ..... २३३ |
| ७ | परमेश्वरसे सम्पूर्ण जगत्की उत्पत्तिमें तीन दृष्टान्त | ..... २३४ |
| ८ | संक्षेपमें जगत्की उत्पत्तिका क्रम | ..... २३५ |
| ९ | सर्वज्ञ परमेश्वरके संकल्पमात्रसे जगत्की उत्पत्तिका वर्णन | ..... २३६ |
( द्वितीय खण्ड )
| १ | अपरा विद्याका स्वरूप और फल | ..... २३७ |
|---|---|---|
| २-३ | अग्निहोत्रका वर्णन तथा उसके साथ करनेयोग्य कर्म और विधिका उल्लेख | ..... २३८ |
| ४-६ | अग्निकी लपटोंके प्रकारभेद तथा प्रदीप्त अग्निमें नित्य हवनका विधान एवं उसका स्वर्गप्राप्तिरूप फल | ..... २४० |
| ७-१० | उपर्युक्त स्वर्गके साधनभूत यज्ञादि सकाम कर्मोंको सर्वोपरि माननेवाले पण्डिताभिमानी लोगोंकी निन्दा और उन कर्मोंका फल बारंबार जन्म-मृत्यु होनेका कथन | ..... २४२ |
| ११ | सांसारिक भोगोंसे विरक्त मनुष्योंके आचार-व्यवहार और उनके फलका वर्णन | ..... २४५ |
| १२ | परमेश्वरको जाननेके लिये श्रोत्रिय ब्रह्मनिष्ठ सद्गुरुके पास जानेका आदेश... | २४६ |
| १३ | गुरुको अधिकारी शिष्यके प्रति तत्त्वविवेचनपूर्वक उपदेश देनेकी प्रेरणा | ..... २४७ |
द्वितीय मुण्डक
( प्रथम खण्ड )
| १ | अग्निसे चिन्तागारियोंकी भाँति ब्रह्मसे जगत्की उत्पत्ति और उसीमें उसके लय होनेका वर्णन | ..... २४८ |
|---|
( १४ )
| मन्त्र | विषय | पृष्ठ |
|---|---|---|
| २-३ | निराकार परमेश्वरके स्वरूपका वर्णन तथा उससे साकार जगत्के सूक्ष्म तत्त्वोंकी उत्पत्तिका प्रकार ..... २४९ | २४९ |
| ४-५ | भगवान्के विराट्रूपका तथा प्रकारान्तरसे जगत्के उत्पत्ति-क्रमका वर्णन ..... २५० | २५० |
| ६-९ | परमेश्वरसे ही फलसहित यज्ञादि साधना, देवादि प्राणी और सदाचार आदि आध्यात्मिक वस्तुओंकी एवं पर्वत, नदी आदि बाह्य जगत्की उत्पत्तिका निरूपण ..... २५२ | २५२ |
| १० | परमेश्वरसे उत्पन्न समस्त भावोंको उन्हींका स्वरूप बताकर हृदयरूप गुहामें छिपे हुए उन अन्तर्गामी परमेश्वरको जाननेके फलका वर्णन ..... २५६ | २५६ |
( द्वितीय खण्ड )
| १ | ‘गुहाचर’ नामसे प्रसिद्ध परमेश्वरके स्वरूपका वर्णन और उसे जाननेका आदेश ..... २५६ | २५६ |
|---|---|---|
| २-४ | परब्रह्मके स्वरूपका निर्देश तथा धनुष और बाणके रूपकद्वारा परब्रह्मरूपी लक्ष्यको वेधनेका प्रकार ..... २५७ | २५७ |
| ५-८ | सबके आत्मरूप सर्वज्ञ परमेश्वरको जाननेके लिये अन्य सब बातोंको छोड़कर ध्यान करनेका आदेश तथा परमेश्वरके स्वरूपका वर्णन एवं उसको जाननेके फलका निरूपण ..... २५९ | २५९ |
| ९-११ | परब्रह्मके स्थान और स्वरूपका वर्णन, उन्हें जाननेका महत्त्व तथा उन स्वप्रकाश परमेश्वरकी सर्वप्रकाशकता और सर्वव्यापकताका कथन ..... २६२ | २६२ |
तृतीय मण्डक
( प्रथम खण्ड )
| १-२ | एक वृक्षपर रहनेवाले दो पक्षीके रूपकद्वारा जीव और ईश्वरकी भिन्नताका निरूपण तथा ईश्वरकी महिमा जाननेसे जीवके मोहजनित शोककी निवृत्तिका कथन ..... २६५ | २६५ |
|---|---|---|
| ३-४ | परमेश्वरकी महिमाके दर्शनसे सर्वोत्तम समताकी प्राप्ति तथा उस ज्ञानी भक्तकी निरभिमानता और सर्वश्रेष्ठ स्थितिका वर्णन ..... २६६ | २६६ |
| ५-६ | सत्य, तप, ज्ञान और ब्रह्मचर्यके साधनसे परमात्माकी प्राप्तिका कथन तथा सत्यकी महिमा ..... २६८ | २६८ |
( १५ )
| मन्त्र | विषय | पृष्ठ |
|---|---|---|
| ७-८ | परमात्माके अचिन्त्य दिव्य स्वरूपका वर्णन तथा चित्तशुद्धि और ध्यानको उनके दर्शनका उपाय बताया | ..... २७० |
| ९ | आत्माके स्वरूपका वर्णन और अन्तःकरणकी शुद्धिसे उसमें विशेष शक्तिके प्रकट होनेका कथन | ..... २७२ |
| १० | शुद्ध अन्तःकरणवाले आत्मज्ञानीकी इष्ट भोगों और लोकोंकी प्राप्तिका कथन तथा उस विवेकीका सत्कार करनेके लिये प्रेरणा | ..... २७२ |
( द्वितीय खण्ड )
| १-२ | निष्कामभावकी प्रशंसा और सकामभावकी निन्दा एवं दोनोंका पृथक्-पृथक् फल | ..... २७३ |
|---|---|---|
| ३-४ | तर्क, प्रमाद, निर्बलता और गुणहीनता आदिसे भगवत्प्राप्तिकी असम्भवता एवं भगवत्प्राप्तिकी उत्कट अभिलाषावाले निष्काम प्रेमी साधकको भगवत्कृपासे उनके दर्शन होनेका कथन | ..... २७५ |
| ५ | उपर्युक्त प्रकारसे परमात्माको प्राप्त महात्माओंका महत्त्व | ..... २७७ |
| ६ | शरीर त्यागकर ब्रह्मलोकमें जानेवाले महापुरुषोंकी मुक्तिका कथन | ..... २७७ |
| ७-८ | जीवनमुक्त महात्माकी अन्तकालीन स्थिति तथा नदी और समुद्रके दृष्टान्तसे उसकी ब्रह्मलीनताका निरूपण | ..... २७८ |
| ९ | 'ब्रह्मवेत्ता ब्रह्म ही है और उसके कुलमें कोई ब्रह्मको न जानेनेवाला नहीं होता' यह कहकर उसकी मोक्षप्राप्तिका कथन | ..... २७९ |
| १०-११ | ब्रह्मविद्याके दानकी विधि और उसके अधिकारीका निर्देश तथा उपदेशका उपसंहार एवं ऋषि-वन्दना | ..... २८० |
| शान्तिपाठ | ..... २८१ |
( ६ ) माण्डूक्योपनिषद्
| शान्तिपाठ | ..... २८२ ---|---|--- १ | भूत, भविष्य, वर्तमान एवं तीनों कालोंसे अतीत, सब भावोंको अकारस्वरूप बताया | ..... २८३ २ | अकार और परब्रह्म परमात्माकी एकताका प्रतिपादन करनेके लिये उसके चार चरणोंका निरूपण | ..... २८४ ३ | परब्रह्मके पहले चरण स्थूल जगत्-रूप 'वैश्वानर' का वर्णन | ..... २८५
( १६ )
| मन्त्र | विषय | पृष्ठ |
|---|---|---|
| ४ | परब्रह्मके दूसरे चरण प्रकाशमय हिरण्यगर्भरूप 'तैजस'का वर्णन ..... | २८६ |
| ५ | परब्रह्मके तीसरे चरण विज्ञान आनन्दमय 'प्राज्ञ' का वर्णन ..... | २८८ |
| ६ | उक्त तीन पादोंद्वारा जिसके स्वरूपका लक्ष्य कराया गया है, उसे सर्वान्तर्यामी, सर्वेश्वर, सर्वज्ञ और सबका कारण बतलाना ..... | २९० |
| ७ | परब्रह्मके चतुर्थ चरण निर्गुण-निराकार निर्विशेष स्वरूपका वर्णन ..... | २९० |
| ८ | नामी—परब्रह्म परमात्माकी उनके नाम—प्रणवकी तीन मात्राओंके साथ तीनों पदोंकी एकताका निरूपण ..... | २९२ |
| ९ | वैश्वानर नामक पहले चरणके साथ पहली मात्रा 'अ'कारकी एकता और उसके ज्ञानसे सम्पूर्ण भोगोंकी प्राप्तिरूप फल ..... | २९२ |
| १० | तैजस नामक दूसरे चरणके साथ दूसरी मात्रा 'उ'कारकी एकता और उसके ज्ञानसे ज्ञानपरम्पराके उत्कर्ष और स्वभावकी प्राप्तिरूप फल ..... | २९३ |
| ११ | प्राज्ञ नामक तीसरे चरणके साथ तीसरी मात्रा 'म'कारकी एकता और उसके ज्ञानसे सम्पूर्ण जगत्का ज्ञान तथा सर्वत्र परब्रह्मदृष्टिरूप फल ..... | २९५ |
| १२ | मात्रारहित अकारकी परमेश्वरके चौथे चरण—निर्विशेष रूपके साथ एकता और उसके ज्ञानमें परब्रह्मकी प्राप्तिरूप फल ..... | २९६ |
| शान्तिपाठ ..... | २९७ |
( ७ ) ऐतरेयोपनिषद्
| उपनिषद्के सम्बन्धमें प्राक्कथन तथा शान्तिपाठ ..... | २९८ |
|---|
प्रथम अध्याय
( प्रथम खण्ड )
| १ परमात्माके सृष्टिचनाविषयक प्रथम संकल्पका वर्णन ..... | ३०० |
|---|---|
| २—४ परमात्माके द्वारा समस्त लोकोंकी और ब्रह्मा तथा अन्य लोकपालोंकी एवं वागादि इन्द्रियों और उनके अधिष्ठातृ-देवताओंकी उत्पत्तिका निरूपण ..... | ३०० |
( द्वितीय खण्ड )
| १ इन्द्रियों और उनके अधिष्ठाता देवताओंद्वारा वासस्थान और अन्नकी याचना ..... | ३०४ |
|---|---|
| २ परमात्माद्वारा गौ तथा अश्व-शरीरकी रचना और देवताओंका उनको पसंद न करना ..... | ३०५ |
( १७ )
| मन्त्र | विषय | पृष्ठ |
|---|---|---|
| ३-४ | परमात्माद्वारा मनुष्य-शरीरकी रचना, उसे देखकर देवताओंका प्रसन्न होना और उसके भीतर अपने-अपने स्थानोंमें प्रवेश करना ..... | ३०५ |
| ५ | देवताओंके अन्तमें शुधा और पिपासाको भी भाग-प्रदान ..... | ३०७ |
( तृतीय खण्ड )
| १-२ | परमात्माद्वारा अन्तरचनाका विचार और अन्तकी सृष्टि ..... | ३०९ |
|---|---|---|
| ३-९ | अन्तका भाग जाना तथा पुरुषका उसे वाणी, प्राण, नेत्र, कान, त्वचा, मन और उपस्थके द्वारा पकड़नेका उद्योग एवं पकड़नेमें असफल होना ..... | ३०९ |
| १० | अन्तमें अपानके द्वारा अन्तको पकड़ लेनेके कारण अपानकी महत्ताका उल्लेख ..... | ३१३ |
| ११ | परमात्माका मनुष्य-शरीरमें प्रवेश करनेका विचार ..... | ३१४ |
| १२ | परमात्माका 'विदूति' नामक मूर्द्धद्वारसे शरीरमें प्रवेश करना तथा उनके तीन स्थानों और तीन स्वप्नोंका निरूपण ..... | ३१५ |
| १३ | मनुष्यका सृष्टि-रचना देखकर आश्चर्ययुक्त होना और उसके बाद परमेश्वरके साक्षात्कारसे इसी शरीरमें उसके कृतकृत्य हो जानेका कथन ..... | ३१६ |
| १४ | परमेश्वरके 'इन्द्र' नामकी व्युत्पत्ति ..... | ३१७ |
द्वितीय अध्याय
( प्रथम खण्ड )
| १-२ | पुरुषद्वारा माताके शरीरमें गर्भप्रवेशरूप उसका प्रथम जन्म तथा माताके द्वारा गर्भके पालन-पोषणका वर्णन ..... | ३१८ |
|---|---|---|
| ३ | माताके गर्भसे बाहर बालकरूपमें प्रकट होनारूप उसका दूसरा जन्म तथा पिता-पुत्रके सम्बन्ध और कर्तव्यका संकेत ..... | ३१९ |
| ४ | पिताद्वारा पुत्रपर वैदिक और लौकिक शुभ कर्मोंका भार देकर उद्वाण होनेका और मरनेके बाद अन्य योनिमें उत्पन्न होनारूप उसके तृतीय जन्मका कथन तथा इस प्रकरणका भावार्थ—जन्म-मृत्युसे छूटनेके लिये प्रेरणा ..... | ३२१ |
| ५-६ | वामदेव ऋषिको गर्भमें ही ज्ञान होनेका उल्लेख तथा देहत्यागके पश्चात् उनको परमधाम प्राप्त होनेका निरूपण ..... | ३२२ |
( १८ )
| मन्त्र | विषय | पृष्ठ |
|---|
तृतीय अध्याय
( प्रथम खण्ड )
| १ | पूर्वोक्त परमात्मा और जीवात्मा इन दोनोंमेंसे उपास्यदेव कौन है? और किसके सहयोगसे मनुष्य रूप आदि विषयोंका अनुभव करता है? इसके निर्णयार्थ ऋषियोंका विचार | ..... ३२५ |
|---|---|---|
| २ | 'मनकी देखना, सुनना, मनन करना आदि शक्तियाँ ज्ञानरूप परमात्माके ही नाम हैं'—इस तथ्यके अनुशीलनसे परमात्माकी सत्ताके ज्ञान होनेका कथन | ..... ३२६ |
| ३ | समस्त जगत्के रचयिता, संचालक, रक्षक और आधारभूत प्रज्ञानस्वरूप परमात्मा ही उपास्यदेव हैं—इस प्रकार ऋषियोंका निश्चय करना | ..... ३२७ |
| ४ | उस प्रज्ञानस्वरूप परमेश्वरके ज्ञानसे शरीर-त्यागके अनन्तर परम धाममें जाकर अमर हो जानेका निरूपण | ..... ३२८ |
| शान्तिपाठ | ..... ३२९ |
( ८ ) तैत्तिरीयोपनिषद्
| उपनिषद्के सम्बन्धमें प्राक्कथन तथा शान्तिपाठ | ..... ३३० |
|---|
( शीक्षा-वल्ली )
अनुवाक
| १ | आचार्यद्वारा विभिन्न शक्तियोंके अधिष्ठातृ-देवताओंके नामसे परमेश्वरकी स्तुति-प्रार्थना करके उनकी वायुनामसे स्तुति और वन्दना | ३३० |
|---|---|---|
| २ | वेदमन्त्रोंके उच्चारणके नियमोंको कहनेकी प्रतिज्ञा करके उनका संक्षेपमें वर्णन | ..... ३३३ |
| ३ | लोक, ज्योति, विद्या, प्रजा और शरीरविषयक पाँच प्रकारकी संहितोपासनाके प्रकरणमें अभीष्ट लोकप्राप्तिके उपायका, ज्योतियोंके संयोगसे भौतिक पदार्थोंकी उत्पत्तिके रहस्यका, विद्याप्राप्तिके रहस्यका, संतानप्राप्तिके उपायका एवं वाणीद्वारा प्रार्थनासे शरीरकी उत्पत्ति और नामजपसे भगवत्प्राप्तिके उपायका तथा इन पाँचोंके ज्ञानसे पृथक्-पृथक् फल पानेका कथन | ..... ३३५ |
( १९ )
| अनुवाक | विषय | पृष्ठ |
|---|---|---|
| ४ | साधनमें सहायक बौद्धिक और शारीरिक बलके लिये परमेश्वरसे अकारद्वारा प्रार्थना करनेका प्रकार तथा ऐश्वर्य-प्राप्ति आदिके लिये किये जानेवाले हवनके मन्त्रोंका उल्लेख ..... | ३४१ |
| ५ | लोकों, ज्योतियों, वेदों और प्राणोंके विषयमें भूः भुवः स्वः महः—इन चार महाव्याहृतियोंके प्रयोगद्वारा उपासना करनेकी विधि और उनका पृथक्-पृथक् फल ..... | ३४६ |
| ६ | परमेश्वरके हृदयाकाशमें रहनेका वर्णन तथा उन्हें प्रत्यक्ष देखनेवाले महापुरुषका क्रमशः भूः भुवः स्वः महः रूप लोकोंमें जाने और वहाँ स्वराट् बनकर प्रकृतिपर अधिकार प्राप्त कर लेनेका निरूपण एवं उन परब्रह्मका स्वरूप बतलाकर उनकी उपासनाके लिये आदेश ... | ३५१ |
| ७ | लौकिक और पारलौकिक उन्नतिके लिये पाङ्करूपसे वर्णित भौतिक और आध्यात्मिक पदार्थोंके सम्बन्ध और उपयोगका निरूपण ..... | ३५४ |
| ८ | अकारकी महिमाका वर्णन ..... | ३५७ |
| ९ | अध्ययनाध्यापन करनेवालोंके लिये ब्रह्म आदि शास्त्रोंक सदाचार-के पालनकी अवश्यकर्तव्यताका विधान ..... | ३५९ |
| १० | त्रिशङ्कु त्रषिषके स्वानुभवके उद्गार बतलाकर भावनाशक्तिकी महिमाका दिग्दर्शन कराना ..... | ३६१ |
| ११ | आचार्यद्वारा स्नातकको गृहस्थधर्मपालनकी महत्वपूर्ण शिक्षा ..... | ३६२ |
| १२ | उपदेशकी समाप्तिमें पुनः विभिन्न शक्तियोंके अधिष्ठातृ-देवताओंके नामसे परमेश्वरकी स्तुति-प्रार्थना करके उनकी वायुनामसे स्तुति और वन्दना ..... | ३६८ |
ब्रह्मानन्दवल्ली
| शान्तिपाठ ..... | ३७१ ---|---|--- १ | हृदयगुहामें छिपे हुए परमेश्वरको जाननेका फल, मनुष्यशरीरकी उत्पत्तिका प्रकार और पक्षीके रूपमें उसके अङ्गोंकी कल्पना ..... | ३७१ २ | अन्नकी महिमा तथा प्राणमय शरीर और उसके अन्तरात्माका वर्णन ... | ३७४ ३ | प्राणकी महिमा तथा मनोमय शरीर और उसके अन्तरात्माका वर्णन ... | ३७७ ४ | मनोमय शरीरकी महिमा तथा विज्ञानमय जीवात्माके स्वरूपका वर्णन ... | ३८१
( २० )
| अनुवाक | विषय | पृष्ठ |
|---|---|---|
| ५ | विज्ञानात्माकी महिमा और उससे भिन्न उसके अन्तरात्मा | |
| आनन्दमय परमपुरुषका वर्णन | ..... ३८३ | |
| ६ | परब्रह्मकी सत्ता मानने और न माननेका परिणाम, ब्रह्मकी सत्ताके | |
| विषयमें अनुप्रश्न और उसके उत्तरमें ब्रह्मके स्वरूप और शक्तिका | ||
| वर्णन करते हुए सृष्टिकी उत्पत्तिका क्रम-निरूपण | ..... ३८६ | |
| ७ | स्वयं जगत्- रूपमें बननेवाले परमात्माकी मुक्तता तथा सबके जीवन | |
| और चेष्टाके आधारभूत उन परमात्माकी रसमयता एवं परमात्मप्राप्त | ||
| पुरुषको निर्भयपद-प्राप्ति और उन परमात्मासे विमुख पुरुषको जन्म- | ||
| मरणरूप भयकी प्राप्ति का उल्लेख | ..... ३९० | |
| ८ | परमात्माकी शासनशक्तिकी महिमामें एवं आनन्दकी मीमांसामें | |
| मानवजीवनकी अपेक्षा क्रमशः देवादिलोकोंके आनन्दकी उत्तरोत्तर | ||
| अधिकता तथा निष्काम विरक्तके लिये उस आनन्दकी स्वभाव- | ||
| सिद्धता और परमात्माके आनन्दकी निरतिशयता एवं उन आनन्द- | ||
| केन्द्र सर्वान्तर्मीया परमेश्वरके ज्ञानसे उनकी प्राप्ति का निरूपण | ..... ३९४ | |
| ९ | आनन्दमय परमात्माके ज्ञाताको निर्भयताकी प्राप्ति तथा पुण्य और | |
| पाप दोनों कर्मोंके प्रति रागद्वेषरहित उस महापुरुषकी शोकरहित | ||
| स्थितिका परिचय | ..... ४०३ |
भृगुवल्ली
१ | भृगुका अपने पिता वरुणके पास जाकर ब्रह्मोपदेशके लिये प्रार्थना तथा वरुणद्वारा अन्न, प्राण, मन आदिको ब्रह्मप्राप्तिका द्वार बतलाकर 'सब कुछ ब्रह्म ही है' इस तत्त्वका उपदेश एवं भृगुका तप करना ... | ..... ४०५ ---|---|--- २ | 'अन्न ही ब्रह्म है' ऐसा निश्चयकर भृगुका पुनः पिताके पास जाना और उनके उपदेशसे पुनः तप करना | ..... ४०६ ३ | 'प्राण ही ब्रह्म है' ऐसा निश्चयकर भृगुका पुनः पिताके पास जाना और उनके उपदेशसे पुनः तप करना | ..... ४०८ ४ | 'मन ही ब्रह्म है' ऐसा निश्चयकर भृगुका पुनः पिताके पास जाना और उनके उपदेशसे पुनः तप करना | ..... ४१० ५ | 'विज्ञानस्वरूप चेतन जीवात्मा ही ब्रह्म है' ऐसा निश्चयकर भृगुका पुनः पिताके पास जाना और उनके उपदेशसे पुनः तप करना | ..... ४११
( २१ )
| अनुवाक | विषय | पृष्ठ |
|---|---|---|
| ६ | भृगुका 'आनन्दमय परमात्मा ही ब्रह्म है' ऐसा निश्चय करना तथा इस भार्गवी वारुणी विद्याका महत्त्व और फल | ......... ४१३ |
| ७ | अन्नकी निन्दा न करनारूप व्रतका निरूपण तथा प्राणको अन्न और शरीरको अन्नका भोक्ता कहकर उसके विज्ञानका फल बताना | ......... ४१५ |
| ८ | अन्नका दुरुपयोग न करनारूप व्रतका निरूपण तथा जलको अन्न और ज्योतिको अन्नका भोक्ता कहकर उसके विज्ञानका फल बताना | ... ४१७ |
| ९ | अन्नकी वृद्धि करनारूप ब्रह्मका निरूपण तथा पृथ्वीको अन्न और आकाशको अन्नका भोक्ता कहकर उसके विज्ञानका फल बताना | ......... ४१९ |
| १० | अतिथि-सेवाका महत्त्व और उसका श्रेष्ठ फल, वाणी आदि मानुषी और वर्षा आदि दैवी विभूतियोंके रूपमें परमात्माके सर्वत्र चिन्तनका प्रकार तथा विविध कामनाओंके भावसे की जानेवाली उपासनाका फलसहित निरूपण एवं परमात्माको सर्वत्र परिपूर्ण समझकर प्राप्त करनेका फल और भगवत्प्राप्त पुरुषकी स्थिति तथा उस महापुरुषके आनन्दमग्न मनसे निकले हुए समता और सर्वरूपताविषयक उद्गारों (सामगान)-का वर्णन | ......... ४२१ |
| शान्तिपाठ | ......... ४३० |
( ९ ) श्वेताश्वतरोपनिषद्
| शान्तिपाठ | ......... ४३१ |
|---|
( प्रथम अध्याय )
| मन्त्र | ||
|---|---|---|
| १ | जगत्के कारणकी, जीवनहेतुकी, स्थितिके कारणकी और सबके आधारकी खोज करनेवाले कुछ जिज्ञासुओंका परस्पर विचार-विमर्श | ... ४३१ |
| २ | काल, स्वभाव, प्रारब्ध आदिकी जगत्कारणताका खण्डन | ......... ४३२ |
| ३ | ऋषियोंद्वारा ध्यानयोगसे जगत्के वास्तविक कारण परमेश्वरकी अचिन्त्य आत्मशक्तिके साक्षात्कारका कथन | ......... ४३४ |
| ४-५ | विश्वका चक्र और नदीके रूपमें वर्णन | ......... ४३५ |
| ६-७ | परमात्माद्वारा जीवात्माके कर्मानुसार संसार-चक्रमें घुमाये जानेका तथा अपनेको और सर्वप्रेरक परमात्माको पृथक्-पृथक् समझने और उनकी कृपाका अनुभव करनेसे अमृतत्व पाकर ब्रह्ममें लीन होनेका निरूपण | ......... ४३८ |
( २२ )
| मन्त्र | विषय | पृष्ठ |
|---|---|---|
| ८ | परमात्माका स्वरूप न जाननेसे जीवात्माके बन्धन होने और जाननेसे मोक्ष होनेका वर्णन | ......... ४४० |
| ९-११ | जीवात्मा, प्रकृति और इन दोनोंके शासक परमात्माके स्वरूपका प्रतिपादन तथा तीनोंके तत्त्वको जानकर परमात्माका निरन्तर ध्यान करनेसे कैवल्यपदकी प्राप्तिका उल्लेख | ......... ४४१ |
| १२ | जाननेयोग्य प्रेरक परमात्मा, भोक्ता जीव और भोग्य जडवर्गको जान लेनेसे सब कुछ जान लेनेका कथन | ......... ४४४ |
| १३-१४ | ॐकारकी उपासनाद्वारा जीवात्मा और परमात्माके स्वरूपकी उपलब्धिका निरूपण एवं अरणि-मन्थनके दृष्टान्तद्वारा वाणीसे नाम-जप और मनसे स्वरूप-चिन्तन करके परब्रह्मका साक्षात्कार करनेका आदेश | ......... ४४४ |
| १५-१६ | तिलोंमें तेल, दहीमें घी आदिकी भाँति हृदय-गुहामें छिपे हुए और सर्वत्र परिपूर्ण परमात्माको सत्य और तपके द्वारा प्राप्त करनेके लिये प्रेरणा | ......... ४४६ |
( द्वितीय अध्याय )
| मन्त्र | विषय | पृष्ठ |
|---|---|---|
| १-५ | प्रथमाध्यायमें वर्णित ध्यानकी सिद्धिके लिये परमेश्वरसे स्तुति-प्रार्थना करनेका निरूपण | ......... ४४७ |
| ६-७ | ध्यान-साधनसे मनके विशुद्ध होनेका कथन एवं साधकको परमात्माकी शरण लेनेकी प्रेरणा | ......... ४५० |
| ८ | ध्यानयोगकी विधि और बैठनेके प्रकार-वर्णन | ......... ४५१ |
| ९ | प्राणायामका क्रम और उसकी महत्ता | ......... ४५२ |
| १० | ध्यानके लिये उपयुक्त स्थान और भूमिका वर्णन | ......... ४५३ |
| ११ | योगसाधनकी उन्नतिके द्योतक लक्षणोंका दिग्दर्शन | ......... ४५४ |
| १२-१३ | योगसाधनसे भूतसम्बन्धी पाँच सिद्धियोंके तथा लघुता, नीरोगता प्रभृति अन्य सिद्धियोंके भी प्राकट्यका निरूपण | ......... ४५५ |
| १४-१५ | योगसाधन करके आत्मतत्त्वसे ब्रह्मतत्त्वको जाननेका फल, कृत-कृत्यता और समस्त बन्धनोंसे मुक्तिकी प्राप्ति | ......... ४५६ |
| १६-१७ | सर्वस्वरूप और सर्वत्र परिपूर्ण परमदेव परमात्माकी जीवोंके भीतर अन्तर्यामीरूपसे स्थिति बताकर उन्हें नमस्कार करना | ......... ४५८ |
( २३ )
| मन्त्र | विषय | पृष्ठ |
|---|---|---|
| तृतीय अध्याय | ||
| १-२ | समस्त जगत्की उत्पत्ति, स्थिति, संचालन और विलयन करनेवाले परमेश्वरके ज्ञानसे अमृतत्व-प्राप्तिका कथन | ४५९ |
| ३ | परमेश्वरके नेत्र, मुख, हाथ और पैरोंकी सर्वत्र विद्यमानता और भक्तके द्वारा उनकी अनुभूतिका प्रकार-निरूपण एवं परमेश्वरद्वारा ही सबको शक्ति दिये जानेका उल्लेख | ४६१ |
| ४—६ | रुद्ररूप सर्वकारण सर्वज्ञ परमेश्वरसे शुभ बुद्धि और कल्याण-दानके लिये प्रार्थना | ४६२ |
| ७-८ | सर्वश्रेष्ठ सर्वव्यापी महान् परमेश्वरके ज्ञानसे जन्म-मरणनाश तथा उस ज्ञानी महापुरुषके अनुभव और परमात्मज्ञानके फलकी दृढ़ताका प्रतिपादन | ४६४ |
| ९-१० | परमेश्वरकी सर्वश्रेष्ठता, महत्ता और सर्वत्र परिपूर्णताका तथा उन परमात्माके ज्ञानद्वारा दुःखोंसे छूटनेका कथन | ४६५ |
| ११—१७ | सर्वव्यापी, सर्वप्रेरक, सर्वरूप, सर्वत्र हाथ, पैर आदि समस्त इन्द्रियोंसे युक्त, सब इन्द्रियोंसे रहित, सबके स्वामी और एकमात्र शरण्य भगवान्के सविशेष और निर्विशेष स्वरूपके तात्त्विक वर्णनमें उन परमात्माको अङ्गुष्ठमात्र परिणामवाला बताकर उनके ज्ञानसे अमृतस्वरूप हो जानेका निरूपण करना | ४६६ |
| १८ | नौ द्वारवाले पुरमें अन्तर्यामीरूपसे परमेश्वरकी स्थितिका वर्णन | ४७० |
| १९ | ‘वे सर्वज्ञ परमात्मा समस्त इन्द्रियोंसे रहित होकर भी सब इन्द्रियोंका कार्य करनेमें समर्थ हैं’ इसका स्पष्टीकरण और उनकी महिमाका वर्णन | ४७१ |
| २० | परमेश्वरको अणुसे भी अणु और महान्से भी महान् बताना और उनकी कृपासे ही उनकी महिमाके ज्ञान होनेका निरूपण करना | ४७१ |
| २१ | परमात्माको प्राप्त महात्माके स्वानुभव-वर्णन | ४७२ |
| चतुर्थ अध्याय | ||
| १ | शुभ बुद्धिके लिये परमेश्वरसे अभ्यर्थना | ४७३ |
| २—४ | परमेश्वरका जगत्के रूपमें चिन्तन करते हुए उनकी स्तुतिका प्रकार तथा अव्यक्त और जीवरूप दोनों प्रकृतियोंपर परमेश्वरके स्वामित्व-का निरूपण | ४७४ |
( २४ )
| मन्त्र | विषय | पृष्ठ |
|---|---|---|
| ५ | उक्त दोनों अनादि प्रकृतियोंका स्पष्टीकरण | ......... ४७६ |
| ६-७ | एक वृक्षपर रहनेवाले दो पक्षीके रूपकद्वारा जीवात्मा और परमेश्वरकी भिन्नताका प्रतिपादन तथा परमेश्वरकी महिमाके ज्ञानसे जीवके मोहजनित शोककी निवृत्तिका कथन | ......... ४७७ |
| ८ | दिव्य परमधाम और भगवान्के पार्षदोंका तत्त्व न जाननेवालेको वेद-शास्त्रोंसे कोई लाभ न होना तथा जाननेवालोंका परमधाममें निवास | ... ४७९ |
| ९ | परमेश्वरके रचे हुए इस जगत्में ज्ञानी पुरुषोंसे भिन्न अज्ञानी जीवोंके बन्धनका उल्लेख | ......... ४८० |
| १० | माया और मायापति परमेश्वरको जाननेकी प्रेरणा | ......... ४८१ |
| ११ | समस्त कारणोंके अधिष्ठाता स्तवनीय परमेश्वरको जान लेनेसे शान्ति प्राप्त होनेका कथन | ......... ४८१ |
| १२ | सद्बुद्धिके लिये उन सर्वकारण सर्वज्ञ परमेश्वरसे पुनः प्रार्थना | ......... ४८२ |
| १३ | समस्त देवोंके अधिपति सबके आश्रयभूत परमेश्वरको भेंट-पूजा समर्पण करनेका समर्थन | ......... ४८३ |
| १४-२० | अत्यन्त सूक्ष्म, सृष्टिकी रचना और रक्षा करनेवाले, सब मनुष्योंके हृदयमें विद्यमान, सर्वव्यापक, कल्याणमय, महान् यशस्वी और दिव्य चक्षुओंसे देखे जानेयोग्य परमदेव परमात्माके स्वरूपका उनकी प्राप्तिरूप फलसहित विस्तृत वर्णन | ......... ४८३ |
| २१-२२ | रुद्ररूप परमेश्वरसे मुक्तिके लिये तथा सांसारिक भयसे रक्षाके लिये प्रार्थना | ......... ४८९ |
पञ्चम अध्याय
| मन्त्र | विषय | पृष्ठ |
|---|---|---|
| १ | विद्या और अविद्याकी परिभाषा एवं इन दोनोंपर शासन करनेवाले परमेश्वरकी विलक्षणता | ......... ४९० |
| २-४ | उपास्यदेव भगवान्के आदिकारणता, सर्वाधिपतित्व, सर्वप्रकाशता, स्वयंप्रकाशमानता प्रभृति गुणगणोंका एवं उनकी अतर्क्य लीलाके रहस्यका निरूपण | ......... ४९१ |
| ५ | विश्वके शासक परमात्माद्वारा सब पदार्थोंके नाना रूपोंमें परिवर्तन और जीवोंके साथ गुणोंका यथायोग्य सम्बन्ध किये जानेका कथन | .... ४९३ |
( २५ )
| मन्त्र | विषय | पृष्ठ |
|---|---|---|
| ६ | वेदोंकी रहस्यभूत उपनिषद्-विद्याको जाननेवाले ब्रह्मा तथा देवता और ऋषिगणोंके अमृतरूप हो जानेका उल्लेख | .......... ४९४ |
| ७ | जीवात्माकी स्वकर्मानुसार देवयान, पितृयान और नाना योनियोंमें जन्म-मृत्युके चक्रमें घूमणारूप तीन गतियोंका प्रकरण | .......... ४९५ |
| ८—१० | जीवात्माके स्वरूपका विवेचन | .......... ४९६ |
| ११ | मनुष्ययोनिमें अथवा विभिन्न योनियोंमें पृथक्-पृथक् संकल्प, स्पर्श, दृष्टि, मोह, भोजन, जलपान और वृष्टिसे सजीव शरीरकी वृद्धि और जन्म होनेका उल्लेख | .......... ४९९ |
| १२ | जीवके आवागमनका कारण | .......... ५०० |
| १३ | अनादिकालसे चले आते हुए जन्म-मरणरूप बन्धनसे छूटनेका उपाय | .......... ५०१ |
| १४ | अध्यायके उपसंहारमें परमात्माकी प्राप्तिके उपायका संकेत | .......... ५०२ |
षष्ठ अध्याय
| मन्त्र | विषय | पृष्ठ |
|---|---|---|
| १ | पुनः स्वभाव और कालकी जगत्कारणताका खण्डन तथा परमेश्वरकी महिमासे सृष्टिचक्रके संचालनका समर्थन | .......... ५०३ |
| २ | उन सर्वव्यापी, सर्वज्ञ, कालके भी काल, सर्वगुण-सम्पन्न, सर्व-शासक परके चिन्तनका आदेश | .......... ५०४ |
| ३ | परमात्माके द्वारा जीवात्माका गुण आदिके साथ सम्बन्ध कराये जानेका वर्णन | .......... ५०४ |
| ४ | भगवदर्पणरूप कर्मयोगके अनुष्ठानसे कर्मबन्धनके नाशका कथन | .......... ५०५ |
| ५ | भगवत्प्राप्तिके लिये उपासनारूप दूसरे साधनका वर्णन | .......... ५०६ |
| ६ | ज्ञानयोगरूप तीसरे साधनका फलसहित निरूपण | .......... ५०७ |
| ७ | प्रथम अध्यायमें कथित ध्यानके द्वारा परमेश्वरका साक्षात्कार करनेवाले महात्मा पुरुषोंके मुखसे जगत्के सर्वश्रेष्ठ कारणरूप परमात्माकी महिमाका कथन | .......... ५०८ |
| ८-९ | परमेश्वरकी असीम ज्ञान, बल और क्रियारूप स्वाभाविक विविध शक्तियोंका वर्णन तथा उनकी अतुलनीय महत्ताका प्रतिपादन | .......... ५०९ |
( २६ )
१० जगत्के अभिन्न निमित्तोपादानस्वरूप परमात्माकी स्तुति करते हुए उनसे अपने ब्रह्मस्वरूपमें आश्रय देनेके लिये प्रार्थना ......... ५१० ११—१३ परब्रह्म परमात्माके सर्वव्यापी, अन्तर्यामी, साक्षी, चेतन एवं कारणस्वरूपका निरूपण एवं उनको जाननेवाले महापुरुषोंके लिये मोक्षकी प्राप्तिका प्रतिपादन ......... ५११ १४ सूर्य-चन्द्रादि ज्योतियोंकी परब्रह्मको प्रकाशित करनेमें असमर्थता तथा परमात्माके प्रकाशसे ही सबको प्रकाश प्राप्त होनेका उल्लेख ...... ५१३ १५—१७ परमधामकी प्राप्तिके लिये अखिल कल्याणमय दिव्य गुणसम्पन्न सर्वेश्वरके स्वरूपका विशेषतासे वर्णन ......... ५१४ १८ परमदेव पुरुषोत्तमको जानने और पानेके लिये उनकी शरण लेनेका प्रकार ......... ५१७ १९ निर्गुण निराकार परमात्माके स्वरूपका निर्देश ......... ५१८ २० परमात्मज्ञानके बिना दुःख-निवृत्तिकी असम्भवता ......... ५१८ २१ श्वेताश्वतर ऋषिको तपसे और भगवत्कृपासे ब्रह्मज्ञान प्राप्त होने तथा उसके द्वारा अधिकारियोंको उपदेश दिये जानेका कथन ......... ५१९ २२ अशान्तचित्त अनधिकारीके प्रति उपदेश देनेका निषेध ......... ५२० २३ परमेश्वर और गुरुमें श्रद्धा-भक्ति रखनेवालेको दिये हुए उपदेशकी सफलताका कथन ......... ५२० शान्तिपाठ ......... ५२१
॥ ॐ श्रीपरमात्मने नमः ॥
ईशावास्योपनिषद्
यह ईशावास्योपनिषद् शुक्लयजुर्वेदकाण्वशाखीय संहिताका चालीसवाँ अध्याय है। मन्त्र-भागका अंश होनेसे इसका विशेष महत्त्व है। इसीको सबसे पहला उपनिषद् माना जाता है। शुक्लयजुर्वेदके प्रथम उनतालीस अध्यायोंमें कर्मकाण्डका निरूपण हुआ है। यह उस काण्डका अन्तिम अध्याय है और इसमें भगवत्तत्त्वरूप ज्ञानकाण्डका निरूपण किया गया है। इसके पहले मन्त्रमें ‘ईशा-वास्यम्’ वाक्य आनेसे इसका नाम ‘ईशावास्य’ माना गया है।
शान्तिपाठ
ॐ पूर्णमदः पूर्णमिदं पूर्णात्पूर्णमुदच्यते।
पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्णमेवावशिष्यते ॥*
ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः।
ॐ=सच्चिदानन्दघन; अदः=वह परब्रह्म; पूर्णम्=सब प्रकारसे पूर्ण है; इदम्=यह (जगत् भी); पूर्णम्=पूर्ण (ही) है; (क्योंकि) पूर्णात्=उस पूर्ण (परब्रह्म)-से ही; पूर्णम्=यह पूर्ण; उदच्यते=उत्पन्न हुआ है; पूर्णस्य=पूर्णके; पूर्णम्=पूर्णको; आदाय=निकाल लेनेपर (भी); पूर्णम्=पूर्ण; एव=ही; अवशिष्यते=बच रहता है।
व्याख्या— वह सच्चिदानन्दघन परब्रह्म पुरुषोत्तम सब प्रकारसे सदा-सर्वदा परिपूर्ण है। यह जगत् भी उस परब्रह्मसे ही पूर्ण है; क्योंकि यह पूर्ण उस पूर्ण पुरुषोत्तमसे ही उत्पन्न हुआ है। इस प्रकार परब्रह्मकी पूर्णतासे जगत् पूर्ण है, इसलिये भी वह परिपूर्ण है। उस पूर्ण ब्रह्ममेंसे पूर्णको निकाल लेनेपर भी वह पूर्ण ही बच रहता है।
त्रिविध तापकी शान्ति हो।
* यह मन्त्र बृहदारण्यक-उपनिषद्के पाँचवें अध्यायके प्रथम ब्राह्मणकी प्रथम कण्डिकाका पूर्वार्द्धरूप है।
२८ ईशादि नौ उपनिषद् [ मन्त्र १-२
ॐ ईशा वास्यमिदꣳ सर्वं यत्किञ्च जगत्यां जगत्।
तेन त्यक्तेन भुञ्जीथा मा गृधः कस्य स्विद्धनम्॥ १॥
जगत्याम्=अखिल ब्रह्माण्डमें; यत् किं च=जो कुछ भी; जगत्=जड-चेतनस्वरूप जगत् है; इदम्=यह; सर्वम्=समस्त; ईशा=ईश्वरसे; वास्यम्=व्याप्त है; तेन=उस ईश्वरको साथ रखते हुए; त्यक्तेन=त्यागपूर्वक; भुञ्जीथाः=(इसे) भोगते रहो; मा गृधः=(इसमें) आसक्त मत होओ; (क्योंकि) धनम्=धन-भोग्य-पदार्थ; कस्य स्वित्=किसका है अर्थात् किसीका भी नहीं है॥ १॥
व्याख्या—मनुष्योंके प्रति वेदभगवान्का पवित्र आदेश है कि अखिल विश्व-ब्रह्माण्डमें जो कुछ भी यह चराचरात्मक जगत् तुम्हारे देखने-सुननेमें आ रहा है, सब-का-सब सर्वाधार, सर्वनियन्ता, सर्वाधिपति, सर्वशक्तिमान्, सर्वज्ञ, सर्वकल्याणगुणस्वरूप परमेश्वरसे व्याप्त है; सदा-सर्वत्र उन्हींसे परिपूर्ण है (गीता ९।४)। इसका कोई भी अंश उनसे रहित नहीं है (गीता १०। ३९, ४२)। यों समझकर उन ईश्वरको निरन्तर अपने साथ रखते हुए—सदा-सर्वदा उनका स्मरण करते हुए ही तुम इस जगत्में ममता और आसक्तिका त्याग करके केवल कर्तव्य-पालनके लिये ही विषयोंका यथाविधि उपभोग करो अर्थात्—विश्वरूप ईश्वरकी पूजाके लिये ही कर्मोंका आचरण करो। विषयोंमें मनको मत फँसने दो, इसीमें तुम्हारा निश्चित कल्याण है (गीता २।६४; ३।९; १८।४६)। वस्तुतः ये भोग्य-पदार्थ किसीके भी नहीं हैं। मनुष्य भूलसे ही इनमें ममता और आसक्ति कर बैठता है। ये सब परमेश्वरके हैं और उन्हींकी प्रसन्नताके लिये इनका उपयोग होना चाहिये॥ १॥
कुर्वन्नेवेह कर्माणि जिजीविषेच्छतꣳ समाः।
एवं त्वयि नान्यथेतोऽस्ति न कर्म लिप्यते नरे॥ २॥
इह=इस जगत्में; कर्माणि=शास्त्रनियत कर्मोंको; कुर्वन्=(ईश्वरपूजार्थ) करते हुए; एव=ही; शतम् समाः=सौ वर्षोंतक; जिजीविषेत्=जीनेकी इच्छा करनी चाहिये; एवम्=इस प्रकार (त्यागभावसे, परमेश्वरके लिये); कर्म=किये जानेवाले कर्म; त्वयि=तुझ; नरे=मनुष्यमें; न लिप्यते=लिप्त नहीं होंगे; इतः=इससे (भिन्न);
मन्त्र ३ ] ईशावास्योपनिषद् २९
अन्यथा=अन्य कोई प्रकार अर्थात् मार्ग; न अस्ति=नहीं है (जिससे कि मनुष्य कर्म-बन्धनसे मुक्त हो सके) ॥ २ ॥
व्याख्या—पूर्व मन्त्रके कथनानुसार जगत्के एकमात्र कर्ता, भर्ता, हर्ता, सर्वशक्तिमान्, सर्वमय परमेश्वरका सतत स्मरण रखते हुए सब कुछ उन्हींका समझकर उन्हींकी पूजाके लिये शास्त्रनियत कर्तव्यकर्मोंका आचरण करते हुए ही सौ वर्षतक जीनेकी इच्छा करो—इस प्रकार अपने पूरे जीवनको परमेश्वरके प्रति समर्पण कर दो। ऐसा समझो कि शास्त्रोक्त स्वकर्मका आचरण करते हुए जीवन-निर्वाह करना केवल परमेश्वरकी पूजाके लिये ही है, अपने लिये नहीं—भोग भोगनेके लिये नहीं। यों करनेसे वे कर्म तुझे बन्धनमें नहीं डाल सकेंगे। कर्म करते हुए कर्मोंसे लिप्त न होनेका यही एकमात्र मार्ग है। इसके अतिरिक्त अन्य कोई भी मार्ग कर्मबन्धनसे मुक्त होनेका नहीं है (गीता २।५०,५१; ५।१०) ॥२॥
सम्बन्ध—इस प्रकार कर्मफलरूप जन्मबन्धनसे मुक्त होनेके निश्चित मार्गका निर्देश करके अब इसके विपरीत मार्गपर चलनेवाले मनुष्योंकी गतिका वर्णन करते हैं—
असुर्या नाम ते लोका अन्धेन तमसाऽऽवृताः ।
तांस्ते प्रेत्याभिगच्छन्ति ये के चात्महनो जनाः ॥ ३ ॥
असुर्याः=असुरोंके; (जो) नाम=प्रसिद्ध; लोकाः=नाना प्रकारकी योनियाँ एवं नरकरूप लोक हैं; ते=वे सभी; अन्धेन तमसा=अज्ञान तथा दुःख-क्लेशरूप महान् अन्धकारसे; आवृताः=आच्छादित हैं; ये के च=जो कोई भी; आत्महनः=आत्माकी हत्या करनेवाले; जनाः=मनुष्य हों; ते=वे; प्रेत्य=मरकर; तान्=उन्हीं भयंकर लोकोंको; अभिगच्छन्ति=बार-बार प्राप्त होते हैं ॥ ३ ॥
व्याख्या—मानव-शरीर अन्य सभी शरीरोंसे श्रेष्ठ और परम दुर्लभ है एवं वह जीवको भगवान्की विशेष कृपासे जन्म-मृत्युरूप संसार-समुद्रसे तरनेके लिये ही मिलता है। ऐसे शरीरको पाकर भी जो मनुष्य अपने कर्मसमूहको ईश्वर-पूजाके लिये समर्पण नहीं करते और कामोपभोगको ही जीवनका परम ध्येय मानकर विषयोंकी आसक्ति और कामनावश जिस-
३० ईशादि नौ उपनिषद् [ मन्त्र ४
किसी प्रकारसे भी केवल विषयोंकी प्राप्ति और उनके यथेच्छ उपभोगमें ही लगे रहते हैं; वे वस्तुतः आत्माकी हत्या करनेवाले ही हैं; क्योंकि इस प्रकार अपना पतन करनेवाले वे लोग अपने जीवनको केवल व्यर्थ ही नहीं खो रहे हैं वरं अपनेको और भी अधिक कर्मबन्धनमें जकड़ रहे हैं। इन काम-भोग-परायण लोगोंको—चाहे वे कोई भी क्यों न हों, उन्हें चाहे संसारमें कितने ही विशाल नाम, यश, वैभव या अधिकार प्राप्त हों, मरनेके बाद कर्मोंके फलस्वरूप बार-बार उन कूकर-शूकर, कीट, पतंगादि विभिन्न शोक-संतापपूर्ण आसुरी योनियोंमें और भयानक नरकोंमें भटकना पड़ता है (गीता १६। १६, १९, २०), जो कि ऐसे आसुरी स्वभाववाले दुष्टोंके लिये निश्चित किये हुए हैं और महान् अज्ञानरूप अन्धकारसे आच्छादित हैं। इसीलिये श्रीभगवान्ने गीतामें कहा है कि मनुष्यको अपने द्वारा अपना उद्धार करना चाहिये, अपना पतन नहीं करना चाहिये (६। ५)॥ ३॥
सम्बन्ध— जो परमेश्वर सम्पूर्ण जगत्में व्याप्त हैं, जिनका सतत स्मरण करते हुए तथा जिनकी पूजाके लिये ही समस्त कर्म करने चाहिये, वे कैसे हैं—इस जिज्ञासापर कहते हैं—
अनेजदेकं मनसो जवीयो नैनद्देवा आप्नुवन् पूर्वमर्षत्।
तद्धावतोऽन्यानत्येति तिष्ठत्तस्मिन्नपो मातरिश्वा दधाति॥ ४॥
( तत् )=वे परमेश्वर; अनेजत्=अचल; एकम्=एक; (और) मनसः=मनसे (भी); जवीयः=अधिक तीव्र गतियुक्त हैं; पूर्वम्=सबके आदि; अर्षत्=ज्ञानस्वरूप या सबके जाननेवाले हैं; एनत्=इन परमेश्वरको; देवाः=इन्द्रादि देवता भी; न आप्नुवन्=नहीं पा सके या जान सके हैं; तत्=वे (परब्रह्म पुरुषोत्तम); अन्यान्=दूसरे; धावतः=दौड़नेवालोंको; तिष्ठत्=(स्वयं) स्थित रहते हुए ही; अत्येति=अतिक्रमण कर जाते हैं; तस्मिन्=उनके होनेपर ही—उन्हींकी सत्ता-शक्तिसे; मातरिश्वा=वायु आदि देवता; अपः=जलवर्षा आदि क्रिया; दधाति=सम्पादन करनेमें समर्थ होते हैं॥ ४॥
व्याख्या— वे सर्वान्तर्यामी सर्वशक्तिमान् परमेश्वर अचल और एक हैं,
मन्त्र ५ ] ईशावास्योपनिषद् ३१
तथापि मनसे भी अधिक तीव्र वेगयुक्त हैं। जहाँतक मनकी गति है, वे उससे भी कहीं आगे पहलेसे ही विद्यमान हैं। मन तो वहाँतक पहुँच ही नहीं पाता। वे सबके आदि और ज्ञानस्वरूप हैं अथवा सबके आदि होनेके कारण सबको पहलेसे ही जानते हैं। पर उनको देवता तथा महर्षिगण भी पूर्णरूपसे नहीं जान सकते (गीता १०।२)। जितने भी तीव्र वेगयुक्त बुद्धि, मन और इन्द्रियाँ अथवा वायु आदि देवता हैं, अपनी शक्तिभर परमेश्वरके अनुसंधानमें सदा दौड़ लगाते रहते हैं; परंतु परमेश्वर नित्य अचल रहते हुए ही उन सबको पार करके आगे निकल जाते हैं। वे सब वहाँतक पहुँच ही नहीं पाते। असीमकी सीमाका पता ससीमको कैसे लग सकता है। बल्कि वायु आदि देवताओंमें जो शक्ति है, जिसके द्वारा वे जलवर्षण, प्रकाशन, प्राणिप्राणधारण आदि कर्म करनेमें समर्थ होते हैं, वह इन अचिन्त्यशक्ति परमेश्वरकी शक्तिका एक अंशमात्र ही है। उनका सहयोग मिले बिना ये सब कुछ भी नहीं कर सकते॥ ४॥
सम्बन्ध— अब परमेश्वरकी अचिन्त्यशक्तिमत्ता तथा व्यापकता प्रकारान्तरसे पुनः वर्णन करते हैं—
तदेजति तन्नैजति तद् दूरे तद्वन्तिके।
तदन्तरस्य सर्वस्य तदु सर्वस्यास्य बाह्यतः॥ ५॥
तत्=वे; एजति=चलते हैं; तत्=वे; न एजति=नहीं चलते; तत्=वे; दूरे=दूरसे भी दूर हैं; तत्=वे; उ अन्तिके=अत्यन्त समीप हैं; तत्=वे; अस्य=इस; सर्वस्य=समस्त जगत्के; अन्तः=भीतर परिपूर्ण हैं; (और) तत्=वे; अस्य=इस; सर्वस्य=समस्त जगत्के; उ बाह्यतः=बाहर भी हैं॥ ५॥
व्याख्या— वे परमेश्वर चलते भी हैं और नहीं भी चलते; एक ही कालमें परस्परविरोधी भाव, गुण तथा क्रिया जिनमें रह सकती है, वे ही तो परमेश्वर हैं। यह उनकी अचिन्त्य शक्तिकी महिमा है। दूसरे प्रकारसे यह भी कहा जा सकता है कि भगवान् जो अपने दिव्य परमधाममें और लीलाधाममें अपने प्रिय भक्तोंको सुख पहुँचानेके लिये अप्राकृत सगुण-साकार रूपमें प्रकट रहकर लीला किया करते हैं, यह उनका चलना है; और निर्गुणरूपसे जो सदा-सर्वथा
३२ ईशादि नौ उपनिषद् [ मन्त्र ६-७
अचल स्थित हैं, यह उनका न चलना है। इसी प्रकार वे श्रद्धा-प्रेमसे रहित मनुष्योंको कभी दर्शन नहीं देते, अतः उनके लिये दूर-से-दूर हैं; और प्रेमकी पुकार सुनते ही जिन प्रेमीजनोंके सामने चाहे जहाँ उसी क्षण प्रकट हो जाते हैं, उनके लिये वे समीप-से-समीप हैं। इसके अतिरिक्त वे सदा-सर्वत्र परिपूर्ण हैं, इसलिये दूर-से-दूर भी वे ही हैं और समीप-से-समीप भी वे ही हैं; क्योंकि ऐसा कोई स्थान ही नहीं है, जहाँ वे न हों। सबके अन्तर्यामी होनेके कारण भी वे अत्यन्त समीप हैं; पर जो अज्ञानी लोग उन्हें इस रूपमें नहीं पहचानते, उनके लिये वे बहुत दूर हैं (गीता १३। १५)। वस्तुतः वे इस समस्त जगत्के परम आधार हैं और परम कारण वे ही हैं; इसलिये बाहर-भीतर सभी जगह वे ही परिपूर्ण हैं (गीता ७। ७) ॥ ५ ॥
सम्बन्ध— अब अगले दो मन्त्रोंमें इन परब्रह्म परमेश्वरको जाननेवाले महापुरुषकी स्थितिका वर्णन किया जाता है—
यस्तु सर्वाणि भूतान्यात्मन्येवानुपश्यति। सर्वभूतेषु चात्मानं ततो न विजुगुप्सते ॥ ६ ॥
**तु=**परन्तु; **यः=**जो मनुष्य; **सर्वाणि=**सम्पूर्ण; **भूतानि=**प्राणियोंको; **आत्मनि=**परमात्मामें; **एव=**ही; **अनुपश्यति=**निरन्तर देखता है; **च=**और; **सर्वभूतेषु=**सम्पूर्ण प्राणियोंमें; **आत्मानम्=**परमात्माको (देखता है); **ततः=**उसके पश्चात् (वह कभी भी); **न विजुगुप्सते=**किसीसे घृणा नहीं करता ॥ ६ ॥
व्याख्या— इस प्रकार जो मनुष्य प्राणिमात्रको सर्वाधार परब्रह्म पुरुषोत्तम परमात्मामें देखता है और सर्वान्तर्यामी परम प्रभु परमात्माको प्राणिमात्रमें देखता है, वह कैसे किससे घृणा या द्वेष कर सकता है। वह तो सदा-सर्वत्र अपने परम प्रभुके ही दर्शन करता हुआ (गीता ६। २९-३०)। मन-ही-मन सबको प्रणाम करता रहता है तथा सबकी सब प्रकारसे सेवा करना और उन्हें सुख पहुँचाना चाहता है ॥ ६ ॥
यस्मिन्सर्वाणि भूतान्यात्मैवाभूद्विजानतः। तत्र को मोहः कः शोक एकत्वमनुपश्यतः ॥ ७ ॥