ज्ञानयोग (स्वामी विवेकानन्द - हिन्दी अनुवाद)
Jnana Yoga - Swami Vivekananda (Hindi)
स्वामी विवेकानन्द द्वारा
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२४० ज्ञानयोग
व्यक्ति जगत् को त्याग कर वन मे जाकर अपने शरीर को कष्ट देता है, धीरे धीरे सुखा कर अपने को मार डालता है, अपने हृदय को शुष्क मरुभूमि बना डालता है, अपने सभी भावो को मार डालता है, और कठोर, बीभत्स और रूखा हो जाता है, समझ लो कि वह भी मार्ग भूल गया है। ये दोनो दो सिरे की बाते है, दोनो ही भ्रम है, एक इस ओर, दूसरा दूसरी ओर। दोनो ही लक्ष्यभ्रष्ट है, दोनो ही पथभ्रष्ट है।
वेदान्त कहता है, इस प्रकार कार्य करो—सभी वस्तुओं मे ईश्वरबुद्धि करो, समझो कि वह सब मे है, अपने जीवन को भी ईश्वर से अनुप्राणित, यहाँ तक कि उसे ईश्वररूप ही समझो—यह जान लो कि यही हमारा एक मात्र कर्तव्य है, केवल यही हमारे लिये जानने की एक मात्र वस्तु है—कारण ईश्वर सभी वस्तुओं मे विद्यमान है, उसे प्राप्त करने के लिये और कहाँ जाओगे ? प्रत्येक कार्य मे, प्रत्येक भाव मे, प्रत्येक चिन्ता मे वह पहले से ही स्थित है। इसी प्रकार समझकर हमे अवश्य ही कार्य करते जाना होगा। यही एक मात्र पथ है, अन्य नही। इस प्रकार करने पर कर्मफल तुमको लगेगा नही। कर्मफल तुम्हारा कोई अनिष्ट नहीं कर पायेगा। हम देख ही चुके है कि हम जो कुछ भी कष्ट भोग करते है उसका कारण ये ही सब व्यर्थ की वासनाये है। परन्तु जब इन वासनाओ मे ईश्वरबुद्धि के द्वारा वे पवित्र भाव धारण कर लेती है, ईश्वरस्वरूप हो जाती है, तब उनके आने से भी फिर कोई अनिष्ट नही होता। जिन्होंने इस रहस्य को नही जाना है, उनको इसे जानने से पहले तक इसी आसुरी जगत् मे रहना पडेगा।' लोग नही जानते कि यहाँ उनके चारों ओर सर्वत्र कितने अनन्त
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आनन्द की खान पड़ी हुई है, किन्तु वे उसको खोज निकाल नहीं पाते। आसुरी जगत् का अर्थ क्या है ? वेदान्त कहता है —अज्ञान ।
वेदान्त कहता है कि हम अनन्त जल से पूर्ण नदी के तट पर रह कर भी प्यास से मर रहे है। ढेरो खाद्य सामने रखा है, फिर भी भूखों मर रहे है। यह आनन्दमय जगत् यहीं विद्यमान है। परन्तु हम उसे खोज नहीं पाते। हम उसी में रह रहे है। वह सर्वदा ही हमारे चारो ओर रहता है, परन्तु हम उसे सदा ही कुछ और समझ कर भ्रम मे पड़ जाते हैं। विभिन्न सभी धर्म हमारे सामने उस आनन्दमय जगत् को दिखाने को आगे आते हैं। सभी हृदय इस आनन्द की खोज कर रहे है। सभी जातियो ने इसकी खोज की है, धर्मों का यही एक मात्र लक्ष्य है, और यही आदर्श विभिन्न भाषाओ मे भी प्रकाशित हुआ है; भिन्न भिन्न धर्मों मे जो सब छोटे छोटे मतभेद है, वे सब केवल कहने के दाँवपेच है, वास्तव मे कुछ भी नहीं है। एक व्यक्ति एक भाव को एक प्रकार से प्रकट करता है, दूसरा दूसरी प्रकार, किन्तु मै जो कुछ कहता हूँ, शायद तुम वही बात दूसरे प्रकार की भाषा मे व्यक्त कर रहे हो। फिर भी मै शायद अकेले ही प्रसिद्ध होने की आशा मे, अथवा अपने मन के अनुसार चलना पसन्द करता हूँ और इसलिये कहता हूँ—'यह मेरा मौलिक मत है।' इन्ही कारणो से हमारे जीवन मे परस्पर ईर्ष्या, द्वेष आदि की उत्पत्ति होती है।
इस सम्बन्ध मे अब और भी प्रश्न आते है। जो ऊपर कहा गया है वह मुख से कह देना तो अत्यन्त सरल है। बचपन से ही सुनता आ रहा हूँ—सर्वत्र ब्रह्मबुद्धि करो—सब ब्रह्ममय हो जायगा—
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तब सभी विषयों का वास्तविक सम्भोग कर पाओगे, किन्तु जैसे ही हम संसारक्षेत्र मे उतर कर कुछ धक्के खाते है वैसे ही हमारी सब ब्रह्मबुद्धि उड़ जाती है। मै मार्ग मे सोचता जा रहा हूँ, सभी मनुष्यो मे ईश्वर विराजमान है—एक बलवान् मनुष्य ने आकर मुझे धक्का दिया, बस मै चित होकर गिर पडा। झट उठा, रक्त मस्तक में चढ़ गया—मुट्ठी बँध गई—विचारशक्ति नष्ट होगई। बिलकुल उन्मत्त हो उठा, स्मृति लुप्त हो गई—उस व्यक्ति के अन्दर ईश्वर को न देखकर मैने भूत देखा। जन्म के साथ ही साथ उपदेश मिलता है, सर्वत्र ईश्वरदर्शन करो, सभी धर्म यही सिखाते है—सभी वस्तुओ मे, सब प्राणियों के अन्दर, सर्वत्र ईश्वरदर्शन करो। न्यू टेस्टामेण्ट मे ईसामसीह ने भी इस विषय मे स्पष्ट उपदेश दिया है। हम सभी ने यह उपदेश पाया है—किन्तु काम के समय ही हमारा गोलमाल प्रारम्भ हो जाता है। ईसप् की कहानियों मे एक कथा है। एक विशालकाय सुन्दर हरिण तालाव मे अपना प्रतिबिम्ब देखकर अपने बच्चे से कहने लगा, “देखो, मै कितना बलवान् हूँ, मेरा मस्तक देखो कैसा भव्य है, मेरे हाथ पाँव देखो कैसे दृढ़ और मांसल है, मै कितना तेज दौड़ सकता हूँ।” यह बात कहते ही उसने दूर से कुत्तो के भौंकने का शब्द सुना। सुनते ही वह ज़ोर से भागा। बहुत दूर दौड़ने के बाद हाँफते हाँफते फिर बच्चे के पास आया। बच्चा बोला, 'अभी तो तुम कह रहे थे, मै बडा बलवान् हूँ, फिर कुत्तो का शब्द सुनकर भागे क्यों?' हरिण बोला—'यही तो बात है, कुत्तो की भों भों सुनकर ही मेरा सब ज्ञान लुप्त हो जाता है।' हम लोग भी जीवन भर यही करते रहते है। हम इस दुर्बल मनुष्य जाति के सम्बन्ध मे कितनी आशाये बाँधते रहते है, किन्तु कुत्तों के भौंकते ही हरिण की भाँति भाग खड़े होते हैं! यदि
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ऐसा है तो यह सब शिक्षा देने की क्या आवश्यकता है ? अत्यधिक आवश्यकता है। समझ रखना चाहिये, एक दिन मे कुछ नहीं हो जाता।
‘आत्मा वा अरे द्रष्टव्यः श्रोतव्यो मन्तव्यो निदिध्यासितव्यः ।’
आत्मा के सम्बन्ध मे पहले सुनना होगा, उसके बाद मनन अर्थात् चिन्ता करनी होगी, उसके बाद लगातार ध्यान करना होगा। सभी आकाश देख पाते है, और तो क्या, जो छोटे कीड़े भूमि पर फिरते रहते है वे भी ऊपर की ओर देखने पर नील वर्ण आकाश को देखते है, किन्तु वह हमारे पास से कितनी-कितनी दूर है—बोलो तो ! इच्छा करने पर तो मन सभी जगह जा सकता है, किन्तु इस शरीर को प्रयत्न करके चलना सीखने मे ही कितना समय बीत जाता है। हमारे सभी आदर्शों के सम्बन्ध मे भी यही बात है। आदर्श हमसे बहुत दूर है, और हम उनसे बहुत नीचे पड़े हुये है, तथापि हम जानते है कि हमे एक आदर्श मान कर रखना आवश्यक है। इतना ही नही, हमे सर्वोच्च आदर्श रखना ही आवश्यक है। अधिकांश व्यक्ति इस जगत् मे कोई आदर्श लिये बिना ही जीवन के इस अन्धकारमय पथ पर भटकते फिरते है। जिसका एक निश्चित आदर्श है वह यदि एक हज़ार भूलों मे पड़ सकता है तो जिसका कोई भी आदर्श नही है वह दस हज़ार भूल करेगा यह निश्चय है। अतएव एक आदर्श रखना ही अच्छा है। इस आदर्श के सम्बन्ध मे जितना हो सके सुनना होगा; उतने दिन सुनना होगा जितने दिन वह हमारे अन्तर मे प्रवेश नही करता, हमारे मस्तिष्क में प्रवेश नहीं करता, जब तक वह हमारे रक्त के भीतर प्रवेश नहीं करता, जब
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तक वह हमारे रक्त के प्रत्येक बिन्दु मे, कण कण में प्रवेश नहीं करता, जब तक वह हमारे शरीर के अणु-परमाणु मे व्याप्त नहीं हो जाता। अतएव यह आत्मतत्व पहले हमे सुनना होगा। कहा गया है कि ‘हृदय भावोच्छ्वासो से पूर्ण होने पर ही मुख वाक्य का उच्चारण करता है।’ इसी प्रकार हृदय पूर्ण होने पर हाथ भी कार्य करता है।
चिन्ता ही हमारी कार्यप्रवृत्ति की नियामक है। मन को सर्वोच्च चिन्ता द्वारा पूर्ण करके रक्खो, दिनानुदिन ये सभी भाव सुनते रहो, मास प्रति मास इसका चिन्तन करो। पहले पहल सफलता न मिले; कोई हानि नहीं, यह विफलता तो स्वाभाविक ही है, यह तो मानव-जीवन का सौन्दर्य स्वरूप है। इस प्रकार की विफलता न होती तो जीवन क्या होता? यदि जीवन मे इस विफलता को जय करने की चेष्टा न रहती, तो जीवन धारण करने का कोई प्रयोजन ही न रह जाता। उसके न रहने पर जीवन की कविता कहाँ रहती? यह विफलता, यह भ्रम रहने से भी क्या हर्ज है? गाय कभी झूठ बोलते नही सुनी जाती, किन्तु वह सदा गाय-ही रहती है, मनुष्य कभी नहीं हो जाती। अतएव बार बार असफल हो जाओ तो भी कोई हानि नही है, सहस्रों बार, बार बार इस आदर्श को हृदय मे धारण करो, किन्तु सहस्र बार असफल होने पर फिर एक बार प्रयत्न करो। सब जीवो मे ब्रह्मदर्शन ही मनुष्य का आदर्श है। यदि सब वस्तुओ मे उसको देखने मे तुम सफल न हो तो कम से कम एक ऐसे व्यक्ति मे कि जिसको तुम सब से अधिक प्रेम करते हो, उसका दर्शन करने की चेष्टा करो—उसके बाद एक अन्य व्यक्ति मे दर्शन करने की चेष्टा करो—इसी प्रकार तुम आगे बढ़ सकते हो।
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आत्मा के सम्मुख तो अनन्त जीवन पड़ा हुआ है—अध्यवसाय के साथ चेष्टा करने पर तुम्हारी वासना अवश्य पूर्ण होगी।
“ अनेजदेकं मनसो जवीयो नैनद्देवा आप्नुवन् पूर्वमर्षत् ।
तद्धावतोऽन्यानत्येति तिष्ठत् तस्मिन्नपो मातरिश्वा दधाति॥
तदेजति तन्नैजति तद्दूरे तद्वन्तिके ।
तदन्तरस्य सर्वस्य तदु सर्वस्यास्य बाह्यतः॥
यस्तु सर्वाणि भूतानि आत्मन्येवानुपश्यति ।
सर्वभूतेषु चात्मानं ततो न विजुगुप्सते॥
यस्मिन्सर्वाणि भूतानि आत्मैवाभूद्विजानतः ।
तत्र को मोहः कः शोक एकत्वमनुपश्यतः॥
(ईशोपनिषद्, ४-७ श्लोक)
“वह अचल है, एक है, मन से भी अधिक द्रुत गति वाला है। इन्द्रियाँ उसके पूर्व चल कर भी उसको प्राप्त नहीं होतीं। वह स्थिर रह कर भी अन्यान्य द्रुतगामी पदार्थों से आगे जानेवाला है। उसमे रह कर ही हिरण्यगर्भ सब के कर्मफलो का विधान करते है। वह चञ्चल है, वह स्थिर है, वह दूर है, वह निकट है, इस सब के भीतर है, फिर भी वह इस सब के बाहर भी है। जो आत्मा के अन्दर सब भूतो का दर्शन करते है, और सब भूतो मे आत्मा का दर्शन करते है वे कुछ भी छिपाने की इच्छा नहीं करते। जिस अवस्था मे ज्ञानी व्यक्ति के लिये समस्त भूत आत्मस्वरूप हो जाते हैं, उस अवस्था मे उस एकत्वदर्शी पुरुष को शोक अथवा मोह कहाँ रह सकता है?”
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सब पदार्थों का यह एकत्व वेदान्त का और एक प्रधान विषय है। हम आगे चल कर देखेंगे कि किस प्रकार वेदान्त सिद्ध करता है कि हमारा समस्त दुःख अज्ञान से उत्पन्न है; वह अज्ञान और कुछ नहीं—यही बहुत्व की धारणा है—यह धारणा कि मनुष्य मनुष्य से भिन्न है, पुरुष और स्त्री भिन्न है, युवा और शिशु भिन्न है, जाति जाति से भिन्न है, पृथिवी चन्द्र से पृथक् है, एक परमाणु दूसरे परमाणु से पृथक् है यह ज्ञान ही वास्तव में सब दुःखों का कारण है। वेदान्त कहता है कि यह भेद वास्तविक नहीं है। यह भेद केवल भासित होता है, ऊपर से दीख पड़ता है। वस्तुओं के अन्तस्तल में वही एकत्व विराजमान है। यदि तुम भीतर जाकर देखो तो इस एकत्व को देखोगे—मनुष्य मनुष्य का एकत्व, नर नारी का एकत्व, जाति जाति का एकत्व, ऊँच नीच का एकत्व, धनी और दरिद्र का एकत्व, देवता और मनुष्य का एकत्व। सभी तो एक है—और यदि और भी भीतर प्रवेश करो तो देखोगे—अन्य प्राणी भी एक ही हैं। जो इस प्रकार एकत्वदर्शी हो चुके हैं उनको फिर मोह नहीं रहता। वे अब उसी एकत्व में पहुँच गये हैं, जिसको धर्मविज्ञान में ईश्वर कहते हैं। उनको अब मोह कैसे रह सकता है? मोह उसको उत्पन्न ही कैसे होगा? उन्होंने सभी वस्तुओं का आभ्यन्तरिक सत्य जान लिया है, सभी का रहस्य जान लिया है। उनके लिये अब दुःख कैसे रह सकता है? वे अब क्या वासना-कामना करेंगे? वे सभी वस्तुओ के अन्दर वास्तविक सत्य की खोज करके ईश्वर तक पहुँच गये हैं, जो जगत् का केन्द्रस्वरूप है, जो सभी वस्तुओ का एकत्व-स्वरूप है। यही अनन्त सत्ता है, यही अनन्त ज्ञान है, यही अनन्त आनन्द है। वहाँ मृत्यु नहीं, रोग नहीं, दुःख नहीं, शोक नहीं,
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अशान्ति नहीं। है केवल पूर्ण एकत्व—पूर्ण आनन्द। तब वे किसके लिये शोक करेंगे? वास्तव मे उस केन्द्र मे, उस परम सत्य मे मृत्यु नही है, दुःख नहीं है, किसी के लिये शोक करना नहीं है, किसी के लिये दुःख करना नहीं है।
स पर्यगाच्छुक्रमकायमव्रणमस्नाविरं शुद्धमपापविद्धम्।
कविर्मनीषी परिभूः स्वयंभूर्याथातथ्यतोऽर्थान्
व्यदधाच्छाश्वतीभ्यः समाभ्यः॥(ईशोपनिषद्, ८ वाँ श्लोक)
"वह चारों ओर से घेरे हुये है, वह उज्ज्वल है, देहशून्य है, व्रणशून्य है, स्नायुशून्य है, वह पवित्र और निष्पाप है, वह कवि है, मन का नियामक है, सब से श्रेष्ठ और स्वयम्भू है; वह सर्वदा ही यथायोग्य सभी के काम्य वस्तुओ का विधान करता है।" जो इस अविद्यामय जगत् की उपासना करता है वह अन्धकार मे प्रवेश करता है। जो इस जगत् को ब्रह्म के समान सत्य समझकर उसकी उपासना करते है वे अन्धकार मे भ्रमण करते हैं, किन्तु जो आजीवन इस संसार की उपासना करते है, उससे ऊपर और कुछ भी लाभ नहीं कर पाते, वे और भी घने अन्धकार मे प्रवेश करते है। किन्तु जिन्होने इस परम सुन्दर प्रकृति का रहस्य जान लिया है, जो प्रकृति की सहायता से दैवी प्रकृति का चिन्तन करते है वे मृत्यु का अतिक्रमण करते है एव दैवी प्रकृति की सहायता से अमरत्व का भोग करते है।
हिरण्मयेन पात्रेण सत्यस्यापिहितं मुखम्।
तत्त्वं पूषन्नपावृणु सत्यधर्माय दृष्टये॥
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ज्ञानयोग
तेजो यत्ते रूपं कल्याणतमं तत्ते पश्यामि ।
योऽसावसौ पुरुषः सोऽहमस्मि ॥
( ईश० उप० १५-१६ )
“ हे सूर्य, हिरण्मय (स्वर्ण के) पात्र द्वारा तुमने सत्य का मुख ढँक रक्खा है। सत्य धर्म वाला मै जिससे उसे देख पाऊं, इसके लिये उसको हटा दो। ... मै तुम्हारा परम रमणीय रूप देखता हूँ—तुम्हारे अन्दर जो यह पुरुष है वह मै ही हूँ।”
१२. अपरोक्षानुभूति
मै तुम लोगों को एक और उपनिषद से कुछ अंश पढ़कर सुनाऊँगा। यह अत्यन्त सरल एवं अतिशय कवित्वपूर्ण है। इसका नाम है कठोपनिषद् । सर एडविन अर्नाल्ड कृत इसका अनुवाद शायद तुममे से बहुतो ने पढ़ा होगा। हम लोगो ने पहले देखा ही है कि जगत् की सृष्टि कहाँ से हुई। इस प्रश्न का उत्तर बाह्य जगत् से नहीं पाया जा सकता, अतः इस प्रश्न के समाधान के लिये लोगो की दृष्टि अन्तर्जगत् की ओर आकृष्ट हुई। कठोपनिषद् मे मनुष्य के स्वरूप के सम्बन्ध मे यह अनुसन्धान आरम्भ हुआ है। पहले यह प्रश्न होता था कि इस वाह्य जगत् की सृष्टि किसने की ? इसकी उत्पत्ति कैसे हुई ? —इत्यादि। किन्तु अब यह प्रश्न उत्पन्न हुआ कि मंनुष्य के अन्दर कौन सी ऐसी वस्तु है जो उसे जीवित रखती है और उसे चलाती है, एवं मृत्यु के बाद मनुष्य का क्या होता है ? पहले मनुष्य ने इस जड़ जगत् को लेकर क्रमशः इसके आभ्यन्तर मे पहुँचने की चेष्टा की थी और इससे उसने पाया जगत् का एक जबरदस्त शासक—एक व्यक्ति—एक मनुष्य मात्र। हो सकता है कि मनुष्य के गुणसमूह को अनन्त परिमाण मे बढ़ाकर, वे उसके नाम के साथ जोड दिए गये हो, किन्तु कार्यतः वह एक मनुष्य मात्र है। परन्तु यह मीमांसा कभी पूर्ण सत्य नहीं हो सकती। अधिक से अधिक इसे आंशिक सत्य कह सकते है। हम लोग इस जगत् को मानवीय दृष्टि से देखते है, और हमलोगो का ईश्वर इस जगत् की मानवीय व्याख्या मात्र है।
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ज्ञानयोग
कल्पना करो, एक गाय दार्शनिक और धर्मज्ञ हुई—वह जगत् को अपनी गो-दृष्टि से देखेगी, वह जब इस समस्या की मीमांसा करेगी तो गाय के भाव से ही करेगी, और वह हमारे ही ईश्वर को देखेगी, ऐसी भी कोई बात नहीं। इसी प्रकार यदि कोई बिल्ली दार्शनिक हो तो वह बिडाल-जगत् को ही देखेगी, वह यही सिद्धान्त रखेगी कि कोई बिड़ाल ही इस जगत् का शासन कर रहा है। अतएव हम लोग देखते हैं कि जगत् के सम्बन्ध मे हमलोगों की व्याख्या पूर्ण नहीं है, और हम लोगों की धारणा भी जगत् के सर्वांश को स्पर्श करनेवाली नहीं है। मनुष्य जिस भाव से जगत् के सम्बन्ध मे भयानक स्वार्थपर मीमांसा करता है, उसे ग्रहण करने पर भ्रम में ही पड़ना होगा। बाह्य जगत् से जगत् के सम्बन्ध में जो मीमासा प्राप्त होती है, उसमे दोष यही है कि जिस जगत् को हम लोग देखते है, वह हम लोगो का अपना जगत् मात्र है, सत्य के सम्बन्ध मे जितनी हमारी दृष्टि है बस उतना ही है। प्रकृत सत्य वह परमार्थ वस्तु कभी इन्द्रियग्राह्य नहीं हो सकती, किन्तु हम लोग जगत् को उतना ही जानते है जितना पचेन्द्रियविशिष्ट प्राणियों की दृष्टि मे पड़ता है। कल्पना करो, हम लोगो की एक इन्द्रिय और हुई, उसके होने से समस्त ब्रह्माण्ड हम लोगो की दृष्टि मे अवश्य ही और एक रूप धारण करेगा। कल्पना करो, हम लोगो को एक चौम्बक (Magnetic) इन्द्रिय प्राप्त हुई—जगत् मे इस प्रकार की लाखों शक्तियाँ है, जिनकी उपलब्धि के लिये हम लोगो के पास कोई इन्द्रिय नहीं है—उस समय उन सब की उपलब्धि हमे होने लगेगी। हमलोगों की इन्द्रियाँ सीमाबद्ध हैं, वस्तुतः अत्यन्त सीमाबद्ध है, और इन सीमाओ के भीतर ही हम लोगो का समस्त जगत् अवस्थित है एवं हम लोगो
अपरोक्षानुभूति २५१
का ईश्वर हमारे इस क्षुद्र जगत् की समस्या का मीमांसा मात्र है। किन्तु वह कभी भी पूर्ण समस्या की मीमांसा नहीं हो सकता। यह तो असंभव व्यापार है। यथार्थ रूप से कहा जाय तो वह कोई मीमांसा ही नहीं है। किन्तु मनुष्य तो चुप होकर रह नहीं सकता, वह तो चिन्ताशील प्राणी है, इसलिए वह ऐसी एक मीमांसा करना चाहता है जिससे जगत् की सभी समस्याओं की मीमांसा हो जाय।
पहले इस प्रकार के एक जगत् का आविष्कार करो, इस प्रकार के एक पदार्थ का आविष्कार करो जो सम्पूर्ण जगत् का एक साधारण तत्त्व स्वरूप हो—जिसे हमलोग इन्द्रिय-प्रत्यक्ष कर सके या न कर सके किन्तु जिसे हम युक्ति-बल से सम्पूर्ण जगत् की नींव कह सके तथा सम्पूर्ण जगत् के भीतर मणिमालामध्यस्थित सूत्र स्वरूप कह सके। यदि हमलोग इस प्रकार के एक पदार्थ का आविष्कार कर सके, जो इन्द्रियगोचर न हो सकने पर भी केवल अकाट्य युक्तिबल से सभी प्रकार के अस्तित्व की भित्तिभूमि कहलाकर प्रमाणित किया जा सके। ऐसा होने पर हम कहेगे कि हम लोगो की समस्या कुछ मीमांसोन्मुख हुई। अतएव यह स्थिर सिद्धान्त है कि हमारे इस दृष्टिगोचर ज्ञात जगत् से इस मीमांसा के पाने की कोई सम्भावना नहीं, क्योकि यह समग्र भाव का केवल अंशविशेष मात्र है।
अतएव जगत् के अन्त:प्रदेश मे प्रवेश करना ही इस समस्या की मीमांसा का एक मात्र उपाय है। अति प्राचीन मननशील महात्मा-गण यह समझ सके थे कि वे केन्द्र से जितना दूर जाते है उतना ही वे उस अखण्ड वस्तु से दूर होते जाते हैं, और केन्द्र के जितने निकटवर्ती होते हैं उतने ही वे उसके निकट पहुँचते जाते हैं। हमलोग
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- ज्ञानयोग
इस केन्द्र के जितने निकटवर्ती होते है उतने ही हम सब जिस साधारण भूमि पर एकत्रित हो सकते है उस भूमि के निकट उपस्थित होते हैं और हमलोग उससे जितना दूर जाते है उतना ही हमलोगों के साथ दूसरों का विशेष पार्थक्य आरम्भ हो जाता है। यह बाह्य जगत् उस केन्द्र से बहुत दूर है, अतएव इसमे कोई ऐसी साधारण भूमि नहीं हो-सकती जहाँ पर सम्पूर्ण अस्तित्व-समष्टि की एक साधारण मीमांसा हो सके। यह जगत् सम्पूर्ण अस्तित्व का अधिक से अधिक एकांशमात्र है और भी कितने व्यापार हैं; जैसे मनोजगत् का व्यापार, नैतिक जगत का व्यापार और बुद्धिराज्य का सम्पूर्ण व्यापार, आदि आदि। इन सभों मे से केवल एक को लेकर उससे समुदय जगत्-समस्या की-मीमांसा करना असम्भव है। अतएव हमे प्रथमतः कहीं एक ऐसे केन्द्र का आविष्कार करना होगा, जिससे अन्यान्य समुदय विभिन्न लोकों की उत्पत्ति हुई है। फिर हम इस प्रश्न की मीमांसा की चेष्टा करेगे। यही इस समय प्रस्तावित विषय है। वह केन्द्र कहाँ है? वह हमलोगो के भीतर है—इस मनुष्य के भीतर जो मनुष्य रहता है, वही यह केन्द्र है। लगातार भीतर की ओर अग्रसर होते होते महापुरुषो ने देखा कि जीवात्मा का गम्भीरतम प्रदेश ही समुदय ब्रह्माण्ड का केन्द्र है। जितने प्रकार के अस्तित्व हैं, सभी आकर उसी एक केन्द्र में एकीभूत होते हैं। वस्तुतः यही स्थान समुदय की एक साधारण भूमि है। इस स्थान पर आकर हम एक सार्वभौमिक सिद्धान्त पर पहुँच सकते हैं। अतएव किसने इस जगत् की सृष्टि की है?—यह प्रश्न विशेष दार्शनिक युक्तिसिद्ध नही है, और न उसकी मीमांसा ही किसी काम की है।
पहले जो मैंने कठोपनिषद् की चर्चा की है, उसकी भाषा बहुत अलंकारपूर्ण है। अति प्राचीन काल मे एक बड़े धनी व्यक्ति थे।
अपरोक्षानुभूति २५३
उन्होने एक समय एक यज्ञ किया । उस यज्ञ मे सर्वस्वदान करने का नियम था । इस यज्ञकर्ता व्यक्ति का बाहर और भीतर समान नही था । वह यज्ञ करके खूब मान और यश पाने की इच्छा रखता था । किन्तु यज्ञ मे वह ऐसी सभी वस्तुओ का दान करता था, जो व्यवहार मे पूर्णतः अनुपयुक्त थी । उसने कितनी ही जराजीर्ण, अर्धमृत, बन्ध्या, एक आँखवाली और लँगड़ी गाये ब्राह्मणो को दान मे दीं । उसका एक छोटा पुत्र था, जिसका नाम था नचिकेता । उसने देखा, उसके पिता ठीक ठीक अपना व्रत-पालन नही कर रहे है, अपितु वे व्रत का भग कर रहे है, अतएव वह निश्चय नही कर पाया कि वह उनसे क्या कहे । भारतवर्ष मे माता-पिता प्रत्यक्ष जीवन्त देवता माने जाते है । उनके सामने सन्तान कुछ कहने या करने का साहस नही करता है, केवल चुप होकर वे खडे रहते है । अतएव उस बालक ने पिता के सम्मुख साक्षात् विरोध करने मे असमर्थ हो, उनसे केवल यही पूछा—" पिताजी, आप मुझे किस को देगे ? आपने तो यज्ञ मे सर्वस्वदान का सकल्प किया है ।" यह सुनकर पिता विरक्त हुए और बोले—" हे वत्स, तू क्या कह रहा है ? भला पिता अपने पुत्र का दान करेगा, यह कैसी बात है ? " पर बालक ने दूसरी बार, तीसरी बार बारम्बार पिता से यही प्रश्न किया, तब पिता क्रुद्ध होकर बोले—" तुझे मै यम को दे दूँगा ।" उसके बाद आख्यायिका ऐसी है कि वह बालक यम के घर गया । आदिमानव मृत होकर यमदेवता होते हैं, वे स्वर्ग जाकर समुदाय पितृगण के शासनकर्ता होते है । अच्छे व्यक्ति मृत्यु प्राप्त कर यम के निकट अनेक दिनो तक रहते है । ये यम एक अत्यन्त शुद्धस्वभाव-साधुपुरुष कहकर वर्णित है । वह बालक नचिकेता यमलोक को
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गया। देवता भी समय समय पर अपने घर मे नहीं रहते है। यमराज उस समय घर पर नहीं थे, इसलिये उस बालक को तीन दिन तक उसी तरह उनकी प्रतीक्षा मे रहना पड़ा। चौथे दिन यम अपने घर आये।
यम बोले, "हे विद्वान् ! तुम पूजनीय अतिथि होकर भी तीन दिन तक बिना कुछ खाये पिए हमारे घर मे रहे। हे ब्रह्मन् ! तुम्हे प्रणाम है, हमारा कल्याण हो। मै घर पर नहीं था, इसका मुझे बहुत दुःख है। किन्तु मै इस अपराध के प्रायश्चित्त स्वरूप तुम्हें प्रत्येक दिन के लिये एक एक करके तीन वर देने को प्रस्तुत हूँ, तुम वर माँगो।" बालक ने पहला वर यह माँगा—"आप मुझे पहला वर यह दीजिये जिससे कि मेरे पति पिताजी का क्रोध दूर हो जाय, वे जिससे मेरे प्रति प्रसन्न हों, और जब आप मुझे प्रस्थान करने के लिये आज्ञा देगे और जब मैं पिता के निकट जाऊँ तो उस समय वे मुझे पहचान सके।" यम ने कहा—'तथास्तु'। नचिकेता ने द्वितीय वर मे स्वर्ग पहुँचाने वाले यज्ञविशेष के विषय मे जानने की इच्छा की। हमने पहले ही देखा है, वेद के संहिता-भाग मे हमलोग केवल स्वर्ग की बात पाते हैं। वहाँ सबका शरीर ज्योतिर्मय होता है, और वे अपने पूर्व पूर्व पितरो के साथ वहाँ वास करते है। क्रमशः अन्यान्य भाव आये, किन्तु इन सभों से लोगों के प्राण पूर्ण तृप्त न हो सके। इस स्वर्ग से भी कुछ उच्चतर उन्हे आवश्यक ज्ञात हुआ। स्वर्ग मे रहना इस जगत् मे रहने की अपेक्षा कुछ भिन्न नही है। जिस प्रकार एक स्वस्थ धनिक नवयुवक का जीवन होता है, उसी प्रकार स्वर्गीय जीवों का भी जीवन होता है, भेद केवल इतना है कि उनकी भोग-सामग्री होती है और उनका शरीर नीरोग, स्वस्थ एवं अधिक बलशाली
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होता है। यह सब तो जड़ जगत् की ही वस्तु ठहरी, इससे कुछ अधिक अच्छी अवश्य है बस इतना ही। और जब हमने पहले ही देखा है कि यह जड जगत् पूर्वोक्त समस्या की कोई मीमांसा नहीं कर सकता, तो स्वर्ग से भी उसकी क्या मीमांसा हो सकती है ? इसलिये स्वर्ग के ऊपर स्वर्ग की कितनी भी कल्पना क्यों न करो, परन्तु समस्या की उपयुक्त मीमांसा इससे नही हो सकती । यदि यह जगत् इस समस्या की कोई मीमांसा नहीं कर सकता, तो इस तरह के चाहे कितने भी जगत् हों वे किस तरह इसकी मीमांसा करेंगे। कारण, हमे स्मरण रखना उचित है कि स्थूल भूत प्राकृतिक समुदाय व्यापारों का 'एक अत्यन्त सामान्य अश मात्र है। हम लोग जिन अगण्य घटनाओं को वास्तविक देखा करते है, वे भौतिक नहीं है।
अपने जीवन के प्रति क्षण को देखिये, मालूम होगा कि हमारे चिन्तन के व्यापार कितने है, और बाहर की वास्तविक घटनाये कितनी है। कितनो का तुम केवल अनुभव करते हो, और कितनों का वास्तविक दर्शन तथा स्पर्श करते हो ? यह जीवन-प्रवाह कितने प्रबल वेग से चलता है—इसका कार्यक्षेत्र भी कितना विस्तृत है—किन्तु इसमे मानसिक घटनाओं की तुलना मे इन्द्रियग्राह्य व्यापार 'कितना स्वल्प है' स्वर्गवाद का भ्रम यही है कि वह कहता है कि हम लोगो का जीवन और जीवन की घटनावली केवल रूप-रस-गन्ध-स्पर्श और शब्द मे ही आबद्ध है। किन्तु इस स्वर्ग से, जहाँ पर ज्योतिर्मय शरीर मिलता है, अधिकांश लोगो को तृप्ति नहीं हुई। तथापि इस जगह नचिकेता ने द्वितीय वर से स्वर्ग-प्रापक यज्ञ सम्बन्धी ज्ञान की प्रार्थना की है। वेद के प्राचीन भाग मे वर्णित हे कि देवतागण यज्ञ द्वारा सतुष्ट होकर लोगो को स्वर्ग ले जाते है।
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सभी धर्मों की आलोचना करने पर निश्चित रूप से यह सिद्धान्त लब्ध होता है कि जो कुछ प्राचीन होता है वही कालान्तर मे पवित्र रूप मे परिणत हो जाता है। हमारे पूर्वपुरुष भोजपत्र पर लिखते थे, अन्त मे उन्होने कागज बनाने की प्रणाली सीखी, परन्तु इस समय भी भोज-पत्र पवित्र कहा जाता है। प्राय: ९-१० हजार वर्ष पूर्व हमारे पूर्वपुरुष लकड़ी से लकड़ी घिसकर अग्नि प्रज्वलित करते थे, वही प्रणाली आज भी वर्तमान है। यज्ञ के समय किसी दूसरी प्रणाली द्वारा अग्नि प्रज्वलित करने से काम नहीं चलेगा। एशियावासी आर्यगणों की और एक शाखा के सम्बन्ध मे भी ऐसा ही है। इस समय भी उनके वर्तमान वंशधर वैद्युताग्नि संग्रहकर उसकी रक्षा करना अच्छा समझते हैं। इससे प्रमाणित होता है कि ये लोग पहले इस तरह अग्नि का संग्रह करते थे; बाद मे दो लकडियो को घिसकर अग्नि उत्पादन करना इन्होने सीखा, फिर जब अग्नि-उत्पादन करने के अन्यान्य उपाय उन्होने सीखे, उस समय भी पहले के उपायो का परित्याग नहीं किया। वे सब उपाय पवित्र आचारो मे परिणत होगये।
हिब्रुओं के सम्बन्ध मे भी यही हाल है। उनके पूर्वज पार्चमेन्ट (Parchment) पर लिखते थे। इस समय वे लोग कागज पर लिखते हैं, किन्तु पार्चमेन्ट पर लिखना उनकी दृष्टि मे महा पवित्र आचार है। इसी तरह सभी जातियो के सम्बन्ध मे है। इस समय जो आचार शुद्धाचार कहलाये जाते हैं, वे प्राचीन प्रथा मात्र हैं। यज्ञ भी इसी तरह प्राचीन प्रथा मात्र थे। कालक्रम से जब लोग पहले की अपेक्षा उत्तम रीति से जीवन-निर्वाह करने लगे, उस समय उनकी सभी धारणायें पूर्व की अपेक्षा अधिक उन्नत हुईं, किन्तु ये प्राचीन प्रथाये रह गयीं।
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समय समय पर इन सभो का अनुष्ठान होता था और वे पवित्र आचार माने जाने लगे। उसके बाद कुछ व्यक्तियो ने इस यज्ञ-कार्य के निर्वाह का भार अपने ऊपर ले लिया। यही लोग पुरोहित हुए। ये यज्ञ के सम्बन्ध मे गम्भीर गवेषणा करने लगे। यज्ञ ही इन लोगो का सर्वस्व हो-गया। उन लोगों की यह धारणा उस समय बद्धमूल हुई कि देवता लोग यज्ञ के गंध का आघ्राण करने के लिये आते है। यज्ञ की शक्ति से संसार मे सब कुछ हो सकता है। यदि निर्दिष्ट संख्या मे आहुतियाँ दी जायें, कुछ विशेष विशेष स्तोत्रो का पाठ हो, विशेष आकार वाली कुछ वेदियो का निर्माण हो, तो देवता सब कुछ कर सकते हैं, इत्यादि मतवादो की सृष्टि हुई। नचिकेता इसी लिये दूसरे वर द्वारा जिज्ञासा करता है कि किस तरह के यज्ञ से स्वर्ग-प्राप्ति हो सकती है। उसके बाद नचिकेता ने तीसरे वर की प्रार्थना की, और यहीं से प्रकृत उपनिषद् का आरम्भ है। नचिकेता बोला— "कोई कोई कहते है. मृत्यु के बाद आत्मा रहती है, कोई कोई कहते हैं, आत्मा मृत्यु के बाद नही रहती। आप मुझे इस विषय का यथार्थ तत्व समझा दे।"
यम भयभीत होगये। उन्होने परम आनन्द के साथ नचिकेता के प्रथमोक्त दोनो वरो को पूर्ण किया था। इस समय वे बोले, —" प्राचीन काल मे देवतागण इस विषय मे सन्दिग्ध थे। यह सूक्ष्म धर्म सुविज्ञेय नहीं है। हे नचिकेता ! तुम कोई दूसरा वर माँगो। मुझसे इस विषय मे और अधिक अनुरोध न करो, मुझे छोड़ दो।"
नचिकेता दृढ़प्रतिज्ञ था. वह बोला—"हे मृत्यो ! सुना । है, देवतालोगो ने भी इस विषय मे संदेह किया था, और इसे समझना
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भी सरल बात नहीं है, यह बात सत्य है । किन्तु मैं आपके सदृश इस विषय का कोई दूसरा वक्ता भी नहीं पा सकता, और इस वर के समान दूसरा कोई वर भी नहीं है ।”
यम बोले--“हे नचिकेता ! शतायु पुत्र, पौत्र, पशु, हाथी, सोना, घोडा आदि माँग लो । इस पृथ्वी के ऊपर राज्य करो, एवं जितने दिन तुम जीने की इच्छा करो उतने दिन तक जीवित रहो । इसके समान और कोई दूसरा वर यदि तुम्हारे मन मे हो तो उसे भी माँग लो, अथवा धन और दीर्घ जीवन की प्रार्थना कर लो । अथवा हे नचिकेता ! तुम विस्तृत पृथ्वीमण्डल पर राज्य करो, मै तुम्हे सभी प्रकार की काम्यवस्तुओं से संयुक्त करूँगा । पृथ्वी में जो जो काम्य-वस्तुएँ दुर्लभ है, उनकी प्रार्थना करो । गीत और वाद्य मे विशारद इन रथारूढ रमणियों को मनुष्य नहीं पा सकता । हे नचिकेता ! इन सभी रमणियों को मैं तुम्हे देता हूँ, ये तुम्हारी सेवा करेगी, किन्तु तुम मृत्यु के सम्बन्ध मे जिज्ञासा मत करो ।”
नचिकेता ने कहा--“ये सभी वस्तुएँ केवल दो दिनों के लिये है, ये इन्द्रियों के तेज को हरण करती है। अतिदीर्घ जीवन भी अनन्त काल की तुलना में वस्तुतः अत्यन्त अल्प है । इसलिये ये हाथी, घोड़े, रथ, गीत, वाद्य आदि तुम्हारे ही पास रहे । मनुष्य धन से कभी तृप्त नहीं हो सकता । जब मै तुम्हे देखूँगा ही, तो इस वित्त की चिर-काल के लिये किस तरह रक्षा कर सकूँगा ? तुम जितने दिन तक इच्छा करोगे, मैं उतने ही दिन तक जीवित रह सकूँगा । मैने जिस वर की प्रार्थना की है, केवल वही वर मै चाहता हूँ ।”
यम इस समय सन्तुष्ट हुए । वे बोले--“परमकल्याण ( श्रेय ) और आपात रम्य भोग ( प्रेय ) इन दोनों का उद्देश्य भिन्न है, ये दोनों
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ही मनुष्यों को बद्ध करते है। जो इनमे से श्रेय को ग्रहण करते है, उनका कल्याण होता है, और जो आपातरम्य भोग को ग्रहण करते है, वे लक्ष्यभ्रष्ट होते हैं। ये श्रेय और प्रेय दोनों ही मनुष्य के समीप उपस्थित होते है। ज्ञानी दोनों पर विचार कर एक को दूसरे से पृथक् जानते है। वे श्रेय को प्रेय से श्रेष्ठ समझकर स्वीकार करते है, किन्तु अज्ञानी पुरुष अपने शारीरिक सुख के लिये प्रेय को ही ग्रहण करते हैं। हे नचिकेता ! तुमने आपातरम्य समग्र विषयो की नश्वरता समझ कर उन सभों को छोड दिया है।” इन वचनों से नचिकेता की प्रशंसा कर अन्त में यम ने उसे परम तत्व का उपदेश देना आरम्भ किया।
यहाँ पर हमे वैदिक वैराग्य और नीति की अत्युन्नत धारणा प्राप्त हुई कि जितने दिन तक मनुष्य की भोगवासना का त्याग नहीं होता, उतने दिन तक उसके हृदय मे सत्य-ज्योति का प्रकाश नहीं हो सकता। जितने दिन तक ये तुच्छ विषयवासनाये तुमुल कोला-हल करती है, जितने दिन तक प्रति मुहूर्त्त वे हमलोगों को खींच कर बाहर ले जाती हैं—लेजाकर हमे प्रत्येक वाह्य वस्तु का, एक विन्दु रूप का, एक विन्दु रस का, एक विन्दु स्पर्श का दास बनाती है, उतने दिन चाहे जितना हम ज्ञान का अभिमान क्यो न करे, हमलोगों के हृदय मे सत्य किस तरह प्रकाशित हो सकता है ?
यम बोले-“जिस आत्मा के सम्बन्ध मे, जिस परलोकतत्व के सम्बन्ध मे तुमने प्रश्न किया है, वह वित्त-मोह से मूढ़ बालको के हृदय मे प्रतिभात नहीं हो सकता है। इसी जगत् का अस्तित्व है, परलोक का नहीं, यह माननेवाले बारम्बार मेरे वश मे आते हैं।”