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ज्ञानयोग (स्वामी विवेकानन्द - हिन्दी अनुवाद)

Jnana Yoga - Swami Vivekananda (Hindi)

स्वामी विवेकानन्द द्वारा

DevanagariHindipublished332 पृष्ठ

माया और ईश्वरधारणा का क्रमविकास १११

तरंग उठती है जो हमें आगे बढ़ने को बाध्य करती है, परन्तु जैसे ही हम एक पाँव आगे बढ़ाते हैं वैसे ही एक धक्का लगता है। हम सब टैण्टालुस की भाँति इस जगत् मे जीवित रहने को और मरने को मानो विधि-विधान से अभिशप्त हैं। पंचेन्द्रिय द्वारा सीमाबद्ध जगत् से अतीत आदर्श हमारे मस्तिष्क मे आते हैं किंतु बहुत सी चेष्टायें करने के वाद हम देखते हैं कि उन्हें हम कभी भी कार्य रूप मे परिणत नही कर सकते। इसके विरुद्ध हम 'अपने आस' पास की अवस्था की चक्की में पिस कर चूर चूर हो कर परमाणुओं में परिणत हो जाते हैं। और यदि हम आदर्शप्राप्ति की चेष्टा का परित्याग करके केवल सांसारिक भाव को लेकर रहने कीं चेष्टा करते हैं तो भी हमे पशुजीवन बिताना पड़ता है और हमारी अवनति हो जाती है। अतएव किसी ओर भी सुख नहीं है। जो लोग इस जगत् मे जिस अवस्था में उत्पन्न हुए हैं उसी अवस्था मे रहना चाहते हैं, तो उनके भाग्य में भी दुःख ही है। और जो लोग सत्य के लिये—इस पाशविक जीवन से कुछ उन्नत जीवन के लिये—प्राण देने को आगे बढ़ते हैं उन्हें सहस्र गुना दुःख होता है। यही वस्तुस्थिति है और इसकी कोई व्याख्या भी नहीं है, व्याख्या हो भी नही सकती। किन्तु वेदान्त इससे बाहर निकलने का मार्ग बतलाता है। याद रखिये कि ये सब बाते बोलते समय मुझे ऐसी अनेक बातें कहनी पड़ेंगी जिनसे आपको कुछ भय लगेगा। किन्तु जो कुछ मै कह रहा हूँ उसे आपने याद रखा, भलीभाँति हजम किया और दिन रात चिन्तन किया तो यह आपके अन्दर बैठ जायगी, आपकी उन्नति करेगी और सत्य को समझने तथा सत्य मे प्रतिष्ठित होने मे आपको समर्थ करेगी।

११२; ज्ञानयोग

११२; ज्ञानयोग

यह बात कोई मतविशेष नही है कि यह जगत् टैण्टालस का नरक है। यह एक सत्य है। हम जगत् के सम्बन्ध में कुछ भी नहीं जानते, परन्तु हम यह भी नही कह सकते कि हम कुछ नहीं जानते। इस जगत्-शृंखला का अस्तित्व है यह हम नहीं कह सकते, और जब हम उसके सम्बन्ध मे चिन्ता करने लगते है तब हम देखते है कि हम कुछ भी नहीं जानते। यह हमारे मस्तिष्क का पूर्ण भ्रम हो सकता है। शायद मै केवल स्वप्न देख रहा हूँ। मै स्वप्न देख रहा हूँ कि मै आप से बाते कर रहा हूँ और आप मेरी बात सुन रहे है। कोई भी इसके विरुद्ध प्रमाण नहीं दे सकता कि यह स्वप्न नहीं है। ‘मेरा मस्तिष्क’ यह भी तो एक स्वप्न हो सकता है, और वास्तविक बात यह है कि अपना मस्तिष्क देखा किसने है ? वह तो हमने केवल मान लिया है। सभी विषयों के सम्बन्ध मे यही बात है। शरीर हमारा है यह भी तो हम मान ही लेते है, और यह भी नहीं कह सकते कि हम नहीं जानते। ज्ञान और अज्ञान के बीच की यह अवस्था, यह रहस्यमय पहेली, यह सत्य और मिथ्या का मिश्रण—कहाँ जाकर इनका मिलन हुआ कौन जानता है ? हम स्वप्न मे विचरण कर रहे है—अर्ध निद्रित, अर्ध जाग्रत—जीवनभर एक पहेली में आबद्ध, यही हममे से प्रत्येक की दशा है ! सभी प्रकार के इन्द्रियज्ञान की यह दशा है। सब दर्शनों की, विज्ञान की, सब प्रकार के मानवीय ज्ञान की—जिनको लेकर हमे इतना अहङ्कार है उन सबकी भी यही दशा है—यही परिणाम है; यही ब्रह्माण्ड है।

चाहे पदार्थ कहो, या भूत कहो, मन कहो या आत्मा कहो, बात एक ही है—हम यह नहीं कह सकते कि ये सब है और यह भी

माया और ईश्वरधारणा का क्रमविकास ११३

नहीं कह सकते कि ये सब नहीं है। हम उन सबको एक भी नहीं कह सकते, अनेक भी नहीं कह सकते। यह प्रकाश और अन्धकार का खेल—यह नाना प्रकार की दुर्बलता—अविविक्त, अपृथक, अविभाज्य—सदा ही रही है, इसमे सभी घटनाये कभी सत्य मालूम होती हैं, कभी मिथ्या। कभी लगता है कि हम जाग्रत है, कभी लगता है सोये हुये है। यही माया है और यही वस्तुस्थिति है। इसी माया मे हमारा जन्म हुआ है, इसी मे हम जीवित हैं; इसी मे हम चिन्ता करते हैं, इसी मे हम स्वप्न देखते हैं। इसी माया मे हम दार्शनिक है, इसी मे साधु है; यही नहीं, हम इसी माया मे कभी दानव और कभी देवता हो जाते है। चिन्ता के रथ पर चढ़ कर चाहे कितनी ही दूर क्यों न जाओ, अपनी धारणा को ऊँचे से ऊँचा बनाओ, उसे अनन्त या जो इच्छा हो नाम दो, फिर भी यह सब माया के ही भीतर है। इसके विपरीत हो ही नहीं सकता; और मनुष्य का समस्त ज्ञान—केवल इसी माया के साधारण भाव का आविष्कार करना, उसका वास्तविक रूप जानना है। यह माया नामरूप का कार्य है। जिस किसी वस्तु की आकृति है, जो कुछ भी तुम्हारे मन मे किसी प्रकार के भाव का उद्दीपन करने वाला है, वही माया के अन्तर्गत है। जर्मन दार्शनिक भी कहते हैं—सभी कुछ देशकालनिमित्त के अधीन है, और यही माया है।

अब हम फिर उस ईश्वर-धारणा के सम्बन्ध मे क्या हुआ इस पर विचार करेगे। इसके पहले संसार की अवस्था का जो चित्र खीचा गया है उससे सहज ही समझ मे आजाता है कि पूर्वोक्त ईश्वर की धारणा हो ही नहीं सकती—अर्थात् उन एक ईश्वर की जो अनंत काल से हमें प्यार कर रहे है (प्यार हमारी धारणा के अनुसार)—उन

११४ ज्ञानयोग

११४ ज्ञानयोग

एक अनंत सर्वशक्तिमान और निःस्वार्थ पुरुष की जो इस विश्व का शासन कर रहे है। इस सगुण ईश्वर की धारणा के विरुद्ध खड़े होने के लिये कवि का साहस आवश्यक है। कवि पूछता है—तुम्हारा न्यायशील दयालु ईश्वर कहाँ है ? वह मनुष्य है अथवा पशु ? क्या वह अपनी लाखों सन्तान का विनाश नहीं देखता ? कारण, ऐसा कौन है जो एक क्षण भी दूसरे की हिंसा किये बिना जीवन धारण कर सकता है ? क्या आप सहस्रों जीवनों का संहार किये बिना एक साँस भी ले सकते है ? लाखों जीव मर रहे है, इसी से आप जीवित हैं। आपके जीवन का प्रति क्षण, प्रत्येक निःश्वास जो आप लेते है वह सहस्रों जीवों की मृत्युस्वरूप है और आपकी प्रत्येक गति लाखों जीवों की मृत्युस्वरूप है। वे क्यों मरे ? इस सम्बन्ध मे एक अति प्राचीन अयुक्तपूर्ण दलील दी जाती है कि—“वे तो अति नीच जीव है।” मान लो कि यह बात ठीक है, किन्तु यह तो एक टेढा प्रश्न है जिसका निश्चय करना ही कठिन है। कौन कह सकता है कि चींटी मनुष्य से श्रेष्ठ है अथवा मनुष्य चींटी से ? कौन कह सकता है कि यह ठीक है या वह ठीक है ? मनुष्य घर बना सकता है, यन्त्र बना सकता है, इसलिये वही श्रेष्ठ है। परन्तु हम इसी तरह यह भी तो कह सकते हैं कि चींटी घर नहीं बना सकती, यन्त्र नहीं बना सकती इसीलिये वह श्रेष्ठ है। जिस प्रकार इस पक्ष में कोई युक्ति नहीं है उसी प्रकार उस पक्ष मे भी कोई युक्ति नहीं है।

अच्छा, मान लिया कि वे अति क्षुद्र जीव हैं, फिर भी वे मरे क्यों ? उनके क्षुद्र होने से ही तो उनका बचना और भी आवश्यक है। वे क्यों न बचें ? उनका जीवन अधिकतर इन्द्रियों में आबद्ध है

माया और ईश्वरधारणा का क्रमविकास ११५

अतः वे हमारी तुम्हारी अपेक्षा सहस्रगुना दुःख-सुख का बोध करते हैं। कुत्ता या व्याघ्र जिस स्फूर्ति और लगन के साथ भोजन करते हैं, उस तरह कौन मनुष्य कर सकता है ? इसका कारण है कि हमारी समस्त कार्यों की प्रवृत्ति इन्द्रियो मे नहीं है, बुद्धि में है, आत्मा मे है। किन्तु कुत्ते की इन्द्रियों मे ही प्राण पड़े रहते है, वह इन्द्रियसुख के लिये उन्मत्त हो जाता है, वह जितने आनन्द के साथ इन्द्रियसुख का उपभोग करता है, मनुष्य उतना नही कर सकता; और जैसा उसका यह सुख है उसी परिमाण मे उसका दुःख भी है।

जितना सुख है उतना ही दुःख है। यदि मनुष्येतर प्राणी इतनी तीव्रता से सुख की अनुभूति करते हैं तो यह भी सत्य है कि उनके दुःख की अनुभूति भी उतनी ही अधिक तीव्र होगी—मनुष्य की अपेक्षा सहस्रगुनी तीव्र होगी, परन्तु फिर भी उन्हे मरना होगा ! तो फिर मरने मे भी उन्हे मनुष्य की अपेक्षा सहस्रगुना कष्ट होगा । फिर भी हमे उनके कष्ट की चिन्ता न करते हुये उन्हे मारना पडता है। यही तो माया है; और यदि हम मान ले कि ईश्वर हमारी ही तरह का एक व्यक्ति है ( सगुण ) जिसने यह सृष्टि रची है तो ये सब सिद्धान्त और व्याख्यायें जो यह सिद्ध करने का प्रयत्न करते हैं कि बुराई में ही भलाई छिपी रहती है, ये सब पर्याप्त नहीं हैं। उपकार चाहे सैकड़ो हो किन्तु अपकारों से उपकार क्यों होंगे ? इसे सिद्धान्त के अनुसार मै यदि अपनी इन्द्रियों के सुख के लिये दूसरों का गला काटूँ तो कोई बुराई नहीं है। अतएव यह युक्ति ठीक नही मालूम होती। बुराई मे से भलाई क्यो निकलेगी ? इस प्रश्न का उत्तर देना होगा। किन्तु इस प्रश्न का कोई उत्तर नहीं है; यह बात भारतीय दर्शन को माननी पड़ी।

११६ ज्ञानयोग

११६ ज्ञानयोग

वेदान्त अन्य सभी धर्मों और सम्प्रदायों की अपेक्षा अधिक साहस के साथ सत्य का अन्वेषण करने मे अग्रसर हुआ है। वेदान्त ने बीच मे ही किसी जगह पहुँच कर अपने अनुसन्धान को स्थगित नहीं किया, और उसको अग्रसर होने मे एक सुविधा भी प्राप्त थी। वह यह कि वेदान्त धर्म के विकास के समय पुरोहित सम्प्रदाय ने सत्यान्वेषियो का मुख बन्द करने की चेष्टा नहीं की। धर्म मे पूर्ण स्वाधीनता थी। उन लोगों की संकीर्णता थी सामाजिक प्रणाली मे। यहाँ (इंग्लैण्ड मे) समाज खूब स्वाधीन है। भारतवर्ष मे सामाजिक स्वाधीनता नही थी किन्तु धार्मिक स्वाधीनता थी। इस देश मे कोई चाहे जैसी पोशाक पहने अथवा जो इच्छा हो करे, उससे कोई कुछ न कहेगा; किन्तु चर्च मे यदि कोई एक दिन भी न जाय तो तरह तरह की बाते उठ खड़ी होती है। सत्य की चिन्ता करते समय उसे हजार बार सोचना पड़ेगा कि समाज क्या कहता है। दूसरी ओर भारतवर्ष मे यदि कोई इतर जाति के हाथ का खाना खा लेता है तो तुरन्त ही समाज उसे जातिच्युत कर देता है। पूर्व पुरुष जैसी पोशाक पहनते थे उससे ज़रा भी पृथक पोशाक पहनते ही बस, उसका सर्वनाश हो जाता है। मैने यहाँ तक सुना है कि एक व्यक्ति प्रथम बार रेलगाड़ी देखने गया था, इसीलिये जातिच्युत कर दिया गया! मान लो कि यह घटना सत्य नही है, किन्तु यह सच है कि हमारे समाज की यही गति है। किन्तु धर्म के विषय मे देखता हूँ कि—नास्तिक, बौद्ध, जडवादी—सभी प्रकार के धर्म, सभी प्रकार के मतमतान्तर, अद्भुत अद्भुत और बड़े बड़े भयानक मतो का प्रचार हो रहा है, शिक्षा भी हो रही है; अधिक क्या, देवमन्दिरो के द्वार पर ही

माया और ईश्वरधारणा का क्रमविकास :११७

ब्राह्मण लोग जड़वादियों की देवनिन्दा को सुनते सहते हैं ! यह बात उनके धर्म की उदारता और महत्व की ही परिचायक है।

भगवान् बुद्ध ने वृद्धावस्था में शरीरत्याग किया था। मेरे एक अमेरिकन वैज्ञानिक मित्र बुद्धदेव का चरित्र पढ़कर बड़े प्रसन्न होते थे किन्तु बुद्धदेव की मृत्यु उन्हे अच्छी नहीं लगती थी, कारण, कि उन्हे क्रॉस पर नहीं लटकाया गया था। कितनी भ्रमात्मक धारणा है ! बड़ा आदमी होने से ही हत्या किया जाना आवश्यक माना जाता है। भारतवर्ष मे इस प्रकार की धारणा प्रचलित नहीं थी। बुद्धदेव ने भारतीय देवताओं तथा जगत् का शासन करने वाले ईश्वर तक को अस्वीकार करते हुये भारतवर्ष भर का भ्रमण किया किन्तु तथापि वे वृद्धावस्था तक जीवित रहे थे। वे पचासी वर्ष की अवस्था तक जीवित रहे और देश के आधे भाग मे उन्होने अपने धर्म का प्रचार कर लिया था।

चार्वाकों ने भी बड़े बड़े भयानक मतों का प्रचार किया था—उन्नीसवीं शताब्दी मे भी लोग इस प्रकार खुल्लमखुल्ला जड़वाद का प्रचार करने का साहस नहीं करते। ये चार्वाक लोग मन्दिरों और नगरो मे प्रचार करते फिरते थे कि धर्म मिथ्या है, वह केवल पुरोहितो की स्वार्थपूर्ति का एक उपाय मात्र है, वेद केवल धूर्त निशाचरों की रचना है—ईश्वर भी नहीं है, आत्मा भी नहीं है। यदि आत्मा है तो स्त्री-पुत्र आदि के प्रेम से आकृष्ट होकर लौट क्यों नही आता ? इन लोगों की यह धारणा थी कि यदि आत्मा होता तो मृत्यु के बाद भी प्रेम आदि भावना उसको रहती और वह खूब अच्छा खाना, अच्छा पहनना चाहता। ऐसा होने पर भी किसी ने चार्वाको के ऊपर अत्याचार नहीं किया।

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ज्ञानयोग

धर्म के विषय मे हमारे यहाँ स्वाधीनता थी, अतएव आज भी धर्म के विषय मे हमारे भीतर महाशक्ति विराजित है। आप लोगो ने सामाजिक स्वतन्त्रता ली थी, इसीलिये आपकी सामाजिक प्रणाली इतनी सुन्दर है। हमने सामाजिक बातो मे बिल्कुल स्वतन्त्रता नही दी, इसलिये हमारे समाज मे सङ्कीर्णता है। आपके देश मे धार्मिक स्वतन्त्रता नहीं दी गई; धर्म के विषय मे प्रचलित मत का उल्लंघन करते ही बन्दूके उठ जाती थीं! उसी का फल यह है कि योरप मे धार्मिक भाव इतना सङ्कीर्ण है। भारतवर्ष में सामाजिक श्रृंखला को खोलना होगा और योरप मे धार्मिक श्रृंखला को तोड़ना पड़ेगा। तभी उन्नति होगी। यदि हम लोग इस आध्यात्मिक, नैतिक या सामाजिक उन्नति के भीतर जो एकत्व है उसको समझ सके, यदि हम जानले कि वे सब एक ही पदार्थ के विभिन्न विकास मात्र है, तो धर्म हमारे समाज के भीतर प्रवेश करेगा, हमारे जीवन का प्रति मुहूर्त धर्म भाव से पूर्ण हो जायगा। धर्म हमारे जीवन के प्रत्येक कार्य मे प्रवेश करेगा, धर्म नाम से जो कुछ भी है वह सब हमारे जीवन मे अपने प्रभाव का विस्तार करेगा। वेदान्त के प्रकाश में आप समझेगे कि समस्त विज्ञान केवल धर्म का ही विभिन्न विकास मात्र है; जगत् की सभी वस्तुये इसी प्रकार हैं।

तो हमने देखा कि स्वाधीनता होने के कारण ही योरप में यह विज्ञान की उत्पत्ति और उन्नति हुई है; और हम देखते हैं कि कितने आश्चर्य की बात है कि सभी समाजों में दो विभिन्न दल देखे जाते हैं। एक संहार करने वाला, दूसरा संगठन करने

माया और ईश्वरधारणा का क्रमविकास १११९

वाला। मान लो कि समाज में दोष है और एक दल उठकर गाली गलौज करने लगा। बहुत दिन तक ये लोग केवल कट्टरपन्थी रहे। सभी देशों और समाजों मे ये लोग देखे जाते हैं; और स्त्रियाँ तो अधिकांश इस चीत्कार में योग दिया करती हैं, कारण वे स्वभाव से भावुक होती है। जो व्यक्ति खड़े होकर किसी विषय के विरुद्ध लेक्चरबाजी करेगा उसके दल की वृद्धि होगी ही। तोड़ना सहज होता है, पागल आदमी जो चाहे तोड फोड़ सकता है, किन्तु किसी वस्तु का बनाना उसके लिये कठिन है।

सभी देशो मे इस प्रकार के गन्दे विषयों के प्रतिवादी किसी न किसी रूप मे पाये जाते हैं, और वे समझते हैं कि केवल गाली-गलौज से और दोषो को प्रकाश मे लाकर ही वे लोगो का उपकार कर रहे हैं। उनको देखने से ऐसा लगता है कि वे कुछ उपकार कर रहे है, किन्तु वास्तव मे वे अनिष्ट ही अधिक करते हैं। एक दिन मे तो कोई काम नहीं होता। समाज एक ही दिन मे तो -बन नहीं गया, और परिवर्तन का अर्थ है, कारणो को दूर करना। मान लो कि बहुत से दोष है, किन्तु केवल गालीगलौज से तो कुछ होगा नही; हमें उनकी जड़ तक जाना पड़ेगा। पहले तो दोष का कारण क्या है यह जानना होगा, फिर उसे दूर करने से दोष स्वतः ही दूर हो जायगा। चिल्लाने से लाभ होने के स्थान पर हानि की ही अधिक सम्भावना है।

किन्तु पूर्ववर्णित दूसरे दल के हृदय में सहानुभूति थी। वे समझ गये थे कि दोषो को दूर करने के लिये उनके कारणों को देखना

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होगा। बडे बड़े साधु महात्माओं का ही यह दल था। एक बात आपको याद रखना चाहिये कि जगत् के सभी बड़े बड़े आचार्य लोग कह गये हैं कि हम नाश करने नहीं आये, किन्तु पहले से जो कुछ है उसे पूर्ण करने आये हैं। प्रायः लोग आचार्यगण का यह महान् उद्देश्य न समझ कर ऐसा कहते हैं कि उन्होने साधारण मनुष्यों की भाँति अनुपयुक्त कार्य किये। इस समय भी बहुधा लोग कहते हैं कि वे लोग (आचार्यगण) जिसको सत्य समझते थे उसे प्रकट रूप से कहने का साहस नही करते थे और वे कुछ अंश मे कायर थे। किन्तु यह बात नहीं है। ये सब एकदेशदर्शी लोग उन सब महापुरुषो के हृदय के अनन्त प्रेम की शक्ति को नहीं समझते हैं। वे तो संसार के समस्त नर-नारियों को अपनी सन्तान के समान देखते थे। वे ही यथार्थ मातापिता है, वे ही यथार्थ देवता हैं, उनके हृदय मे प्रत्येक के लिये अनन्त सहानुभूति और क्षमा थी—वे सदा ही सहने को और क्षमा करने को उद्यत रहते थे। वे जानते थे कि किस प्रकार मानव समाज संगठित हो सकता है; अतएव वे अत्यन्त धैर्य के साथ, अत्यन्त सहिष्णुता के साथ अपनी संजीवनी औषध का प्रयोग करने लगे। उन्होने किसी को गालियाँ नहीं दीं, न भय दिखलाया किन्तु बड़े धैर्य के साथ लोगों को एक एक कदम रख कर मार्ग दिखलाया है। ये उपनिषदो के रचयिता थे। वे अच्छी तरह जानते थे कि ईश्वर सम्बन्धी प्राचीन धारणा अन्य सभी उन्नत नीति-संगत धारणा के साथ मेल नहीं खाती। वे पूरी तरह से जानते थे कि इन सब खण्डन करने वालों के भीतर ही अधिक सत्य है; वे पूरी तरह से जानते थे कि बौद्ध और नास्तिक लोग जो कुछ प्रचार करते हैं उसमें अनेक महान् सत्य हैं; किन्तु

माया और ईश्वरधारणा का क्रमविकास १२१

वे यह भी जानते थे कि जो लोग पहले के मतों से कोई सम्बन्ध न रख कर एक नया मत स्थापित करना चाहते है, जो लोग जिस सूत्र मे माला गुँथी हुई है उसी को तोड़ना चाहते हैं, जो शून्य के ऊपर नूतन समाज का गठन करना चाहते है वे पूरी तरह से असफल होंगे।

हम कभी भी किसी नूतन वस्तु का निर्माण नहीं कर सकते, हम केवल पुरानी वस्तुओ का स्थान परिवर्तन कर सकते है। बीज ही वृक्ष के रूप में परिणत हो जाता है, अतः हमे धैर्य के साथ शान्तिपूर्वक लोगों की सत्य की खोज मे लगी हुई शक्ति को ठीक तरह से चलाना होगा, और जो सत्य पहले ही से ज्ञात है उसी को पूर्ण रूप से जानना होगा। अतएव प्राचीन काल की इस ईश्वर सम्बन्धी धारणा को वर्तमान काल के लिए एकदम अनुपयुक्त कह कर उड़ाये बिना ही उन लोगो ने उसमे जो कुछ सत्य है उसका अन्वेषण आरम्भ किया; उसी का फल वेदान्त-दर्शन है। वे प्राचीन सभी देवताओं तथा जगत् के शासनकर्ता एक ईश्वर के मात्र से भी उच्चतर भावों का आविष्कार करने लगे—इसी प्रकार उन्होने जो उच्चतम सत्य आविष्कृत किया उसी को निर्गुण पूर्णब्रह्म नाम से पुकारते हैं—इसी निर्गुण ब्रह्म की धारणा मे उन्होंने जगत् के बीच में एक अखण्ड सत्ता को देख पाया।

“जिन्होंने इस बहुत्वपूर्ण जगत् में उस एक अखण्ड स्वरूप को देख पाया है, जो इस मर्त्य जगत् मे उस एक अनन्त जीवन को देख पाते हैं, जो इस जड़ता तथा अज्ञान से पूर्ण जगत् मे उसी एक स्वरूप को देख लेते हैं उन्हीं को चिरशान्ति मिलती है और किसी को नहीं।”

६. माया और मुक्ति

कवि कहते हैं कि “हम जिस समय जगत् में प्रवेश करते हैं उस समय अपने पीछे मानों एक हिरण्मय मेघजाल लेकर प्रवेश करते हैं।” किन्तु यदि सच पूछो तो हम मे से सभी इस प्रकार महिमामण्डित होकर संसार मे प्रवेश नहीं करते; हममें से बहुत से तो कुज्झटिका (कुहरे) की कालिमा अपने पीछे लेकर जगत् मे प्रवेश करते हैं, इसमें कोई सन्देह नहीं। हम लोग, हममें से सभी मानों युद्ध करने के लिये युद्धक्षेत्र मे प्रेरित कर दिये गये हैं। रोते रोते हमे इस जगत् मे प्रवेश करना होगा—यथासाध्य चेष्टा करके अपना मार्ग बनाना होगा—इस अनन्त जीवन-समुद्र में पीछे की ओर कोई चिन्ह तक न छोडकर मार्ग बनाना होगा—सम्मुख की ओर हम अग्रसर हो रहे है, पीछे अनन्त युग पड़े हैं, और सामने भी अनन्त युग पड़े हैं। इसी प्रकार हम चलते रहते है और अन्त मे मृत्यु आकर हमें इस क्षेत्र से अपसारित कर देती है—विजयी अथवा पराजित कुछ भी निश्चित नहीं है; यही माया है।

बालक के हृदय की आशा बलवती होती है। बालकों के विस्फारित नयनों के समक्ष समस्त जगत् मानों एक सुनहले चित्र के समान मालूम पडता है; वह समझता है कि मेरी जो इच्छा होगी वही होगा। किन्तु जैसे ही वह आगे बढ़ता है वैसे ही प्रत्येक पद पर प्रकृति वज्रदृढ प्राचीर के रूप मे उसका गतिरोध करके खड़ी हो

माया और मुक्ति १२३

जाती है। बारम्बार उस प्राचीर को भंग करने के उद्देश्य से वह वेग के साथ उसके ऊपर टक्कर मार सकता है। सारे जीवन भर जितना वह अग्रसर होता जाता है उतना ही उसका आदर्श उससे दूर होता चला जाता है—अन्त मे मृत्यु आ जाती है और सारा खेल समाप्त हो जाता है; यही माया है।

वैज्ञानिक उठे, महाज्ञान की पिपासा लिये। उनके लिये ऐसा कुछ भी नहीं है जिसका वे त्याग न कर सकते हों, कोई किसी प्रकार भी उन्हे निरुत्साह नहीं कर सकता। वे धीरे धीरे आगे बढ़ते हुये प्रकृति के एक के वाद एक गुप्त तत्त्वो का आविष्कार करते है—प्रकृति के अन्तस्तल मे से आभ्यन्तरीण गूढ रहस्यो का उद्घाटन करते हैं—किन्तु इसका उद्देश्य क्या है ? इस सब के करने का क्या उद्देश्य है ? हम इन वैज्ञानिकों का गौरव क्यों करे ? उन्हे कीर्त्ति क्यो मिले ? क्या प्रकृति मनुष्य जितना जान सकता है उससे अनन्त गुना अधिक नहीं जान सकती ? ऐसा होने पर भी क्या वह जड़ नहीं है ? जड़ का अनुकरण करने मे कौन सा गौरव है ? वज्र चाहे कितना ही विद्युत्शक्तिशाली क्यो न हो, प्रकृति उसे चाहे जितनी दूर उठाकर फेक सकती है। यदि कोई मनुष्य उसका शतांश भी कर सकता है तो हम उसे उठाकर आकाश मे पहुँचा देते है ! परन्तु यह सब किस लिये ? प्रकृति के अनुकरण के लिये, मृत्यु के, जड़त्व के, अचेतन के अनुकरण के लिये हम उसकी प्रशंसा क्यों करे ?

मध्याकर्षण शक्ति भारी से भारी पदार्थ को क्षण भर में खण्ड खण्ड कर फेक सकती है, फिर भी वह एक जड़ शक्ति है। जड़

१२४ ज्ञानयोग

१२४ ज्ञानयोग

के अनुकरण से क्या लाभ है ? तथापि हम सारे जीवन भर केवल इसी के लिये चेष्टा करते रहते हैं; यही माया है।

इन्द्रियाँ मनुष्य की आत्मा को बाहर खींच लाती हैं। मनुष्य उन स्थानो मे सुख और आनन्द की खोज कर रहा है जहाँ वह उन्हे कभी भी नहीं पा सकता। युगो से हम यह सीखते आ रहे है कि यह निरर्थक और व्यर्थ है; यहाँ हमे सुख नहीं मिल सकता, परन्तु हम सीख नही सकते ! अपने अनुभव के अतिरिक्त और किसी उपाय से हम सीख नही सकते। हम प्रयत्न करते है; हमे धक्का लगता है, फिर भी क्या हम सीखते है ? नहीं, फिर भी नही सीखते। पतंग जैसे दीपक की लौ पर जलते है उसी प्रकार हम इन्द्रियो में सुख की प्राप्ति की आशा से अपने को बार बार झोकते है। हम फिर लौटते है, ताजगी लेकर; इसी प्रकार चलता रहता है और अन्त मे असमर्थ होकर, धोखा खाकर हम मर जाते है; और यही माया है।

यही बात हमारी बुद्धि के सम्बन्ध मे भी है। हम जगत् के रहस्य की मीमांसा करने की चेष्टा करते है—हम इस जिज्ञासा, इस अनुसन्धान की प्रवृत्ति को बन्द नही रख सकते; किन्तु हम लोगो को यह जान लेना चाहिये कि ज्ञान प्राप्तव्य वस्तु नहीं है—कुछ पद अग्रसर होते ही अनादि अनन्त काल का प्राचीर बीच मे व्यवधान के रूप मे आ खडा होता है जिसे हम लाँघ नहीं सकते। कुछ दूर बढ़ कर अनादि देश का व्यवधान आकर खड़ा हो जाता है जिसे अतिक्रमण नहीं कर सकते; सभी कुछ अनतिक्रमणीय हो कर हम हम कार्यकारण रूपी दीवार की सीमा से बद्ध है। हम इसे लाँघ कर आगे नहीं जा

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सक्ने। तो भी हम चेष्टा करते रहते है। चेष्टा हमे करनी ही पड़ेगी; यही माया है।

प्रत्येक साँस मे, हृदय की प्रत्येक धड़कन मे, अपनी प्रत्येक गति मे हम समझते है कि हम स्वतन्त्र हैं, और उसी क्षण हम देखते है कि हम स्वतन्त्र नही है। क्रीत दास—हम प्रकृति के क्रीत दास है—शरीर, मन तथा सभी चिन्ताओ एवं सभी भावो मे हम प्रकृति के क्रीत दास है; यही माया है।

ऐसी एक भी माता नही है जो अपनी सन्तान को अद्भुत शिशु—महापुरुष नही समझती है। वह उसी बालक को लेकर पागल हो जाती है, उसी बालक के ऊपर उसके प्राण पडे रहते है। बालक बडा हुआ—शायद् बिलकुल शराबी और पशुतुल्य हो गया—जननी के प्रति बुरा व्यवहार तक करने लगा। जितना ही उसका दुर्व्यवहार बढता है उतना ही जननी का प्रेम भी बढ़ता है। लोग इसे जननी का नि.स्वार्थ प्रेम कह कर खूब प्रशंसा करते है—उनके मन मे प्रश्न भी नही उठता कि वह माता जन्म भर के लिये केवल एक क्रीत दासी के समान है—वह प्रेम किये बिना रह ही नही सकती। हजारो बार उसकी इच्छा होती है कि वह इस मोह का त्याग कर देगी, किन्तु वह कर ही नही सकती। अतः वह इसे सुन्दर पुष्पों से सजा कर उसी को अद्भुत प्रेम कह कर व्याख्या करती है; यही माया है।

हम सब का यही हाल है। नारद ने एक दिन श्रीकृष्ण से पूछा, “प्रभो, आपकी माया कैसी है, मै देखना चाहता हूँ।” कई दिन के बाद श्रीकृष्ण नारद को लेकर एक जंगल मे गये। बहुत दूर जाने के बाद श्रीकृष्ण नारद से बोले—“नारद, मुझे बड़ी प्यास लगी है।

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ज्ञानयोग

क्या कहीं से थोडा जल लाकर पिला सकते हो ?”। नारद बोले— “प्रभो, कुछ देर ठहरिये, मै अभी जल लेकर आता हूँ।” यह कह कर नारद चले गये। कुछ दूर पर एक गाँव था, नारद वहीं जल की खोज करने लगे। एक मकान के द्वार पर पहुँच कर उन्होंने खटखटाया। द्वार खुला और एक परम सुन्दरी कन्या उनके सम्मुख आकर खड़ी हुई। उसे देखते ही नारद सब कुछ भूल गये। भगवान उनकी प्रतीक्षाकर रहे होगे,वे प्यासे होगे,हो सकता है प्यास से उनका प्राण-वियोग भी हो जाय—ये सभी बाते नारद भूल गये। सब कुछ भूल कर वे उसी कन्या के साथ बातचीत करने लगे, धीरे धीरे एक दूसरे के प्रति प्रणयभाव उत्पन्न होने लगा। तब फिर नारद उस कन्या के पिता के पास जाकर उसके साथ विवाह करने के लिये प्रार्थना करने लगे—विवाह भी हो गया और वे उसी गाँव में रहने लगे—धीरे धीरे उनके सन्तति भी होने लगी। इसी तरह रहते रहते बारह वर्ष बीत गये। नारद के ससुर भी मर गये और उनकी सम्पत्ति के नारद उत्तराधिकारी हो गये और पुत्र कलत्र, भूमि, पशु, सम्पत्ति, गृह आदि को लेकर नारद खूब स्वच्छन्दता पूर्वक सुख से रहने लगे। अन्त मे उन्हे यह बोध होने लगा कि वे खूब सुखी है। इसी समय उस देश मे बाढ आई। एक दिन रात के समय नदी दोनों तटों को तोड़कर बहने लगी और सम्पूर्ण गाँव डूब गया। मकान सब गिरने लगे; मनुष्य, पशु, पक्षी, सब बह बह कर डूबने लगे, नदी की धार में सभी कुछ बहने लगा। नारद को भी भागना पड़ा। एक हाथ से उन्होने स्त्री को पकडा, दूसरे हाथ से दो बच्चों को, और एक बालक को कन्धे पर बिठा कर उस भयङ्कर नदी को पार करने की चेष्टा करने लगे।

माया और मुक्ति १२७

कुछ दूर जाने के बाद ही लहरों का वेग बढ़ने लगा। कन्धे पर बैठे हुये शिशु की नारद किसी प्रकार रक्षा न कर सके; वह गिर कर तरंगो मे बह गया। निराशा और दुख से नारद चीत्कार कर उठे। उसकी रक्षा करने को जाते ही और एक बालक, जिसका हाथ वे पकडे हुये थे, हाथ से छूट डूब कर मर गया। अपनी पत्नी को वे अपने शरीर की समस्त शक्ति लगा कर पकडे हुये थे, अन्त में तरंगो के वेग से पत्नी भी उनके हाथ से छूट गई और वे स्वयं तट पर गिर कर मिट्टी मे लोटपोट होने लगे और बड़े कातर स्वर मे विलाप करने लगे। इसी समय मानो किसी ने उनकी पीठ पर कोमल हाथ रख कर कहा—"वत्स, कहाँ, जल कहाँ है? तुम जल लेने गये थे, मैं तुम्हारी प्रतीक्षा मे हूँ। तुम्हें गये हुये आधा घण्टा हुआ।" आध घण्टा! नारद के लिये तो बारह वर्ष बीत चुके थे! और आध घण्टे के भीतर ही ये सब दृश्य उनके मन के अन्दर से निकल गये—यही माया है! किसी न किसी रूप मे हम सब इसी माया के भीतर रहते हैं। यह बात समझना बड़ा कठिन है—विषय भी बड़ा जटिल है। इसका क्या तात्पर्य है? तात्पर्य यही है कि—यह बात बड़ी भयानक है—सभी देशों में महापुरुषो ने इसी तत्व का प्रचार किया है, सभी देशो के लोगों ने यही शिक्षा प्राप्त की है, किन्तु बहुत कम लोगों ने इस पर विश्वास किया है; उसका कारण यही है कि स्वयं बिना भोगे हुये, बिना ठोकर खाये हुये हम इस पर विश्वास नहीं कर सकते। सच पूछिये तो सभी वृथा है, सभी मिथ्या है।

सर्व-संहारक काल आकर सब को ग्रास कर लेता है, कुछ भी नहीं छोड़ता। वह पाप को खा जाता है, पापी को भी खा जाता है,

१२८ ज्ञानयोग

१२८ ज्ञानयोग

वह राजा को, प्रजा को, सुन्दर को, कुत्सित को—सभी को खा डालता है, किसी को भी नहीं छोड़ता। सभी कुछ उस चरम गति—विनाश-की ओर अग्रसर हो रहा है। हमारा ज्ञान, शिल्प विज्ञान—सभी कुछ उसी एक अनिवार्य गति मृत्यु की ओर अग्रसर हो रहा है। कोई भी इस तरंग की गति को नहीं रोक सकता, कोई भी इस विनाशाभिमुखी गति को एक क्षण के लिये भी रोक कर रख नहीं सकता। हम उसे भूले रहने की चेष्टा कर सकते हैं, जैसे किसी देश मे महामारी फैलने पर शराब, नाच, गान आदि व्यर्थ की चेष्टाये करके लोग सब कुछ भूलने की चेष्टा करते हुये लकवा मारे हुये मनुष्य की भाँति गतिशक्तिरहित हो जाते हैं। हम लोग भी इसी प्रकार इस मृत्यु की चिन्ता को भूलने की अति कठोर चेष्टा कर रहे हैं—सभी प्रकार के इन्द्रियसुखों के द्वारा उसे भूलने की चेष्टा कर रहे हैं किन्तु इससे उसकी निवृत्ति नहीं होती।

लोगों के सामने दो मार्ग हैं। इनमे से एक सभी जानते हैं—वह यह है—"जगत् मे दुःख है, कष्ट है, सब सत्य है किन्तु इस सम्बन्ध मे बिल्कुल सोचना नहीं चाहिये। 'यावज्जीवेत्सुखं जीवेत् ऋणं कृत्वा घृतं पिबेत्।' दुःख अवश्य है किन्तु उधर नज़र मत डालो। जो थोडा बहुत सुख मिले उसे भोग कर लो, इस संसार-चित्र के अन्धकारमय अंश को मत देखो—केवल प्रकाशमय अंश की ओर देखो।" इस प्रकार के विचारों मे कुछ सत्य तो अवश्य है किन्तु इस मे भयानक विपत्ति की आशंका भी है। इसमें सत्य इतना ही है कि यह हमे कार्य मे प्रवृत्त रखता है। आशा एवं इसी प्रकार का एक प्रत्यक्ष आदर्श हमे कार्य मे प्रवृत्त और उत्साहित करता है

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अवश्य, किन्तु इसमे यह एक विपत्ति है कि अन्त मे हताश होकर सब चेष्टाये छोड़ देनी पडती है। जो लोग कहते है—" संसार को जैसा देखते हो वैसा ही ग्रहण करो; जितनी दूर तक स्वच्छन्द रह सकते हो, रहो 'समस्त दुःख, कष्ट आने पर भी सन्तुष्ट रहो; आघात होने पर भी कहो कि यह आघात नहीं; पुष्पवृष्टि है; दास के समान परिचालित होने पर भी कहो—'मै मुक्त हूँ, स्वाधीन हूँ' दूसरों के तथा अपनी आत्मा के सम्मुख दिन रात मिथ्या बोलो, क्योंकि संसार में रहने का, जीवित रहने का यही एक मात्र उपाय है, "—ऐसे लोग बाध्य होकर ही अन्त मे ऐसा करते है। इसी को पक्का सांसारिक ज्ञान कहते है और इस उन्नीसवीं शताब्दी में यह ज्ञान जितना साधारण है उतना साधारण कभी भी नहीं था; इसका कारण यही है कि लोग इस समय जो चोटे खा रहे है ऐसी चोटें उन्होने पहले कभी नहीं खाई थीं, प्रतिद्वन्द्विता भी इतनी तीव्र पहले कभी नहीं थी; इस समय मनुष्य अपने दूसरे भाइयों के प्रति जितना निष्ठुर है उतना पहले कभी नही था, और इसीलिये आज कल यह सान्त्वना दी जाती है। आज कल यह उपदेश ही अधिकतर दिया जाता है, किन्तु इस उपदेश से अब कोई फल नहीं होता; कभी भी नहीं होता। गले हुये शव को फूलो से ढक कर कब तक रखा जा सकता है। असम्भव कब तक चल सकता है ? एक दिन ये सब फूल उड जायेंगे, तब यह शव पहले से भी अधिक वीभत्स रूप मे दिखेगा। हमारा समस्त जीवन ही ऐसा है। हम अपने पुराने सड़े घाव को स्वर्ण के वस्त्र से ढक देने की चेष्टा कर सकते हैं किन्तु एक दिन आयेगा जब वह स्वर्णवस्त्र खिसक पड़ेगा और वह घाव अत्यन्त वीभत्स रूप मे हमारे सम्मुख प्रकाशित होगा। तब क्या कोई

१३० ज्ञानयोग

आशा नहीं है ? यह बात सत्य है कि हम सभी माया के दास हैं, हम सभी माया के अन्दर ही जन्म लेते हैं और माया मे ही हम जीवित रहते हैं ।

तब क्या कोई उपाय नहीं है, कोई आशा नहीं है ? यह बात कि हम सब अतीव दुर्दशा मे पड़े हैं, यह जगत् वास्तव में एक कारागार है, हमारी पूर्वप्राप्त महिमा की छटा भी एक कारागार है, हमारी बुद्धि और मन भी एक कारागार के समान है, ये सब बातें सैकड़ो युगो से लोगो को मालूम हैं । मनुष्य चाहे जो कुछ कहें, ऐसा कोई भी व्यक्ति नहीं है जो किसी न किसी समय इस बात को हृदय से अनुभव न करता हो । बुड्ढे लोग इसको और भी तीव्रता के साथ अनुभव करते हैं, क्योकि उनकी जीवन भर की सञ्चित अभि-ज्ञता रहती है, प्रकृति की मिथ्या भाषा उन्हें अधिक ठग नहीं सकती । इस बन्धन को तोड़ने का क्या उपाय है ? क्या इसे तोड़ने का कोई उपाय नहीं है ? हम देखते हैं कि यह भयंकर व्यापार, यह बन्धन हमारे सामने, पीछे, चारों ओर रहने पर भी. इसी दुःख और कष्ट के बीच, इसी जगत् में जहाँ जीवन और मृत्यु का एक ही अर्थ है, यहाँ भी एक महावाणी सभी युगों मे, सभी देशो में, सभी व्यक्तियो के हृदय के भीतर से मानो उठ रही है—

“ दैवी ह्येषा गुणमयी मम माया दुरत्यया ।
मामेव ये प्रपद्यन्ते मायामेतां तरन्ति ते ॥ ”

“ मेरी यह दैवी त्रिगुणमयी माया बड़ी मुश्किल से पार की जाती है । जो मेरी शरण में आते हैं वे इस माया के पार हो जाते हैं ।” “ हे