कालिका पुराण (सटीक हिन्दी अनुवाद सहित)
Kalika Purana with Hindi Translation
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: कल्याण मन्दिर प्रयाग · कल्याण मन्दिर प्रयाग (उद्गम)
४४२ ॐ श्रीकालिका पुराण ॐ भावार्थ-तुम सुरापान से मस्त रहती हो तथा अपने भक्तों पर कृपा बिखेरती हो, जप-ध्यान-पूजा रूपी अमृत से निर्मल तथा पवित्र हृदय से तुम्हारा अविर्भाव सुशोभित होता है। तुम्हारे इस स्वरूप को देखता भी नहीं जानते हैं ॥४॥ चिदानन्दकन्दं हंसन्मन्दमन्दं, शरच्चन्द्र कोटिप्रभापुञ्जबिम्बम्। मुनीनां कवीनां हृदि द्योतमानं, स्वरूपं त्वदीयं न विन्दन्ति देवाः ॥५॥ भावार्थ-तुम चिदानन्द की मूल, मन्द-मन्द मुस्काने वाली, करोड़ों शरद् चन्द्रमाओं की प्रभा से युक्त मुख वाली एवं मुनियों तथा कवियों के हृदय को प्रकाशित करने वाली हो। तुम्हारे इस स्वरूप को देवता भी नहीं जानते हैं। महामेघकाली सुरक्ताऽपि शुभ्रा, कदाचिद्विचित्रा कृतिर्योगमाया। न बाला न वृद्धा न कामातुराऽपि, स्वरूपं त्वदीयं न विन्दन्ति देवाः ॥६॥ भावार्थ-तुम महामेघों के समान कृष्णवर्णा, रक्तवर्णा तथा शुभ्रवर्णा भी हो। तुम कभी-कभी विचित्र आकृति को धारण करने वाली योगमाया हो। तुम न बाला हो, न वृद्धा हो और न कामातुरा हो। तुम्हारे स्वरूप को देवता भी नहीं जानते हैं ॥६॥ क्षमास्वापराधं महागुप्तभावं, मयालोकमध्ये प्रकाशीकृतं यत्। तव ध्यानपूतेन चापल्यभावात्, स्वरूपं त्वदीयं न विन्दन्ति देवाः ॥७॥ भावार्थ-मैंने तुम्हारे ध्यान से पवित्र चापल्यभाव से तुम्हारे अत्यन्त गुप्त भाव को जो संसार में प्रकट कर दिया है, उस अपराध के लिए तुम मुझे क्षमा करो। तुम्हारे इस स्वरूप को देखता भी नहीं जानते हैं ॥७॥
ॐ श्रीकालिका पुराण ॐ ४४३ यदि ध्यान युक्तं पठेद्यो मनुष्य,- स्तदा सर्वलोके विशालो भवेच्च । गृहे चाष्टसिद्धिर्मृते चापि मुक्तिः स्वरूपं त्वदीयं न विन्दन्ति देवाः ॥८॥ भावार्थ-जो मनुष्य ध्यान युक्त होकर इस अष्टक का पाठ करता है, वह सम्पूर्ण संसार में उच्चपद प्राप्त करता है । उसके घर में आठों सिद्धियाँ बनी रहती हैं तथा मृत्यु के पश्चात् मुक्ति प्राप्त होती है । हे देवि ! तुम्हारे इस स्वरूप को देवता भी नहीं जानते हैं ॥८॥ ॥ इति श्री मच्छंकराचार्य विरचितं श्रीकालिकाष्टम् समाप्तम् ॥ श्री काली स्तुति या कालिका रोगहरा सुवंद्या वैश्यैः समस्तै व्यवहारदक्षैः । जनैर्जनानां भयहारिणी च सा देवमाता मयि सौख्यदात्री ॥१॥ या माया प्रकृतिः शक्तिश्चण्डमुण्ड विमर्दिनी । सा पूज्या सर्वदेवैश्च ह्यस्माकं वरदाभव ॥२॥ विश्वेश्वरी त्वं परिपासि विश्वं विश्वात्मिका धारयसीति विश्वम् । विश्वेशवन्द्याभवती भवन्ति विश्वाश्रया ये त्वयि भक्तिनम्राः ॥३॥ देवि प्रपन्नार्तिहरे प्रसीद मातर्जगतोऽखिलस्य । प्रसीद विश्वेश्वरी पाहि विश्वं त्वमीश्वरी देवि चराचरस्य ॥४॥ या श्रीः स्वयं सुकृतिनां भवनेष्वलक्ष्मीः पापत्मनां कृतिधियां हृदयेषु बुद्धि । श्रद्धां सतां कुलजन प्रभवश्य लज्जा तां त्वां नताः स्मरपरिपालय देवि विश्वम् ॥५॥
४४४ ❡ श्रीकालिका पुराण ❡ श्रीकाली चालीसा दोहा-जय काली जगदम्ब जय, हरनि ओघ अघ पुंज । वास करहु निज दास के, निशदिन हृदय-निकुंज ॥ जयति कपाली कालिका, कंकाली सुख दानि । कृपा करहु वरदायिनी, निज सेवक अनुमानि ॥ जय जय जय काली कंकाली । जय कपालिनी, जयति कराली ॥ शंकर प्रिया, अपर्णा, अम्बा । जय कपर्दिनी, जय जगदम्बा ॥ आर्या, हला, अम्बिका, माया । कात्यायनी उमा जगजाया ॥ गिरिजा गौरी दुर्गा चण्डी । दाक्षाणायिनी शाम्भवी प्रचंडी ॥ पार्वती मंगला भवानी । विश्वकारिणी सती मृडानी ॥ सर्वमंगल शैल नन्दिनी । हेमवती तुम जगत वन्दिनी ॥ ब्रह्माचारिणी कालरात्रि जय । महारात्रि जय मोहरात्रि जय ॥ तुम त्रिमूर्ति रोहिणी कालिका । कूष्माण्डा कार्तिकी चण्डिका ॥ तारा भुवनेश्वरी अनन्या । तुम्हीं छिन्नमस्ता शुचिधन्या ॥ धूमावती षोडशी माता । बगला मातंगी विख्याता ॥ तुम भैरवी मातु तुम कमला । रक्तदन्तिका कीरति अमला ॥ शाकम्भरी कौशिकी भीमा । महातमा अग जग की सीमा ॥ चन्द्रघण्टिका तुम सावित्री । ब्रह्मवादिनी माँ गायत्री ॥ रुद्राणी तुम कृष्ण पिंगला । अग्निज्वाला तुम सर्वमंगला ॥ मेघस्वना तपस्विनि योगिनी । सहस्त्राक्षि तुम अगजन भोगिनी ॥ जलोदरी .सरस्वती डाकिनी । त्रिदशेश्वरी अजेय लाकिनी ॥ पुष्टितुष्टि धृति स्मृति शिव दूती । कामाक्षी लज्जा आहूती ॥ महोदरी कामाक्षि हारिणी । विनायकी श्रुति महा शाकिनी ॥ अजा कर्ममोही ब्रह्मणी । धात्री बाराही शर्वाणी ॥ स्कन्द मातु तुम सिंह वाहिनी । मातु सुभद्रा रहहु दाहिनी ॥ नाम रूप गुण अमित तुम्हारे । शेष शारदा बरणत हारे ॥ तनु छवि श्यामवर्ण तव माता । नाम कालिका जग विख्याता ॥ अष्टदश तव भुजा मनोहर । तिनमहं अस्त्र विराजत सुंदर ॥ शंख चक्र अरु गदा सुहावन । परिघ भुशुण्डी घण्टा पावन ॥ शूल बज्र धनुबाण उठाये । निशिचर कुल सब मारि गिराये ॥ शुंभ निशुंभ दैत्य संहारे । रक्तबीज के प्राण निकारे ॥
൏ श्रीकालिका पुराण ൏ ४४५ चौंसठ योगिनी नाचत संगा। मद्यपान कीन्हेउ रण गंगा ॥ कटि किंकिणी मधुर नूपुर धुनि। दैत्यवंश कांपत जेहि सुनि-सुनि ॥ कर खप्पर त्रिशूल भयकारी। अहै सदा सन्तन सुखकारी ॥ शव आरूढ़ नृत्य तुम साजा। बाजत मृदंग भेरि के बाजा ॥ रक्त पान अरिदल को कीन्हा। प्राण तजेउ जो तुम्हिं न चीन्हा ॥ लपलपति जिह्वा तव माता। भक्तन सुख दुष्टन दुःख दाता ॥ लसत भाल सेंदुर को टीको। बिखरे केश रूप अति नीको ॥ मुंडमाल गल अतिशय सोहद। भुजामाल किंकण मनमोहत ॥ प्रलय नृत्य तुम करहु भवानी। जगदम्बा कहि वेद बखानी ॥ तुम मशान वासिनी कराला। भजत तुरत काटहु भवजाला ॥ बावन शक्ति पीठ तव सुन्दर। जहाँ बिराजत विविध रूप धर ॥ विन्ध्यवासिनी कहूँ बड़ाई। कहूँ कालिका रूप सुहाई ॥ शाकम्भरी बनी कहूँ ज्वाला। महिषासुर मर्दिनी कराला ॥ कामाख्या तव नाम मनोहर। पुजवहिं मनोकामना द्रुततर ॥ चंड मुंड वध छिन महं करेउ। देवन के उर आनन्द भरेउ ॥ सर्व व्यापिनी तुम माँ तारा। अरिदल दलन लेहु अवतारा ॥ खलबल मचत सुनत हुँकारी। अगजग व्यापक देह तुम्हारी ॥ तुम विराट रूपा गुणखानी। विश्व स्वरूपा तुम महारानी ॥ उत्पति स्थिति लय तुम्हरे कारण। करहु दास के दोष निवारण ॥ माँ उर वास करहू तुम अंबा। सदा दीन जन की अवलंबा ॥ तुम्हरो ध्यान धरै जो कोई। ता कहँ भीति कतहूँ नहिं होई ॥ विश्वरूप तुम आदि भवानी। महिमा वेद पुराण बखानी ॥ अति अपार तव नाम प्रभावा। जपत न रहत रंच दुःख दावा ॥ महाकालिका जय कल्याणी। जयति सदा सेवक सुखदानी ॥ तुम अनन्त औदार्य विभूषण। कीजिये कृपा क्षमिये सब दूषण ॥ दास जानि निज दया दिखाबहु। सुत अनुमानित सहित अपनावहु ॥ जननी तुम सेवक प्रति पाली। करहु कृपा सब विधि माँ काली ॥ पाठ करै चालीसा जोई। तापर कृपा तुम्हारी होई ॥ दोहा:- जय तारा जय दक्षिणा, कलावती सुखमूल । शरणागत 'राजेश' है, रहहु सदा अनुकूल ॥ ॥ इति काली चालीसा समाप्त ॥
४४६ ॐ श्रीकालिका पुराण ॐ आरती : श्रीकाली जी की मंगल की सेवा सुन मेरी देवा, हाथ जोड़ तेरे द्वार खड़े । पान सुपारी ध्वजा नारियल, ले ज्वाला तेरी भेंट करें ॥ सुन जगदम्बा कर न विलम्बा, सन्तन के भण्डार भरें । सन्तन प्रतिपाली सदा खुशहाली, जय काली कल्याण करें ॥१॥ 'बुद्धि' विधाता तू जगमाता, मेरा कारज सिद्ध करें । चरण कमल का लिया आसरा, शरण तुम्हारी आन पड़े ॥ जब जब भीड़ पड़े भक्तन पर, तब तब आप सहाय करें । सन्तन प्रतिपाली सदा खुशहाली, जय काली कल्याण करें ॥२॥ 'गुरु' के वार सकल जग मोहे, तरुणी रूप अनूप धरे । माता होकर पुत्र खिलावै, कहीं भार्या होकर भोग करें ॥ 'शुक्र' सुखदाई सदा सहाई, सन्त खड़े जय कार करें । सन्तन प्रतिपाली सदा खुशहाली, जय काली कल्याण करें ॥३॥ ब्रह्मा, विष्णु, महेश फल लिए, भेंट देन सब द्वार खड़े । अटल सिंहासन बैठी माता, सिर सोने का छत्र धरे ॥ वार 'शनिचर' कुमकुम वरणी, जब लुंगड़ पर हुक्म करे । सन्तन प्रतिपाली सदा खुशहाली, जय काली कल्याण करे ॥४॥ खडग खप्पर त्रिशूल हाथ लिये, रक्तबीज को भस्म करे । शुम्भ निशुम्भ क्षणहि में मारे, महिषासुर को पकड़ दरे ॥ 'आदित' वारी आदि भवानी, जन अपने का कष्ट हरे । सन्तन प्रतिपाली सदा खुशहाली, जय काली कल्याण करे ॥५॥