कालिका पुराण (सटीक हिन्दी अनुवाद सहित)
Kalika Purana with Hindi Translation
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: कल्याण मन्दिर प्रयाग · कल्याण मन्दिर प्रयाग (उद्गम)
൵७२ श्रीकालिका पुराण ७२൵ ६७ बाहिर सब पार्श्व में और सभी ओर आछन्न हो गया था। सात सागरों के मान से जैसे नदी आदि के मान से ब्रह्माण्ड के अन्दर जल है उसी तरह से उसके अन्दर यह भगवान् विष्णु स्वयं ही ब्रह्मा के रूप के धारण करने वाले हैं। एक वर्ष तक निवास करके ही मैंने उस अण्ड का भेदन किया था। हे महेश्वर! उससे इसमें मेरु हुआ था। उस जल से जरायु पर्वत हुए और सात समुद्र हुए था। उसके मध्व में गन्ध की तन्मात्रा से पृथ्वी समुत्पन्न हुई थी। ईश्वर के द्वारा और प्रवृत्ति से वह त्रिगुणात्मिका ज्योति की थी। पहले ही पर्वत आदि से वसुन्धरा समुत्पन्न हुई थी। ब्रह्माण्ड के खण्ड के संयोग से वह अत्यन्त दृढ़ हो गई थी। उसमें ही सब लोकों के गुरु ब्रह्माजी स्वयं संस्थित हैं। तब ही से सब लोकों के गुरु ब्रह्माजी स्वयं संस्थित हैं। जब ब्रह्माजी ब्रह्माण्ड के मध्य में स्थित थे तो वह व्यक्त नहीं हुए थे। उसी समय में रूप की तन्मात्रा से भली-भाँति तेज उत्पन्न हुआ था। प्रकृति के द्वारा विनियोतिज स्पर्श तन्मात्रा से वायु उत्पन्न हुआ था जो वायु सभी ओर से समस्त प्राणियों का प्राणभूत हुआ था। अतुल जलों से, तेजों से, वायुओं से तथा नभ से उस अण्ड के अन्दर और बाहर व्याप्त था और गर्भ में गमन करने वाला था। इसके अनन्तर महेश्वर ने ब्रह्मा के शरीर को तीन भागों में विभक्त कर दिया था। हे शम्भो! स्वभाव की इच्छा के वश से त्रिगुण त्रिगुणीकृत हो गया। उसका जो उर्ध्वभाग था चतुर्मुख और चतुर्भुज हो गया था। पद्म केशर के समान और रंग काया वाला ब्रह्म महेश्वर था। उसका जो मध्य भाग था वह नीले अंगों वाला, एक मुख से युक्त चार भुजाओं वाला था। शंख, चक्र, गदा और पद्म हाथों में लिए हुए वह काम वैष्णव था। उसका अधोभाग पाँच मुखों से समन्वित, चार भुजाओं वाला था। वह स्फटिक के तुल्य शुक्ल था और वह काम चन्द्रशेखर था। इधर-उधर ब्रह्म के कार्य में सृष्टि की शक्ति नियोजित किया था और वह लोकभूत ब्रह्म के रूप से सृष्टा हो गया था। महेश ने वैष्णव
६८ ॐ श्रीकालिका पुराण ॐ काम में अपनी ज्ञान की शक्ति को महेश्वर में ही स्थिति अर्थात् पालन का करने वाला विष्णु हो गया था। सर्वशक्तियों के नियोग से मेरा सदा ही तद्रूपता है। वही परमेश्वर संहार करने वाले शम्भु हो गये थे। इनका वे फिर तीनों शरीरों में अर्थात्-ब्रह्मा, विष्णु, शिव इन तीनों में वह स्वयं ही प्रकाश किया करते हैं। ज्ञानरूप परमात्मा भगवान् प्रभु अनादि हैं। सृजन, पालन और संहार के करने से एक ही हैं। वही ब्रह्मा, विष्णु और महेश पृथक्-पृथक् नहीं हैं। इस प्रकार से शरीर, रूप और ज्ञान हमारा अन्तर होता है। मार्कण्डेय महर्षि ने कहा-इस प्रकार से शिव भगवान् ने उन अमित तेज वाले भगवान् विष्णु के वचन का श्रवण करके अतिरेक से विकसित मुख वाले होकर पुनः जनार्दन प्रभु से बोले-यदि ज्योति स्वरूप वाला और निरञ्जन महेश ही है, कौन सी माया है अथवा कौन काल है अथवा कौन प्रकृति कही जाया करती है? कौन से पुरुष उनसे भिन्न-अभिन्न हैं यदि ऐसा है तो फिर एकता किस रीति से होती हैं? हे गोविन्द! उनके प्रभाव को मुझे बतलाइए। श्री भगवान् ने कहा-आप ही सदा ध्यान में समवस्थित होकर परमेश्वर को देखा करते हैं जो आत्मा में आत्मस्वरूप हैं और वह ज्योति के रूप वाला सहक्षर है। हे विभो! माया को, प्रकृति को, काल को और पुरुष को आप स्वयं जानने वाले हैं जब आप ध्यान का भोग करते हैं तो उसी के द्वारा ज्ञाता हैं। इसीलिए आप ध्यान में तत्पर हो जाइए क्योंकि इस समय में आप हमारी माया से मोहित हो रहे हैं। इसी कारण से आप निश्चय ही परम ज्योति का विस्मरण करके वनिता में निरत हो रहे हैं। अब आप कोप से युक्त हैं अतएव कोप को भूलकर हे प्रथमों के स्वामिन्! प्रकृति के आदिरूप जिसको आप पूछ रहे हैं। मार्कण्डेय महर्षि ने कहा-फिर तो वहाँ पर महादेवजी ने इस परम सुनिश्चित वाक्य का श्रवण करके समस्त मुनियों के देखते हुए ये योग से युक्त होकर ध्यान में परायण हो गये थे। इस समय में बन्ध का आसाद न करके विर्निमीलित लोचनों वाले महेश्वर ने सब आत्मा का
चिन्तन किया था। परमपुरुष का चिन्तन करते हुए उनका शरीर बहुत अधिक कान्तियुक्त होकर चमक रहा था। तेज से उज्ज्वल उनको देखने के लिए उस समय में मुनिगण भी समर्थ नहीं हुए थे। उसी क्षण में जब ये शम्भु ध्यान से मुक्त हो गये तो भगवान् विष्णु की माया ने भी उनका परित्याग कर दिया था उस समय वे तप के तेज से अतीव उज्ज्वल एवं कान्तिमान् होकर चमक रहे थे। जो-जो भी गण उस अवसर पर सेवा करने के लिए शंकर के समीप में स्थित रहते थे वे सब भी उन शंकर अथवा दिवाकर के देखने में समर्थ नहीं थे अर्थात् उन्हें देख नहीं सकते थे। उस काल में स्वयं ही भगवान् विष्णु समाधि में मन लगाने वाले शिव के शरीर के अन्दर ज्योति के स्वरूप से प्रविष्ट हुए थे। उन शंकर ने जठर में प्रवेश करके जैसे पहले सृष्टि का क्रम था ठीक उसी भाँति स्वयं अव्यय नारायण ने दिखा दिया था। वह न तो स्थूल है और न सूक्ष्म ही हैं, न विशेषण के गोचर हैं, वह नित्य आनन्दरूप हैं, निरानन्दन हैं, एक हैं, शुद्ध हैं और इन्द्रियों की पहुँच के बाहर हैं वह अस्पृश्य हैं और सब का दृष्टा अर्थात् देखने वाला है, वह निर्गुण है, परमपद हैं, परमात्मा में गमन करने वाला आनन्द हैं और जगत् के कारण का भी कारण हैं। सबसे प्रथम शम्भु ने तत्स्वरूपी आत्मा को देखा था। वह पर प्रविष्ट हुए मन में बाहर के ज्ञान से विवर्जित उसी के रूप प्रकृति को जो सृष्टि की रचना के लिए भिन्नता को प्राप्त हुई थी। उसी के समीप एक उसको पृथक् भूत हुई की भांति देखा था। फिर इनमें जिस रीति से वास कर रहे पुरुषों को देखा था। हे द्विजसत्तमोँ! जैसे स्थूल अग्नि के कण से निरन्तर होवें। वह ही काल के रूप से बारम्बार भासित होता है। सृष्टि, पालन और अहंकार के योगों का अवच्छेद से कारण है। प्रकृति और पुरुष ही काल भी जो अभिन्न थे और सर्ग के लिए भिन्नता को प्राप्त हुए भी समान थे। इन सबको पृथक भूत और अभिन्न चन्द्रशेखर प्रभु ने देखा था। एक ही ब्रह्म है जो द्वैत से रहित और यहाँ पर कुछ भी नानारूप वाला नहीं है।
७० ॐ श्रीकालिका पुराण ॐ
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वह ही प्रधान रूप से और काल के स्वरूप से भासमान होता है तथा
पुरुष के रूप में संसार के लिए प्रवृत्त हुआ करता है।
भोग करने के लिए निरन्तर वह प्राणधारियों के शरीर में प्रवृत्तित
होता है। वह ही माया या प्रकृति हैं जो शंकर भगवान् को मोहित
करती है। वह ही हरि को और ब्रह्माजी को मोहयुक्त करती हैं। ठीक
उसी भाँति से आप अन्य जन्म वाले हैं। माया के नाम वाली प्रकृति
जात हुई और जन्तु को सम्मोहित भी किया करती है। वह सदा स्त्री
के स्वरूप से लक्ष्मीभूता हुई हरि भगवान् की प्रिया है। वह ही
सावित्री, रति, सन्ध्या, सती और वारिणी है। वह देवी स्वयं बुद्धि के
रूप वाली है जो चण्डिका इन नाम से गायन की जाया करती है। यह
ध्यान के मार्ग में गमन किए हुए भगवान् हर ने शीघ्र स्वयं ही देखा था।
महत्तत्व आदि के भेद से फिर सृष्टि के क्रम को स्वयं देखा था।
भगवान् ने काल-प्रकृति तथा पुरुषों को दिखलाकर हे द्विजोत्तभों! उसी
प्रकार से उनके शरीर को अन्य दिखलाया था।
हर कोप शमन वर्णन
मार्कण्डेय मुनि ने कहा-इसके अनन्तर भगवान् ने शम्भु के लिए
ब्रह्माण्ड का संस्थान दिखलाया था जिस प्रकार से पहले ब्रह्माण्ड जो
जल की राशि में स्थित होता हुआ बढ़ा था। उसके मध्य में पद्मगर्भ
की आभा वाले जगत् के पति ब्रह्मा को जो ज्योति के रूप वाला
प्रकाश के लिए और सृष्टि की रचना करने के लिए पृथक्गत है और
शरीरधारी को देखा था। फिर ब्रह्माण्ड के अन्तर्गत चार भुजाओं से
समन्वित ज्योतियों से प्रकाशित कमल पर आसन वाले को देखा था
और वहीं पर उन्होंने तीन भागों में स्थित वपु वाले ब्रह्मा को देखा था।
जो ऊर्ध्व, मध्य और अन्त भागों के द्वारा ब्रह्मा, विष्णु और शिव के
स्वरूप वाला था। जिस रीति से वायु का ऊर्ध्व भाग उस समय में
ब्रह्मत्व को प्राप्त हो गया था जो मध्य भाग था। वह एक ही शरीर तीन
भागों में बार-बार हर भगवान् ने अपने गर्भ में इस सम्पूर्ण जगत् को
൘൘ श्रीकालिका पुराण ൘൘ ७१ उसी भाँति देखा था। कदाचित् वैष्णवकाय अर्थात् विष्णु का शरीर ब्रह्मकाय में अर्थात् ब्रह्मा के शरीर में लय हो जाता है। किसी समय में ब्रह्म वैष्णव में तथा शाम्भव वैष्णवकाय लीन हो जाता है। तात्पर्य यह है कि कभी ब्रह्मा का शरीर विष्णु के शरीर में और शम्भु के शरीर में विष्णु का शरीर लय को प्राप्त हो जाया करता है। शम्भु का शरीर विष्णु के वपु में अथवा ब्रह्मा का वपु शम्भु के शरीर में लीनता को प्राप्त होता हुआ तथा बार-बार एकता को प्राप्त होने वाला शम्भु भगवान् ने देखा था। वामदेव की भिन्नता को अप्राप्त पृथक्गत परमात्मा में गमन करते हुए अर्थात् लीनता को प्राप्त होते हुए उसके वपु को स्वयं देखा था। शम्भु ने उसके मध्य में जल में वितत अर्थात् विस्तृत पृथ्वी को देखा था। जो महान् पर्वतों के संघातों से विरल है। फिर उन्होंने आदि से सर्ग की रचना करते हुए ब्रह्माजी को देखा था तथा अपने आपको पृथक्भूत और गरुड़ पर आसन वाले विष्णु को देखा था। वहाँ पर ही प्रजापति दक्ष को और उसी भाँति अपने गणों को, प्ररीचि आदि दशों को, वैरिणी को, सती, सन्ध्या, रति, कन्दर्प, वसन्त के सहित श्रृंगार, हावों को, भावों को, मारों को, ऋषियों को, देवों को, गरुड़ गणों को देखा था। मेघों को, चन्द्र, सूर्य, वृक्षगण, वल्ली और तृण, सिद्ध, विद्याधर, यक्ष, राक्षस और किन्नरों को देखा था। मनुष्यों को, भुजंगों को, ग्राह, मत्स्य, कच्छप, उल्का, निर्घात, केतुकों को, कृमि, कीट और पतंगों को देखा था। वहाँ पर किसी वनिता को देखा था जो द्वन्द्व भाव को कर रही थी। किसी को उत्पन्न, उत्पत्ति को प्राप्त होते हुए विपद्ग्रस्त को देखा था। कुछ लोगों को हास-विलास करते हुए और कुछ को विलाप करते हुए तथा कुछ दौड़ लगाते हुओं को परमेश्वर ने देखा था जो कि शम्भु की ओर ही भाग रहे थे। कुछ लोग दिव्य अंलकारों से युक्त थे, कुछ माला और चन्दन से चर्चित हुए थे, कुछ लोग वीक्षा करते थे और कुछ पुनः शम्भु के साथ क्रीड़ित थे। कुछ लोग स्तुति कर रहे थे, कुछ शम्भु का स्तवन
करते हुए-विष्णु और ब्रह्मा का स्तवन करने वाले थे। उनके द्वारा कुछ मुनि और तपस्वी गण भी देखे गये थे। कुछ लोग नदी के तट पर तपोवन में तपस्या करते हुए देखे गये थे। कुछ लोग स्वाध्याय तथा वेदों में रत देखे गये थे और कुछ पढ़ाते हुए देखे गये थे। वहीं पर सात सागर, नदियाँ और देव सरोवर देखे गए थे। वही पर यह पर्वत पर स्थित थे, ऐसा स्वयं शम्भु के द्वारा देखा गया था। यह महालक्ष्मी के रूप से भगवान् हरि को पर्याप्त रूप से मोहित किया करती है। सती के स्वरूप वाली उसी भाँति आत्मा को अर्थात् अपने आप को मोहित करती हुई को शंकर ने देखा था। वे स्वयं सती के साथ मेरु पर्वत कैलाश में रमण करते थे तथा मन्दिर में देव विपिन में जो शृंगार रस से सेवित था। वह देवी सती के रूप का परित्याग करके हिमवान् की सुता होकर समुत्पन्न हुई थी। जिस प्रकार से पुनः उसने उन सती को प्राप्त किया था और जैसे अन्धक मारा गया था। जैसे कार्तिकेय समुत्पन्न हुए और जिस तरह से तारक नाम वाले का हनन किया था यह सब विस्तारपूर्वक भली-भाँति वृषभध्वज ने देखा था। जिस रीति से नरसिंह के स्वरूप धारण करने वाले के द्वारा हिरण्यकशिपु मारा गया था और जिस प्रकार से हिरण्याक्ष और कालनेमि नष्ट हुआ था तथा जैसे पहले किया हुआ दानवों के समुदाय के साथ विष्णु भगवान् के द्वारा युद्ध हुआ था तथा जो-जो भी वहाँ पर निहित हुए थे यह सभी कुछ भगवान् हर ने देखा था। जगत् के प्रपञ्चरूप ब्रह्मा आदि नक्षत्र ग्रह और मनुष्य, सिद्ध और विद्याधर आदि को पृथक-पृथक देख-देखकर ईश्वर शम्भु ने उन सबका संहार करते अपने आप को देखा था। इन्होंने फिर संहार के अन्त में ब्रह्मा, विष्णु, महेश्वरी को देखा था। यह सम्पूर्ण चर और अचरों से समन्वित जगत् शून्य हो गया था। इस समस्त शून्य जगत् में ब्रह्मा, विष्णु के शरीर में गमन करने वाले तथा शम्भु लीन होते हुए उसी के शरीर में प्रवेश कर गये थे। इन्होंने एक ही अव्यक्त रूप वाले विष्णु को देखा था और इन्होंने अन्य कुछ भी नहीं देखा था जो उस समय में विष्णु के बिना
ॐ श्रीकालिका पुराण ॐ ७३ होवें। इसके अनन्तर विष्णु भगवान् को देखा गया था। परमात्मा में लय को प्राप्त, भासमान पर तत्व, सनातन ज्योति के रूप वाले परमतत्व देखे गये थे। इसके अनन्तर ज्ञान से परिपूर्ण, नित्य, आनन्दमय, ब्रह्म से पर, केवल ज्ञान के द्वारा ही जानने के योग्य को देखा था और अन्य कुछ भी नहीं देखा था। परमात्मा में उस जगत् का एकत्व और पृथक्त्व अपने शरीर के अन्दर मर्ग, स्थित और संयमों को देखा था। प्रकाशरूप, शान्त, नित्य और इन्द्रियों की पहुँच से परे परमात्मा को देखा था कि ब्रह्मा एक ही पर है। जो अद्वय द्वैत से रहित है। इससे अतिरिक्त अन्य कुछ भी नहीं देखा था। कौन भगवान् विष्णु है, कौन ब्रह्मा है अथवा क्या यह जगत् है ? शम्भु के द्वारा परमात्मा का यह भेद ग्रहण नहीं किया गया था। इस प्रकार से देखते हुए उनके शरीर के सुन्दर से बाहर माया आदि निर्गत हुए थे और वृषभध्वज (शिव) में प्रवेश कर गए थे। जनार्दन प्रभु ने अनन्यत्व और पृथक्त्व दिखलाकर शम्भु के लिए उनके शरीर से शीघ्र ही फिर बाहर हो गये थे। इसके उपरान्त समाधि से परित्याग करने वाले चलित आत्मा से युक्त शिव का मन सती की ओर गया था जो शिवमाया से मोहित हो गये थे। हे द्विजोत्तमों! फिर भगवान् हर ने दाक्षायणी के मनोहर और विकसित कमल के आकार वाले मुख को देखा था। इसके आगे दक्ष, मारीचि आदि मुनियों को, अपने गणों को, कमलासन (ब्रह्मा) को और भगवान् विष्णु को वहाँ पर देखकर भगवान् शंकर अत्यन्त विस्मित हो गये थे। इसके अनन्तर विस्मय में स्मित (मन्द मुस्कराहट) से प्रफुल्लित मुख से संयुत वृषभध्वज महादेव से भगवान् जनार्दन ने कहा। श्री भगवान् ने कहा-हे शंकर! जो-जो भी आपने एकत्व में और भिन्नता में देखा और आपने तीनों देवों को स्वरूप जान लिया है। आपने अपने अन्तर में प्रकृति, पुरुष, काल और माया को अच्छी तरह से जान लिया है। हे महादेव! वे फिर किस प्रकार वाले हैं ? ब्रह्म एक ही हैं और वह शान्त, नित्य, परम महत् हैं। वह किस तरह से भिन्नता को प्राप्त हुआ और कैसा हैं यह आपने देख लिया है। मार्कण्डेय मुनि
ने कहा- इस रीति से भगवान् वृषभध्वज जब भगवान् विष्णु के द्वारा पूजे गये थे हे द्विजोत्तमों! हर ने हरि के लिए यह तथ्य वचन कहा था। ईश्वर ने कहा- एक शिव परमशान्त, अनन्त, अच्युत ब्रह्म हैं और उनसे अन्य ऐसा कुछ भी नहीं है उनसे अभिन्न सम्पूर्ण जगत् हरि के कला आदि रूप से सृष्टि की रचना का हेतु होता है। वह समस्त प्राणियों को प्रभव है और निरञ्जन है और हम सब उसके ही सदा अंश स्वरूप वाले हैं। सृष्टि, स्थिति (पालन) और संयमन (संहार) उसके द्वारा कथित भेद से तीनों रूप शोभित होते हैं। न तो मैं, न आप और न हिरण्यगर्भ, न कालरूप, न प्रकृति और उसकी प्रेरणा करने के लिए समर्थ है। यहाँ पर कुछ रूप के बिना भी उसका सत् भी है। श्री भगवान् ने कहा-हे वृषभध्वज! यह तत्व आपने कहा और जान लिया है। हम ब्रह्मा, विष्णु और पिनाकी (शिव) उसके अंशभूत ही हैं। इस कारण आपके द्वारा ब्रह्मा वध के योग्य नहीं हैं। यदि आपको एकता विदित है जो कि हे शम्भो! ब्रह्मा, विष्णु और पिनाकधारी शिव की होती है। मार्कण्डेय मुनि ने कहा-अपरिमित तेज के धारण करने वाले भगवान् विष्णु के इस वचन का श्रवण करके महादेव जी ने सबकी एक स्वरूपता को देखकर ब्रह्मा का हनन नहीं किया। भगवान् विष्णु ने जिस रीति से एकता को आदिष्ट किया था वह सब मैंने आपको बतला दिया है। शिव सती बिहार वर्णन मार्कण्डेय मुनि ने कहा-इसके अनन्तर मेघों के गर्जन करने पर श्री महादेवजी सती के पति के विष्णु भगवान् प्रभृति सबको विदा करके अथवा त्याग करके वे हिमवान पर्वत पर राज पर चले गए थे। उस परमाधिक आमोद की शोभा वाली सती को अपने अत्युन्नत वृषभ पर समारोपित कराके हिमालय के प्रस्थ को गमन किया था जिसमें परम रम्य कुञ्जों का समुदाय था। इसके उपरान्त वह सुन्दर दन्त-पंक्ति वाली चारुहार से समन्वित सती भगवान् शंकर के समीप शोभायमान
௹ श्रीकालिका पुराण ௹ ७५ हुई थी। वृषभ पर स्थित भी वह चन्द्र के मध्य में कलिका के समान ही थी। वे सब ब्रह्मा आदिक और मरीचि आदि मानस पुत्र, दक्ष प्रजापति भी सभी सुर और असुर परम प्रसन्न हुए थे अर्थात् उस अवसर पर सभी को अत्यन्त हर्ष हुआ था। जो सब भगवान् शंकर के साथ में गमन कर रहे थे। उनमें कुछ तो शंखों को बजा रहे थे और कुछ सुमंगल करने वाले तालों का वादन कर रहे थे। कुछ हास्य ही कर रहे थे। इसी रीति से सबने वृषभध्वज का अनुगमन किया था अर्थात् शिव के पीछे-पीछे गये थे फिर ब्रह्मा आदि भी सब शम्भु के द्वारा विदा कर दिए गए थे। वे सब परमाधिक आनन्द से कुछ दूर तक शिव की पीछे-पीछे गये थे। इसके उपरान्त ब्रह्मा आदि और मानस पुत्रों ने शम्भु के साथ सम्भाषण करके आशुगमन करने वाले रथों के द्वारा अपने-अपने आश्रमों को चले गये थे। समस्त देवगण, सिद्ध और उसी भाँति अप्सराओं के समुदाय और जो-जो भी वहाँ पर यक्ष, विद्याधर आदि समागत हुए थे वे सभी भगवान् हर के द्वारा बिना किए हुए अपने निवास स्थानों को चले गए थे तथा वृषभध्वज के द्वारा ग्रहण करने पर सभी आमोद से समन्वित हुए थे। इसके अनन्तर भगवान् शिव अपने गणों के सहित आनन्द देने वाले संस्थान पर पहुँचकर जो कि कैलाश गिरि के नाम वाला था। वहाँ पर शिव ने अपनी प्रिया को वृषभ ने नीचे उतार लिया था। फिर विरुपाक्ष प्रभु ने इस दाक्षायणी सती की प्राप्ति करके अपने गणों को जो नन्दी आदिक थे उस गिरि की कन्दरा से विदा कर दिया था। भगवान् शम्भु ने नन्दी आदि से बहुत ही मधुर वाणी में उन सबसे कहा था कि यहाँ पर जिस समय में भी मैं आप सबका स्मरण करूँ उसी समय में स्मरण से चलमानस वाले आप लोग मेरे समीप में तब-तब ही आगमन करेंगे। इस प्रकार से वामदेव के द्वारा कथन करने पर वे नन्दी भैरव आदिक सब हिमवान् गिरि पर चल रहे थे। उन सबके जाने पर भगवान् ईश्वर भी उस सती के साथ मोहित हो गये थे। हर भी एकान्त में प्रतिदिन उस दाक्षायणी के साथ चिरकाल पर्यन्त बहुत ही अधिक रमण करने वाले हो गये थे।
७६ ॐ श्रीकालिका पुराण ॐ ॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐ किसी समय में वन में स्वाभाविक रूप से समुत्पन्न हुए पुरुषों का समाहरण करके उनकी एक अतीव मन को हरण करने वाली सुन्दर माला की रचना करके उन्होंने सती के हार के स्थान में नियोजित किया था। किसी समय दर्पण में अपने मुख का अवलोकन करने वाली सती का अनुगमन करके भगवान् शम्भु भी अपने मुख को देखा करते थे। किसी समय उस सती के कुन्तलों को उल्लसित करके उल्लास में आए हुए शिव बाँधा करते थे तथा किसी प्रकार मोचन किया करते थे और बराबर उन केशों को काढ़ा भी करते थे अर्थात् कंघी भी काढ़ते थे। अनुराग में निमग्न हर इस सती के स्वाभाविक लालिमा लिए हुए दोनों चरणों को उज्ज्वल पावक के द्वारा निसर्ग रक्त किया करते थे। जो दूसरों के आगे भी बार-बार ऊँचे स्वर के कथन करने के योग्य बात होती थी उसको भी भगवान् हर सती के मुख को स्पर्श करने के विचार में उनके कान में कहा करते थे। विशेष दूर भी न जाकर यह शम्भु किसी समय में प्रयत्नपूर्वक समागत होकर पीछे के भाग में आकर अन्य मन वाली इस सती की आँखों को बन्द कर दिया करते थे। वृषभध्वज अपनी माया से वहाँ पर ही अन्तर्धान होकर उस सती का आलिंगन किया करते थे। तब वह भय से चकित होकर अधिक व्याकुल हो जाया करती थी। उन हिमालय पर्वत में वृषभध्वज के प्रवेश किए जाने पर कामदेव भी अपने मित्र वसन्त के तथा अपनी पत्नी रति के साथ वहाँ पर चला गया था। उस कामदेव के प्रविष्ट हो जाने पर वसन्त ने भगवान् शंकर के समीप में अपनी शोभा का वृक्षों में, जल में और भूमि में विस्तार कर दिया था। वहाँ पर सभी वृक्ष फूलों से संयुत होकर पुष्पित हो गए थे और अन्य लतायें भी पुष्पित हो गई थीं सब सरोवरों के जल खिले हुए कमलों से युक्त हो गये थे तथा उन कमलों पर भ्रमर गुञ्जार कर रहे थे। वहाँ पर सुरति के प्रविष्ट हो जाने पर मलय की ओर से आने वाली वायु वहन कर रही थी। सुगन्धित पुष्पों के सहित योग को जाने से सुरभियाँ मोहित हो गई थीं। उस समय में उस सुरभि ने मुनियों के
भी मन का प्रमथन कर दिया था। चक्र के समूह के ही घृत के समान कृति कामदेव ने सार का समुद्धरण किया था। पलाश सन्ध्या काल में आधे चन्द्रमा के सदृश शोभित हुए थे। पुष्प कामदेव के अस्त्र के ही समान सदा प्रमोद के लिए हो गये थे। सरोवरों में कमल के पुष्प शोभित हो रहे थे। नागकेशर के वृक्ष स्वर्ण वर्ण वाले पुष्पों के शंकर से समीप में मदन (कामदेव) के केतु की आभा वाले परम सुन्दर शोभित हो रहे थे। चम्पक के वृक्ष बार-बार हेम पुष्पत्व को अर्थात् सुनहले पुष्पों को प्रकट करते हुए विकसित प्रचुर पुष्पों से भली-भाँति शोभायमान हुए थे। विकसित हुए अर्थात् खिले हुए पाटला के पुष्पों से दिशायें पाटलांशु हो गईं थीं। जिस किसी तरह से वे पाटलनाभ वाले वृक्ष पुष्पित हो रहे थे। अवंग वल्ली की सुरभि गन्ध के द्वारा वायु को सुरभित करके कामीजनों में पूर्व चित्तों को बहुत ही अधिक सम्मोहित करती है। वासन्ती से वासित वल्वज शोभित हो रहे थे उसकी गन्ध के लालची भ्रमर मनोहर रति मित्र थे। सुन्दर पावक के वर्चस्व वाले आम्र वृक्षों के शिखर कामदेव के वाणों के समूह से वंदनावृत होते हुए शोभायुक्त थे। सरोवर तथा जलाशयों का जल फूले हुए कमलों के द्वारा शोभित हुए थे जो अव्यक्त ज्योति के उद्गम से मुनिगणों के चित्तों के ही तुल्य थे। सूर्य की किरणों के संगम से तुषार क्षय को प्राप्त हो गये थे। उस समय में उन तुषारों का क्षय विज्ञानशाली पुरुषों के हृदय से ममत्व की ही भाँति हुआ था। उस समय में प्रतिदिन कोयल निःशंक होकर अपनी मधुर ध्वनि का विचार कर रही थी। जो पुष्पों में बहुत ही अधिक पुष्पों की ज्या (धनुष की डोरी) के शब्द की ही भाँति था। वहाँ पर भ्रमर वनों के अन्तर्गत पुष्पों में गमन करने वाले भ्रमरकान्ता की लीला को भूख वाले कामदेव रूपी व्याघ्र की ध्वनि की ही भाँति गुँजन कर रहे थे। चन्द्र तुषार की भाँति था और भानु सकल कलाओं वाला नहीं था। यह क्रम से स्वजनों के मोह के लिए कुशलतापूर्वक इन कलाओं
७८ ॐ श्रीकालिका पुराण ॐ को धारण करता था । उस समय में चन्द्रमा के साथ प्रसन्न और तुषार से रहित विभावरी सुमनोहर कामिनियाँ प्रिय के साथ की भाँति की हो गयी थीं । उस समय महादेव उत्तम धरा में उत्तम सती के साथ बहुत समय तक होकर रमण करते रहे । हिमाद्रि निवास गमन मार्कण्डेय मुनि ने कहा-इसके अनन्तर किसी समय में दक्ष की पुत्री सती ने जलदों के आगम में अद्रि (पर्वत) शिखर के प्रस्थ में संस्थित वृषभध्वज से बोली-मेघों के समागम का समय प्राप्त हो गया है । यह काल परम दुःसह होता है । अनेक वर्णों वाले मेघों के समुदाय से आकाश और दिशायें सब स्थगित अर्थात् आछन्न हो गये हैं । अत्यन्त वेग वाली वायु हृदय को विदीर्ण करती हुई वहन करती है । विद्युत की पताका वाले मेघों की ऊँची और तीव्र गर्जना से जो मेघधारा सार को मोचन कर रहे हैं, इससे किसके मन क्षुब्ध नहीं होते हैं अर्थात् सभी के मन में लोभ उत्पन्न हो जाया करता है । इस समय में सूर्य दिखलाई नहीं देता है और मेघों से चन्द्रमा भी समाच्छन्न हो गया था और इस समय में दिन भी रात्रि की भाँति प्रतीत होता है । यह समय विरही जनों को बहुत ही व्यथा करने वाला है । ये मेघ एक जगह में स्थित नहीं रहा करते हैं । ये गर्जन की ध्वनि करते हुए पवन से चलायमान हो जाते हैं । हे शंकर! ये ऐसे प्रतीत होते हैं मानों लोगों के माथे पर गिर रहे हों । वायु से हत हुए वृक्ष आकाश में नृत्य-सा करते हुए दिखलाई दिया करते हैं । हे हर! ये कामुक पुरुषों के ईक्षित हैं और भीरुओं को त्राण देने वाले हैं । स्निग्ध नीलअञ्जन के समान श्याम मेघों के ओघ के पीछे से बलकाओं की पंक्ति यमुना के धृष्ट फेन के ही समान शोभा देती है । यह गत कालिका क्षण-क्षण में चञ्चल है ऐसी दिखलाई दिया करती है । जैसे सागर में सन्दोप्त बड़वा मुख पावक होता है । मन्दिर के प्रांगणों में भी शस्य पुरुढ़ होते हैं । हे विरूपाक्ष! अन्य स्थान मे मैं
ॐ श्रीकालिका पुराण ॐ ७९ शास्त्रों की उद्भूति ( उत्पत्ति ) को क्या बतलाऊँ । श्यामल और रजत कक्षों से यह हिमवान् विषद हो रहा है जिस तरह से मन्दिर अचल के वृक्षों के समुदाय के पत्रों से क्षीर सागर होता है । वह कुसुमों की श्री इसके कुटज का सेवन करती है । मयूर मेघों की ध्वनि से बार-बार परम हर्षित होते हैं और वे निरन्तर वृष्टि की सूचना देने वाले हर एक वन में अपनी वाणी को बोला करते हैं । हे हर ! अत्यन्त घोर काले मेघों की ओर मुख किए हुए चातकों की ध्वनि का आप श्रवण करिए जो कि वृष्टि की समीपता को सूचना देने वाला है । इस समय में आकाश में इन्द्र के धनुष ने अपना स्थान बना लिया है अर्थात् इन्द्रधनुष दिखलाई देता है । जिस प्रकार से धारा के शरों से ताप का भेदन करने के लिए मानों यह उद्गत हुआ हो । मेघों के अन्याय को देखिए जो कि कारकों अर्थात् ओलों का उत्कर उसी भाँति चातक और अनुगत मयूर को ताड़ित करता रहता है । शिखी ( मयूर ) और सारंग का पराभव मित्र से भी देखकर हे गिरीश! हँस बहुत दूर देश में स्थित मानसरोवर को गमन किया करते हैं । इस विषय काल में कण्टक और कोरक अपने घोसलों की रचना किया करते हैं । आप बिना गेह के किस प्रकार से शान्ति को प्राप्त करते हैं । हे पिनाक धनुष के धारण करने वाले ! वह विशाल मेघों से उठी हुई भीति ( डर ) मुझको बाधा कर रही है । अतएव मेरे कहने से आप शीघ्र ही निवास स्थान के लिए यत्न करिए । हे वृषभध्वज ! कैलास में अथवा हिमालय गिरि में या भूमि में आप अपने योग्य निवास स्थान को बनाइए । उस दाक्षायणी के द्वारा एक बार ही इस प्रकार से कहे हुए शम्भु ने उस समय में थोड़ा हास किया था जो शम्भु अपने मस्तक में स्थित चन्द्रमा की रश्मियों से घोषित आनन ( मुख ) वाले थे । इसके अनन्तर महान् आत्मा वाले सभी तत्वों के ज्ञान से सुसम्पन्न मन्द मुस्कराहट से अपने होठों के सम्पुट को भेद न करने वाले शिव परमेश्वरी देवी को तुष्ट करते हुए बोले थे । ईश्वर ने कहा- हे मनोहरे ! आपकी प्रीति के लिए जहाँ पर भी मुझे
८० ॐ श्रीकालिका पुराण ॐ निवास करना चाहिए, हे मेरी प्यारी! वहाँ पर मेघ कभी भी गमन करने वाले नहीं होंगे। इस महीभृत अर्थात् पर्वत के नितम्ब के समीप पर्यन्त ही मेघ सञ्चरण किया करते हैं। हे मनोहर! वर्षा ऋतु में भी इस प्रालेय के धाम गिरि के अन्दर सदा मेघों की गति वहीं तक है। उसी भाँति कैलास की जहाँ तक मेखला है वहीं तक मेघ सञ्चरण करते हैं। उसके ऊपर वे कभी भी गमन नहीं किया करते हैं। सुमेरु के वारिधि के ऊपर बलाहक (मेघ) नहीं जाया करते हैं। पुष्कर और आवर्तक प्रभृति उसके जानुओं के मूल तक ही रहते हैं। इन गिरीन्द्रों पर जिसके भी ऊपर आपकी इच्छा हो, हे प्रिये! जहाँ पर भी आपका मन हो वही आप मुझे ही बतला दीजिए। सदा हिमालय गिरि में स्वेच्छापूर्वक विहार के द्वारा आपके कौतुक उपदेय हैं। जहाँ पर सुवर्ण पक्षों के द्वारा अनिलों के वृन्दों से और मधुर ध्वनि वाले पक्षियों से तुम्हारे कौतुक होंगे। सिद्धों की सिद्धांगनायें आपके साथ सखिता की अर्थात् सनातनी सखी की भावना की इच्छा करने वाली होती हुई स्वेच्छापूर्वक विहारों के द्वारा मणिकुहिस पर्वत पर कौतुक के सहित आपका उपहार करती हुई फल आदि दोनों के सहित वहाँ पर आयेंगी। जो देवों की कन्यायें हैं और जो गिरि की कन्यायें हैं, जो तुरंगमुखी नागों की कन्यायें हैं वे सभी निरन्तर आपकी सहायता करती हुई अनुमोद के विभ्रमों के द्वारा समाचारण करेंगी। आपका वह अतुल रूप है अर्थात् ऐसा है जिसकी तुलना न हो। आपका मुख परम सुन्दर है। अंगला अपने शरीर की कान्ति के संघ को देखकर अपने वपु में और रूप गुच्छों में खेला करेंगी इससे निर्निमेष ईक्षण से चारुरूप वाली है। जो मेनका अप्सरा पर्वतराज की जाया के रूप और गुणों से तीनों लोकों में ख्याति वाली हुई थी वह भी सूचनाओं से आपके मन का अनुमोदन नित्य किया करेगी। गिरिराज के द्वारा वन्दना करने के योग्य पुरन्ध्रि वर्गों के साथ उदाररूपा प्रीति का विस्तार करती हुई उनके द्वारा सदा अपने कुल के लिए उचित गुणों के समुदायों से प्रीति में समन्वित प्रतिदिन आपकी शिक्षा करने के योग्य है। हे प्रिये! अतीव विचित्र कोमलों के सन्तान
൵ श्रीकालिका पुराण ൵ ८१ और मोद से कुब्जों के समुदाय से समावृत होने वाले और जहाँ पर और सदा ही वसन्त का प्रभाव विद्यमान रहता है क्या वहाँ आप गमन करना चाहती हैं ? समस्त कामनाओं के प्रदान करने वाले वृक्षों से और कल्पसंज्ञा वाले शार्दूलों से जो संच्छन्न है वहाँ पर जिसके कुसुमों का उपयोग करोगी । हे महाभागो! जहाँ परश्वापद् गण परम प्रशान्त हैं जो मुनि और यतियों से सेवित हैं अनेक प्रकार के मृग गणों से समावृत हैं ऐसा देवों का आलय है । स्फटिक के वर्ण से युक्त विप्र आदि से और रजत चाँदी के निर्मित से विराजित हैं जो मानस सरोवर के वर्गों से दोनों ओर परिशोभा वाला है । जो हिरण्मय रत्नों के नाल वाले पंकजों तथा मुकुलों से आवृत्त हैं तथा शिशुमार, शंख, कच्छप, मकर, झपों के द्वारा निमेषित और मञ्जुल नीलोत्पल आदि से समन्वित है । देवी के सैकड़ों स्नानों से सक्त सम्पूर्ण वाले कुंकुमों से युक्त, विचित्र मालाओं के गन्ध से युक्त, जनों से अपूर्ण एवं स्वच्छ कान्ति वाले शाद्वलों से, तरुओं से जो तीर पर स्थित थे उनसे उपशोभित, मानों नृत्य करते हुए शास्त्रों के समुदाय से अपने सम्भव का व्यञ्जन करते हुए कादम्ब, सारस, मत्त चक्रांगों के ग्राम (समुदाय) से शोभित मधुर ध्वनि करने वाले, मोद को करने वाले भ्रमर आदि से युक्त-इन्द्र, यम, कुबेर, वरुण की पुरियों से शोभान्वित देवों का आलय मेरु को जो उन्नत है जो रम्भा, शची, मेनका आदि रम्भोरुगण सेवित है । क्या आप सबके सारभूत महागिरि की इच्छा करती हैं ? वहाँ पर सैकड़ों देवियों से समन्वित अप्सरागणों के सहित सेवा की हुई शची (इन्द्राणी) आपके लिए समुचित सहायता करेगी । मेरे कैलास अंचलों के शिरोमणि को जो सत्पुरुषों का आश्रय और वित्तेश कुबेर की पुरी से परिराजित हैं क्या ऐसे स्थान के प्राप्त करने की इच्छा करती हो ? हे सुन्दरि ! गंगाजल से ओघ से प्रयत, पूर्ण चन्द्रमा की प्रभा के समान प्रभा से संयुत, दरियों में और सानुओं में (शिखरों में) सदा यक्ष की कन्याओं से सम्मोहित, अनेक मृग गणों से सुसेवित, सैकड़ों
८२ ॐ श्रीकालिका पुराण ॐ पद्माकारों से समावृत जो सभी गुणगणों से सुमेरु की तरह ही तुल्य है। इन स्थानों में जहाँ पर भी आपके अन्तःकरण की स्पृहा हो उसे शीघ्र ही मुझको बतला दो वहाँ पर ही मैं आपका निवास बना दूँगा। मार्कण्डेय मुनि ने कहा- इस प्रकार से भगवान् शंकर के द्वारा कहने पर उस अवसर पर दाक्षायणी ने धीरे से अपनी इच्छा को प्रकाशित करने वाला वह वचन कहा था। सती ने कहा- इस हिमालय में ही अपना निवास आपके साथ चाहती हूँ। आप शीघ्र ही इस महागिरि में ही निवास करिये। मार्कण्डेय महर्षि ने कहा- इसके अनन्तर उस देवी सती के वाक्य का श्रवण करके भगवान् शंकर परमाधिक प्रसन्न हुए और उस दाक्षायणी के साथ जो हिमवान् का शिखर था उस पर चले गए थे। वह हिमालय का शिखर सिद्धों की अंगनाओं से युक्त था और मेघ एवं पक्षियों के लिए अगम्य था अर्थात् वहाँ पर मेघ तथा पक्षी भी नहीं जा सकते थे। उसके परमोन्नत तथा मरीचवन से सुशोभित शिखर पर उन्होंने गमन किया था। सती के देह त्याग वर्णन मार्कण्डेय मुनि ने कहा- वह कनकों के रूपों से रत्न सुशोभित शिखर था। वह शिखर सूर्य के समान उन्नत था। उस शिखर को सती सखा शिव ने प्राप्त किया था। उसमें जो स्फटिक पाषाण था और शाद्वल एवं द्रुमों से राजित था, विचित्र पुष्पों की लताओं से तथा सरोवरों से संयुत था, वहाँ प्रफुल्लित वृक्षों की शाखाओं की टहनियों पर गुञ्जार करते हुए भ्रमरों के द्वारा परम शोभा हो रही थी। विकसित कमलों के द्वारा तथा नील कमलों के समुदाय के द्वारा चक्रवाकों समूहों से और कादम्ब से शोभि था। प्रमत्त सारस, कौंच और नीलकण्ठ इनसे जो शब्दायमान था एवं कोकिलों की मधुर ध्वनियों से तथा मृगों से सेवित था। तुरंग के समान मुखों वाले सिद्धों, अप्सराओं और गुह्यकों से, विद्याधरों, देवियों तथा किन्नरों के द्वारा विहार किया हुआ था। पर्वतीय पुरन्ध्रियों से और कन्याओं से वह समन्वित था। विपञ्ची
൏൱ श्रीकालिका पुराण ൏൱ ८३ तन्त्रिका मन्द मृदंग, पट्टह की ध्वनियों से और नृत्य करती हुई कौतुक से समुत्थित अप्सराओं के द्वारा सुशोभित था। दैवी-दिव्य और गन्ध युक्त लताओं से समावृत्त, ऊर्ध्व प्रफुल्ल कुसुमों से तथा निकुन्जों से शोभायमान स्थान था। उसमें वृषभध्वज ने इस प्रकार से समन्वित सुशोभन में सती के साथ चिरकाल पर्यन्त रमण किया था। उस स्वर्ग के सदृश स्थान में भगवान् शंकर ने दिव्यमान से दश हजार वर्ष तक आनन्द सहित सती देवी के साथ रमण किया था। पहले वह शंकर भगवान् किसी समय उस स्थान से कैलाश पर चले जाया करते हैं। किसी समय देवों और देवियों से समावृत मेरु पर्वत के शिखर चले जाते हैं। उसी भाँति दिक्पालों के उद्यान में, वनों में और वसुधा तल में जा-जाकर पुनः वहाँ पर सती को साथ में लिए हुए उनसे रमण किया करते थे। उन्होंने रात दिन को नहीं जाना था, न तो वे ब्रह्म का चिन्तन करते थे, न तप और शम का ही समाचरण किया करते थे। सती के अन्दर समाहित मन वाले शम्भु ने केवल प्रीति ही की थी। सती सभी ओर केवल एक महादेवजी के ही मुख को देखा करती थीं और महादेवजी भी निरन्तर सभी जगह सर्वदा सती के ही मुख का अवलोकन किया करते थे। इस रीति से परस्पर में एक-दूसरे संसर्ग से अनुराग रूपी वृक्ष को सती और शम्भु ने भावरूपी जल के सेवन के समान सेवन किया था। दक्ष यज्ञ का आयोजन इसी बीच में जगतों के हित को करने वाले प्रजापति दक्ष के एक महान् यज्ञ के यजन करने का समारम्भ किया था जो कि सर्वजीवन था। जहाँ पर अट्ठासी हजार ऋत्विज हवन करते हैं। हे सुरर्षियों! इसमें चौसठ हजार उद्गाता थे। उतने ही अध्वर्यु और नारद आदि होता गण थे। समस्त मरुद्गणों के साथ विष्णु भगवान् स्वयं ही अधिष्ठाता हुए थे। ब्रह्माजी स्वयं वहाँ पर त्रयी की विधि के निदर्शक थे। उसी भाँति सब दिक्पाल उसके द्वारपाल और रक्षक थे। वहाँ पर यज्ञ स्वयं
८४ ॐ श्रीकालिका पुराण ॐ उपस्थित हुआ था और धरा स्वयं वेदी हुई थी अर्थात् पृथ्वी ने ही स्वयं वेदी का स्वरूप धारण किया था। अग्नि ने उस यज्ञ के महोत्सव में हवियों के शीघ्र ग्रहण करने के लिए ही अपने अनेक स्वरूप धारण किए थे। शीघ्र ही मरीचि आदि को आमन्त्रित करके जो पवित्रैक के धारण करने वाले थे वहाँ पर बुलाया था और उन्होंने सामिधेनी से अर्चि को प्रज्वलित किया था। सप्तर्षि गण पृथक-पृथक सामगाथा करते थे जो कि श्रुतियों के स्वरों से पृथ्वी, दिशाओं को और विदिशाओं को एवं आकाश को पूरित कर रहे थे। महात्मा दक्ष ने वहाँ पर योगियों में किन्हीं को भी परावृत नहीं किया था। न तो कोई ऋषिगण, न देवगण, न मनुष्य और न पक्षीगण, न उद्भिद, न तृण, न पशु और मृग पराव्रत किए गए थे। उस दक्ष ने सुसदाध्वरों में गन्धर्व, विद्याधर, सिद्धों के समुदाय, आदित्य, साध्य, ऋषिगण, यक्ष, समस्त स्थावर नागदर को भी परावृत नहीं किया था। कल्प, मन्वन्तर, युग, वर्ष, मास, दिन, रात्रि, कला, काष्ठा, निमेष आदि सब वृत किए हुए वहाँ पर सब समागत हुए थे। उस दक्ष के द्वारा वृत किए हुए महर्षि, राजर्षि, सुरभि संघ, पुत्रों के सहित नृप, गण देवता ये सब उस समय आगत हुए थे। कीट, पतंग, सब जल में समुत्पन्न जीव, वानर, श्वापद, घोर, विघ्न, शैल, नदियाँ और समुद्र, सरोवर, वापी, वृत हुए थे और सब गये थे। सभी हवियों के अपने भाग को ग्रहण करने की इच्छा वाले थे। वे दृढ़ यज्वीक्रतु के गमन करने वाले हुए थे। पाताल में निवास करने वाले असुर भी वहाँ पर समागत हुए थे। नागों की स्त्रियाँ और समस्त देवों की सभा आई थी। जो कुछ भी इस जगत में वर्त्तन करने वाले थे चाहे चेतन हो या अचेतन ही वे सब में वरण इस सर्वस्व दक्षिणा वाले यज्ञ का समारम्भ किया था। उस यज्ञ में महात्मा दक्ष ने केवल भगवान् शम्भु का वरण नहीं किया था अर्थात् शम्भु को आमन्त्रण नहीं दिया था। शम्भु कपाल धारण करने वाले हैं अतएव उनमें यज्ञ में सम्मिलित होने की योग्यता ही नहीं है ऐसा ही निश्चय करके शम्भु को निमन्त्रित नहीं किया गया
ॐ श्रीकालिका पुराण ॐ ८५ था। सती भी यद्यपि परमप्रिय अपनी पुत्री थी किन्तु क्योंकि वह भी कपाली शिव की भार्या थी अतएव उनका भी वृत नहीं किया गया था क्योंकि यज्ञ के विषय में दक्ष ने दोषों को विचार कर लिया था। सती ने यह श्रवण करके कि पिताजी ने एक उत्तम यज्ञ करने का आरम्भ किया है किन्तु क्योंकि मैं कपालधारी की भार्या हूँ इसीलिए वास्तव में मुझको नहीं बुलाया गया है। वह सती अत्यन्त क्रोधित हो गयी थी जो कि कोप उसे अपने पिता दक्ष के ऊपर उनको हुआ था। उस अवसर पर उनका मुख और नेत्र क्रोध से लाल हो गये थे। उसी समय में सती ने शाप द्वारा दक्ष प्रजापति को दग्ध करने के लिए मनन किया था। यद्यपि वह सती क्रोध में आविष्ट थीं तो भी इस पूर्व समय को उसने स्मरण किया था। मन से ऐसा निश्चय करके उस समय में सती ने शाप नहीं दिया था क्योंकि मैंने पहले दृढ़ प्रतिज्ञा की है मेरी अवज्ञा होने पर मैं फिर निश्चय ही अपने प्राणों का परित्याग कर दूँगी। जिस समय दक्ष ने तनया की इच्छा वाले होते हुए बहुत समय तक मेरा स्तवन किया था उसी समय में मैंने यह प्रतिज्ञा की थी कि मैं उसको शाप नहीं दूँगी। इसके अनन्तर अपने नित्य स्वरूप का उस देवी ने चिन्तन करके अत्यन्त उग्र, निष्कल और जगत् से परिपूर्ण का स्मरण किया था। उस सती ने हरि की योगनिद्रा नाम वाले पूर्व स्वरूप का स्मरण करती हुई उस समय में दक्ष की पुत्री ने मन के द्वारा इस प्रकार से चिन्तन किया था। ब्रह्मा के द्वारा उदित दक्ष प्रजापति ने जिसके लिए मेरी स्तुति की थी वह कुछ भी नहीं जाना था और भगवान् शंकर भी पुत्रवान् नहीं हुए थे। इस समय में देवगण का एक ही कार्य सम्पन्न हुआ था कि भगवान् शंकर मेरे लिए स्त्री में अनुराग करने वाले हो गये थे। मेरे अतिरिक्त अन्य कोई भी शम्भु के अनुराग की वृद्धि करने के लिए समर्थ नहीं थी और न कोई होगी क्योंकि अन्य किसी को भी शंकर ग्रहण नहीं करेंगे। तो भी मैं पूर्वयोजित समय से पूर्व ही अपने शरीर का त्याग कर दूँगी और जगत् की भलाई के लिए फिर गिरि अर्थात् हिमवान् में अपना प्रादुर्भाव करूँगी।
ॐ नमः शिवाय नमः शिवाय नमः शिवाय नमः शिवाय नमः शिवाय नमः शिवाय नमः शिवाय नमः शिवाय नमः शिवाय नमः शिवाय नमः शिवाय नमः शिवाय नमः शिवाय नमः शिवाय नमः शिवाय नमः शिवाय नमः शिवाय नमः शिवाय नमः शिवाय नमः शिवाय नमः शिवाय नमः शिवाय नमः शिवाय नमः शिवाय नमः शिवाय नमः शिवाय नमः शिवाय नमः शिवाय नमः शिवाय नमः शिवाय नमः शिवाय नमः शिवाय नमः शिवाय नमः शिवाय नमः शिवाय नमः शिवाय नमः शिवाय नमः शिवाय नमः शिवाय नमः शिवाय नमः शिवाय नमः शिवाय नमः शिवाय नमः शिवाय नमः शिवाय नमः शिवाय नमः शिवाय नमः शिवाय नमः शिवाय नमः शिवाय नमः शिवाय नमः शिवाय नमः शिवाय नमः शिवाय नमः शिवाय नमः शिवाय नमः शिवाय नमः शिवाय नमः शिवाय नमः शिवाय नमः शिवाय नमः शिवाय नमः शिवाय नमः शिवाय नमः शिवाय नमः शिवाय नमः शिवाय नमः शिवाय नमः शिवाय नमः शिवाय नमः शिवाय नमः शिवाय नमः शिवाय नमः शिवाय नमः शिवाय नमः शिवाय नमः शिवाय नमः शिवाय नमः शिवाय नमः शिवाय नमः शिवाय नमः शिवाय नमः शिवाय नमः शिवाय नमः शिवाय नमः शिवाय नमः शिवाय नमः शिवाय नमः शिवाय नमः शिवाय नमः शिवाय नमः शिवाय नमः शिवाय नमः शिवाय नमः शिवाय नमः शिवाय नमः शिवाय नमः शिवाय नमः शिवाय नमः शिवाय नमः शिवाय नमः शिवाय नमः शिवाय नमः शिवाय नमः शिवाय नमः शिवाय नमः शिवाय नम