भारतकोश
कल्कि पुराण (संस्कृत मूल एवं हिन्दी अनुवाद)

कल्कि पुराण (संस्कृत मूल एवं हिन्दी अनुवाद)

Kalki Purana with Sanskrit Original & Hindi Translation

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished259 पृष्ठ

पृष्ठ 152, कुल 259 में से

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तृतीयांश— षष्ठ अध्याय इति तौ मरुदेवापौ श्रुत्वा कल्केर्वचः पुरः । कृतोद्वाहौ रथारूढौः समायातौ महाभुजौ । १। नानायुधधरैः सैन्यैरावृतौ शूरमानिनौ । बद्धगोधाऽङ्गुलित्राणौ दंशितौ बद्धहस्तकौ । २। कार्ष्णायसशिरस्त्राणौ धनुर्द्धरधुरन्धरौ । अक्षौहिणीभिः षडभिस्तु कम्पयन्तौ भुव भरैः । ३। विशाखयूपभूपस्तु गजलक्षैः समावृतः । अश्वैः सहस्रनियुतैः रथैः सप्तसहस्रकैः ।४। पदातिभिर्द्विलक्षैश्च रत्नछद्धृतकार्मुकैः । वातोद्धतोत्तरोष्णीषैः सर्वतः परिवारितः । ५। रुधिराश्वसहस्राणां पञ्चाशद्भिर्महारथैः । गजैर्दशशतैर्मत्तैर्नवलक्षैर्वृतो बभौ ।६। सूतजी बोले—कलिकी की आज्ञा से मरु और देवापि ने विवाह कर लिया और वे दोनो महाबाहु दिव्य रथो पर आरूढ हुए वहाँ आ पहुचे ।१। अपने महाबली होने का अभिमान रखनेवाले वे दोनो वीर अपने देह को सुरक्षित किये हुए और अङ्गुलियो मे त्राण धारण किये हुए थे। अस्त्रशस्त्रो से भले प्रकार सुसज्जित उन वीरो के साथ अग- णित सेना थी । २। वे अपने शिरो पर कार्ष्णाय वर्ण का शिरस्त्राण धारण किये थे तथा सर्व श्रेष्ठ धनुप बाणों से सज्जित अपनी छः अक्षो- ४०५ २

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