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कल्याण: उपनिषद् अङ्क

Kalyan Upanishad Ank

गीताप्रेस द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished832 पृष्ठ

ॱ निवेदन और क्षमा-प्रार्थना ॱ ७७५ हूँ—इस प्रकारका भाव सदा जागरित रखना चाहिये और मै अन्तरात्मस्वरूप चैतन्य-मात्र, द्रष्टा, साक्षी हूँ—इस चिन्तन- धाराको ऐसे प्रवाहित करना चाहिये कि तार न टूटने पावे । इस प्रकारका अभ्यास सहज होनेपर स्वरूपभूत ज्ञानानन्दका आविर्भाव होकर आत्मास्थितिपूर्वक जीव कृतकृत्य हो जाता है । यस्य देवे परा भक्तिर्यथा देवे तथा गुरौ । तस्यैते कथिता ह्यर्था प्रकाशन्ते महात्मन ॥ ( श्वेताश्वतर० ६ । २३ ) ‘जिसकी परमेश्वरमे अत्यन्त भक्ति है और जैसी परमात्मा- मे है वैसी ही श्रीगुरुदेवमें भी है, उसीके अन्तःकरणमे इन तत्त्वोंका प्रकाश होता है ।’ निवेदन और क्षमा-प्रार्थना मनुष्य-जीवनका चरम और परम उद्देश्य है—अखण्ड पूर्ण आनन्द तथा सनातन शान्तिरूप भगवान्को प्राप्त करना । जीवनके अन्य सारे कार्य इसी एकमात्र चरम लक्ष्यकी सिद्धिके लिये किये जाने चाहिये । हमारे उपनिषद् इसी परम लक्ष्यके स्वरूप तथा उसकी प्राप्तिके विविध अनुभवपूर्ण साधनोंका उपदेश करते है । हम भारतीय आज इस अपने घरके दिव्य परसोज्ज्वल प्रकाशको छोड़कर अज्ञानान्धकारके नाशके लिये दूसरोंकी टिमटिमाती चिरागपर मुग्ध हुए जा रहे है ! हमारा यह मोह दूर हो । हम उपनिषदोंका किसी अंशमें यत्किञ्चित् परिचय प्राप्त कर सकें, इसी उद्देश्यसे ‘उपनिषद्- अङ्क’के प्रकाशनका हमारा यह क्षुद्र प्रयास है । उपनिषदें ज्ञानकी खानें हैं । जीवनकी सभी दिशाओंमे प्रकाश देनेवाली अखण्ड परम ज्योति हैं । परमात्माके पुनीत मार्गकी पथप्रदर्शिका हैं और परमात्मा परमेश्वरके विभिन्न रूपोंके निर्भ्रान्त और समन्वयात्मक स्वरूपका साक्षात्कार कराने- वाली हैं । उपनिषदोंकी महिमा इसलिये नहीं है कि दाराशिकोहने इनसे प्रकाश प्राप्त किया या शोपेनहर, मैक्समूलर एव अन्यान्य पाश्चात्त्य विद्वानोंने इनकी प्रशसा की है । यह उनका सौभाग्य है, जो उन्हें उपनिषदोंका कुछ आभास प्राप्त हुआ । वे उपनिषदोंको न जान पाते, जानकर भी प्रशंसा न करते या कोई इन्हें व्यर्थ बताकर निन्दा भी करता तो इससे उपनिषदोंका महत्त्व तो अक्षुण्ण ही रहता । क्योंकि उनकी महिमाका आधार उनका निर्मल मङ्गलमय प्रकाशमय स्वरूप ही है। आजकल काल-निर्णयकी पद्धति चली है, और पाश्चात्त्य विद्वानोंके मतोंका अनुकरण करके भारतीय विद्वान् भी उसी पद्धतिके अनुसार चल रहे हैं । इसीसे उपनिषदोंका निर्माण- काल ईसासे सात-आठ सौ वर्ष पूर्व बतलाते हैं । पर उन्हें यह समझना चाहिये कि ब्रह्मसूत्रमे उपनिषदोंकी व्याख्या है और ब्रह्मसूत्रका श्रीमद्भगवद्गीतामे उल्लेख है, इससे यह सिद्ध है कि भगवद्गीतासे पूर्व उपनिषदोंका अस्तित्व था । श्रीमद्भगवद्गीताका प्रादुर्भाव ईसासे ३१०० वर्ष पूर्व महाभारत- युद्धमें हुआ था—यह प्रायः निर्णीत हो चुका है । ऐसी अवस्था- में दूसरोंके अन्धेरेमें काल टटोलनेकी यह पद्धति कहाँतक समीचीन है, इसपर विद्वान् सज्जन विचार करें । वस्तुतः उपनिषदोंकी महत्ता कालपर नहीं है, वह तो उनकी महान् ज्ञानराशिको लेकर है, जो वेदोंके सारके रूपमें ऋषियो- द्वारा श्रुत और संगृहीत है एव जो नित्य, सत्य और सनातन है । उपनिषदोंमे तत्त्वज्ञान या ज्ञानके परम साध्य तत्त्वके स्वरूपका साक्षात्कार ही नहीं है, वहाँतक पहुँचनेके विभिन्न रुचिके अधिकारियोंके अनुकूल विविध साधनोंका भी वर्णन है, और साथ ही मनुष्यको ऊँचे उठानेवाले उस सदाचारका भी महत्त्वपूर्ण उल्लेख है, जिसे जानकर प्रत्येक मनुष्य अपनेको ऊँचा उठानेका प्रयत्न कर सकता है । यह भारतीयोकी परम निधि है और किसी दिन इन्हींके प्रकाशसे विश्वमे यथार्थ सुख-शान्तिका प्रसार होगा । उपनिषद् सैकड़ों हैं । उनमे बारह प्रधान मानी जाती है । इन बारहमेंसे—ईश, केन, कठ, प्रश्न, मुण्डक, माण्डूक्य, ऐतरेय, तैत्तिरीय और श्वेताश्वतर इन नौ उपनिषदोंको तो मूल, पदच्छेद, अन्वय तथा व्याख्यासहित प्रकाशित किया जा रहा है । समय-सङ्कोचसे शेष तीन—छान्दोग्य, बृहदारण्यक और कौषीतकि-ब्राह्मणपर व्याख्या नही लिखी जा सकी ।

Regd. No. A. 175. श्रीहरिः भगवान् ही सब कुछ हैं स ब्रह्मा स शिवः सेन्द्रः सोऽक्षरः परमः स्वराट् । स एव विष्णुः स प्राणः स कालोऽग्निः स चन्द्रमाः ॥ स एव सर्वं यद्भूतं यच्च भव्यं सनातनम् । ज्ञात्वा तं मृत्युमत्येति नान्यः पन्था विमुक्तये ॥ सर्वभूतस्थमात्मानं सर्वभूतानि चात्मनि । सम्पश्यन् ब्रह्म परमं याति नान्येन हेतुना ॥ ( कैवल्योपनिषद् ८–१० ) वे (परात्पर परब्रह्म परमेश्वर ही) चतुर्मुख ब्रह्मा हैं, वे ही पञ्चमुख शिव हैं, वे ही देवराज इन्द्र हैं, वे ही अक्षर परमात्मा हैं, वे ही चतुर्भुज विष्णु हैं, वे प्राण हैं, वे काल हैं, वे अग्नि हैं, वे चन्द्रमा हैं। जो कुछ हो चुका और जो कुछ आगे होनेवाला है, सब वे ही हैं। उन सनातन भगवान्‌को जानकर जीव मृत्युके परे चला जाता है। इसके अतिरिक्त मुक्तिका अन्य कोई उपाय नहीं है। जो इन परमात्माको सब चराचर भूत- प्राणियोंमें देखता है और सब भूतप्राणियोंको परमात्मामें देखता है अर्थात् सब प्रकारसे एक भगवान्‌को ही सदा सर्वत्र देखता है, वह उन पर- ब्रह्मको प्राप्त करता है। दूसरे किसी उपायसे उनकी प्राप्ति नहीं होती।