कर्पूरमञ्जरी (महाकवि राजशेखर - प्राकृत सट्टक एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या)

कर्पूरमञ्जरी (महाकवि राजशेखर - प्राकृत सट्टक एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या)
Karpuramanjari Sattaka of Rajasekhara with Commentary
महाकवि राजशेखर द्वारा
DevanagariHindipublished172 पृष्ठ
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द्वितीयं जवनिकान्तरम् ७७ राजा—ईदिसो जेव दोहउस्स पहावो । विचक्षणा—अअं तिलअहुमो । ( कर्पूरमञ्जरी तिरं नियंपरलोकयति । ) राजा— तिक्खत्तणं तरलाणं कअलकळासंवरागिअक्खाणं पि से पासे पंचसरं सिलीमुहधरं णिच्चं सुणंताणँ अ । णेत्ताणं तिलअहुमे णिवडिदा घाही मअच्छीअ जं तं सो मंजरिपुंजदंतुरसिरो रोमंचिदो व द्विओ ॥ ४६ ॥ विचक्षणा—एमो वि असोअसाही । ( कर्पूरमञ्जरी चरणताडनं नाटयति । ) — राजा— ईदृश एव दोहदस्य प्रभावः । विचक्षणा— अयं तिलकद्रुमः । —