कठोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Katha Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
( ४ ) लौकिक शान्तिके पश्चात् मनुष्यको स्वभावसे ही पारलौकिक सुखकी इच्छा होती है; यहाँतक कि जब वह अधिक प्रबल हो जाती है तो वह ऐहिक सुखकी कुछ भी परवा नहीं करता । इसीलिये नचिकेताने भी दूसरे वरसे पारलौकिक सुख यानी स्वर्गलोककी प्राप्तिका साधनभूत अग्निविज्ञान माँगा; किन्तु इससे यह नहीं समझना चाहिये कि वे स्वर्गसुखके इच्छुक थे । जिस प्रकार उनके पहले वरमें पिताकी शान्तिकामना थी उसी प्रकार इसमें मनुष्यमात्र- की हितचिन्ता थी । सबके हितमें उनका भी हित था ही । वे स्वयं स्वर्गसुखके लिये लालायित नहीं थे । यह बात उस समय स्पष्ट हो जाती है जब यमराजके यह कहनेपर कि— ये ये कामा दुर्लभा मर्त्यलोके सर्वान्कामाँश्छन्दतः प्रार्थयस्व । इमा रामाः सरथाः सतूर्या न हीदृशा लम्भनीया मनुष्यैः । आभिर्मत्प्रत्ताभिः परिचारयस्व नचिकेतो मरणं मानुप्राक्षीः ॥ ( १ । १ । २५ ) वे कहते हैं— श्वोभावा मर्त्यस्य यदन्तकैतत्सर्वेन्द्रियाणां जरयन्ति तेजः । अपि सर्वं जीवितमल्पमेव तवैव वाहास्तव नृत्यगीते ॥२६॥ न वित्तेन तर्पणीयो मनुष्यो लप्स्यामहे वित्तमद्राक्ष्म चेत्त्वा । जीविष्यामो यावदीशिष्यसि त्वं वरस्तु मे वरणीयः स एव ॥२७॥ अजीर्यताममृतानामुपेत्य जीर्यन्मर्त्यः क्वधःस्थः प्रजानन् । अभिध्यायन्वर्णरतिप्रमोदानतिदीर्घे जीविते को रमेत ॥२८॥ यस्मिन्निदं विचिकित्सन्ति मृत्यो यत्साम्पराये महति ब्रूहि नस्तत् । योऽयं वरो गूढमनुप्रविष्टो नान्यं तस्मान्नचिकेता वृणीते ॥२९॥ ( अ० १ व० १ ) उपर्युक्त उद्धरणोंसे उनकी तीव्र जिज्ञासा और आत्मदर्शनकी अनवरत पिपासा स्पष्ट प्रतीत होती है । इसीसे प्रेरित होकर उन्होंने
( ५ )
तृतीय वर माँगा था। यमराजने उनकी जिज्ञासाकी परीक्षाके लिये उन्हें तरह-तरहके प्रलोभन दिये और बड़े-बड़े मनोमोहक सब्जबाग दिखलाये परन्तु आत्मामृतके लिये लालायित नचिकेताने उनपर कोई दृष्टि न देकर यही कहा ‘वरस्तु मे वरणीयः स एव’ ‘नान्यं तस्मान्नचिकेता वृणीते’ इत्यादि।
इस प्रकार, जब यमराजने देखा कि वे लौकिक और पारलौकिक भोगोंसे सर्वथा उदासीन हैं, उनमें पूर्ण विवेक विद्यमान है, वे शम-दमादि साधनोंसे सर्वथा सम्पन्न हैं और उनमें तीव्र मुमुक्षाकी प्रच्छन्न अग्नि तेज़ीसे धधक रही है तो उन्हें उनकी शान्तिके लिये ज्ञानामृतकी वर्षा करनी पड़ी। वह ज्ञानवर्षा ही सम्पूर्ण लोकोंका कल्याण करनेके लिये आज भी कठोपनिषद्के रूपमें विद्यमान है। परन्तु उससे विशुद्ध बोधरूप अंकुर तो उसी हृदयमें प्रस्फुटित हो सकता है जो नचिकेताके समान साधनचतुष्टयसम्पन्न है। परम उदार पयोधर जल तो सभी जगह बरसाते हैं परन्तु उससे परिणाम भिन्न-भिन्न भूमियोंकी योग्यतानुसार भिन्न-भिन्न होता है। ठीक यही बात शास्त्रोपदेशके विषयमें भी है। शास्त्रकृपा और ईश्वरकृपा तो सभीपर समान है परन्तु आत्मकृपाकी न्यूनाधिकताके कारण उससे होनेवाले परिणामोंमें अन्तर रहता है।
हम उस अनुपम अमृतका पानकर अमर जीवन प्राप्त कर सकें—ऐसी तीव्र आकांक्षासे हमें उससे लाभान्वित होनेकी योग्यता प्राप्त करनी चाहिये, क्योंकि ‘इह चेदवेदीदथ सत्यमस्ति न चेदिहावेदीन्महती विनष्टिः’ (के० उ० २।५) इस श्रुतिके अनुसार इस मानवजीवनका परमलाभ आत्मामृतकी प्राप्ति ही है। इसलिये इसकी प्राप्ति ही हमारा प्रथम कर्तव्य है। भगवान्से प्रार्थना है कि वे हमें उसकी प्राप्तिकी योग्यता प्रदान करें।
<p align="right">अनुवादक</p>प्रथम अध्याय
श्रीहरिः
विषय-सूची
| विषय | पृष्ठ |
|---|---|
| १. शान्तिपाठ | १ |
| २. सम्बन्ध-भाष्य | २ |
प्रथम अध्याय
प्रथमा वल्ली
| विषय | पृष्ठ |
|---|---|
| ३. वाजश्रवसका दान | ६ |
| ४. नचिकेताकी श्रद्धा | ८ |
| ५. पिता-पुत्र-संवाद | ९ |
| ६. यमलोकमें नचिकेता | १२ |
| ७. यमराजका वरप्रदान | १४ |
| ८. प्रथम वर—पितृपरितोष | १५ |
| ९. स्वर्गस्वरूपप्रदर्शन | १७ |
| १०. द्वितीय वर—स्वर्गसाधनभूत अग्निविद्या | १८ |
| ११. नाचिकेत अग्निचयनका फल | २२ |
| १२. तृतीय वर—आत्मरहस्य | २७ |
| १३. नचिकेताकी स्थिरता | २९ |
| १४. यमराजका प्रलोभन | ३० |
| १५. नचिकेताकी निरीहता | ३३ |
द्वितीया वल्ली
| विषय | पृष्ठ |
|---|---|
| १६. श्रेय-प्रेयविवेक | ३९ |
| १७. अविद्याग्रस्तोंकी दुर्दशा | ४४ |
| १८. आत्मज्ञानकी दुर्लभता | ४७ |
| १९. कर्मफलकी अनित्यता | ५२ |
( २ )
२०. नचिकेताके त्यागकी प्रशंसा ... ... ५३
२१. आत्मज्ञानका फल ... ... ५४
२२. सर्वातीत वस्तुविषयक प्रश्न ... ... ५७
२३. ओङ्कारोपदेश ... ... ५८
२४. आत्मस्वरूपनिरूपण ... ... ६०
२५. आत्मा आत्मकृपासाध्य है ... ... ६८
२६. आत्मज्ञानका अनधिकारी ... ... ६९
तृतीया वल्ली
२७. प्राप्ता और प्राप्तव्य भेदसे दो आत्मा ... ... ७२
२८. शरीरादिसे सम्बन्धित रथादि रूपक ... ... ७५
२९. अविवेकीकी विवशता ... ... ७७
३०. विवेकीकी स्वाधीनता ... ... ७८
३१. अविवेकीकी संसारप्राप्ति ... ... ७९
३२. विवेकीकी परमपदप्राप्ति ... ... ७९
३३. इन्द्रियादिका तारतम्य ... ... ८१
३४. आत्मा सूक्ष्मबुद्धिग्राह्य है ... ... ८४
३५. लयचिन्तन ... ... ८६
३६. उद्बोधन ... ... ८८
३७. निर्विशेष आत्मज्ञानसे अमृतत्वप्राप्ति ... ... ९०
३८. प्रस्तुत विज्ञानकी महिमा ... ... ९२
द्वितीय अध्याय
प्रथमा वल्ली
३९. आत्मदर्शनका विघ्न—इन्द्रियोंकी बहिर्मुखता ... ... ९४
४०. अविवेकी और विवेकीका अन्तर ... ... ९७
४१. आत्मज्ञकी सर्वज्ञता ... ... ९९
४२. आत्मज्ञकी निःशोकता ... ... १०१
४३. आत्मज्ञकी निर्भयता ... ... १०२
( ३ )
| विषय | पृष्ठ |
|---|---|
| ४४. ब्रह्मज्ञका सर्वात्म्यदर्शन | १०३ |
| ४५. अरणिस्थ अग्निमें ब्रह्मदृष्टि | १०५ |
| ४६. प्राणमें ब्रह्मदृष्टि | १०६ |
| ४७. भेददृष्टिकी निन्दा | १०७ |
| ४८. हृदयपुण्डरीकस्थ ब्रह्म | १०९ |
| ४९. भेदापवाद | १११ |
| ५०. अभेददर्शनकी कर्तव्यता | ११२ |
| द्वितीया वल्ली | |
| ५१. प्रकारान्तरसे ब्रह्मानुसन्धान | ११४ |
| ५२. देहस्थ आत्मा ही जीवन है | १२० |
| ५३. मरणोत्तरकालमें जीवकी गति | १२२ |
| ५४. गुह्य ब्रह्मोपदेश | १२४ |
| ५५. आत्माका उपाधिप्रतिरूपत्व | १२५ |
| ५६. आत्माकी असङ्गता | १२७ |
| ५७. आत्मदर्शी ही नित्य सुखी है | १२९ |
| ५८. सर्वप्रकाशकका अप्रकाश्यत्व | १३३ |
| तृतीया वल्ली | |
| ५९. संसाररूप अश्वत्थ वृक्ष | १३६ |
| ६०. ईश्वरके ज्ञानसे अमरत्वप्राप्ति | १४० |
| ६१. सर्वशासक प्रभु | १४१ |
| ६२. ईश्वरज्ञानके बिना पुनर्जन्मप्राप्ति | १४२ |
| ६३. स्थानभेदसे भगवद्दर्शनमें तारतम्य | १४३ |
| ६४. आत्मज्ञानका प्रकार और प्रयोजन | १४४ |
| ६५. परमपदप्राप्ति | १४९ |
| ६६. आत्मोपलब्धिका साधन सद्बुद्धि ही है | १५२ |
| ६७. अमर कब होता है ? | १५५ |
| ६८. उपसंहार | १६० |
| ६९. शान्तिपाठ | १६३ |
मन्त्रार्थ, शाङ्करभाष्य और भाष्यार्थसहित
ॐ
तत्सद्ब्रह्मणे नमः
कठोपनिषद्
मन्त्रार्थ, शाङ्करभाष्य और भाष्यार्थसहित
यस्मिन् सर्वं यतः सर्वं यः सर्वं सर्वदृक्तथा ।
सर्वभावपदातीतं स्वात्मानं तं स्मराम्यहम् ॥
शान्तिपाठ
ॐ सह नाववतु । सह नौ भुनक्तु । सह वीर्यं करवावहै । तेजस्वि नावधीतमस्तु । मा विद्विषावहै ।
ॐ शान्तिः ! शान्तिः !! शान्तिः !!!
वह परमात्मा हम (आचार्य और शिष्य) दोनोंकी साथ-साथ रक्षा करें । हम दोनोंका साथ-साथ पालन करें । हम साथ-साथ विद्या-सम्बन्धी सामर्थ्य प्राप्त करें ! हम दोनोंका पढ़ा हुआ तेजस्वी हो । हम द्वेष न करें । त्रिविध तापकी शान्ति हो ।
| २ | कठोपनिषद् |
|---|
सम्बन्ध-भाष्य
| संस्कृत | हिन्दी |
|---|---|
| ॐ नमो भगवते वैवस्वताय मृत्यवे ब्रह्मविद्याचार्याय नचिकेतसे च। | ॐ ब्रह्मविद्याके आचार्य सूर्यपुत्र भगवान् यम और नचिकेताको नमस्कार है। |
| अथ काठकोपनिषद्वल्लीनां सुखार्थप्रबोधनार्थम् अल्पग्रन्था वृत्तिरारभ्यते। | अब कठोपनिषद्की वल्लियोंको सुगमतासे समझानेके लिये यह संक्षिप्त वृत्ति आरम्भ की जाती है। |
| (उपनिषच्छब्दार्थ-निरुक्तिः)<br>सदेर्धातोर्विशरणगत्यवसादनार्थस्योपनिपूर्वस्य क्विप्प्रत्ययान्तस्य रूपमुपनिषदिति। उपनिषच्छब्देन च व्याचिख्यासितग्रन्थप्रतिपाद्यवेद्यवस्तुविषया विद्योच्यते। केन पुनरर्थयोगेन उपनिषच्छब्देन विद्योच्यत इत्युच्यते। | विशरण (नाश), गति और अवसादन (शिथिल करना)—इन तीन अर्थोंवाली तथा 'उप' और 'नि' उपसर्गपूर्वक एवं 'क्विप्' प्रत्ययान्त 'सद्' धातुका 'उपनिषद्' यह रूप बनता है। उपनिषद् शब्दसे, जिस ग्रन्थकी हम व्याख्या करना चाहते हैं उसके प्रतिपाद्य और वेद्य ब्रह्मविषयक विद्याका प्रतिपादन किया जाता है। किस अर्थका योग होनेके कारण उपनिषद् शब्दसे विद्याका कथन होता है, सो बतलाते हैं। |
| ये मुमुक्षवो दृष्टानुश्रविकविषयवितृष्णाः सन्त उपनिषच्छब्दवाच्यां वक्ष्यमाणलक्षणां विद्याम् उपसद्योपगम्य तन्निष्ठतया निश्चयेन शीलयन्ति तेषामविद्यादेः | जो मोक्षकामी पुरुष लौकिक और पारलौकिक विषयोंसे विरक्त होकर उपनिषद्शब्दकी वाच्य तथा आगे कहे जानेवाले लक्षणोंसे युक्त विद्याके समीप जाकर अर्थात् उसे प्राप्त कर उसीकी निष्ठासे निश्चयपूर्वक उसका परिशीलन करते हैं |
शाङ्करभाष्यार्थ
| संस्कृत-भाष्य | हिन्दी-अनुवाद |
|---|---|
| संसारबीजस्य विशरणाद्धिंसनाद् विनाशनादित्यनेनार्थयोगेन विद्या उपनिषदित्युच्यते। तथा च वक्ष्यति—"निचाय्य तं मृत्युमुखात्प्रमुच्यते" (क० उ० १।३।१५) इति। | उनके अविद्या आदि संसारके बीजका विशरण—हिंसन अर्थात् विनाश करनेके कारण इस अर्थके योगसे ही 'उपनिषद्' शब्दसे वह विद्या कही जाती है। ऐसा ही आगे श्रुति कहेगी भी कि "उसे साक्षात् जानकर पुरुष मृत्युके मुखसे छूट जाता है।" |
| पूर्वोक्तविशेषणान्मुमुक्षून्वा परं ब्रह्म गमयतीति ब्रह्मगमयितृत्वेन योगाद्ब्रह्मविद्योपनिषत्। तथा च वक्ष्यति—"ब्रह्मप्राप्तो विरजोऽभूद्विमृत्युः" (क० उ० २।३।१८) इति। | अथवा पूर्वोक्त विशेषणोंसे युक्त मुमुक्षुओंको ब्रह्मविद्या परब्रह्मके पास पहुँचा देती है—इस प्रकार ब्रह्मके पास पहुँचानेवाली होनेके कारण इस अर्थके योगसे भी ब्रह्मविद्या 'उपनिषद्' है। ऐसा ही "ब्रह्मको प्राप्त हुआ पुरुष विरज (शुद्ध) और विमृत्यु (अमर) हो गया" इस वाक्यसे श्रुति आगे कहेगी भी। |
| लोकादिर्ब्रह्मजज्ञो योऽग्निस्तद्विषयाया विद्याया द्वितीयेन वरेण प्रार्थ्यमानायाः स्वर्गलोकफलप्राप्तिहेतुत्वेन गर्भवासजन्मजराद्युपद्रववृन्दस्य लोकान्तरे पौनःपुन्येन प्रवृत्तस्यावसादयितृत्वेन शैथिल्यापादनेन धात्वर्थ- | जो अग्नि भूः भुवः आदि लोकोंसे पूर्वसिद्ध, ब्रह्मासे उत्पन्न और ज्ञाता है उससे सम्बन्ध रखनेवाली विद्या, जो कि दूसरे वरसे माँगी गयी है, और स्वर्गलोकरूप फलकी प्राप्तिके कारणरूपसे लोकान्तरोंमें पुनः-पुनः प्राप्त होनेवाले गर्भवास, जन्म और वृद्धावस्था आदि उपद्रवसमूहका अवसादन अर्थात् शैथिल्य करनेवाली है, अतः वह अग्निविद्या भी 'सद्' धातुके |
| ४ | कठोपनिषद् |
|---|
| योगादग्निविद्याप्युपनिषदित्युच्यते। तथा च वक्ष्यति—"स्वर्गलोका अमृतत्वं भजन्ते" (क० उ० १।१।१३) इत्यादि। | अर्थके योगसे 'उपनिषद्' कही जाती है। "स्वर्गलोकको प्राप्त होनेवाले पुरुष अमरत्व प्राप्त करते हैं" ऐसा आगे कहेंगे भी। |
| ननु चोपनिषच्छब्देनाध्येतारो ग्रन्थमप्यभिलपन्ति। उपनिषदमधीमहेऽध्यापयाम इति च। | शङ्का—किन्तु अध्ययन करनेवाले तो 'उपनिषद्' शब्दसे ग्रन्थका भी उल्लेख करते हैं, जैसे—'हम उपनिषद् पढ़ते हैं अथवा पढ़ाते हैं' इत्यादि। |
| एवं नैष दोषोऽविद्यादिसंसारहेतुविशरणादेः सदिधात्वर्थस्य ग्रन्थमात्रेऽसम्भवाद्विद्यायां च सम्भवात्। ग्रन्थस्यापि तादर्थ्येन तच्छब्दत्वोपपत्तेः, आयुर्वै घृतम् इत्यादिवत्। तस्माद्विद्यायां मुख्याया वृत्त्योपनिषच्छब्दो वर्तते ग्रन्थे तु भक्त्येति। | समाधान—ऐसा कहना भी दोषयुक्त नहीं है। संसारके हेतुभूत अविद्या आदिके विशरण आदि, जो कि सद् धातुके अर्थ हैं, ग्रन्थमात्रमें तो सम्भव नहीं हैं किन्तु विद्यामें सम्भव हो सकते हैं। ग्रन्थ भी विद्याके ही लिये है; इसलिये वह भी उस शब्दसे कहा जा सकता है; जैसे [आयुवृद्धिमें उपयोगी होनेके कारण] 'घृत आयु ही है' ऐसा कहा जाता है। इसलिये 'उपनिषद्' शब्द विद्यामें मुख्य वृत्तिसे प्रयुक्त होता है तथा ग्रन्थमें गौणी वृत्तिसे। |
| एवमुपनिषन्निर्वचनेनैव विशिष्टोऽधिकारी विद्यायामुक्तः। विषयश्च विशिष्ट उक्तो विद्यायाः परं | इस प्रकार 'उपनिषद्' शब्दका निर्वचन करनेसे ही विद्याका विशिष्ट अधिकारी बतला दिया गया। तथा विद्याका प्रत्यगात्मस्वरूप पर- |
शाङ्करभाष्यार्थ
५
| ब्रह्म प्रत्यगात्मभूतम् । प्रयोजनं चास्या उपनिषद आत्यन्तिकी संसारनिवृत्तिर्ब्रह्मप्राप्तिलक्षणा । सम्बन्धश्चैवंभूतप्रयोजनेनोक्तः । अतो यथोक्ताधिकारिविषयप्रयोजनसम्बन्धाया विद्यायाः करतलन्यस्तामलकवत् प्रकाशकत्वेन विशिष्टाधिकारिविषयप्रयोजनसम्बन्धा एता वल्ल्यो भवन्ति इत्यतस्ताः यथाप्रतिभानं व्याचक्ष्महे । | ब्रह्मरूप विशिष्टविषय भी कह दिया । इसी प्रकार इस उपनिषद्का संसारकी आत्यन्तिक निवृत्ति और ब्रह्मप्राप्तिरूप प्रयोजन, तथा इस प्रकारके प्रयोजनसे इसका [साध्य-साधनरूप] सम्बन्ध भी बतला दिया । अतः उपर्युक्त अधिकारी, विषय, प्रयोजन और सम्बन्धवाली विद्याको करामलकवत् प्रकाशित करनेवाली होनेसे ये कठोपनिषद्की वल्लियाँ विशिष्ट अधिकारी, विषय, प्रयोजन और सम्बन्धवाली हैं, सो हम उनकी यथामति व्याख्या करते हैं । |
|---|
प्रथम अध्याय
प्रथम अध्याय
प्रथमा वल्ली
वाजश्रवसका दान
ॐ उशन्ह वै वाजश्रवसः सर्ववेदसं ददौ। तस्य ह नचिकेता नाम पुत्र आस ॥ १ ॥
प्रसिद्ध है कि यज्ञफलके इच्छुक वाजश्रवाके पुत्रने [विश्वजित् यज्ञमें] अपना सारा धन दे दिया। उसका नचिकेता नामक एक प्रसिद्ध पुत्र था ॥ १ ॥
| संस्कृत-भाष्य | हिन्दी-अनुवाद |
|---|---|
| तत्राख्यायिका विद्यास्तुत्यर्था। उशन्कामयमानः, ह वा इति वृत्तार्थस्मरणार्थौ निपातौ। वाजमन्नं तद्दानादिनिमित्तं श्रवो यशो यस्य स वाजश्रवा रूढितो वा। तस्यापत्यं वाजश्रवसः किल विश्वजिता सर्वमेधेनेजे तत्फलं कामयमानः। स तस्मिन्क्रतौ सर्ववेदसं सर्वस्वं धनं ददौ दत्तवान्। | यहाँ जो आख्यायिका है वह विद्याकी स्तुतिके लिये है। उशन् अर्थात् कामनावाला। 'ह' और 'वै' ये निपात पहले बीते हुए वृत्तान्तको स्मरण करानेके लिये हैं। 'वाज' अन्नको कहते हैं; उसके दानादिके कारण जिसका श्रव यानी यश हो उसे वाजश्रवा कहते हैं; अथवा रूढिसे भी यह उसका नाम हो सकता है। उस वाजश्रवाके पुत्र वाजश्रवसने, जिसमें सर्वस्व समर्पण किया जाता है उस विश्वजित् यज्ञद्वारा, उसके फलकी इच्छासे यजन किया। उस यज्ञमें उसने सर्ववेदस् यानी अपना |
वल्ली १ ] शाङ्करभाष्यार्थ ७
वल्ली १ ] शाङ्करभाष्यार्थ ७
| तस्य यजमानस्य ह नचिकेता नाम पुत्रः किलास बभूव ॥१॥ | सारा धन दे डाला। कहते हैं, उस यजमानका नचिकेता नामक एक पुत्र था ॥ १ ॥ |
|---|
तँहकुमारँसन्तं दक्षिणासु नीयमानासु श्रद्धा-विवेश सोऽमन्यत ॥ २ ॥
जिस समय दक्षिणाएँ (दक्षिणारूप गौएँ) ले जायी जा रही थीं, उसमें—यद्यपि अभी वह कुमार ही था—श्रद्धा (आस्तिक्यबुद्धि) का आवेश हुआ। वह सोचने लगा ॥ २ ॥
| तं ह नचिकेतसं कुमारं प्रथमवयसं सन्तमप्राप्तजननशक्तिं बालमेव श्रद्धास्तिक्यबुद्धिः पितुर्हितकामप्रयुक्ताविवेश प्रविष्टवती। कस्मिन्काल इत्याह—ऋत्विग्भ्यः सदस्येभ्यश्च दक्षिणासु नीयमानासु विभागेनोपनीयमानासु दक्षिणार्थासु गोषु स आविष्टश्रद्धो नचिकेता अमन्यत ॥ २ ॥ | जो कुमार अर्थात् प्रथम अवस्थामें ही स्थित है और जिसे पुत्रोत्पादनकी शक्ति प्राप्त नहीं हुई उस बालक नचिकेतामें श्रद्धाका अर्थात् पिताकी हितकामनासे प्रयुक्त आस्तिक्य बुद्धिका आवेश—प्रवेश हुआ। किस समय प्रवेश हुआ? इसपर कहते हैं—जिस समय ऋत्विक् और सदस्योंके लिये दक्षिणाएँ लायी जा रही थीं अर्थात् दक्षिणाके लिये विभाग करके गौएँ लायी जा रही थीं, उस समय नचिकेताने श्रद्धाविष्ट होकर विचार किया ॥२॥ |
|---|
| कथमित्युच्यते— | किस प्रकार विचार किया सो बतलाते हैं— |
|---|
८ | कठोपनिषद् | [ अध्याय १
| ८ | कठोपनिषद् | [ अध्याय १ |
|---|
नचिकेताकी शङ्का
पीतोदका जग्धतृणा दुग्धदोहा निरिन्द्रियाः ।
अनन्दा नाम ते लोकास्तान्स गच्छति ता ददत् ॥३॥
जो जल पी चुकी हैं, जिनका घास खाना समाप्त हो चुका है, जिनका दूध भी दुह लिया गया है और जिनमें प्रजननशक्तिका भी अभाव हो गया है उन गोओंका दान करनेसे वह दाता, जो अनन्द (आनन्द-शून्य) लोक हैं उन्हींको जाता है ॥ ३ ॥
| दक्षिणार्था गावो विशेष्यन्ते पीतमुदकं याभिस्ताः पीतोदकाः, जग्धं भक्षितं तृणं याभिस्ता जग्धतृणाः, दुग्धो दोहः क्षीराख्यो यासां ता दुग्धदोहाः, निरिन्द्रिया अप्रजननसमर्था जीर्णा निष्फला गाव इत्यर्थः । यास्ता एवंभूता गा ऋत्विग्भ्यो दक्षिणाबुद्ध्या ददत्प्रयच्छन्ननन्दा अनानन्दा असुखा नामेत्येतद्ये ते लोकास्तान्स यजमानो गच्छति ॥ ३ ॥ | दक्षिणाके लिये लायी हुई गौओंका विशेषण बतलाते हैं; जिन्होंने जल पी लिया है वे पीतोदका कहलाती हैं, जो तृण (घास) खा चुकी हैं [अर्थात् जिनमें और घास खानेकी शक्ति नहीं रही है] वे जग्धतृणा हैं, जिनका क्षीर नामक दोह दुहा जा चुका है वे दुग्धदोहा हैं तथा निरिन्द्रिया—जो सन्तान उत्पन्न करनेमें असमर्था अर्थात् बूढ़ी और निष्फल गौएँ हैं उन इस प्रकारकी गौओंको दक्षिणा-बुद्धिसे देनेवाला यजमान जो अनन्द अर्थात् सुखहीन लोक हैं उन्हींको जाता है ॥ ३ ॥ |
वल्ली १ ] शाङ्करभाष्यार्थ ९
वल्ली १ ] शाङ्करभाष्यार्थ ९
पिता-पुत्र-संवाद
स होवाच पितरं तत कस्मै मां दास्यसीति । द्वितीयं तृतीयं तꣳहोवाच मृत्यवे त्वा ददामीति ॥४॥
तब वह अपने पितासे बोला—'हे तात ! आप मुझे किसको देंगे ?' इसी प्रकार उसने दुबारा-तिबारा भी कहा । तब पिताने उससे 'मैं तुझे मृत्युको दूँगा' ऐसा कहा ॥ ४ ॥
| शाङ्करभाष्यम् | भाष्यार्थ |
|---|---|
| तदेवं क्रत्वसम्पत्तिनिमित्तं पितुरनिष्टं फलं मया पुत्रेण सता निवारणीयमात्मप्रदानेनापि क्रतुसम्पत्तिं कुर्व्वेत्येवं मत्वा पितरम् उपगम्य स होवाच पितरं हे तत तात कस्मै ऋत्विग्विशेषाय दक्षिणार्थं मां दास्यसि प्रयच्छसि इत्येतत् । एवमुक्तेन पित्रोपेक्ष्यमाणोऽपि द्वितीयं तृतीयमप्युवाच कस्मै मां दास्यसि कस्मै मां दास्यसीति । नायं कुमारस्वभाव इति क्रुद्धः सन्पिता तं ह पुत्रं किलोवाच मृत्यवे वैवस्वताय त्वा त्वां ददामीति ॥ ४ ॥ | तब, इस प्रकार यज्ञकी पूर्णता न होनेके कारण पिताको प्राप्त होनेवाला अनिष्ट फल मुझ-जैसे सत्पुत्रको आत्मबलिदान करके भी निवृत्त करना चाहिये—ऐसा मानकर वह पिताके समीप जाकर बोला—'हे तात ! आप मुझे किस ऋत्विग्विशेषको दक्षिणामें देंगे ?' इस प्रकार कहनेपर पिता-द्वारा बारम्बार उपेक्षा किये जानेपर भी उसने दूसरे-तीसरे बार भी यही बात कही कि 'मुझे किसको देंगे ? मुझे किसको देंगे ?' तब पिता यह सोचकर कि यह बालकोंके-से स्वभाववाला नहीं है, क्रोधित हो गया और उस पुत्रसे बोला—'मैं तुझे सूर्यके पुत्र मृत्युको देता हूँ' ॥४॥ |
| स एवमुक्तः पुत्र एकान्ते परिदेवयांचकार । कथम् ? इत्युच्यते— | पिताद्वारा इस प्रकार कहे जानेपर वह पुत्र एकान्तमें अनुताप करने लगा, किस प्रकार ? सो बतलाते हैं— |
१० | कठोपनिषद् | [ अध्याय १
| १० | कठोपनिषद् | [ अध्याय १ |
|---|
बहूनामेमि प्रथमो बहूनामेमि मध्यमः ।
किँस्विद्यमस्य कर्तव्यं यन्मयाद्य करिष्यति ॥ ५ ॥
मैं बहुत-से [शिष्य या पुत्रों] में तो प्रथम (मुख्य वृत्तिसे) चलता हूँ और बहुतोंमें मध्यम (मध्यम वृत्तिसे) जाता हूँ। यमका ऐसा क्या कार्य है जिसे पिता आज मेरेद्वारा सिद्ध करेंगे ॥ ५ ॥
| बहूनां शिष्याणां पुत्राणां वैमि गच्छामि प्रथमः सन्मुख्यया शिष्यादिवृत्त्येत्यर्थः । मध्यमानां च बहूनां मध्यमो मध्यमयैव वृत्त्यैमि । नाधमया कदाचिदपि । तमेवं विशिष्टगुणमपि पुत्रं मां मृत्यवे त्वा ददामीत्युक्तवान् पिता । स किंस्विद्यमस्य कर्तव्यं प्रयोजनं मया अत्तेन करिष्यति यत्कर्तव्यमद्य ? नूनं प्रयोजनम् अनपेक्ष्यैव क्रोधवशादुक्तवान् पिता । तथापि तत्पितुर्वचो मृषा मा भूदित्येवं मत्वा परिदेवनापूर्वकमाह पितरं शोकाविष्टं किं मयोक्तमिति ॥ ५ ॥ | मैं बहुत-से शिष्य अथवा पुत्रोंमें तो प्रथम अर्थात् आगे रहकर मुख्य शिष्यादि वृत्तिसे चलता हूँ तथा बहुत-से मध्यम शिष्यादिमें मध्यम रहकर मध्यम-वृत्तिसे बर्तता हूँ। अधम वृत्तिसे मैं कभी नहीं रहता। उस ऐसे विशिष्टगुणसम्पन्न पुत्रको भी पिताने 'मैं तुझे मृत्युको देता हूँ' ऐसा कहा। परन्तु यमका ऐसा कौन-सा कर्तव्य--प्रयोजन इन्हें पूर्ण करना है जिसे ये इस प्रकार दिये हुए मेरेद्वारा सिद्ध करेंगे? अवश्य किसी प्रयोजनकी अपेक्षा न करके ही पिताने क्रोधवश ऐसा कहा है। तथापि 'पिताका वचन मिथ्या न हो' ऐसा विचारकर उसने अपने पितासे, जो यह सोचकर कि 'मैंने क्या कह डाला?' शोकातुर हो रहे थे, खेदपूर्वक कहा ॥ ५ ॥ |
वल्ली १ ] शाङ्करभाष्यार्थ ११
वल्ली १ ] शाङ्करभाष्यार्थ ११
अनुपश्य यथा पूर्वे प्रतिपश्य तथापरे ।
सस्यमिव मर्त्यः पच्यते सस्यमिवाजायते पुनः ॥ ६ ॥
जिस प्रकार पूर्वपुरुष व्यवहार करते थे उसका विचार कीजिये तथा जैसे वर्तमानकालीन अन्य लोग प्रवृत्त होते हैं उसे भी देखिये । मनुष्य खेतीकी तरह पकता (वृद्ध होकर मर जाता) है और खेतीकी भाँति फिर उत्पन्न हो जाता है ॥ ६ ॥
| [सन्मार्गः सदैव सेवनीयः]<br><br>अनुपश्यालोचय निभालय अनुक्रमेण यथा येन प्रकारेण वृत्ताः पूर्वे अतिक्रान्ताः पितृपितामहादयस्तव । तानदृष्ट्वा च तेषां वृत्तमास्थातुमहर्हसि । वर्तमानाश्चापरे साधवो यथा वर्तन्ते तांश्च प्रतिपश्यालोचय तथा न च तेषु मृषाकरणं वृत्तं वर्तमानं वास्ति । तद्विपरीतमसतां च वृत्तं मृषाकरणम् । न च मृषा कृत्वा कश्चिदजरामरो भवति । यतः सस्यमिव मर्त्यो मनुष्यः पच्यते जीर्णो म्रियते । मृत्वा च सस्यमिव आजायत आविर्भवति पुनरेवमनित्ये जीव- | आपके पिता-पितामह आदि पुरुष अनुक्रमसे जिस प्रकार आचरण करते आये हैं उसकी आलोचना कीजिये—उसपर दृष्टि डालिये । उन्हें देखकर आपको उन्हींके आचरणोंका पालन करना चाहिये । तथा वर्तमानकालीन जो दूसरे साधुलोग आचरण करते हैं उनकी भी आलोचना कीजिये । उनमेंसे किसीका भी आचरण अपने कथनको मिथ्या करना नहीं था और न इस समय ही किसीका है । इसके विपरीत असत्पुरुषोंका आचरण मिथ्या करना ही है । किन्तु अपने आचरणको मृषा करके कोई अजर-अमर नहीं हो सकता । क्योंकि मनुष्य खेतीकी तरह पकता अर्थात् जीर्ण होकर मर जाता है, तथा मरकर खेतीके समान पुनः उत्पन्न—आविर्भूत हो जाता है । इस प्रकार इस अनित्य जीवलोकमें |
१२ | कठोपनिषद् | [ अध्याय १
| १२ | कठोपनिषद् | [ अध्याय १ |
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| लोके किं मृषाकरणेन । पालय आत्मनः सत्यम् । प्रेषय मां यमाय इत्यभिप्रायः ॥ ६ ॥ | असत्य आचरणसे लाभ ही क्या है ? अतः अपने सत्यका पालन कीजिये अर्थात् मुझे यमराजके पास भेजिये ॥ ६ ॥ |
यमलोकमें नचिकेता
| स एवमुक्तः पितात्मनः सत्यतायै प्रेषयामास । स च यमभवनं गत्वा तिस्रो रात्रीः उवास यमे प्रोषिते । प्रोष्यागतं यमममात्या भार्या वा ऊचुर्बोधयन्तः— | पुत्रके इस प्रकार कहनेपर पिताने अपनी सत्यताकी रक्षाके लिये उसे यमराजके पास भेज दिया । वह यमराजके घर पहुँचकर तीन रात्रि टिका रहा, क्योंकि यम उस समय बाहर गये हुए थे । प्रवाससे लौटनेपर यमराजसे उनकी भार्या अथवा मन्त्रियोंने समझाते हुए कहा— |
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वैश्वानरः प्रविशत्यतिथिर्ब्राह्मणो गृहान् ।
तस्यैतां शान्तिं कुर्वन्ति हर वैवस्वतोदकम् ॥ ७ ॥
ब्राह्मण-अतिथि होकर अग्नि ही घरोंमें प्रवेश करता है । [साधु पुरुष] उस अतिथिकी यह [अर्घ्य-पाद्य-दानरूपा] शान्ति किया करते हैं । अतः हे वैवस्वत ! [इस ब्राह्मण-अतिथिकी शान्तिके लिये] जल ले जाइये ॥ ७ ॥
| वैश्वानरोऽग्निरेव साक्षात् प्रविशत्यतिथिः सन्ब्राह्मणो गृहान्दहन्निव तस्य दाहं शमयन्त इवाग्नेरेतां पाद्यासनादिदानलक्षणां शान्तिं कुर्वन्ति सन्तोऽतिथेर्यतोऽतो हराहर हे वैवस्वत | ब्राह्मण-अतिथिके रूपमें साक्षात् वैश्वानर—अग्नि ही दग्ध करता हुआ-सा घरोंमें प्रवेश करता है । उस अग्निके दाहको मानों शान्त करते हुए ही साधु-गृहस्थजन यह पाद्यादि दानरूप शान्ति क्रिया करते हैं । अतः हे वैवस्वत ! |
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वल्ली १ ] शाङ्करभाष्यार्थ १३
वल्ली १ ] शाङ्करभाष्यार्थ १३
| उदकं नचिकेतेसे पाद्यार्थम्। यतश्चाकरणे प्रत्यवायः श्रूयते ॥ ७ ॥ | नचिकेताको पाद्य देनेके लिये जल ले जाइये। क्योंकि ऐसा न करनेमें प्रत्यवाय सुना जाता है ॥ ७ ॥ |
आशाप्रतीक्षे संगतꣳसूनृतां च
इष्टापूर्ते पुत्रपशूꣳश्च सर्वान् ।
एतद्वृङ्क्ते पुरुषस्याल्पमेधसो
यस्यानश्नन्वसति ब्राह्मणो गृहे ॥ ८ ॥
जिसके घरमें ब्राह्मण-अतिथि बिना भोजन किये रहता है उस मन्दबुद्धि पुरुषकी ज्ञात और अज्ञात वस्तुओंकी प्राप्तिकी इच्छाएँ, उनके संयोगसे प्राप्त होनेवाले फल, प्रिय वाणीसे होनेवाले फल, यागादि इष्ट एवं उद्यानादि पूर्त कर्मोंके फल तथा समस्त पुत्र और पशु आदिको वह नष्ट कर देता है ॥ ८ ॥
| [अतिथ्युपेक्षणे दोषाः]<br><br>आशाप्रतीक्षे अनिर्ज्ञातप्राप्येष्टार्थप्रार्थना आशा निर्ज्ञातप्राप्यार्थप्रतीक्षणं प्रतीक्षा ते आशाप्रतीक्षे, संगतं तत्संयोगजं फलम्, सूनृतां च सूनृता हि प्रिया वाक्तन्निमितं च, इष्टापूर्ते इष्टं यागजं पूर्तमारामादिक्रियाजं फलम्, पुत्रपशूंश्च पुत्रांश्च पशूंश्च सर्वानितत्सर्वं यथोक्तं वृङ्क्त आवर्जयति विनाशयतीत्येतत्—पुरुषस्याल्पमेधसोऽल्पप्रज्ञस्य—यस्यानश्नन्नभुञ्जानो ब्राह्मणो गृहे | जिसके घरमें ब्राह्मण बिना भोजन किये रहता है उस मन्दमति पुरुषके 'आशा-प्रतीक्षा'—आशा—जिनका कोई ज्ञान नहीं है उन प्राप्तव्य इष्ट पदार्थोंकी इच्छा तथा अपने प्राप्तव्य ज्ञात पदार्थोंकी प्रतीक्षा एवं संगत—उनके संयोगसे प्राप्त होनेवाले फल, सूनृता—प्रिय वाणी और उससे होनेवाले फल, 'इष्टापूर्त'—इष्ट—यागादिसे प्राप्त होनेवाले फल और पूर्त—बाग-बगीचोंके लगानेसे होनेवाले फल तथा पुत्र और पशु—इन उपर्युक्त सभीको नष्ट कर देता है। अतः तात्पर्य |
१४ | कठोपनिषद् | [ अध्याय १
| १४ | कठोपनिषद् | [ अध्याय १ |
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| वसति। तस्मादनुपेक्षणीयः सर्वावस्थास्वप्यतिथिरित्यर्थः ॥ ८ ॥ | यह है कि अतिथि सभी अवस्थाओंमें अनुपेक्षणीय है ॥ ८ ॥ |
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| एवमुक्तो मृत्युरुवाच नचिकेतसमुपगम्य पूजापुरःसरम्— | [मन्त्रियोंद्वारा] इस प्रकार कहे जानेपर यमराजने नचिकेताके पास जा उसकी पूजा करनेके अनन्तर कहा— |
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यमराजका वरप्रदान
तिस्रो रात्रीर्यदवात्सीर्गृहे मे
अनश्नन्ब्रह्मन्नतिथिर्नमस्यः ।
नमस्तेऽस्तु ब्रह्मन्स्वस्ति मेऽस्तु
तस्मात्प्रति त्रीन्वरान्वृणीष्व ॥ ९ ॥
हे ब्रह्मन् ! तुम्हें नमस्कार हो; मेरा कल्याण हो। तुम नमस्कार-योग्य अतिथि होकर भी मेरे घरमें तीन रात्रितक बिना भोजन किये रहे; अतः एक-एक रात्रिके लिये एक-एक करके मुझसे तीन वर माँगलो ॥९॥
| तिस्रो रात्रीर्यद्यस्मादवात्सीः उषितवानसि गृहे मे ममानश्नन् हे ब्रह्मन्नतिथिः सन्नमस्यो नमस्कारार्हश्च तस्मान्नमस्ते तुभ्यमस्तु भवतु । हे ब्रह्मन्स्वस्ति भद्रं मेऽस्तु तस्माद्भवतोऽनशनेन मद्गृहवासनिमित्ताद्दोषात्तत्प्राप्त्युपशमेन । यद्यपि भवदनुग्रहेण सर्वं मम स्वस्ति स्यात्तथापि त्वदधिक- | हे ब्रह्मन् ! क्योंकि अतिथि और नमस्कारयोग्य होकर भी तुम तीन रात्रितक बिना कुछ भोजन किये मेरे घरमें रहे हो, अतः तुम्हें नमस्कार है। हे ब्रह्मन् ! मेरे घरमें बिना भोजन किये आपके निवास करनेके निमित्तसे हुए दोषसे, उससे प्राप्त हुए अनिष्ट फलकी शान्तिद्वारा, मेरा मंगल—शुभ हो । यद्यपि तुम्हारी कृपासे ही मेरा सब प्रकार कल्याण हो जायगा, तथापि |
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वल्ली १ ] शाङ्करभाष्यार्थ १५
वल्ली १ ] शाङ्करभाष्यार्थ १५
| संप्रसादनार्थमनशनेनोपोषिताम् एकैकां रात्रिं प्रति त्रीन्वरान् वृणीष्व अभिप्रेतार्थविशेषान् प्रार्थयस्व मत्तः ॥ ९ ॥ | अपनी अधिक प्रसन्नताके लिये तुम बिना भोजन किये बितायी हुई एक-एक रात्रिके प्रति मुझसे तीन वर—अपने अभीष्ट पदार्थविशेष माँग लो ॥ ९ ॥ |
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| नचिकेतास्त्वाह—यदि दित्सुर्व्वरान्— | नचिकेताने कहा—यदि आप वर देना चाहते हैं तो— |
प्रथम वर—पितृपरितोष
शान्तसंकल्पः सुमना यथा स्या-
द्वीतमन्युर्गौतमो माभि मृत्यो ।
त्वत्प्रसृष्टं माभिवदेत्प्रतीत
एतत्त्रयाणां प्रथमं वरं वृणे ॥ १० ॥
हे मृत्यो ! जिससे मेरे पिता वाजश्रवस मेरे प्रति शान्तसङ्कल्प, प्रसन्नचित्त और क्रोधरहित हो जायँ तथा आपके भेजनेपर मुझे पहचानकर बातचीत करें—यह मैं [आपके दिये हुए] तीन वरोंमेंसे पहला वर माँगता हूँ ॥ १० ॥
| शान्तसंकल्प उपशान्तः संकल्पो यस्य मां प्रति यमं प्राप्य किं नु करिष्यति मम पुत्र इति स शान्तसंकल्पः सुमनाः प्रसन्नमनाश्च यथा स्याद्वीतमन्युर्विगतरrenderरोषश्च गौतमो मम पिता माभि मां प्रति हे मृत्यो किं च त्वत्प्रसृष्टं त्वया विनिर्मुक्तं प्रेषितं गृहं प्रति मामभिवदेत्प्रतीतो लब्ध- | जिस प्रकार मेरे पिता गौतम मेरे प्रति शान्तसङ्कल्प—जिनका ऐसा सङ्कल्प शान्त हो गया है कि 'न जाने मेरा पुत्र यमराजके पास जाकर क्या करेगा,' सुमनाः—प्रसन्नचित्त और वीतमन्यु—क्रोधरहित हो जायँ और हे मृत्यो ! आपके भेजे हुए—घरकी ओर जानेके लिये छोड़े हुए मुझसे विश्वस्त—लब्धस्मृति होकर अर्थात् |
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