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कठोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Katha Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished182 पृष्ठ

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कठोपनिषद्

सानुवाद शाङ्करभाष्यसहित


गीताप्रेस, गोरखपुर

प्रकाशक—गोविन्दभवन-कार्यालय, गीताप्रेस, गोरखपुर



| सं० १९९२ से २०५२ तक | १,६९,२५० | | सं० २०५३ तेईसवाँ संस्करण | ५,००० | | योग | १,७४,२५० |

<br>

मूल्य—आठ रुपये



मुद्रक—गीताप्रेस, गोरखपुर—२७३००५
दूरभाष—३३४७२१

प्राक्कथन

कठोपनिषद् कृष्णयजुर्वेदकी कठशाखाके अन्तर्गत है। इसमें यम और नचिकेताके संवादरूपसे ब्रह्मविद्याका बड़ा विशद वर्णन किया गया है। इसकी वर्णनशैली बड़ी ही सुबोध और सरल है। श्रीमद्भगवद्गीतामें भी इसके कई मन्त्रोंका कहीं शब्दतः और कहीं अर्थतः उल्लेख है। इसमें, अन्य उपनिषदोंकी भाँति जहाँ तत्त्वज्ञानका गम्भीर विवेचन है वहाँ नचिकेताका चरित्र पाठकोंके सामने एक अनुपम आदर्श भी उपस्थित करता है। जब वे देखते हैं कि पिताजी जीर्ण-शीर्ण गौएँ तो ब्राह्मणोंको दान कर रहे हैं और दूध देनेवाली पुष्ट गायें मेरे लिये रख छोड़ी हैं तो बाल्यावस्था होनेपर भी उनकी पितृभक्ति उन्हें चुप नहीं रहने देती और वे बालसुलभ चापल्य प्रदर्शित करते हुए वाजश्रवासे पूछ बैठते हैं—‘तत कस्मै मां दास्यसि’ (पिताजी, आप मुझे किसको देंगे?) उनका यह प्रश्न ठीक ही था, क्योंकि विश्वजित् यागमें सर्वस्वदान किया जाता है, और ऐसे सत्पुत्रको दान किये बिना वह पूर्ण नहीं हो सकता था। वस्तुतः सर्वस्वदान तो तभी हो सकता है जब कोई वस्तु ‘अपनी’ न रहे और यहाँ अपने पुत्रके मोहसे ही ब्राह्मणोंको निकम्मी और निरर्थक गौएँ दी जा रही थीं; अतः इस मोहसे पिताका उद्धार करना उनके लिये उचित ही था।

( २ )

इसी तरह कई बार पूछनेपर जब वाजश्रवाने खीझकर कहा कि मैं तुझे मृत्युको दूँगा, तो उन्होंने यह जानकर भी कि पिताजी क्रोधवश ऐसा कह गये हैं, उनके कथनकी उपेक्षा नहीं की। महाराज दशरथने वस्तुस्थितिको बिना समझे ही कैकेयीको वचन दिये थे; किन्तु भगवान् रामने उनकी गम्भीरताका निर्णय करनेकी कोई आवश्यकता नहीं समझी। जिस समय द्रौपदीके स्वयंवरमें अर्जुनने मत्स्यवेध किया और पाण्डवलोग द्रौपदीको लेकर अपने निवास-स्थानपर आये उस समय माता कुन्तीने बिना जाने-बूझे घरके भीतरसे ही कह दिया था कि 'सब भाई मिलकर भोगो'। माताकी यह उक्ति सर्वथा लोकविरुद्ध और भ्रान्तिजनित थी, परन्तु मातृभक्त पाण्डवोंको उसका अक्षरशः पालन ही अभीष्ट हुआ। ऐसा ही प्रसंग नचिकेताके सामने उपस्थित हुआ और उन्होंने भी अपने पिताके वचनकी रक्षाके लिये उनके मोहजनित वात्सल्य और अपने ऐहिक जीवनको सत्यकी वेदीपर निछावर कर दिया।

हमारे बहुत-से भाइयोंको इस प्रकारके अनभिप्रेत और अनर्गल कथनकी मर्यादा रखनेके लिये इतना सरदर्द मोल लेना कोरी भूल और भोलापन ही जान पड़ेगा। किन्तु उन्हें इसका रहस्य समझनेके लिये कुछ गम्भीर विचारकी आवश्यकता है। योगदर्शनके साधन-पादमें अहिंसा, सत्य, अस्तेय, ब्रह्मचर्य और अपरिग्रह इन पाँच यमोंका नाम-निर्देश करनेके अनन्तर ही कहा है—'जातिदेशकाल-समयानवच्छिन्नाः सार्वभौमा महाव्रतम्' (यो० सू० २।३१) अर्थात् जाति, देश, काल और कर्त्तव्यानुरोधकी अपेक्षा न करते हुए इनका सर्वथा पालन करना महाव्रत है तथा जाति, देश और कालादिकी अपेक्षासे पालन करना अल्पव्रत कहलाता है। इनमें अल्पव्रतमें ही लोकाचार, सुविधा और हानि-लाभ आदिके विचारकी गुञ्जाइश है। उसे हम व्यावहारिक धर्म कह सकते हैं। वह किसी विशेष सिद्धिका कारण नहीं हो सकता; सिद्धियोंकी प्राप्ति तो महाव्रतसे ही होती है। योगदर्शनमें इससे आगे जो भिन्न-भिन्न यम-नियमादिकी प्रतिष्ठासे भिन्न-भिन्न सिद्धियोंकी प्राप्ति बतलायी है वह महाव्रतीको ही हो सकती है। इस प्रकारका महाव्रत, व्यवहारी लोगोंकी दृष्टिमें

( ३ )

भले ही व्यर्थ आग्रह और मानसिक संकीर्णता जान पड़े तथापि वह परिणाममें सर्वदा मंगलमय ही होता है। भगवान् रामका वनवास, परशुरामजीका मातृवध, पुरुका यौवनदान, तथा पाँच पाण्डवोंका एक ही द्रौपदीके साथ पाणिग्रहण करना—ये सब प्रसङ्ग इसके ज्वलन्त प्रमाण हैं। ऐसा ही नचिकेताके साथ भी हुआ। उनका यमलोक-गमन उन्हींके लिये नहीं उनके पिताके लिये और सारे संसारके लिये भी कल्याणकर ही हुआ।

यमलोकमें पहुँचनेपर भी जबतक यमराजसे उनकी भेंट नहीं हुई तबतक उन्होंने अन्न-जल कुछ भी ग्रहण नहीं किया। इससे भी उनकी प्रौढ सत्यनिष्ठाका पता लगता है। उनका शरीर यमराजको दान किया जा चुका था, अतः अब उसपर यमराजका ही पूर्ण अधिकार था; उनका तो सबसे पहला कर्तव्य यही था कि वे उसे धर्मराजको सौंप दें। इसीसे वे भोजनाच्छादनादिकी चिन्ता छोड़कर यमराजके द्वारपर ही पड़े रहे। तीन दिन पश्चात् जब यमराज आये तो उन्होंने उन्हें एक-एक दिनके उपवासके लिये एक-एक वर दिया। इससे अतिथिसत्कारका महत्त्व प्रकट होता है। अतिथिकी उपेक्षा करनेसे कितनी हानि होती है—यह बात वहाँ (अ० १ व० १ मं० ७, ८ में) स्पष्टतया बतलायी गयी है।

इसपर नचिकेताने यमराजसे जो तीन वर माँगे हैं उनके क्रममें भी एक अद्भुत रहस्य है। उनका पहला वर था पितृपरितोष। वे पिताके सत्यकी रक्षाके लिये उनकी इच्छाके विरुद्ध यमलोकको चले आये थे। इससे उनके पिता स्वभावतः बहुत खिन्न थे। इसलिये उन्हें सबसे पहले यही आवश्यक जान पड़ा कि उन्हें शान्ति मिलनी चाहिये। यह नियम है कि यदि हमारे कारण किसी व्यक्तिको खेद हो तो, जबतक हम उसका खेद निवृत्त न कर देंगे, हमें भी शान्ति नहीं मिल सकती। यह नियम मनुष्यमात्रके लिये समान है; और यहाँ तो स्वयं उनके पूज्य पिताको ही खेद था; इसलिये सबसे पहले उनकी शान्ति अभीष्ट होनी ही चाहिये थी। यह पितृपरितोष उनकी दृष्ट शान्तिका कारण था, इसलिये सबसे पहले उन्होंने यही वर माँगा।

( ४ ) लौकिक शान्तिके पश्चात् मनुष्यको स्वभावसे ही पारलौकिक सुखकी इच्छा होती है; यहाँतक कि जब वह अधिक प्रबल हो जाती है तो वह ऐहिक सुखकी कुछ भी परवा नहीं करता । इसीलिये नचिकेताने भी दूसरे वरसे पारलौकिक सुख यानी स्वर्गलोककी प्राप्तिका साधनभूत अग्निविज्ञान माँगा; किन्तु इससे यह नहीं समझना चाहिये कि वे स्वर्गसुखके इच्छुक थे । जिस प्रकार उनके पहले वरमें पिताकी शान्तिकामना थी उसी प्रकार इसमें मनुष्यमात्र- की हितचिन्ता थी । सबके हितमें उनका भी हित था ही । वे स्वयं स्वर्गसुखके लिये लालायित नहीं थे । यह बात उस समय स्पष्ट हो जाती है जब यमराजके यह कहनेपर कि— ये ये कामा दुर्लभा मर्त्यलोके सर्वान्कामाँश्छन्दतः प्रार्थयस्व । इमा रामाः सरथाः सतूर्या न हीदृशा लम्भनीया मनुष्यैः । आभिर्मत्प्रत्ताभिः परिचारयस्व नचिकेतो मरणं मानुप्राक्षीः ॥ ( १ । १ । २५ ) वे कहते हैं— श्वोभावा मर्त्यस्य यदन्तकैतत्सर्वेन्द्रियाणां जरयन्ति तेजः । अपि सर्वं जीवितमल्पमेव तवैव वाहास्तव नृत्यगीते ॥२६॥ न वित्तेन तर्पणीयो मनुष्यो लप्स्यामहे वित्तमद्राक्ष्म चेत्त्वा । जीविष्यामो यावदीशिष्यसि त्वं वरस्तु मे वरणीयः स एव ॥२७॥ अजीर्यताममृतानामुपेत्य जीर्यन्मर्त्यः क्वधःस्थः प्रजानन् । अभिध्यायन्वर्णरतिप्रमोदानतिदीर्घे जीविते को रमेत ॥२८॥ यस्मिन्निदं विचिकित्सन्ति मृत्यो यत्साम्पराये महति ब्रूहि नस्तत् । योऽयं वरो गूढमनुप्रविष्टो नान्यं तस्मान्नचिकेता वृणीते ॥२९॥ ( अ० १ व० १ ) उपर्युक्त उद्धरणोंसे उनकी तीव्र जिज्ञासा और आत्मदर्शनकी अनवरत पिपासा स्पष्ट प्रतीत होती है । इसीसे प्रेरित होकर उन्होंने

( ५ )

तृतीय वर माँगा था। यमराजने उनकी जिज्ञासाकी परीक्षाके लिये उन्हें तरह-तरहके प्रलोभन दिये और बड़े-बड़े मनोमोहक सब्जबाग दिखलाये परन्तु आत्मामृतके लिये लालायित नचिकेताने उनपर कोई दृष्टि न देकर यही कहा ‘वरस्तु मे वरणीयः स एव’ ‘नान्यं तस्मान्नचिकेता वृणीते’ इत्यादि।

इस प्रकार, जब यमराजने देखा कि वे लौकिक और पारलौकिक भोगोंसे सर्वथा उदासीन हैं, उनमें पूर्ण विवेक विद्यमान है, वे शम-दमादि साधनोंसे सर्वथा सम्पन्न हैं और उनमें तीव्र मुमुक्षाकी प्रच्छन्न अग्नि तेज़ीसे धधक रही है तो उन्हें उनकी शान्तिके लिये ज्ञानामृतकी वर्षा करनी पड़ी। वह ज्ञानवर्षा ही सम्पूर्ण लोकोंका कल्याण करनेके लिये आज भी कठोपनिषद्के रूपमें विद्यमान है। परन्तु उससे विशुद्ध बोधरूप अंकुर तो उसी हृदयमें प्रस्फुटित हो सकता है जो नचिकेताके समान साधनचतुष्टयसम्पन्न है। परम उदार पयोधर जल तो सभी जगह बरसाते हैं परन्तु उससे परिणाम भिन्न-भिन्न भूमियोंकी योग्यतानुसार भिन्न-भिन्न होता है। ठीक यही बात शास्त्रोपदेशके विषयमें भी है। शास्त्रकृपा और ईश्वरकृपा तो सभीपर समान है परन्तु आत्मकृपाकी न्यूनाधिकताके कारण उससे होनेवाले परिणामोंमें अन्तर रहता है।

हम उस अनुपम अमृतका पानकर अमर जीवन प्राप्त कर सकें—ऐसी तीव्र आकांक्षासे हमें उससे लाभान्वित होनेकी योग्यता प्राप्त करनी चाहिये, क्योंकि ‘इह चेदवेदीदथ सत्यमस्ति न चेदिहावेदीन्महती विनष्टिः’ (के० उ० २।५) इस श्रुतिके अनुसार इस मानवजीवनका परमलाभ आत्मामृतकी प्राप्ति ही है। इसलिये इसकी प्राप्ति ही हमारा प्रथम कर्तव्य है। भगवान्‌से प्रार्थना है कि वे हमें उसकी प्राप्तिकी योग्यता प्रदान करें।

<p align="right">अनुवादक</p>

प्रथम अध्याय

श्रीहरिः

विषय-सूची

विषयपृष्ठ
१. शान्तिपाठ
२. सम्बन्ध-भाष्य

प्रथम अध्याय

प्रथमा वल्ली
विषयपृष्ठ
३. वाजश्रवसका दान
४. नचिकेताकी श्रद्धा
५. पिता-पुत्र-संवाद
६. यमलोकमें नचिकेता१२
७. यमराजका वरप्रदान१४
८. प्रथम वर—पितृपरितोष१५
९. स्वर्गस्वरूपप्रदर्शन१७
१०. द्वितीय वर—स्वर्गसाधनभूत अग्निविद्या१८
११. नाचिकेत अग्निचयनका फल२२
१२. तृतीय वर—आत्मरहस्य२७
१३. नचिकेताकी स्थिरता२९
१४. यमराजका प्रलोभन३०
१५. नचिकेताकी निरीहता३३
द्वितीया वल्ली
विषयपृष्ठ
१६. श्रेय-प्रेयविवेक३९
१७. अविद्याग्रस्तोंकी दुर्दशा४४
१८. आत्मज्ञानकी दुर्लभता४७
१९. कर्मफलकी अनित्यता५२

( २ )

२०. नचिकेताके त्यागकी प्रशंसा ... ... ५३
२१. आत्मज्ञानका फल ... ... ५४
२२. सर्वातीत वस्तुविषयक प्रश्न ... ... ५७
२३. ओङ्कारोपदेश ... ... ५८
२४. आत्मस्वरूपनिरूपण ... ... ६०
२५. आत्मा आत्मकृपासाध्य है ... ... ६८
२६. आत्मज्ञानका अनधिकारी ... ... ६९

तृतीया वल्ली

२७. प्राप्ता और प्राप्तव्य भेदसे दो आत्मा ... ... ७२
२८. शरीरादिसे सम्बन्धित रथादि रूपक ... ... ७५
२९. अविवेकीकी विवशता ... ... ७७
३०. विवेकीकी स्वाधीनता ... ... ७८
३१. अविवेकीकी संसारप्राप्ति ... ... ७९
३२. विवेकीकी परमपदप्राप्ति ... ... ७९
३३. इन्द्रियादिका तारतम्य ... ... ८१
३४. आत्मा सूक्ष्मबुद्धिग्राह्य है ... ... ८४
३५. लयचिन्तन ... ... ८६
३६. उद्बोधन ... ... ८८
३७. निर्विशेष आत्मज्ञानसे अमृतत्वप्राप्ति ... ... ९०
३८. प्रस्तुत विज्ञानकी महिमा ... ... ९२

द्वितीय अध्याय

प्रथमा वल्ली

३९. आत्मदर्शनका विघ्न—इन्द्रियोंकी बहिर्मुखता ... ... ९४
४०. अविवेकी और विवेकीका अन्तर ... ... ९७
४१. आत्मज्ञकी सर्वज्ञता ... ... ९९
४२. आत्मज्ञकी निःशोकता ... ... १०१
४३. आत्मज्ञकी निर्भयता ... ... १०२

( ३ )

विषयपृष्ठ
४४. ब्रह्मज्ञका सर्वात्म्यदर्शन१०३
४५. अरणिस्थ अग्निमें ब्रह्मदृष्टि१०५
४६. प्राणमें ब्रह्मदृष्टि१०६
४७. भेददृष्टिकी निन्दा१०७
४८. हृदयपुण्डरीकस्थ ब्रह्म१०९
४९. भेदापवाद१११
५०. अभेददर्शनकी कर्तव्यता११२
द्वितीया वल्ली
५१. प्रकारान्तरसे ब्रह्मानुसन्धान११४
५२. देहस्थ आत्मा ही जीवन है१२०
५३. मरणोत्तरकालमें जीवकी गति१२२
५४. गुह्य ब्रह्मोपदेश१२४
५५. आत्माका उपाधिप्रतिरूपत्व१२५
५६. आत्माकी असङ्गता१२७
५७. आत्मदर्शी ही नित्य सुखी है१२९
५८. सर्वप्रकाशकका अप्रकाश्यत्व१३३
तृतीया वल्ली
५९. संसाररूप अश्वत्थ वृक्ष१३६
६०. ईश्वरके ज्ञानसे अमरत्वप्राप्ति१४०
६१. सर्वशासक प्रभु१४१
६२. ईश्वरज्ञानके बिना पुनर्जन्मप्राप्ति१४२
६३. स्थानभेदसे भगवद्दर्शनमें तारतम्य१४३
६४. आत्मज्ञानका प्रकार और प्रयोजन१४४
६५. परमपदप्राप्ति१४९
६६. आत्मोपलब्धिका साधन सद्बुद्धि ही है१५२
६७. अमर कब होता है ?१५५
६८. उपसंहार१६०
६९. शान्तिपाठ१६३

मन्त्रार्थ, शाङ्करभाष्य और भाष्यार्थसहित

तत्सद्ब्रह्मणे नमः

कठोपनिषद्

मन्त्रार्थ, शाङ्करभाष्य और भाष्यार्थसहित


यस्मिन् सर्वं यतः सर्वं यः सर्वं सर्वदृक्तथा ।
सर्वभावपदातीतं स्वात्मानं तं स्मराम्यहम् ॥


शान्तिपाठ

ॐ सह नाववतु । सह नौ भुनक्तु । सह वीर्यं करवावहै । तेजस्वि नावधीतमस्तु । मा विद्विषावहै ।
ॐ शान्तिः ! शान्तिः !! शान्तिः !!!

वह परमात्मा हम (आचार्य और शिष्य) दोनोंकी साथ-साथ रक्षा करें । हम दोनोंका साथ-साथ पालन करें । हम साथ-साथ विद्या-सम्बन्धी सामर्थ्य प्राप्त करें ! हम दोनोंका पढ़ा हुआ तेजस्वी हो । हम द्वेष न करें । त्रिविध तापकी शान्ति हो ।

कठोपनिषद्

सम्बन्ध-भाष्य

संस्कृतहिन्दी
ॐ नमो भगवते वैवस्वताय मृत्यवे ब्रह्मविद्याचार्याय नचिकेतसे च।ॐ ब्रह्मविद्याके आचार्य सूर्यपुत्र भगवान् यम और नचिकेताको नमस्कार है।
अथ काठकोपनिषद्वल्लीनां सुखार्थप्रबोधनार्थम् अल्पग्रन्था वृत्तिरारभ्यते।अब कठोपनिषद्की वल्लियोंको सुगमतासे समझानेके लिये यह संक्षिप्त वृत्ति आरम्भ की जाती है।
(उपनिषच्छब्दार्थ-निरुक्तिः)<br>सदेर्धातोर्विशरणगत्यवसादनार्थस्योपनिपूर्वस्य क्विप्प्रत्ययान्तस्य रूपमुपनिषदिति। उपनिषच्छब्देन च व्याचिख्यासितग्रन्थप्रतिपाद्यवेद्यवस्तुविषया विद्योच्यते। केन पुनरर्थयोगेन उपनिषच्छब्देन विद्योच्यत इत्युच्यते।विशरण (नाश), गति और अवसादन (शिथिल करना)—इन तीन अर्थोंवाली तथा 'उप' और 'नि' उपसर्गपूर्वक एवं 'क्विप्' प्रत्ययान्त 'सद्' धातुका 'उपनिषद्' यह रूप बनता है। उपनिषद् शब्दसे, जिस ग्रन्थकी हम व्याख्या करना चाहते हैं उसके प्रतिपाद्य और वेद्य ब्रह्मविषयक विद्याका प्रतिपादन किया जाता है। किस अर्थका योग होनेके कारण उपनिषद् शब्दसे विद्याका कथन होता है, सो बतलाते हैं।
ये मुमुक्षवो दृष्टानुश्रविकविषयवितृष्णाः सन्त उपनिषच्छब्दवाच्यां वक्ष्यमाणलक्षणां विद्याम् उपसद्योपगम्य तन्निष्ठतया निश्चयेन शीलयन्ति तेषामविद्यादेःजो मोक्षकामी पुरुष लौकिक और पारलौकिक विषयोंसे विरक्त होकर उपनिषद्शब्दकी वाच्य तथा आगे कहे जानेवाले लक्षणोंसे युक्त विद्याके समीप जाकर अर्थात् उसे प्राप्त कर उसीकी निष्ठासे निश्चयपूर्वक उसका परिशीलन करते हैं

शाङ्करभाष्यार्थ


संस्कृत-भाष्यहिन्दी-अनुवाद
संसारबीजस्य विशरणाद्धिंसनाद् विनाशनादित्यनेनार्थयोगेन विद्या उपनिषदित्युच्यते। तथा च वक्ष्यति—"निचाय्य तं मृत्युमुखात्प्रमुच्यते" (क० उ० १।३।१५) इति।उनके अविद्या आदि संसारके बीजका विशरण—हिंसन अर्थात् विनाश करनेके कारण इस अर्थके योगसे ही 'उपनिषद्' शब्दसे वह विद्या कही जाती है। ऐसा ही आगे श्रुति कहेगी भी कि "उसे साक्षात् जानकर पुरुष मृत्युके मुखसे छूट जाता है।"
पूर्वोक्तविशेषणान्मुमुक्षून्वा परं ब्रह्म गमयतीति ब्रह्मगमयितृत्वेन योगाद्ब्रह्मविद्योपनिषत्। तथा च वक्ष्यति—"ब्रह्मप्राप्तो विरजोऽभूद्विमृत्युः" (क० उ० २।३।१८) इति।अथवा पूर्वोक्त विशेषणोंसे युक्त मुमुक्षुओंको ब्रह्मविद्या परब्रह्मके पास पहुँचा देती है—इस प्रकार ब्रह्मके पास पहुँचानेवाली होनेके कारण इस अर्थके योगसे भी ब्रह्मविद्या 'उपनिषद्' है। ऐसा ही "ब्रह्मको प्राप्त हुआ पुरुष विरज (शुद्ध) और विमृत्यु (अमर) हो गया" इस वाक्यसे श्रुति आगे कहेगी भी।
लोकादिर्ब्रह्मजज्ञो योऽग्निस्तद्विषयाया विद्याया द्वितीयेन वरेण प्रार्थ्यमानायाः स्वर्गलोकफलप्राप्तिहेतुत्वेन गर्भवासजन्मजराद्युपद्रववृन्दस्य लोकान्तरे पौनःपुन्येन प्रवृत्तस्यावसादयितृत्वेन शैथिल्यापादनेन धात्वर्थ-जो अग्नि भूः भुवः आदि लोकोंसे पूर्वसिद्ध, ब्रह्मासे उत्पन्न और ज्ञाता है उससे सम्बन्ध रखनेवाली विद्या, जो कि दूसरे वरसे माँगी गयी है, और स्वर्गलोकरूप फलकी प्राप्तिके कारणरूपसे लोकान्तरोंमें पुनः-पुनः प्राप्त होनेवाले गर्भवास, जन्म और वृद्धावस्था आदि उपद्रवसमूहका अवसादन अर्थात् शैथिल्य करनेवाली है, अतः वह अग्निविद्या भी 'सद्' धातुके
कठोपनिषद्

योगादग्निविद्याप्युपनिषदित्युच्यते। तथा च वक्ष्यति—"स्वर्गलोका अमृतत्वं भजन्ते" (क० उ० १।१।१३) इत्यादि।अर्थके योगसे 'उपनिषद्' कही जाती है। "स्वर्गलोकको प्राप्त होनेवाले पुरुष अमरत्व प्राप्त करते हैं" ऐसा आगे कहेंगे भी।
ननु चोपनिषच्छब्देनाध्येतारो ग्रन्थमप्यभिलपन्ति। उपनिषदमधीमहेऽध्यापयाम इति च।शङ्का—किन्तु अध्ययन करनेवाले तो 'उपनिषद्' शब्दसे ग्रन्थका भी उल्लेख करते हैं, जैसे—'हम उपनिषद् पढ़ते हैं अथवा पढ़ाते हैं' इत्यादि।
एवं नैष दोषोऽविद्यादिसंसारहेतुविशरणादेः सदिधात्वर्थस्य ग्रन्थमात्रेऽसम्भवाद्विद्यायां च सम्भवात्। ग्रन्थस्यापि तादर्थ्येन तच्छब्दत्वोपपत्तेः, आयुर्वै घृतम् इत्यादिवत्। तस्माद्विद्यायां मुख्याया वृत्त्योपनिषच्छब्दो वर्तते ग्रन्थे तु भक्त्येति।समाधान—ऐसा कहना भी दोषयुक्त नहीं है। संसारके हेतुभूत अविद्या आदिके विशरण आदि, जो कि सद् धातुके अर्थ हैं, ग्रन्थमात्रमें तो सम्भव नहीं हैं किन्तु विद्यामें सम्भव हो सकते हैं। ग्रन्थ भी विद्याके ही लिये है; इसलिये वह भी उस शब्दसे कहा जा सकता है; जैसे [आयुवृद्धिमें उपयोगी होनेके कारण] 'घृत आयु ही है' ऐसा कहा जाता है। इसलिये 'उपनिषद्' शब्द विद्यामें मुख्य वृत्तिसे प्रयुक्त होता है तथा ग्रन्थमें गौणी वृत्तिसे।
एवमुपनिषन्निर्वचनेनैव विशिष्टोऽधिकारी विद्यायामुक्तः। विषयश्च विशिष्ट उक्तो विद्यायाः परंइस प्रकार 'उपनिषद्' शब्दका निर्वचन करनेसे ही विद्याका विशिष्ट अधिकारी बतला दिया गया। तथा विद्याका प्रत्यगात्मस्वरूप पर-

शाङ्करभाष्यार्थ


ब्रह्म प्रत्यगात्मभूतम् । प्रयोजनं चास्या उपनिषद आत्यन्तिकी संसारनिवृत्तिर्ब्रह्मप्राप्तिलक्षणा । सम्बन्धश्चैवंभूतप्रयोजनेनोक्तः । अतो यथोक्ताधिकारिविषयप्रयोजनसम्बन्धाया विद्यायाः करतलन्यस्तामलकवत् प्रकाशकत्वेन विशिष्टाधिकारिविषयप्रयोजनसम्बन्धा एता वल्ल्यो भवन्ति इत्यतस्ताः यथाप्रतिभानं व्याचक्ष्महे ।ब्रह्मरूप विशिष्टविषय भी कह दिया । इसी प्रकार इस उपनिषद्‌का संसारकी आत्यन्तिक निवृत्ति और ब्रह्मप्राप्तिरूप प्रयोजन, तथा इस प्रकारके प्रयोजनसे इसका [साध्य-साधनरूप] सम्बन्ध भी बतला दिया । अतः उपर्युक्त अधिकारी, विषय, प्रयोजन और सम्बन्धवाली विद्याको करामलकवत् प्रकाशित करनेवाली होनेसे ये कठोपनिषद्‌की वल्लियाँ विशिष्ट अधिकारी, विषय, प्रयोजन और सम्बन्धवाली हैं, सो हम उनकी यथामति व्याख्या करते हैं ।

प्रथम अध्याय

प्रथम अध्याय

प्रथमा वल्ली

वाजश्रवसका दान

ॐ उशन्ह वै वाजश्रवसः सर्ववेदसं ददौ। तस्य ह नचिकेता नाम पुत्र आस ॥ १ ॥

प्रसिद्ध है कि यज्ञफलके इच्छुक वाजश्रवाके पुत्रने [विश्वजित् यज्ञमें] अपना सारा धन दे दिया। उसका नचिकेता नामक एक प्रसिद्ध पुत्र था ॥ १ ॥

संस्कृत-भाष्यहिन्दी-अनुवाद
तत्राख्यायिका विद्यास्तुत्यर्था। उशन्कामयमानः, ह वा इति वृत्तार्थस्मरणार्थौ निपातौ। वाजमन्नं तद्दानादिनिमित्तं श्रवो यशो यस्य स वाजश्रवा रूढितो वा। तस्यापत्यं वाजश्रवसः किल विश्वजिता सर्वमेधेनेजे तत्फलं कामयमानः। स तस्मिन्क्रतौ सर्ववेदसं सर्वस्वं धनं ददौ दत्तवान्।यहाँ जो आख्यायिका है वह विद्याकी स्तुतिके लिये है। उशन् अर्थात् कामनावाला। 'ह' और 'वै' ये निपात पहले बीते हुए वृत्तान्तको स्मरण करानेके लिये हैं। 'वाज' अन्नको कहते हैं; उसके दानादिके कारण जिसका श्रव यानी यश हो उसे वाजश्रवा कहते हैं; अथवा रूढिसे भी यह उसका नाम हो सकता है। उस वाजश्रवाके पुत्र वाजश्रवसने, जिसमें सर्वस्व समर्पण किया जाता है उस विश्वजित् यज्ञद्वारा, उसके फलकी इच्छासे यजन किया। उस यज्ञमें उसने सर्ववेदस् यानी अपना

वल्ली १ ] शाङ्करभाष्यार्थ ७

वल्ली १ ] शाङ्करभाष्यार्थ


तस्य यजमानस्य ह नचिकेता नाम पुत्रः किलास बभूव ॥१॥सारा धन दे डाला। कहते हैं, उस यजमानका नचिकेता नामक एक पुत्र था ॥ १ ॥

तँहकुमारँसन्तं दक्षिणासु नीयमानासु श्रद्धा-विवेश सोऽमन्यत ॥ २ ॥

जिस समय दक्षिणाएँ (दक्षिणारूप गौएँ) ले जायी जा रही थीं, उसमें—यद्यपि अभी वह कुमार ही था—श्रद्धा (आस्तिक्यबुद्धि) का आवेश हुआ। वह सोचने लगा ॥ २ ॥

तं ह नचिकेतसं कुमारं प्रथमवयसं सन्तमप्राप्तजननशक्तिं बालमेव श्रद्धास्तिक्यबुद्धिः पितुर्हितकामप्रयुक्ताविवेश प्रविष्टवती। कस्मिन्काल इत्याह—ऋत्विग्भ्यः सदस्येभ्यश्च दक्षिणासु नीयमानासु विभागेनोपनीयमानासु दक्षिणार्थासु गोषु स आविष्टश्रद्धो नचिकेता अमन्यत ॥ २ ॥जो कुमार अर्थात् प्रथम अवस्थामें ही स्थित है और जिसे पुत्रोत्पादनकी शक्ति प्राप्त नहीं हुई उस बालक नचिकेतामें श्रद्धाका अर्थात् पिताकी हितकामनासे प्रयुक्त आस्तिक्य बुद्धिका आवेश—प्रवेश हुआ। किस समय प्रवेश हुआ? इसपर कहते हैं—जिस समय ऋत्विक् और सदस्योंके लिये दक्षिणाएँ लायी जा रही थीं अर्थात् दक्षिणाके लिये विभाग करके गौएँ लायी जा रही थीं, उस समय नचिकेताने श्रद्धाविष्ट होकर विचार किया ॥२॥

कथमित्युच्यते—किस प्रकार विचार किया सो बतलाते हैं—

८ | कठोपनिषद् | [ अध्याय १

कठोपनिषद्[ अध्याय १

नचिकेताकी शङ्का

पीतोदका जग्धतृणा दुग्धदोहा निरिन्द्रियाः ।
अनन्दा नाम ते लोकास्तान्स गच्छति ता ददत् ॥३॥

जो जल पी चुकी हैं, जिनका घास खाना समाप्त हो चुका है, जिनका दूध भी दुह लिया गया है और जिनमें प्रजननशक्तिका भी अभाव हो गया है उन गोओंका दान करनेसे वह दाता, जो अनन्द (आनन्द-शून्य) लोक हैं उन्हींको जाता है ॥ ३ ॥

| दक्षिणार्था गावो विशेष्यन्ते पीतमुदकं याभिस्ताः पीतोदकाः, जग्धं भक्षितं तृणं याभिस्ता जग्धतृणाः, दुग्धो दोहः क्षीराख्यो यासां ता दुग्धदोहाः, निरिन्द्रिया अप्रजननसमर्था जीर्णा निष्फला गाव इत्यर्थः । यास्ता एवंभूता गा ऋत्विग्भ्यो दक्षिणाबुद्ध्या ददत्प्रयच्छन्ननन्दा अनानन्दा असुखा नामेत्येतद्ये ते लोकास्तान्स यजमानो गच्छति ॥ ३ ॥ | दक्षिणाके लिये लायी हुई गौओंका विशेषण बतलाते हैं; जिन्होंने जल पी लिया है वे पीतोदका कहलाती हैं, जो तृण (घास) खा चुकी हैं [अर्थात् जिनमें और घास खानेकी शक्ति नहीं रही है] वे जग्धतृणा हैं, जिनका क्षीर नामक दोह दुहा जा चुका है वे दुग्धदोहा हैं तथा निरिन्द्रिया—जो सन्तान उत्पन्न करनेमें असमर्था अर्थात् बूढ़ी और निष्फल गौएँ हैं उन इस प्रकारकी गौओंको दक्षिणा-बुद्धिसे देनेवाला यजमान जो अनन्द अर्थात् सुखहीन लोक हैं उन्हींको जाता है ॥ ३ ॥ |

वल्ली १ ] शाङ्करभाष्यार्थ ९

वल्ली १ ] शाङ्करभाष्यार्थ

पिता-पुत्र-संवाद

स होवाच पितरं तत कस्मै मां दास्यसीति । द्वितीयं तृतीयं तꣳहोवाच मृत्यवे त्वा ददामीति ॥४॥

तब वह अपने पितासे बोला—'हे तात ! आप मुझे किसको देंगे ?' इसी प्रकार उसने दुबारा-तिबारा भी कहा । तब पिताने उससे 'मैं तुझे मृत्युको दूँगा' ऐसा कहा ॥ ४ ॥

शाङ्करभाष्यम्भाष्यार्थ
तदेवं क्रत्वसम्पत्तिनिमित्तं पितुरनिष्टं फलं मया पुत्रेण सता निवारणीयमात्मप्रदानेनापि क्रतुसम्पत्तिं कुर्व्वेत्येवं मत्वा पितरम् उपगम्य स होवाच पितरं हे तत तात कस्मै ऋत्विग्विशेषाय दक्षिणार्थं मां दास्यसि प्रयच्छसि इत्येतत् । एवमुक्तेन पित्रोपेक्ष्यमाणोऽपि द्वितीयं तृतीयमप्युवाच कस्मै मां दास्यसि कस्मै मां दास्यसीति । नायं कुमारस्वभाव इति क्रुद्धः सन्पिता तं ह पुत्रं किलोवाच मृत्यवे वैवस्वताय त्वा त्वां ददामीति ॥ ४ ॥तब, इस प्रकार यज्ञकी पूर्णता न होनेके कारण पिताको प्राप्त होनेवाला अनिष्ट फल मुझ-जैसे सत्पुत्रको आत्मबलिदान करके भी निवृत्त करना चाहिये—ऐसा मानकर वह पिताके समीप जाकर बोला—'हे तात ! आप मुझे किस ऋत्विग्विशेषको दक्षिणामें देंगे ?' इस प्रकार कहनेपर पिता-द्वारा बारम्बार उपेक्षा किये जानेपर भी उसने दूसरे-तीसरे बार भी यही बात कही कि 'मुझे किसको देंगे ? मुझे किसको देंगे ?' तब पिता यह सोचकर कि यह बालकोंके-से स्वभाववाला नहीं है, क्रोधित हो गया और उस पुत्रसे बोला—'मैं तुझे सूर्यके पुत्र मृत्युको देता हूँ' ॥४॥
स एवमुक्तः पुत्र एकान्ते परिदेवयांचकार । कथम् ? इत्युच्यते—पिताद्वारा इस प्रकार कहे जानेपर वह पुत्र एकान्तमें अनुताप करने लगा, किस प्रकार ? सो बतलाते हैं—