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कुलार्णव तन्त्र (हिन्दी व्याख्या सहित)

Kularnava Tantra with Hindi Commentary

भगवान शिव / पं. भद्रशील शर्मा द्वारा

स्रोत: कल्याण मन्दिर प्रयाग · कल्याण मन्दिर प्रयाग · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished84 पृष्ठ

प्रकाशन करने से ‘दीप’ कहा जाता है।

७२ हिन्दी कुलार्णव आत्मसिद्धि देने से, सब रोगों को दूर करने से और नव- सिद्धियाँ प्रदान करने से ‘आसन’ कहलाता है। मायाजाल का शमन करने से, मोक्षमार्ग का निरूपण करने से और आठों प्रकार के दुःखों को दूर करने से ‘मद्य’ कहा जाता है। मङ्गलकारी होने से, संविदानन्द देने से और सब देवताओं का प्रिय होने से ‘मांस’ कहलाता है। पूर्वजन्म के पापों का शमन करने से, अपमृत्यु का निवारण करने से और सभी प्रकार का फल देने से ‘पूजा’ कही जाती है। अभीष्ट फल प्रदान करने से, चतुर्वर्ग-फलों का आश्रय होने से और सब देवताओं की वन्दना होने से ‘अर्चन’ कहलाता है। तत्त्वात्मक देवता को उसके परिवार-सहित आनन्द प्रदान करने से ‘तर्पण’ कहलाता है। गम्भीर पापों, दुर्भाग्य, क्लेशादि का नाश करने से और धर्म का ज्ञान प्रदान करने से ‘गन्ध’ कहा जाता है। आत्मज्ञान देने से, पापों का क्षय करने से और तादात्म्य करने से ‘अक्षत’ कहलाता है। पुण्य की वृद्धि करने से और पुष्कल अर्थदान करने से ‘पुष्प’ कहा जाता है। बड़े से बड़े दोष को दूर करने से और परमानन्द उत्पन्न करने से ‘धूप’ कहलाता है। अज्ञान और अहङ्कार को दूर करने से और परातत्त्व का प्रकाशन करने से ‘दीप’ कहा जाता है। मोह को शान्त करने से और क्षय आदि दुःखों का निवारण करने से तथा दिव्यरूप प्रदान कर परतत्त्व का प्रकाशन करने से ‘मोक्षदीप’ कहलाता है, जो मोक्षमार्ग का अचूक साधन है।

प्रकाशानन्द को उत्पन्न करने से और सामरस्य प्रदान करने से

साधनमाला ७३ छः रसों से युक्त चतुर्विध द्रव्यों को निवेदित करने से तृप्ति होती है। अतः 'नैवेद्य' कहलाता है। तत्त्वों का प्रकाश करने से 'तत्त्वत्रय' कहे जाते हैं। चतुर्वर्ग का फल देने से और अज्ञानबन्धन से छुटकारा दिलाने से तथा कल्याणकारी धर्म का मूल होने से 'चरुक' कहलाता है। प्रकाशानन्द को उत्पन्न करने से और सामरस्य प्रदान करने से तथा परतत्त्व का दर्शन होने से 'आनन्द' कहा जाता है। पाश को काटने से, नव तत्त्वों को धारण करने से और पवित्र करने के कारण 'स्नान' कहा जाता है। कर्म, मन और वाणी से सभी अवस्था में सदैव समीप रह- कर विधिपूर्वक सेवा करने से 'उपास्ति' कही जाती है। पञ्चाङ्ग उपासना से इष्टदेवता की प्रसन्नता मिलती है। उसे भक्त पहले करता है। अतः 'पुरश्चरण' कहलाता है। इस प्रकार 'गुरु' आदि नामों का रहस्य मैंने हे महेशानि ! संक्षेप में कहा। जो यह सब जानता है, वह कौलिक है। ऊर्ध्वाम्नाय का संक्षेप में वर्णन इस कुलार्णव शास्त्र में हुआ है। इसे गुरुमुख से समझना चाहिये। आवाहनादि सोलह या बारह कर्मों को विधिपूर्वक सम्पन्न करना 'उपहार' कहलाता है। सोलह उपचारों से देवता का पूजन कर उसे अपने स्थान को प्रेषित करना 'मृद्धासन' कहा जाता है। आसन पर सन्निवेशन करना ही 'स्थापन' है। देवता के शरीर में षडङ्गों का न्यास करना 'सकलीकरण' कहलाता है। देवता को आच्छादित करना (ढँकना) 'अवगुण्ठन' कहा जाता है।

७४ हिन्दी कुलार्णव धेनुमुद्रा को दिखाकर 'अमृतीकरण' किया जाता है। 'क्षमस्व' के साथ अंगुलि-प्रदर्शन 'परमीकरण' कहलाता है। देवता का स्वागत कर उससे कुशल-प्रश्न करना चाहिए। श्यामाक, दूर्वा, कमल-पुष्प और विष्णुक्रान्ता-युक्त 'पाद्य' रुचिकर होता है। 'आचमनीय' में जाती, लवङ्ग और कङ्कोल का मिश्रण निर्दिष्ट किया गया है। 'अर्घ्य' के अष्टाङ्ग ये बताये गये हैं— १ सिद्धार्थ (सरसों), २ अक्षत, ३ कुश का अग्रभाग, ४ तिल, ५ जौ, ६ गन्ध, ७ फल और ८ पुष्प। मधु, घृत और दधि से 'मधुपर्क' प्रस्तुत होता है। श्वेत चन्दन, कस्तूरी, कालागुरु आदि से सुगन्धित जल से देह को धोना ही 'स्नान' है। आठों अङ्गों से भूमि को स्पर्श करते हुए प्रणाम करना 'वन्दन' कहलाता है। यह सारा चराचर जगत् 'क्षेत्र' कहा गया है। इस क्षेत्र का जो पालन करता है, वह 'क्षेत्रपाल' कहलाता है।

साधनमाला वार्षिक मूल्य साधारण डाक-व्यय सहित १२), वार्षिक मूल्य सजिल्द प्रतियों के लिये १५) सिद्ध स्तोत्रमाला वार्षिक मूल्य साधारण डाक-व्यय सहित १०), वार्षिक मूल्य सजिल्द प्रतियों के लिये १३) गुप्तावतार दुर्लभ तन्त्रमाला वार्षिक मूल्य साधारण डाक-व्यय सहित १०) वार्षिक मूल्य सजिल्द प्रतियों के लिये १३) प्रयोगमाला वार्षिक मूल्य साधारण डाक-व्यय सहित ५) पता—कल्याण मन्दिर, कटरा, प्रयाग—२

हमारे प्रकाशन वाममार्ग ३), मन्त्रसिद्धि का उपाय २), मातृ उपासना २॥) पञ्चमकार तथा भावत्रय ३), हिन्दी शाक्तानन्द तरङ्गिणी २॥।), हिन्दी तन्त्रसार ६), हिन्दी कौलावली निर्णय ३।) श्रीभगवती गीता ३।), साधक का सम्वाद ३।।।), श्रीगायत्री तत्त्व विमर्श २), धनप्राप्ति के प्रयोग १), श्रीश्यामा सपर्या वासना ३।।), काली स्वरूप तत्त्व ।।=), श्री तारा स्वरूप तत्त्व २), श्री कल्पद्रुम दो भाग ५।।), श्रीत्रिपुरा महोपनिषद् १।।), मुमुक्षु मार्ग ३ भाग ६), सन्तानसुख प्राप्ति के प्रयोग १), भैरवा चक्रपूजन १)। सप्तशतं रहस्य ३।।), सप्तशती मीमांसा १।।।), दुर्गासप्तशती— शब्दशः पद्यानुवाद १।), चण्डी चरितावली ।।।), शतचण्डी विधान २।।।), चण्डिका माहात्म्य १)। उपदेश मुक्तावली—भजन-संग्रह ( दो भाग ) ६।।); दोहावली ।।), आरति-माला ।।।), श्री भैरवोपदेश २।।।), विनय सुधा १।) कौल- कीर्तन १), श्री उच्छ्लब गीताञ्जलि २। ) । श्रीकाली नित्यार्चन ३), श्रीश्यामा पूजा-पद्धति ३), श्रीतारा नित्यार्चन २।।), श्री श्रीविद्या नित्यार्चन ३।।), श्रीबाला नित्यार्चन ३), श्रीभुवनेश्वरी नित्यार्चन ३), वैदिक श्रीबगला पूजापद्धति....२), श्रीबगला नित्यार्चन २), श्रीछिन्नमस्ता नित्यार्चन २)। श्रीबालास्तवमञ्जरी २।।), श्री श्रीविद्या स्तवमञ्जरी ३।।), श्रीकाली स्तवमञ्जरी ३।।), श्रीतारास्तवमञ्जरी २।), श्रीदुर्गास्तवमञ्जरी २।।), दकारादि श्रीदुर्गानामसहस्रं ।।।), सविधि आपदुद्धार वटुकभैरवस्तोत्रं ।।।), चक्रपूजा के स्तोत्र १), आनन्दलहरी २।), सार्थ-सौन्दर्यलहरी ३।।), सविधि काली कर्पूरस्तवः १)। परातन्त्रम् १।।), मातृकाभेद-तन्त्र २।।), निरुत्तर तन्त्र २।।), ज्ञान- संकलिनी तन्त्र १।।), तोडलतन्त्र १।।), कुलार्णवतन्त्र ३।।), मन्त्रकोष २), काली-तन्त्रम् २), कामधेनु-तन्त्रम् २), श्री भुवनेश्वरी रहस्य ३)। हिन्दुओं की पोथी ३), अक्षयवट ।।), वन्देमातरम् २)। पता—कल्याण मन्दिर, कटरा, प्रयाग—२

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