लघुसिद्धान्तकौमुदी (वरदराजाचार्य - भैमी एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)
Laghu Siddhanta Kaumudi of Varadaraja with Hindi Commentary
आचार्य वरदराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१०२ भैमीव्याख्योपेतायां लघुसिद्धान्तकौमुद्यां नोट—‘ष्टु परे होने पर’ ऐसा न कह कर ‘ष्टु के साथ योग होने पर’ ऐसा इस लिये कहा है कि ‘पेष्टा’ आदि में ‘ष्टु’ का पूर्वयोग होने पर भी ‘स्तु’ को ‘ष्टु’ हो जाए। सूत्रे ‘ष्टुना’ इत्यत्र सहयोगे तृतीया बोध्या। (४) तट्टीका (उस की टीका, अथवा वह टीका)। ‘तद्+टीका’ [यहां ‘तस्य टीका’ ऐसा षष्ठी-तत्पुरुष अथवा कर्मधारयसमास हो सर्वनाम्नो वृत्तिमात्रे पुंव- द्भावः वार्त्तिक से पुंवद्भाव समझना चाहिये।] यहां टकार के योग में दकार को डकार हो कर खरि च (७४) सूत्र से डकार को टकार करने से ‘तट्टीका’ प्रयोग सिद्ध होता है। ग्रन्थकार को यहां पर बल्कि ‘सच्चित्’ प्रयोग पर ही खरि च (७४) सूत्र दर्शाना उचित था। नोट—यहां पर कुछ लोग ‘तत् + टीका’ ऐसा छेद करके सीधा ष्टुत्व कर दिया करते हैं, यह नितान्त अशुद्ध है, क्योंकि ष्टुना ष्टुः (८.४.४०) सूत्र की दृष्टि में खरि च (८.४.५४) सूत्र असिद्ध है अतः ष्टुत्व से पूर्व चर्व नहीं हो सकता, और यदि ‘तद्’ शब्द को दकारान्त न मान कर तकारान्त मानते हैं तो ‘अतितद्, अतितदौ, अतितदः’ इत्यादि प्रयोग उपपन्न नहीं हो सकते। (५) चक्रिण्ढौकसे (हे चक्रधारिन् ! तुम जाते हो)। ‘चक्रिन्+ढौकसे’ यहां ढकार का योग होने से नकार को णकार हो कर ‘चक्रिण्ढौकसे’ प्रयोग सिद्ध होता है। [लघु०] निषेध-सूत्रम्—(६५) न पदान्ताट्टोरनाम् ।८।४।४१॥ पदान्तात् टवर्गात् परस्याऽनामः स्तोः ष्टुर्न स्यात्। षट् सन्तः। षट् ते। पदान्तात् किम् ? ईट्टे। टोः किम् ? सर्पिष्टमम्॥ अर्थः—पदान्त टवर्ग से परे ‘नाम्’ के नकार को छोड़ कर अन्य सकार तवर्ग को षकार टवर्ग नहीं होता। व्याख्या—न इत्यव्ययपदम्। पदान्तात् ।५।१। टोः ।५।१। अनाम् ।६।१। (यहां षष्ठी के एकवचन ‘ङस्’ का लुक् हुआ है)। स्तोः ।६।१। (स्तोः श्चुना श्चुः से)। ष्टुः ।१।१। (ष्टुना ष्टुः से)। अर्थ —(पदान्तात्) पदान्त (टोः) टवर्ग से परे (अनाम्) नाम्शब्द के अवयव से भिन्न (स्तोः) सकार तवर्ग के स्थान पर (ष्टुः) षकार टवर्ग (न) नहीं होता। यह सूत्र ष्टुना ष्टुः (६४) सूत्र का अपवाद है। उदाहरण यथा— (१) षट् सन्तः (छः सज्जन)। ‘षड्+सन्तः’ [यहां ‘षड्’ सुबन्त होने से पदसंज्ञक है। इस रूप में प्रथम ङः सि धुँट् (८४) द्वारा वैकल्पिक ‘धुट्’ होता है। जहां ‘धुट्’ नहीं होता, उस पक्ष का यहां ग्रहण समझना चाहिये] यहां खरि च (८.४.५४) के असिद्ध होने से ष्टुना ष्टुः (८.४.४०) द्वारा सकार को षकार प्राप्त होता है। पुन इस सूत्र से उस का निषेध हो जाता है क्योंकि यहां पदान्त टवर्ग (डकार) से परे स्तु (सकार) को ष्टुत्व (षकार) करना है। अब खरि च (७४) से डकार को टकार हो कर—‘षट् सन्तः’ प्रयोग सिद्ध होता है। (२) षट् ते (वे छः)। ‘षड्+ते’ यहां खरि च (८.४.५४) के असिद्ध होने से ष्टना ष्टुः (८.४.४०) द्वारा ष्टुत्व अर्थात् तकार को टकार प्राप्त होता है, इस