लघुसिद्धान्तकौमुदी (वरदराजाचार्य - भैमी एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)
Laghu Siddhanta Kaumudi of Varadaraja with Hindi Commentary
आचार्य वरदराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंहल्-सन्धि-प्रकरणम् १०३ पर इस सूत्र से निषेध हो कर पुनः खरि च (७४) से चर्त्व टकार करने से 'षट् ते' प्रयोग सिद्ध होता है। इसी प्रकार—लिण्निमित्तः, इण्, लिट्सु आदि प्रयोगों में भी ष्टुत्व का निषेध समझ लेना चाहिये । पदान्तात् किम् ? ईट्टे । अब यहां यह प्रश्न उत्पन्न होता है कि पदान्त टवर्ग क्यों कहा ? केवल टवर्ग ही कह देते तो क्या हानि थी ? इस का उत्तर यह है कि यदि 'पदान्त' न कहते तो 'ईट्टे' (वह स्तुति करता है) यह प्रयोग अशुद्ध हो जाता। तथाहि—'ईड् + ते' [ईड् स्तुतौ (अदा०) धातु से लँट्, उसे 'त' आदेश, शप्, उस का लुक् तथा 'त' की टि= अकार को एकार हो यह रूप निष्पन्न होता है] यहां खरि च (८.४.५४) के असिद्ध होने से प्रथम ष्टुना ष्टुः (८.४.४०) से तकार को टकार तदनन्तर खरि च (८.४.५४) से डकार को टकार हो कर 'ईट्टे' प्रयोग सिद्ध होता है। अब यदि न पदान्ताट्टोर- नाम् (६५) सूत्र में 'टोः' पद का विशेषण 'पदान्तात्' नहीं बनाते तो यहां अपदान्त डकार से परे भी तवर्ग को टवर्ग करने का निषेध हो जाता; जो अनिष्ट था। अब 'पदान्तात्' कहने से कुछ भी दोष नहीं आता । टोः किम् ? सर्पिष्टमम् । प्रश्न—इस सूत्र में 'टवर्ग' का ग्रहण क्यों किया है ? केवल न पदान्तादनाम् इतना ही कह देते; अर्थात् 'पदान्त वर्ण से परे नाम् के नकार को छोड़ अन्य सकार तवर्ग को षकार टवर्ग नहीं होता' इतने मात्र के कथन से क्या हानि हो सकती थी ? उत्तर—यदि 'टवर्ग' का ग्रहण न करते तो पदान्त षकार से परे भी 'स्तु' को 'ष्टु' होने का निषेध हो जाता; इस से 'सर्पिष्टमम्' आदि प्रयोगों में ष्टुत्व न हो सकने से अनिष्ट हो जाता। तथाहि—'सर्पिस्' शब्द से 'तमप्' प्रत्यय करने पर ह्रस्वात्तादौ तद्धिते (८.३.१०१) सूत्र से सकार को षकार हो 'सर्पिष् + तम'। अब ष्टुना ष्टुः (६४) से ष्टुत्व अर्थात् तकार को टकार करने से 'सर्पिष्टमम्' (उत्तम घृत) प्रयोग निष्पन्न होता है। यहां स्वादिष्वसर्वनामस्थाने (१६४) सूत्र से 'सर्पिष्' की पद सञ्ज्ञा होने के कारण षकार पदान्त हो जाता है¹। अब यदि न पदान्ताट्टोरनाम् (६५) सूत्र में 'टोः' का ग्रहण न करते तो यहां पदान्त षकार से परे तकार को टकार होने का निषेध हो अनिष्ट रूप हो जाता; अतः सूत्र में 'टोः' का ग्रहण परमावश्यक है। [लघु०] वा०—(१०) अनाम्नवति-नगरीणामिति वाच्यम् ॥ षण्णाम् । षण्णवतिः । षण्णगर्यः ॥ अर्थ:—पदान्त टवर्ग से परे नाम्, नवति तथा नगरी शब्दों के नकार को छोड़ अन्य सकार तवर्ग को षकार टवर्ग न हो—ऐसा कहना चाहिये । १. यहां यह शङ्का नहीं करनी चाहिये कि झलाञ्जशोऽन्ते (६७) से षकार को डकार हो टवर्ग हो जाने से न पदान्ताट्टोरनाम् (६५) द्वारा ष्टुत्व का निषेध क्यों न हो जाये ? स्मरण रहे कि ह्रस्वात्तादौ तद्धिते (८.३.१०१) द्वारा किया गया षत्व झलाञ्जशोऽन्ते (८.२.३६) की दृष्टि में असिद्ध है। अतः डकारादेश नहीं होता।