भारतकोश
लघुसिद्धान्तकौमुदी (वरदराजाचार्य - भैमी एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)

लघुसिद्धान्तकौमुदी (वरदराजाचार्य - भैमी एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)

Laghu Siddhanta Kaumudi of Varadaraja with Hindi Commentary

आचार्य वरदराज द्वारा

DevanagariHindipublished633 पृष्ठ

पृष्ठ 119, कुल 633 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 119

१०४ भैमीव्याख्योपेतायां लघुसिद्धान्तकौमुद्यां व्याख्या = सूत्रकार [भगवान् पाणिनि] ने न पदान्ताट्टोरनाम् (६५) में केवल नाम् के नकार को ही ष्टुत्वनिषेध से मुक्त किया था, अतः नवति तथा नगरी शब्दों में ष्टुत्व-निषेध प्राप्त होने से दोष उत्पन्न होता था। यह देख कर वार्त्तिककार कात्यायन ने वार्त्तिक बनाया कि केवल 'नाम्' के नकार को ही ष्टुत्वनिषेध से मुक्त नहीं करना चाहिये, अपितु 'नवति' और 'नगरी' शब्दों को भी ष्टुत्वनिषेध से मुक्त कर देना चाहिये। वार्त्तिक में पुनः 'नाम्' का ग्रहण अनुवादार्थ है। उस के ग्रहण न करने में उस का बाध हो जाता, क्योंकि वार्त्तिक सूत्र का बाधक होता है। इन के उदाहरण यथा— (१) षण्णाम् (छः का)। षड्+नाम्' ['षष्' शब्द से षष्ठी का बहुवचन 'आम्' प्रत्यय करने पर 'षष्+आम्'। ष्णान्ता षट् (२६७) से 'षष्' की षट्-सञ्ज्ञा हो कर षट्चतुर्भ्यश्च (२६६) से 'आम्' को नुट्कागम कर 'षष्+नाम्'। अब स्वादि- ष्वसर्वनामस्थाने (१६४) से पद-सञ्ज्ञा हो झलाञ्जशोऽन्ते (६७) से षकार को डकार करने से 'षड्+नाम्' रूप बनता है] यहां न पदान्ताट्टोरनाम् (६५) सूत्र में ष्टुत्व-निषेध से 'नाम्' को मुक्त कर देने के कारण पदान्त टवर्ग=डकार से परे नकार को ष्टुना ष्टुः (६४) से ष्टुत्व=णकार हो, प्रत्यये भाषायां नित्यम् (वा० ११) 'वार्त्तिक द्वारा डकार को भी नित्य णकार करने से 'षण्णाम्' प्रयोग सिद्ध होता है। (२) षण्णवतिः (छियानवे)। 'षड्+नवति' ('षडधिका नवति' या 'षट् च नवतिश्च' इस विग्रह में क्रमशः तत्पुरुष और द्वन्द्व करने पर विभक्तियों का लुक् हो 'षड्+नवति' होता है। यहां उसी का ग्रहण है।) यहां अनाम्नवति० (वा० १०) इस प्रकृत वार्त्तिक में ष्टुत्वनिषेध से 'नवति' के मुक्त हो जाने के कारण पदान्त टवर्ग= डकार से परे नकार को ष्टुना ष्टुः (६४) से ष्टुत्व=णकार हो कर यरोऽनुनासिकेऽनु- नासिको वा (६८) सूत्र द्वारा डकार को भी विकल्प कर के णकार करने पर विभक्ति लाने से 'षण्णवति' तथा 'षड्णवति' ये दो प्रयोग सिद्ध होते हैं। (३) षण्णगर्यं (छः नगरियां हैं)। 'षड्+नगर्यं' यहां अनाम्नवति० (वा० १०) इस प्रकृत वार्त्तिक में ष्टुत्व-निषेध से 'नगरी' के भी मुक्त हो जाने के कारण पदान्त टवर्ग=डकार से परे नकार को ष्टुना ष्टुः (६४) से ष्टुत्व=णकार हो, यरोऽनुनासिकेऽनुनासिको वा (६८) सूत्र द्वारा डकार को भी विकल्प करके णकार करने से 'षण्णगर्यं' तथा 'षड् णगर्यं' ये दो प्रयोग सिद्ध होते हैं। ध्यान रहे कि यहां समास नहीं है। [लघु०] निषेध-सूत्रम्—(६६) तोः षि ।८।४।४२॥ (तवर्गस्य षकारे परे) न ष्टुत्वम्। सन्षष्ठः॥ अर्थः—षकार परे होने पर तवर्ग के स्थान पर षकार टवर्ग नहीं होता। व्याख्या—तो ।६।१। षि ।७।१। न इत्यव्ययपदम् (न पदान्ताट्टोरनाम् में)। ष्टु ।१।१। (ष्टुना ष्टुः से)। अर्थ—(षि) षकार परे होने पर (तो ) तवर्ग के