लघुसिद्धान्तकौमुदी (वरदराजाचार्य - भैमी एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)
Laghu Siddhanta Kaumudi of Varadaraja with Hindi Commentary
आचार्य वरदराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंहल्-सन्धि-प्रकरणम् १०५ स्थान पर (ष्टुः) षकार टवर्ग (न) नहीं होता। यह सूत्र ष्टुना ष्टुः (६४) का अप- वाद है। उदाहरण यथा— 'सन् + षष्ठः' यहां षकार के योग में ष्टुना ष्टुः (६४) से नकार को णकार प्राप्त होता है, जो अब इस सूत्र से निषेध कर देने के कारण नहीं होता—सन्षष्ठः (छठा श्रेष्ठ है)। स्मरण रहे कि यद्यपि यहां 'ष्टु' की अनुवृत्ति आती है तथापि तवर्ग के स्थान पर प्राप्त टवर्ग का ही इस सूत्र से निषेध होता है, क्योंकि षकार तो तवर्ग के स्थान पर प्राप्त ही नहीं, जो प्राप्त नही उस का पुनः निषेध कैसा ? यद्यपि यह तोः षि (८.४.४२) सूत्र ष्टुना ष्टुः (८.४.४०) सूत्र की दृष्टि में असिद्ध है, तथापि वचनसामर्थ्य से यह उस का अपवाद है। अपवादो वचनप्रामाण्याद् इति भाष्यम्। अभ्यास (१६) (१) अधोलिखित रूपों में सन्धिविच्छेद कर सन्धि-विधायक सूत्र लिखें— १. न पदान्ताट्टोरनाम्। २. कृपीट्। ३. गरुत्माण्डयते। ४. टिड्ढा- णञ्०। ५. पेष्टुम्। ६. सोमसुड्डौकसे। ७. ष्टष्टः। ८. स्याण्णी। (२) निम्नलिखित रूपों में सूत्र-निर्देश-पूर्वक सन्धि करें— १. भवान् + षण्डः। २. हरिस् + षडङ्गमधीते। ३. परिव्राट् + साधुः। ४. सोमसुत् + षडङ्गमधीते। ५. अग्निचित् + ठकार। ६. राट् + नगरी। ७. इट् + न। ८. हेतुमत् + णी। (३) ष्टुना ष्टुः (८.४.४०) की दृष्टि में तोः षि (८.४.४२) सूत्र त्रिपादी पर होने से असिद्ध है; तो पुनः किस प्रकार यह उस का अपवाद हो सकता है ? ---------::o::--------- [लघु०] विधि-सूत्रम्—(६७) झलां जशोऽन्ते ॥८।२।३६॥ पदान्ते झलां जशः स्युः। वागीशः॥ अर्थः—पद के अन्त में झलों के स्थान पर जश् हों। व्याख्या—पदस्य ।८।१। (यह अधिकृत है)। अन्ते ।७।१। झलाम् ।६।३। जशः ।१।३। अर्थः—(पदस्य) पद के (अन्ते) अन्त में (झलाम्) झलों के स्थान पर (जशः) जश् हो जाते हैं। भाव—झल् प्रत्याहार में वर्गों के चौथे, तीसरे, दूसरे, पहले तथा ऊष्म वर्ण आते हैं। ये वर्ण यदि पद के अन्त में स्थित होंगे तो इन के स्थान पर 'जश्', अर्थात् वर्गों के तीसरे वर्ण हो जाएंगे। स्थानेऽन्तरतमः (१७) से जिस का जिस के साथ स्थान तुल्य होगा; उस के स्थान पर वही आदेश होगा। यहां हम संपूर्ण स्थानी और आदेश वर्णों की तालिका नीचे दे रहे हैं—