लघुसिद्धान्तकौमुदी (वरदराजाचार्य - भैमी एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)
Laghu Siddhanta Kaumudi of Varadaraja with Hindi Commentary
आचार्य वरदराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१०६ भैमीव्याख्योपेतायां लघुसिद्धान्तकौमुद्यां झल् वर्ण | साम्य (स्थान) | जश् वर्ण (जो आदेश होते हैं) (जिन के स्थान पर 'जश्' होता है) | | झ् ज् छ् च् श् | तालु | ज् भ् ब् फ् प् | ओष्ठ | ब् घ् ग् ख् क् ह्¹ | कण्ठ | ग् ढ् ड् ठ् ट् ष् | मूर्धा | ड् ध् द् थ् त् स्² | दन्त | द् उदाहरण यथा- वागीश (वाणी का पति-बृहस्पति) । 'वाक्+ईश' [वाचामीश = वागीश । षष्ठीतत्पुरुष । यहां समास म विभक्तियों का लुक् होने पर चोः कुः (३०६) से पदान्त चकार को ककार हो जाता है ।] यहां इस सूत्र से पदान्त झल् = ककार के स्थान पर जश् = गकार हो कर विभक्ति लाने से 'वागीश' प्रयोग सिद्ध होता है । इस सूत्र के कुछ अन्य उदाहरण यथा- १ सुप्+अन्त = सुबन्त (सुप् अन्ते यस्य स सुबन्त) । २ तिप्+अन्त = तिबन्त (तिप् अन्ते यस्य स तिबन्त) । ३ समिध्+अत्र = समिदत्र । ४ समिध्+ आधानम् = समिदाधानम् । ५ सम्राट्+इच्छति = सम्राडिच्छति । ६ विद्युत्+ गच्छति = विद्युद् गच्छति । ७ त्रिष्टुभ्+आदि = त्रिष्टुब्वादि । ८ अनुष्टुभ्+एव = अनुष्टुब्वेव । ९ वाक्+अत्र = वागत्र । १० जगत्+ईश = जगदीश (जगत ईश = जगदीश ) । ११ अग्निमथ्+भ्याम् = अग्निमद्भ्याम् । १२ पद्+आगच्छन्ति = पदागच्छन्ति । १३ अप्+ज = अब्जम् (अद्भ्यो जायत इत्यब्जम्) । १४ त्विष्+ भ्याम् = त्विड्भ्याम् । १५ अच्+अन्त = अजन्त । इस सूत्र का फल प्रायः तभी दिखाई देता है जब झलों से परे 'खर्' न हो । खर् परे होने पर इस के किये कार्य को खरि च (७४) नष्ट कर देता है । यथा- 'जगत्+तिष्ठति' यहां झलां जशोऽन्ते (६७) से त् को द् हो खरि च (७४) से पुनः दकार को 'त्' हो गया है । इस लिये इस का फल अश् प्रत्याहार परे होने पर ही प्रतीत होता है । ध्यान रहे कि इस सूत्र की दृष्टि में खरि च (८.४.५५) तथा स्तोः श्चुना श्चुः (८.४.४०) आदि सूत्र असिद्ध हैं, परन्तु उन की दृष्टि में यह असिद्ध नहीं । १ हो ढः (२५१) आदि सूत्र 'ह्' के जश्त्व का बाध कर लेते हैं । २ ससजुषो रुः (१०५) सूत्र पदान्त में 'स्' के जश्त्व का बाध कर लेता है ।