भारतकोश
लघुसिद्धान्तकौमुदी (वरदराजाचार्य - भैमी एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)

लघुसिद्धान्तकौमुदी (वरदराजाचार्य - भैमी एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)

Laghu Siddhanta Kaumudi of Varadaraja with Hindi Commentary

आचार्य वरदराज द्वारा

DevanagariHindipublished633 पृष्ठ

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हल्-सन्धि-प्रकरणम् १०७ [लघु०] विधि-सूत्रम् - (६८) यरोऽनुनासिकेऽनुनासिको वा ।८।४।४५॥ यरः पदान्तस्यानुनासिके परेऽनुनासिको वा स्यात् । एतन्मुरारिः, एतद्मुरारिः ॥ अर्थः—अनुनासिक परे होने पर पदान्त यर् के स्थान पर विकल्प कर के अनु- नासिक हो जाता है। व्याख्या—पदान्तस्य ।६।१। (न पदान्ताट्टोरनाम् से विभक्तिविपरिणाम द्वारा)। यरः ।६।१। अनुनासिके ।७।१। अनुनासिकः ।१।१। वा इत्यव्ययपदम् । अर्थः— (अनुनासिके) अनुनासिक परे होने पर (पदान्तस्य) पदान्त (यरः) यर् के स्थान पर (वा) विकल्प कर के (अनुनासिकः) अनुनासिक आदेश हो जाता है। जो वर्ण मुख और नासिका दोनों से बोला जाये उसे 'अनुनासिक' कहते हैं [मुखनासिकावचनो- ऽनुनासिकः (६)]। अनुनासिक अच् और हल् दोनों प्रकार के होते हैं। पदान्त यर् से परे अनुनासिक अच् कहीं नहीं देखा जाता; अतः यहां हल् अनुनासिकों का ही ग्रहण होगा। हल् अनुनासिक पांच हैं—१. ङ्, २. ञ्, ३. ण्, ४. न्, ५. म् । इन पांच वर्णों में से किसी वर्ण के परे होने पर पदान्त यर् को विकल्प कर के अनुनासिक होगा। स्थानेऽन्तरतमः (१७) से वही अनुनासिक होगा; जिस का यर् के साथ स्थान तुल्य होगा। यथा—कवर्ग को ङ्, चवर्ग को ञ्, टवर्ग को ण्, तवर्ग को न्, पवर्ग को म्। उदाहरण यथा— 'एतद् + मुरारि' (एतस्य मुरारिः—एतद्मुरारिः, षष्ठीतत्पुरुषः, एष मुरारिः —एतद्मुरारिः, कर्मधारयसमासो वा) यहां समास में विभक्तियों का लुक् हो चुकने पर प्रत्ययलोपे प्रत्ययलक्षणम् (१६०) की सहायता से सुप्तिङन्तम्पदम् (१४) द्वारा एतद् की पद-सञ्ज्ञा हो जाती है; इस प्रकार दकार पद का अन्त ठहरता है। इस से परे मकार मुखनासिकावचनोऽनुनासिकः (६) के अनुसार अनुनासिक है। इस के परे होने पर अब दकार = यर् को अनुनासिक करना है। स्थानेऽन्तरतमः (१७) से दकार को नकार ही अनुनासिक होगा (लृतुलसानां दन्ताः) । तो इस प्रकार दकार को विकल्प कर के अनुनासिक नकार हो कर विभक्ति लाने से 'एतन्मुरारिः, एतद्मुरारिः' ये दो प्रयोग सिद्ध होते हैं। इस सूत्र के कुछ उदाहरण यथा— १. अग्निचित् + नयति = अग्निचिद् + नयति (झलां जशोऽन्ते) = अग्नि- चिन्नयति । २. तद् + न = तन्न । ३. दिग् + नाग = दिङ्नागः । इसी प्रकार—षत्रेमंम् नित्यम्, नद्याम्नीभ्यः, आङ् नद्याः । अन्य उदाहरण अभ्यास में देखें। यर् प्रत्याहार में यद्यपि ह् को छोड़ सब व्यञ्जन आ जाते हैं तथापि यहां यर् से केवल स्पर्श (वर्गगत) वर्णों का ही ग्रहण अभीष्ट है—स्पर्शस्यैवेष्यते। अत एव चतुर्मुखः, प्रातर्नयति, स्वनर्म आदि में पदान्त भी रेफ को अनुनासिक = णकार नहीं होता। इस का स्पष्टीकरण सिद्धान्तकौमुदी में देखें। यहां पर यर्ग्रहण अचो रहाभ्यां द्वे (६०) आदि उत्तरसूत्रों में अनुवृत्ति के लिये है।