लघुसिद्धान्तकौमुदी (वरदराजाचार्य - भैमी एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)
Laghu Siddhanta Kaumudi of Varadaraja with Hindi Commentary
आचार्य वरदराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१०८ भैमीव्याख्योपेतायां लघुसिद्धान्तकौमुद्यां पदान्त ग्रहण का यह प्रयोजन है कि—'शङ्खध्मा' आदि में अपदान्त यर् को अनुनासिक न हो। [लघु०] वा०—(११) प्रत्यये भाषायां नित्यम्॥ तन्मात्रम्। चिन्मयम्॥ अर्थ—लोक में अनुनासिकादि प्रत्यय परे होने पर पदान्त यर् को नित्य अनु- नासिक हो जाता है। - व्याख्या—प्रत्यये ।७।१। भाषायाम् ।७।१। नित्यम् ।२।१। (क्रियाविशेषणम्)। यह वार्त्तिक यरोऽनुनासिकेऽनुनासिको वा (६८) सूत्र पर भाष्य में पढ़ा गया है, अतः तद्विषयक ही समझना चाहिये। अतः इस का अर्थ होगा—(भाषायाम्) लोक में (अनुनासिके) अनुनासिकादि (प्रत्यये) प्रत्यय परे होने पर (पदान्तस्य) पदान्त (यर्) यर् के स्थान पर (नित्यम्) नित्य (अनुनासिक) अनुनासिक हो। पूर्वसूत्र से विकल्प प्राप्त होने पर इस से नित्य अनुनासिक होता है। उदाहरण यथा— (१) तन्मात्रम् (उतना ही)। 'तद्+मात्र' [तत् प्रमाणमस्येति तन्मात्रम्, प्रमाणे द्वयसज्दघ्नञ्मात्रच (११६४) इति मात्रच्-प्रत्यय।] यहां 'मात्रच्' प्रत्यय हो कर तद्धितान्त की प्रातिपदिक-संज्ञा होने से सुपो धातु-प्रातिपदिकयो (७२१) द्वारा तद् शब्द से परे सुं प्रत्यय का लुक् हो जाता है, अतः 'एतद्मुरारि' प्रयोग- गत 'एतद्' शब्द की तरह यहां भी दकार पदान्त है। इस पदान्त दकार=यर् से परे 'मात्रच्' यह अनुनासिकादि प्रत्यय किया गया है, अतः दकार को तत्सदृश नकार नित्य अनुनासिक हो कर विभक्ति लाने से 'तन्मात्रम्' प्रयोग सिद्ध हो जाता है¹। (२) चिन्मयम् (चेतनस्वरूप)। 'चित्+मय' [चिदेव चिन्मयम्, नित्यं वृद्धशरादिभ्य (१११०) इत्यत्र 'नित्यम्' इति योग-विभागात् स्वार्थे मयट्] यहां 'मयट्' प्रत्यय हो कर तद्धितान्त की प्रातिपदिक-संज्ञा होने से सुपो धातु-प्रातिपदिकयो (७२१) द्वारा सुं प्रत्यय का लुक् हो जाता है, अतः तकार पदान्त है। इस पदान्त तकार को प्रथम झलां जशोऽन्ते (६७) सूत्र से दकार हो कर पुनः इस वार्त्तिक से नित्य अनुनासिक नकार हो जाता है, तब विभक्ति लाने से 'चिन्मयम्' प्रयोग सिद्ध होता है। ध्यान रहे कि इस वार्त्तिक से भी पूर्ववत् पदान्त यर् को ही अनुनासिक विधान किया जाता है, अपदान्त यर् को नहीं। अतः एव—'स्वप्न, यत्न, क्षुभ्नाति, मथ्नाति, बध्नाति, मृद्नाति, वेद्मि' आदि प्रयोगों में अनुनासिकादि प्रत्यय परे होने पर भी अपदान्त यर् को अनुनासिक नहीं होता। नोट—यहां यह विशेष ज्ञातव्य है कि झलां जशोऽन्ते (८।२।३६) की दृष्टि में यह सूत्र (८।४।४४) असिद्ध है, अतः जहां झलां जशोऽन्ते (६७) सूत्र का विषय होगा वहां प्रथम जश्त्व हो कर पश्चात् अनुनासिक होगाँ। १ यहां नकार के असिद्ध होने से न लोप प्रातिपदिकान्तस्य द्वारा नलोप नहीं होता।