भारतकोश
लघुसिद्धान्तकौमुदी (वरदराजाचार्य - भैमी एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)

लघुसिद्धान्तकौमुदी (वरदराजाचार्य - भैमी एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)

Laghu Siddhanta Kaumudi of Varadaraja with Hindi Commentary

आचार्य वरदराज द्वारा

DevanagariHindipublished633 पृष्ठ

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हल्-सन्धि-प्रकरणम् १०६ अभ्यास (१७) (१) निम्नलिखित रूपों में सूत्र-समन्वय करते हुए सन्धिच्छेद करें— १. षण्मासाः। २. एतन्मनोहरः। ३. इणिन्पेघः। ४. तण्णकारः¹। ५. त्रिष्टुम्नाम। ६. तन्न। ७. सन्मार्गः। ८. मृन्मयम्²। ९. क्षुद्भिः। १०. सोमसुन्नयति। ११. त्वङ्मनसी। १२. ककुबीशः। १३. ककु- म्नायकः। १४. वाङ्मयम्। १५. अम्मयम्। १६. कियन्मात्रम्। (२) निम्न-लिखित प्रयोगों में सूत्रोपन्यासपूर्वक सन्धि करें— १. विपद् + मय। २. यद् + नैति। ३. तद् + लकार³। ४. मनाक् + हसति। ५. अप् + माय। ६. अग्निचित् + लकार। ७. कतिचित् + दिनानि। ८. मद् + नीतिः। ९. धिक् + मूर्खम्। १०. सत् + आचार। ११. वाक् + मलम्। १२. जगत् + नाथ। १३. ऋक् + मन्त्र। (३) निम्न-लिखित रूपों में सन्धि न करने का कारण बताओ। १. वेद् + मि। २. गरुत् + मत्⁴। ३. गृभ् + णाति। ४. प्रश् + न। ५. चतुर् + मुख। ६. प्रातर् + नमामि। (४) (क) खर् परे होने पर झलां जशोऽन्ते का फल क्यों प्रतीत नहीं होता? (ख) 'शङ्खध्माः' में धकार को अनुनासिक क्यों नहीं होता ? • (ग) सुँप् परे न होने पर भी 'एतन्मुरारिः' में दकार कैसे पदान्त है ? ――:०:―― [लघु०] विधि-सूत्रम्—(६६) तोर्लि ।८।४।६०॥ तवर्गस्य लकारे परे परसवर्णः। तल्लयः। विद्वाँल्लिखति। नस्या- ऽनुनासिको लः॥ अर्थः—लकार परे होने पर तवर्ग के स्थान पर पर-सवर्ण आदेश होता है। व्याख्या—तोः ।६।१। लि ।७।१। पर-सवर्णः ।१।१। (अनुस्वारस्य ययि पर- सवर्णः से)। समासः—परस्य सवर्णः=परसवर्णः, षष्ठी-तत्पुरुषः। अर्थः—(लि) लकार परे होने पर (तोः) तवर्ग के स्थान पर (पर-सवर्णः) पर-सवर्ण आदेश होता है। भाव यह है कि तवर्ग से जब लकार परे होगा तो तवर्ग के स्थान पर—पर अर्थात् लकार का सवर्ण आदेश किया जायेगा। लकार का लकार के सिवाय अन्य कोई सवर्ण नहीं, अतः तवर्ग के स्थान पर लकार ही आदेश होगा। लकार दो प्रकार का होता है; एक अनुनासिक (लँ) और दूसरा अननुना- १. यहां अनुनासिक-विधायक सूत्र के असिद्ध होने से प्रथम ष्टुत्व कर लेना चाहिये। २. यहां पर पदान्त होने से न् को ण् नहीं होता— पदान्तस्य (१३६)। ३. यहां पर प्रथम श्चुत्व कर लेना चाहिये। ४. यहां पर तसौ मत्वर्थे (११८२) सूत्र से भ सञ्ज्ञा होती है। पदान्त न होने से अनुनासिक नहीं होता।

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