भारतकोश
लघुसिद्धान्तकौमुदी (वरदराजाचार्य - भैमी एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)

लघुसिद्धान्तकौमुदी (वरदराजाचार्य - भैमी एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)

Laghu Siddhanta Kaumudi of Varadaraja with Hindi Commentary

आचार्य वरदराज द्वारा

DevanagariHindipublished633 पृष्ठ

पृष्ठ 125, कुल 633 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 125

भिन्न (ल्) । स्थानेऽन्तरतम (१७) के अनुसार तवर्गस्थ अनुनासिक वर्ण के स्थान पर अनुनासिक लकार तथा अननुनासिक वर्ण के स्थान पर अननुनासिक लकार होगा । तवर्गो में नकार के सिवाय अन्य कोई अनुनासिक नहीं, अतः केवल नकार के स्थान पर ही अनुनासिक लकार तथा शेष तवर्गीय वर्णों के स्थान पर अननुनासिक लकार होगा । उदाहरण यथा- तल्लय (उस में नाश या उस का नाश) । 'तद् + लय' (तस्मिंस्तस्य वा लय - तल्लय, सप्तमीतत्पुरुष, षष्ठी-तत्पुरुषो वा) यहां तवर्ग = दकार से परे लकार विद्यमान है, अतः तोर्लि (६६) सूत्र से दकार के स्थान पर पर-सवर्ण = लकार कर के विभक्ति लाने से 'तल्लय' प्रयोग सिद्ध होता है । विद्वाँल् लिखति (विद्वान् लिखता है) । 'विद्वान् + लिखति' इस दशा में तोर्लि (६६) सूत्र से नकार को पर-सवर्ण लकार आदेश होता है, परन्तु नकार के अनुना- सिक होने से लकार भी अनुनासिक आदेश हो कर 'विद्वाँल् लिखति' प्रयोग सिद्ध होता है। इस के कुछ अन्य उदाहरण यथा -१ विपद् + लीन = विपल्लीन् । २ कश्चिद् + लभते = कश्चिल्लभते । ३ कुशान् + लुनाति = कुशाँल् लुनाति । ४ महान्

  • लाभ = महाँल् लाभ । ५ उद् + लेख = उल्लेख । ६ धनवान् + लुनीते = धन- वाँल् लुनीते । ७ हनुमान् + लङ्का दहति = हनुमाँल् लङ्का दहति । ८ हसन् + लेढि = हसँल् लेढि । ६ जगद् + लीयते = जगल्लीयते । १०. तद् + लीला = तल्लीला । ११ तद् + लीन = तल्लीन । १२ यद् + लक्षणम् = यल्लक्षणम् । १३ चिद् + लय = चिल्लय । १४ विद्युद् + लेखा = विद्युल्लेखा । 'तस्मात् + लुवारात्' इत्यादि में तोर्लि (६६) प्रवृत्त नहीं होगा, क्योंकि इस में 'ल' -सदृश है, 'ल' नहीं। केवल जश्त्व ही होगा 'तस्माद् लुवारात्' । ध्यान रहे कि यह सूत्र झलां जशोऽन्ते (६७) की दृष्टि में असिद्ध है, अतः जहां उस का विषय होगा वहां प्रथम जश्त्व हो कर पश्चात् तोर्लि (६६) सूत्र प्रवृत्त होगा । यथा - जगत् + लीयते = जगद् + लीयते = जगल्लीयते । [लघु०] विधि-सूत्रम् - (७०) उदः स्था-स्तम्भोः पूर्वस्य ।८।४।६०॥ उद परयोः स्था-स्तम्भोः पूर्व-सवर्णः ॥ अर्थ - 'उद्' से (परे) स्था और स्तम्भ् को पूर्वसवर्ण हो । व्याख्या - उद ५।१। स्था-स्तम्भोः ६।२। पूर्वस्य ।६।१। सवर्ण १।१। (अनुस्वारस्य ययि परसवर्णः म०) । अर्थ -(उद ) 'उद्' उपसर्ग से (स्था-स्तम्भो ) स्था और स्तम्भ् के स्थान पर (पूर्वस्य) पूर्व का (सवर्ण) सवर्ण आदेश होता है । १ यद्यपि अनुस्वारस्य ययि पर-सवर्ण (७६) सूत्र में 'पर सवर्ण' है, तथापि अनु- वृत्ति केवल 'सवर्ण' की ही आनी है। इस का कारण यह है कि अनुवृत्ति अधि- कृत पदों की ही आया करती है और अधिकृति स्वरितेनाधिकारः (१।३।११) इस सूत्र में स्वरित-स्वर के बल से होती है। पूर्व समय में उक्त सूत्र में स्वरित-