लघुसिद्धान्तकौमुदी (वरदराजाचार्य - भैमी एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)
Laghu Siddhanta Kaumudi of Varadaraja with Hindi Commentary
आचार्य वरदराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंहल्-सन्धि-प्रकरणम् १११ 'उदः' यहां दिग्योग में पञ्चमी है; अर्थात् 'उद्' से किसी दिशा में स्थित स्था और स्तम्भ् को पूर्वसवर्ण होगा। वर्णों में दो ही दिशा सम्भव हो सकती हैं, एक पर और दूसरी पूर्व। अब यहां यह प्रश्न उत्पन्न होता है कि क्या 'उद्' से पूर्वस्थित स्था और स्तम्भ् को पूर्व-सवर्ण हो या परस्थित स्था और स्तम्भ् को पूर्वसवर्ण हो ? किञ्च—यह भी प्रश्न उत्पन्न होता है कि क्या व्यवधान से रहित पूर्व या पर-स्थित स्था और स्तम्भ् को पूर्व-सवर्ण हो या व्यवहित पूर्व या पर स्थित स्था और स्तम्भ् को भी पूर्वसवर्ण हो ? इन शङ्काओं की निवृत्ति के लिये अग्रिम परिभाषा-सूत्र लिखते हैं। [लघु०] परिभाषा-सूत्रम्—(७१) तस्मादित्युत्तरस्य ।१।१।६६॥ पञ्चमी-निर्देशेन क्रियमाणं कार्यं वर्णान्तरेणाऽव्यवहितस्य परस्य ज्ञेयम् ॥ अर्थः—पञ्चम्यन्त के निर्देश से क्रियमाण कार्य अन्य वर्णों के व्यवधान से रहित पर के स्थान पर जानना चाहिये। व्याख्या - तस्माद् इति पञ्चम्यन्तानुकरणं लुप्तपञ्चम्येकवचनान्तम् [उदः स्था-स्तम्भोः आदि सूत्रों में स्थित 'उदः' आदि पञ्चम्यन्त पदों का अनुकरण यहां 'तस्मात्' शब्द से किया गया है, इस के आगे पञ्चमी के एकवचन का सुपां सुलुक्० (७.१.३६) सूत्र से लुक् हुआ समझना चाहिये]। इति इत्यव्ययपदम्। निर्द्दिष्टात् ।५।१। (तस्मिन्निति निर्दिष्टे पूर्वस्य सूत्र से विभक्ति-विपरिणाम द्वारा) । उत्तरस्य ।६।१। अर्थः—(तस्माद् इति निर्द्दिष्टात्) उदः स्था-स्तम्भोः पूर्वस्य आदि सूत्रों में स्थित 'उदः' आदि पञ्चम्यन्त पदों के निरन्तर उच्चारण किये गये अर्थों से (उत्तरस्य) परले के स्थान पर कार्य होता है। पञ्चम्यन्त पदों के अर्थों का निरन्तर उच्चारण तभी हो सकता है जब उन से अव्यवहित [व्यवधान-रहित] उत्तर को कार्य्य हो; अतः यह सुतराम् आ जाता है कि सूत्रों में स्थित पञ्चम्यन्त पदों के अर्थों से अव्यवहित पर को कार्य हो। इस सूत्र की विशेष व्याख्या तस्मिन्निति निर्दिष्टे पूर्वस्य (१६) सूत्र के समान समझ लेनी चाहिये। हम यहां पिष्ट-पेषण करना नहीं चाहते। इस सूत्र से अन्ततोगत्वा यह ज्ञात होता है कि उदाहरणों में पञ्चम्यन्त पद के अर्थ से अव्यवहित पर को ही कार्य हो, पूर्व को अथवा व्यवहित पर को कार्य न हो। यथा—'उद्+प्रस्थानम्' यहां यद्यपि 'उद्' से 'स्था' परे है, तथापि 'प्र' शब्द का मध्य में व्यवधान होने से उदः स्थास्तम्भोः० (७०) सूत्र द्वारा पूर्व-सवर्ण नहीं होता। इसी प्रकार तिङ्ङतिङः (८.१.२८) [अतिङन्त से तिङन्त को निघात अर्थात् सर्वानु- स्वर केवल 'सवर्णः' पर था, 'पर' पर नहीं। यद्यपि अब स्वरितादि-स्वर-चिह्न नहीं रहे; तथापि प्रतिज्ञाऽनुनासिक्याः पाणिनीयाः की तरह प्रतिज्ञास्वरिताः पाणि- नीयाः भी जानना चाहिये। अथवा 'पर' में षष्ठी का लोप समझना चाहिये।