भारतकोश
लघुसिद्धान्तकौमुदी (वरदराजाचार्य - भैमी एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)

लघुसिद्धान्तकौमुदी (वरदराजाचार्य - भैमी एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)

Laghu Siddhanta Kaumudi of Varadaraja with Hindi Commentary

आचार्य वरदराज द्वारा

DevanagariHindipublished633 पृष्ठ

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पृष्ठ 127

११२ भैमीव्याख्योपेतायां लघुसिद्धान्तकौमुद्यां दात्तस्वर हो] सूत्र 'ईडे अग्निम्' में प्रवृत्त नहीं होता, क्योंकि 'अग्निम्' इस अतिङन्त पद में 'ईडे' यह तिङन्त पद परे नहीं, पूर्व में वर्त्तमान है। यह परिभाषा-सूत्र है। परिभाषाएं प्रयोगसिद्धि में स्वतन्त्रतया कुछ कार्य नहीं किया करतीं, अपितु सूत्रों के अर्थों में मिश्रित हो कर प्रयोगसिद्धि किया करती हैं, यह हम पीछे लिख चुके हैं। इस के अनुसार यह परिभाषा भी उदः स्था-स्तम्भोः पूर्वस्य (७०)आदि सूत्रों के साथ मिल कर एकार्थ उत्पन्न करेगी। तो अब उदः स्थास्तम्भोः पूर्वस्य (७०) सूत्र का यह अर्थ हो जायेगा—'उद्' से अव्यवहित पर स्था और स्तम्भ् को पूर्व-सवर्ण आदेश हो। इसी प्रकार तिङ्ङतिङ (८।१।२८) सूत्र का यह अर्थ होगा —अतिङन्त पद से अव्यवहित पर तिङन्त के स्थान पर निघात अर्थात् सर्वानुदात्त- स्वर हो। 'उद्+स्थान' 'उद्+स्तम्भन' इन दोनों स्थानों पर 'उद्' से परे अव्यवहित स्था और स्तम्भ् विद्यमान हैं, अतः इन के स्थान पर पूर्व-सवर्ण करना है। अब 'स्था- स्तम्भो' के षष्ठ्यन्त होने से अलोऽन्त्यस्य (२१) सूत्र से इन के अन्त्य अल् के स्थान पर पूर्व-सवर्ण प्राप्त होता है, इस पर अलोऽन्त्यस्य (२१) की अपवाद परिभाषा लिखते हैं— [लघु०] परिभाषा-सूत्रम्—(७२) आदेः परस्य ।१।१।५३॥ परस्य यद् विहितं तत् तस्यादेर्बोध्यम् । इति सस्य थः ॥ अर्थः—पर के स्थान पर जो कार्य विधान किया जाता है, वह कार्य उस (पर) के आदि वर्ण के स्थान पर समझना चाहिये। व्याख्या—आदे ।६।१। अल् ।६।१। (अलोऽन्त्यस्य से)। परस्य ।६।१। अर्थ -- (परस्य) पर के स्थान पर विधान किया कार्य (आदे) उस के आदि (अल्) अल् के स्थान पर होता है। यहां सूत्रार्थ, अनुकूल पदों का अध्याहार कर के ही किया जाता है। 'उद्+स्थान' 'उद्+स्तम्भन' यहां तस्मादित्युत्तरस्य (७१) परिभाषा की सहायता से उदः स्था-स्तम्भोः पूर्वस्य (७०) सूत्र द्वारा परले स्था और स्तम्भ् को पूर्व- सवर्ण होना था, अब वह इस परिभाषा द्वारा पर के आदि अर्थात् सकार को होगा। अब यहां यह विचार प्रस्तुत होता है कि स् को पूर्व (दकार) का कौन सा सवर्ण हो ? क्योंकि पूर्व (दकार) का एक सवर्ण नहीं किन्तु पांच सवर्ण हैं—त्, थ्, द्, ध्, न्। इस शङ्का की निवृत्ति के लिये स्थानेऽन्तरतमः (१७) सूत्र उपस्थित हो कर कहता है कि 'प्राप्त हुए आदेशों में अत्यन्त सदृश आदेश हो'। इस के अनुसार अब हमें 'त्, थ्, द्, ध्, न्' इन पांच वर्णों में से सकार के अत्यन्त सदृश वर्ण ढूंढना है। यदि यहां स्थानकृत आन्तर्य (सादृश्य) देखते हैं तो वह लृतुलसानां दन्ताः के अनुसार सब में समान है; अतः इस आन्तर्य से काम नहीं चल सकता। अर्थकृत और प्रमाण- कृत सादृश्य तो इन में हो ही नहीं सकता। अतः अब शेष बचे गुणकृत आन्तर्य अर्थात् यत्नों