भारतकोश
लघुसिद्धान्तकौमुदी (वरदराजाचार्य - भैमी एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)

लघुसिद्धान्तकौमुदी (वरदराजाचार्य - भैमी एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)

Laghu Siddhanta Kaumudi of Varadaraja with Hindi Commentary

आचार्य वरदराज द्वारा

DevanagariHindipublished633 पृष्ठ

पृष्ठ 128, कुल 633 में से

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पृष्ठ 128

हल्-सन्धि-प्रकरणम् ११३ द्वारा सादृश्य से ही परीक्षा करेंगे। यत्न—आभ्यन्तर और बाह्य दो प्रकार के होते हैं। इन में प्रथम आभ्यन्तर-यत्न तो सकार के साथ उन पांचों में से किसी का भी नहीं मिलता; क्योंकि ईषद्द्विवृतमूष्मणाम् के अनुसार सकार का 'ईषद्विवृत' और उन पांचों का तत्र स्पृष्टं प्रयत्नं स्पर्शानाम् के अनुसार 'स्पृष्ट' है। अतः बाह्य-यत्नों की दृष्टि से ही परीक्षा करते हैं। मकार का 'विवार, श्वास, अघोष और महाप्राण' बाह्य-यत्न है। उन पांचों के बाह्य-यत्न निम्नप्रकारेण हैं— ⎧ त् का बाह्ययत्न—विवार, श्वास, अघोष और अल्पप्राण है। ⎫ ⎪ थ् का बाह्ययत्न—विवार, श्वास, अघोष और महाप्राण है। ⎪ ⎨ द् का बाह्ययत्न—संवार, नाद, घोष और अल्पप्राण है। ⎬ ⎪ ध् का बाह्ययत्न—संवार, नाद, घोष और महाप्राण है। ⎪ ⎩ न् का बाह्ययत्न—संवार, नाद, घोष और अल्पप्राण है। ⎭ इस से सिद्ध होता है कि बाह्ययत्नों की दृष्टि से थकार ही सकार के तुल्य है। अतः सकार के स्थान पर पूर्वसवर्ण थकार ही होता है— उद्+स्थान, उद्+ थ्तम्भन। अब अग्रिमसूत्र प्रवृत्त होता है— [लघु०] विधि-सूत्रम् (७३) झरो झरि सवर्णे ।८।४।६४॥ हलः परस्य झरो वा लोपः सवर्णे झरि ॥ अर्थः—हल् से परे झर् का विकल्प से लोप हो सवर्ण झर् परे हो तो। व्याख्या हलः ।५।१। (हलो यमां यमि लोपः से)। झरः ।६।१। लोपः ।१।१। (हलो यमां यमि लोपः से)। अन्यतरस्याम् ।७।१। (झयो होऽन्यतरस्याम् से)। सवर्णे ।७।१। झरि ।७।१। अर्थः—(हलः) हल् से¹ (झरः) अव्यवहित पर झर् का (अन्यत- रस्र्याम्) एक अवस्था में (लोपः) लोप हो जाता है (सवर्णे) सवर्ण (झरि) झर् परे हो तो। यहां निमित्त² और स्थानियों³ का यथासङ्ख्य नहीं होता; अर्थात् यहां 'झ् का झ् परे होने पर, भ् का भ् परे होने पर, घ् का घ् परे होने पर, ढ् का ढ् परे होने १. हल् से परे झर् का लोप विहित होने से 'पत्रम्, दत्त्वा, तत्त्वम्, सत्त्वम्, कित्त्वम्, डित्त्वम्, मित्रम्, क्षत्रियः, छत्रम्, छात्रः, पुत्रः' इत्यादि में 'त्' का और 'वाग्मी' में 'ग्' का लोप नहीं होगा। पत्र, तत्व, कित्व, वाग्मी आदि लिखना अपाणिनीय है। २. जिसके होने पर कोई कार्य हो उसे 'निमित्त' कहते हैं यथा इको यणचि (१५) में अच् परे होने पर इक् को यण् होता है तो अच् निमित्त है। झरो झरि सवर्णे (७३) सूत्र में झर् परे होने पर झर् का लोप कहा गया है तो परला 'झर्' निमित्त है। ३. जिस के स्थान पर कुछ किया जाता है उसे 'स्थानी' कहते हैं। यथा—झरो झरि सवर्णे (७३) में झर् के स्थान पर लोप विहित होने से 'झर्' स्थानी है; इसी प्रकार इको यणचि (१५) आदि में इक् आदि स्थानी हैं। ल० प्र० (८)

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