लघुसिद्धान्तकौमुदी (वरदराजाचार्य - भैमी एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)
Laghu Siddhanta Kaumudi of Varadaraja with Hindi Commentary
आचार्य वरदराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें११४ भैमीव्याख्योपेतायां लघुसिद्धान्तकौमुद्यां पर' इत्यादि क्रम से लोप नहीं होता, क्योंकि यदि ऐसा अभीष्ट होता तो आचार्य झरो झरि' इतना ही सूत्र बनाते 'सवर्णे' पद का ग्रहण न करते, अतः विदित होता है कि वे सवर्ण झर् मात्र परे होने पर झर् का लोप चाहते हैं। इस का प्रयोजन 'उद् थ् तम्भन' आदि प्रयोगों में थकार आदि का लोप करना है। 'उद् थ् थान' 'उद् थ् तम्भन' यहां हल् = दकार से परे इस सूत्र द्वारा झर् = प्रथम थकार का विकल्प कर के लोप हो जाता है, क्योंकि इस से परे थकार और तकार क्रमशः सवर्ण झर् विद्यमान हैं। इस प्रकार लोपपक्ष में- उद्+थान, उद्+ तम्भन । लोपाभाव में- उद्+थ्थान उद्+थ्स्तम्भन । अब इन सब स्थानों पर अग्रिमसूत्र प्रवृत्त होता है— [लघु०] विधि-सूत्रम्—(७४) खरि च ।८।४।५४॥ खरि झलां चरः स्युः । इत्युदो दस्य तः । उत्थानम् । उत्तम्भनम् ॥ अर्थ - खर् प्रत्याहार परे होने पर झलों के स्थान पर चर् हो जाता है। इत्युदो दस्य तः - इस सूत्र से उद् के दकार को तकार हो जाता है। व्याख्या-खरि ।७।१। च इत्यव्ययपदम् । झलाम् ।६।३। (झलां जश् झशि से)। चर् ।१।३। (अभ्यासे चर्च से वचन-विपरिणाम कर के) । अर्थ --(खरि) खर् प्रत्याहार परे होने पर (झलाम्) झलों के स्थान पर (चरः) चर् हो जाते हैं। वर्गों के प्रथम, द्वितीय तथा श्, ष्, स् वर्ण—'खर्' कहाते हैं। वर्गों के प्रथम तथा श्, ष्, स् वर्ण—'चर्' कहाते हैं। वर्गों के पञ्चम वर्णों को छोड़ कर शेष सब वर्गस्थ तथा ऊष्म वर्ण—'झल्' प्रत्याहार के अन्तर्गत हो जाते हैं। श्, ष्, स् इन झलों के स्थान पर श्, ष्, स् ही चर् होते हैं। यथा— 'निश्चय', 'रामश्चिनोति' यहां चकार खर् परे होने पर शकार झल् को शकार चर् ही हुआ है। 'वृष्टि', 'दृष्टि' यहां टकार खर् होने पर षकार झल् को षकार चर् ही हुआ है। 'अस्ति, स्त', 'रामस्स्य' यहां खर् परे होने पर सकार झल् को सकार चर् ही हुआ है। झल् प्रत्याहारान्तर्गत हकार से परे कभी खर् नहीं आता, क्योंकि खर् से पूर्व हकार को सदैव हो ढः (२५१) द्वारा ढकार हो जाता है। प्रश्न—यदि 'श्, ष्, स्' के स्थान पर 'श्, ष्, स्' होते हैं और हकार की जरूरत नहीं, तो झल् की बजाय झय् और चर् की बजाय चय् ही क्यों नहीं कह देते ? उत्तर—खरि च (७४) सूत्र में झल् और चर् की पीछे से अनुवृत्ति आ रही है, उसी से यहां काम चल जाता है, अब यदि झय् और चय् कहेंगे तो उन का ग्रहण करना पड़ेगा, इस में लाघव की बजाय गौरव-दोष उत्पन्न होगा, अतः इन अनुवर्तित झल् और चर् पदों से ही काम चलाने में लाघव है, किञ्च इन के ग्रहण से कोई दोष तो उत्पन्न होता ही नहीं। स्थानेऽन्तरतम (१७) सूत्र द्वारा जिस झल् का जिस चर् के साथ स्थान साम्य होगा, वही उसी के स्थान पर आदेश होगा। तालिका यथा—