लघुसिद्धान्तकौमुदी (वरदराजाचार्य - भैमी एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)
Laghu Siddhanta Kaumudi of Varadaraja with Hindi Commentary
आचार्य वरदराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंहल्-सन्धि-प्रकरणम् १२७ रूप में परिणत किया जायेगा । अर्थः---(डः) डकार से परे (वा) विकल्प कर के (सि-सः) सकार का अवयव (धुट्) धुट् हो जाता है । उदाहरण यथा— षड्+सन्तः (छः सज्जन) । यहां खरि च (८.४.५४) के असिद्ध होने से प्रथम इस सूत्र की प्रवृत्ति होती है । यहां डकार से परे 'सन्तः' पद का आदि सकार विद्यमान है, अतः उस सकार का अवयव 'धुट्' यह शब्द-समुदाय विकल्प से होगा । अब प्रश्न यह उत्पन्न होता है कि क्या 'धुट्' सकार का आद्यवयव हो या अन्तावयव? इस शङ्का की निवृत्ति के लिये अग्रिम परिभाषा-सूत्र लिखते हैं— [लघु०] परिभाषा-सूत्रम्—(८५) आद्यन्तौ टकितौ ।१।१।४५॥ टित्कितौ यस्योक्तौ तस्य क्रमादाद्यन्तावयवौ स्तः । षट्सन्तः, षट् सन्तः ॥ अर्थः--टित् और कित् जिस के अवयव कहे गये हों वे उस के क्रमशः आद्य- वयव तथा अन्तावयव होते हैं । व्याख्या—आद्यन्तौ ।१।२। टकितौ ।१।२। समासः—आदिश्च अन्तश्च= आद्यन्तौ । इतरेतरद्वन्द्वः । टश्च क् च =टकौ । टकारादकार उच्चारणार्थः । इतरेतर- द्वन्द्वः । टकौ इतौ ययोस्तौ टकितौ । बहुव्रीहिसमासः । अर्थः--(टकितौ) टकार इत् वाला तथा ककार इत् वाला क्रमशः (आद्यन्तौ) आद्यवयव तथा अन्तावयव होता है । किस का अवयव होता है ? ऐसी जिज्ञासा होने पर सुतरां यह आ जाता है कि जिस का अवयव विधान किया गया हो । 'क्रमशः' शब्द यथासङ्ख्यमनुदेशः समानाम् (२३) परिभाषा द्वारा प्राप्त होता है । 'षड्+सन्तः' यहां डः सि धुट् (८४) सूत्र से सकार का अवयव धुट् विधान किया गया है । धुट् के टकार की हलन्त्यम् (१) सूत्र से इत् सञ्ज्ञा होती है अतः धुट् टित् है । इस लिये यह सकार का आद्यवयव होगा । 'षड्+धुट् सन्तः' ऐसा हो कर हलन्त्यम् (१) द्वारा टकार तथा उपदेशेऽजनुनासिक इत् (२८) द्वारा उकार की इत्सञ्ज्ञा हो जाती है¹ पुनः इन इत्सञ्ज्ञकों का तस्य लोपः (३) से लोप करने पर— हो रहा है । इस शास्त्र में आगम प्रायः टित्, कित् या मित् होते हैं । धुट् आदि टित् हैं । कुँक्, टुंक् आदि कित् हैं । नुँम् आदि मित् आगम कहाते हैं । टित् का आगम जिसे कहा जाये उस के आदि में, कित् का आगम जिसे कहा जाये उस के अन्त में, तथा मित् का आगम जिसे कहा जाये उस के अन्त्य अच् से परे बैठता है । यह सब (८५, २४०) सूत्रों पर आगे स्पष्ट हो जायेगा । १. ध्यान रहे कि कुछ वैयाकरण यहां उकार आदि को उच्चारणार्थक मानते हुए प्रयोजनाभाव के कारण इन की इत्सञ्ज्ञा नहीं करते । परन्तु अन्य वैयाकरणों का कथन है कि उच्चारण भी तो एक प्रयोजन है अतः इन की इत्सञ्ज्ञा और लोप अवश्य करना चाहिये । इसी प्रकार आगे कुँक्-टुंक्-तुँक्-नुँम् अनँङ् आदियों में भी समझ लेना चाहिये ।