भारतकोश
लघुसिद्धान्तकौमुदी (वरदराजाचार्य - भैमी एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)

लघुसिद्धान्तकौमुदी (वरदराजाचार्य - भैमी एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)

Laghu Siddhanta Kaumudi of Varadaraja with Hindi Commentary

आचार्य वरदराज द्वारा

DevanagariHindipublished633 पृष्ठ

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१२८ भैमीव्याख्योपेताया लघुसिद्धान्तकौमुद्यां 'षड् + ध् मन्तः' । अत्र खरि च (७४) सूत्र से सकार शर् के परे होने पर धकार को तकार पुन उस तकार को भी खर् मान डकार को भी टकार हो कर षट्त्सन्तःप्रयोग निष्पन्न हुआ । जिस पक्ष में 'धुट्' आगम न हुआ उस पक्ष में खरि च (७४) से डकार को टकार हो कर 'षट सन्तः' प्रयोग सिद्ध हुआ । इस प्रकार इस के दो रूप बन गये । इस के अन्य उदाहरण यथा-१ लिट्त्सु लिट्सु । २ षट्त्सुखानि, षट् सुखानि । ३ तुराषाट्त्सरति तुराषाट् सरति । ४ षट्त्सन्ततय, षट् सन्ततय । ५ षटत्समस्या, षट समस्या । ६ षटत्सन्निकर्षा, षट सन्निकर्षा । इत्यादि । [लघु०] विधि सूत्रम्-(८६) ङणोः कुक्टुक् शरि ।।८।३।२८।। वा म्त ॥ अर्थ-शर् परे होने पर ङकार णकार को क्रमश विकल्प करके कुँक् और टुँक् का आगम हो जाता है । व्याख्या-ङणो ।६।२। कुक्टुँक् ।१।१। शरि ।७।१। वा इत्यव्ययपदम् (हे मपरे वा स) । समास-ङ् च ण् च=ङणौ, तयो = ङणोः । इतरेतरद्वन्द्व । कुँङ् च टुँक् च= कुँक्टुँक्, समाहारद्वन्द्व । अर्थ - (शरि) शर् परे होने पर (ङणो ) ङकार और णकार के अवयव (कुक्टुँक्) कुँक् और टुँक् (वा) विकल्प करके होते हैं। कुंक् और टुँक् कित् हैं अत आद्यन्तौ टकितौ (८५) परिभाषा से ये ङकार और णकार के अन्तावयव होंगे। यथासङ्ख्यपरिभाषा (२३) से ङकार को कुँक् तथा णकार को टुँक् का आगम होगा। उदाहरण यथा- 'प्राङ्+षष्ठ, सुगण्+षष्ठ' यहा ङकार णकार से परे षकार शर् विद्यमान है अत ङकार को कुँक् तथा णकार को टुँक् का आगम हो कर उकार और क्कार अनुबन्धो का लोप हो गया तो- [ कुँक्टुँक्पक्षे ] प्राङ्क्+षष्ठ । सुगण्ट्+षष्ठ । [कुँक्टुँकोरभावे] प्राङ्+षष्ठ । सुगण्+षष्ठ । अब कुँक्-टुँक्-पक्ष में अग्रिम वार्त्तिक प्रवृत्त होता है- [लघु०] वा०-(१४) चयो द्वितीया शरि पौष्करसादेरिति वाच्यम् ॥ प्राङ्ख्षष्ठ, प्राङ्क्षष्ठ, प्राङ्षष्ठ । सुगण्ठ्षष्ठ, सुगण्ट्षष्ठ, सुगण् षष्ठ ॥ अर्थ-शर् परे होने पर चय् प्रत्याहार के स्थान पर वर्गों के द्वितीय वर्ण विकल्प कर के हो जाने हैं। व्याख्या-चय ।६।२। द्वितीया ।१।३। शरि ।७।१। पौष्करसादे ।६।१। इति इत्यव्ययपदम् । वाच्यम् ।१।१। अर्थ -(चय) चय् अर्थात् वर्गों के प्रथम वर्गों के १ यहा चत्वं असिद्ध है अत चयो द्वितीया शरि० (वा० १४) से तकार को थकार नही होना । इसी प्रकार 'षट्त्सन्त' मे भी समझ लेना चाहिये। यहा ष्टुत्व का भी न पदान्ताट् टोरनाम् (६५) सूत्र से निषेध हो जाना है।