भारतकोश
लघुसिद्धान्तकौमुदी (वरदराजाचार्य - भैमी एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)

लघुसिद्धान्तकौमुदी (वरदराजाचार्य - भैमी एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)

Laghu Siddhanta Kaumudi of Varadaraja with Hindi Commentary

आचार्य वरदराज द्वारा

DevanagariHindipublished633 पृष्ठ

पृष्ठ 132, कुल 633 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 132

ल्-सन्धि-प्रकरणम् ११५ | झल् | साम्य | चर् | | (वे वर्ण जिन के स्थान पर आदेश होते हैं।) | (स्थान) | (आदेश होने वाले वर्ण) | | घ् , ग् , ख् , क् | कण्ठ | क् | | झ् , ज् , छ् , च् | तालु | च् | | ढ् , ड् , ठ् , ट् | मूर्धा | ट् | | ध् , द् , थ् , त् | दन्त | त् | | भ् , ब् , फ् , प् | ओष्ठ | प् | श्, ष्, स् के स्थान पर पूर्णतया तुल्य क्रमशः श्, ष्, स् आदेश होते हैं। भावः—वर्गों के दूसरे, तीसरे तथा चौथे वर्णों को वर्गों के प्रथम वर्ण हो जाते , यदि उन से परे वर्गों के पहले, दूसरे तथा श्, ष्, स्, वर्ण हों तो। अब इस सूत्र से पूर्वोक्त चारों स्थानों में उद् के दकार को चर्=तकार हो र निम्नलिखित रूप सिद्ध होते हैं— (लोपपक्ष में)—उत्थानम्, उत्तम्भनम् । (लोपाभाव में)—उत्थ्यानम्, उत्थम्भनम् । इस प्रकार प्रत्येक के दो-दो रूप सिद्ध होते हैं। ध्यान रहे कि लोपाभाव वाले रूपों में उदः स्था० (८.४.६०) द्वारा किया या पूर्वसवर्ण=थकार खरि च (८.४.५४) की दृष्टि में असिद्ध है अतः उसे सकार ही दीखता है इसलिये उस थकार को तकार आदेश नहीं होता । इस विषय पर शोधपूर्ण विस्तृत विचार हमारे अभिनव प्रकाशित शोधग्रन्थ न्यास-पर्यालोचन के पृष्ठ २६३ से ३००) पर देखें। अभ्यास (१८) (१) सूत्र-समन्वय करते हुए सन्धि करें— १. भेद्+तुम्। २. शिण्ड्+ढि। ३. उद् + स्थापयति। ४. भगवान् +लङ्घते। ५. छेद्+तव्यम् । ६. रुन्ध्+धः। ७. प्रत्+तम्। ८. लिप्+सा। ९ उद्+स्तम्भते। १०. उद्+स्थितः। ११. बन्द्+धुम्। १२. उद्+स्तम्भितुम्। (२) सूत्रोपपत्तिपूर्वक सन्धिच्छेद करें— १. पिण्ढ। २. भिन्नः। ३. धुक्षु। ४. उत्थाय। ५. उत्तम्मिता।