भारतकोश
लघुसिद्धान्तकौमुदी (वरदराजाचार्य - भैमी एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)

लघुसिद्धान्तकौमुदी (वरदराजाचार्य - भैमी एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)

Laghu Siddhanta Kaumudi of Varadaraja with Hindi Commentary

आचार्य वरदराज द्वारा

DevanagariHindipublished633 पृष्ठ

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पृष्ठ 133

११६ भैमीव्याख्योपेतायां लघुसिद्धान्तकौमुद्यां ६ युयुत्सव । ७ अग्निन्मत्सु । ८ अत्त । ९ रुन्ध । १० ऊर्गीयते¹ । ११ अवत्तम् । १२ उत्थातव्यम् । १३ आरिप्सते । १४ निबन्धा [तृच्] । १५ छिन्धि । १६ भिन्धि । (३) झरो झरि सवर्णे में 'सवर्णे' ग्रहण का प्रयोजन स्पष्ट करें । (४) तोर्लि सूत्र द्वारा नकार को अनुनासिक लकार ही क्यो होता है ? (५) खर् परे होने पर श्, ष्, स् के स्थान पर कौन से चर् होंगे ? (६) निमित्त, स्थानी और आदेश किसे कहते हैं ? सोदाहरण स्पष्ट करें । (७) आदे परस्य और तस्मादित्युत्तरस्य परिभाषाओ की व्याख्या करें । (८) निम्नलिखित प्रश्नो का उत्तर दें— (क) खर् परे होने पर हकार के स्थान पर क्या होगा ? (ख) 'उत्थानम्' यहा खरि च द्वारा थकार को तकार क्यो नही होता ? (ग) 'उद् + प्रस्थानम्' मे सन्धि करें । ० [लघु०] विधि-सूत्रम्—(७५) झयो होऽन्यतरस्याम् ।८।४।६२।। झयः परस्य हस्य वा पूर्वसवर्णः । नादस्य घोषस्य संवारस्य महाप्राणस्य हस्य तादृशो वर्गचतुर्थः । वाग्घरिः, वाग्हरिः ॥ अर्थ—झय् से परे हकार के स्थान पर विकल्प कर के पूर्व-सवर्ण हो । नादस्येति—नाद, घोष, संवार और महाप्राण यत्न वाले हकार के स्थान पर वैसा वर्गों का चतुर्थ होगा । व्याख्या—झयः ।५।१। हः ।६।१। अन्यतरस्याम् ।७।१। पूर्वस्य ।६।१। (उदः स्थास्तम्भोः पूर्वस्य से) । सवर्णः ।१।१। (अनुस्वारस्य ययि परसवर्णः से) । अर्थ— (झयः) झय् से अव्यवहित पर (हः) 'ह्' के स्थान पर (अन्यतरस्याम्) एक अवस्था मे (पूर्वस्य) पूर्व का (सवर्णः) सवर्ण आदेश होता है । भाव— झय् प्रत्याहार में पञ्चम वर्णों को छोड़ कर शेष सब वर्गस्य वर्ण आ जाते हैं । इन से परे हकार हो तो उस के स्थान पर पूर्व (झय्) का सवर्ण (चतुर्थ) विकल्प से आदेश हो जाता है । उदाहरण यथा— वाग्घरि (वाणी का शेर अर्थात् बोलने मे चतुर) । 'वाक् + हरि' यहा प्रथम झलां जशोऽन्ते (६७) से क्कार को गकार आदेश हो—वाग् + हरि । अब यहा झय् गकार है, इस मे परे हकार के स्थान पर पूर्व अर्थात् गकार का सवर्ण आदेश करना है । गकार के—क्, ख्, ग्, घ्, ङ् ये पञ्च सवर्ण हैं । इन मे से यहा कौन हो? ऐसी शङ्का उत्पन्न होने पर स्थानेऽन्तरतमः (१७) सूत्र उपस्थित हो कर कहता है कि जो हकार के साथ अत्यन्त सदृश हो वही हकार के स्थान पर आदेश किया जाये । अब यदि स्थानकृत आन्तर्य देखते हैं तो हकार के सब सदृश ठहरते हैं, क्योकि, अकुह- १ ऊर्क् + गीयते = ऊर्ग् + गीयते = ऊर्गीयते (बल की प्रशंसा होती है) ।