लघुसिद्धान्तकौमुदी (वरदराजाचार्य - भैमी एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)
Laghu Siddhanta Kaumudi of Varadaraja with Hindi Commentary
आचार्य वरदराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंहल्-सन्धि-प्रकरणम् ११७ विसर्जनीयानां कण्ठः के अनुसार हकार और कवर्ग दोनों का कण्ठ स्थान है । अर्थकृत तथा प्रमाणकृत आन्तर्य तो यहां हो ही नहीं सकते । अतः अब शेष बचे गुणकृत आन्तर्य (अर्थात् यत्नों द्वारा सादृश्य) से ही सदृशता जांचेंगे । आभ्यन्तर यत्न तो इन का हकार के साथ तुल्य हो नहीं सकता । ईषद्विवृतमूष्मणाम् के अनुसार हकार ईषद्विवृत तथा तत्र स्पृष्टं प्रयत्नं स्पर्शानाम् के अनुसार कवर्ग स्पृष्ट है । अतः अब बाह्य यत्न देखेंगे । हकार का बाह्ययत्न—संवार, नाद, घोष और महाप्राण है । कवर्ग में इस प्रकार के बाह्ययत्न वाला केवल घकार ही है, इस से हकार के स्थान पर विकल्प कर के घकार हो विभक्ति लाने से पूर्वसवर्णपक्ष में 'वाग्घरिः' और तदभावपक्ष में 'वाग्हरिः' इस प्रकार दो रूप बन जाते हैं । वाचि वाचो वा हरिः (सिंहः) = वाग्घरिः । इस सूत्र के कुछ अन्य उदाहरण यथा - १. तद् + हानि = तद्धानिः । २. अच् + हीन - अज् + हीन = अज्झीनम् । ३. मधुलिङ् + हसति = मधुलिङ्ढसति । ४. अप् + हस्ती = अभ्भस्ती । ५. अज् + ह्रस्व- दीर्घप्लुतः = अज्झ्रस्वदीर्घप्लुतः । ६. स्याद् + ह्रस्वश्च = स्याद्ध्रस्वश्च । ७. दिग् + हस्ती = दिग्घस्ती । ८. सम्पद् + हर्ष = सम्पद्धर्षः । ९. रत्नमुड् + हरति = रत्नमुड्- ढरति । १०. वणिग् + हस्ती = वणिग्घस्ती । ११. दूराद् + हूते = दूराद्धूते । १२. मित्त्वाद्
- ह्रस्वः = मित्त्वाद्-ध्रस्वः । १३. समुद् + हर्ता = समुद्धर्ता । इन सब स्थानों पर पूर्वसवर्णाभाव-पक्ष में भी प्रयोग जान लेना चाहिये । यहां सर्वत्र हकार के स्थान पर पूर्व अक्षर के वर्ग का चतुर्थ वर्ण ही होता है; क्योंकि आन्तर्यपरीक्षा में वह ही हकार के अत्यन्त सदृश हो सकता है । सार यह है कि झय्- प्रत्याहारान्तर्गत कवर्ग से परे हकार को घकार, चवर्ग से परे हकार को झकार, टवर्ग से परे हकार को ढकार, तवर्ग से परे हकार को धकार तथा पवर्ग से परे हकार को भकार विकल्प से होता है । पक्ष में हकार भी रहता है । [लघु०] विधि-सूत्रम्—(७६) शश्छोऽटि ।८।४।६२॥ झयः परस्य शस्य छो वाऽटि । 'तद् + शिव' इत्यत्र दस्य श्चुत्वेन जकारे कृते 'खरि च' (७४) इति जकारस्य चकारः । तच्छिवः, तच्छिवः ॥ अर्थः—झय् से परे शकार को विकल्प से छकार हो जाता है, अट् परे हो तो । व्याख्या-झयः ।५।१। (झयो होऽन्यतरस्याम् से) । शः ।६।१। छः ।१।१। छकारादकार उच्चारणार्थः । अन्यतरस्याम् ।७।१। (झयो होऽन्यतरस्याम् से) । अटि ।७।१। अर्थः- (झयः) झय् से परे (शः) 'श्' के स्थान पर (छः) छ् हो जाता है (अटि) अट् परे होने पर (अन्यतरस्याम्) एक अवस्था में अर्थात् विकल्प से । यह सूत्र स्तोः श्चुना श्चुः (८.४.३६) और खरि च (८.४.५४) दोनों की दृष्टि में असिद्ध है । इन दोनों में भी स्तोः श्चुना श्चुः (८.४.३६) की दृष्टि में खरि च (८.४.५४) असिद्ध है; अतः सब से प्रथम स्तोः श्चुना श्चुः (६२) फिर खरि च (७४) और तदनन्तर शश्छोऽटि (७६) सूत्र प्रवृत्त होगा । उदाहरण यथा-