लघुसिद्धान्तकौमुदी (वरदराजाचार्य - भैमी एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)
Laghu Siddhanta Kaumudi of Varadaraja with Hindi Commentary
आचार्य वरदराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें११८ भैमीव्याख्योपेतायां लघुसिद्धान्तकौमुद्यां तद् + शिव = तज् + शिव (स्तो श्चुना श्चुः) = तच् शिव (खरि च)। अब यहां झय् चकार है इस से परे शकार वर्तमान है और उस शकार से भी इकार = अट् परे है, अतः प्रकृत सूत्र से शकार को वैकल्पिक छत्व हो कर विभक्ति लाने से छत्व- पक्ष में 'तच्छिव' और छत्वाभाव-पक्ष में 'तच्शिव' ये दो रूप सिद्ध होते हैं। तस्य शिव इति, स चासौ शिव इति वा विग्रह । इस सूत्र के कुछ अन्य उदाहरण यथा -- १ मधुलिट् + शेते = मधुलिट् छेते। २ वाक् + शेते = वाक् छेते। ३ मत् + श्वशुर = मच् + श्वशुर = मच्छ्वशुर । ४ यावत् + शक्यम् = यावच् + शक्यम् = यावच्छक्यम् । ५ जगत् + शान्ति = जगच् + शान्ति = जगच्छान्ति । ६ तद् + श्रुत्वा = तज् + श्रुत्वा = तच् + श्रुत्वा = तच्छ्रुत्वा । ७ कश्चित् + शेते = कश्चिच् + शेते = कश्चिच्छेते । ८ प्राक् + शेते = प्राक्छेते । नोट—यहां पर पदान्तस्य (८।४।५८) सूत्र से 'पदान्तस्य' पद का भी अनु- वर्त्तन होता है । विभक्तिविपरिणाम से वह पञ्चम्यन्त हो कर 'झय् ' का विशेषण बन जाता है । इस से यह अर्थ हो जाता है—पदान्त झय् से परे शकार को छकार हो विकल्प कर के अट् परे हो तो । 'पदान्त' पद लाने का यह प्रयोजन है कि—'विप्शम्, चक्षौ' आदियों में अपदान्त पकार-क्कारादियो से परे शकार को छकार न हो जाये । [लघु०] वा०—(१२) छत्वममीति वाच्यम् ॥ तच्छ्लोकेन ॥ अर्थः—पदान्त झय् से परे शकार को वैकल्पिक छकारादेश—अट् परे की बजाय अम् परे होने पर कहना चाहिये । व्याख्या—पूर्वोक्त शश्छोऽटि (७६) सूत्र से 'तच्छ्लोकेन, तच्छ्मश्रुणा' आदि प्रयोग सिद्ध नहीं हो सकते क्योंकि इन में शकार से परे लकार है, जो अट् प्रत्याहार में नहीं आता । अतः इन की सिद्धि के लिये कात्यायन ने यह वार्त्तिक रचा है (छत्वम् ।१।१।) छत्व (अमि ।७।१।) अम् प्रत्याहार परे होने पर हो (इति) ऐसा (वाच्यम्) कहना चाहिये । कात्यायन का पाणिनि के शश्छोऽटि (७६) सूत्र के अन्य किसी अंश से मतभेद नहीं, केवल 'अटि' अंश में ही मतभेद है । वे चाहते हैं कि 'अटि' को हटा कर इस के स्थान पर 'अमि' कर देना चाहिये । ऐसा करने से 'तच्छ्लोकेन' आदि रूप सिद्ध हो जाते हैं। तथाहि— तद् + श्लोक = तज् + श्लोक (स्तो श्चुना श्चुः) = तच् + श्लोक (खरि च)। अब यहां झय् = चकार से शकार परे विद्यमान है । इस में 'ल्' यह अम् परे है । अतः विकल्प कर के शकार को छकार हो कर विभक्ति लाने से छत्वपक्ष में 'तच्छ्लोकेन' और छत्वाभाव में 'तच्श्लोकेन' ये दो रूप सिद्ध होते हैं। [ स चासौ श्लोक तच्छ्लोक , यद्वा तस्य श्लोक — तच्छ्लोक , तेन = तच्छ्लोकेन । कर्मधारय षष्ठीतत्पुरुषो वा । उस श्लोक से या उस के श्लोक में ] । इस वार्त्तिक के कुछ अन्य उदाहरण यथा — (१) एतद् + श्मश्रु = एतच्छ्मश्रु, एतच्श्मश्रु । (२) तद् + श्लक्ष्ण = तच्छ्लक्ष्ण , तच्श्लक्ष्ण । (३) तद् + श्मशानम् =