भारतकोश
लघुसिद्धान्तकौमुदी (वरदराजाचार्य - भैमी एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)

लघुसिद्धान्तकौमुदी (वरदराजाचार्य - भैमी एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)

Laghu Siddhanta Kaumudi of Varadaraja with Hindi Commentary

आचार्य वरदराज द्वारा

DevanagariHindipublished633 पृष्ठ

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पृष्ठ 136

हल्-सन्धि-प्रकरणम् ११६ तच्छ्मशानम्, तच्श्मशानम्। (४) तद् + श्लिष्ट = तच्छ्लिष्टः, तच्श्लिष्टः। (५) भूभृत् + श्लाघा = भूभृच्छ्लाघा, भूभृच्श्लाघा। (६) सकृत् + श्लेष्मा = सकृच्छ्लेष्मा, सकृच्श्लेष्मा। नोट—कात्यायनद्वारा शश्छोऽटि सूत्र में 'अटि' की जगह 'अमि' रखने का सुझाव कोई अपूर्वकथन नहीं है। आचार्यवर पाणिनि ने गोत्रचरणाच्छ्लाघात्याकार- तद्वेतेषु (५.१.१३३) सूत्र में 'चरणात् + श्लाघा = चरणाच्छ्लाघा' लिखकर स्वयं अम्पर्क शकार को छत्व किया है। ध्यान रहे कि आचार्यचरण सब बातें मुख द्वारा प्रतिपादन नहीं किया करते। उन की कई बातें इङ्गित आदि के द्वारा भी प्रकट होती हैं। अतएव भाष्यकार पतञ्जलि कहते हैं—इह इङ्गितेन चेष्टितेन निमिषितेन महता वा सूत्रप्रबन्धेनाचार्याणाम् अभिप्रायो गम्यते (महाभाष्य ६.३.३७)। अभ्यास (१६) (१) हकार को पूर्वसवर्ण वर्गचतुर्थ ही क्यों होता है, अन्य क्यों नहीं ? (२) कात्यायन शश्छोऽटि सूत्र को शश्छोऽमि क्यों बनाना चाहते हैं ? (३) विरप्शम्, चक्शीं, तच्च्युतवम्-में छत्व क्यों नहीं होता ? (४) भवान् हसति, प्राङ् हसति—में हकार को पूर्वसवर्ण क्यों नहीं होता ? (५) श्चुत्व, चर्व्व और छत्व में कौन प्रथम और कौन पश्चात् होगा ? --::o::-- [लघु०] विधि-सूत्रम्-(७७) मोऽनुस्वारः ।८।३।२३॥ मान्तस्य पदस्यानुस्वारो हलि। हरिं वन्दे॥ अर्थः—हल् परे हो तो मकारान्त पद के स्थान पर अनुस्वार हो। व्याख्या—मः ।६।१। पदस्य ।६।१। (यह अधिकार पीछे से आ रहा है)। अनुस्वारः ।१।१। हलि ।७।१। (हलि सर्वेषाम् से)। 'मः' यह 'पदस्य' का विशेषण है अतः इस से येन विधिस्तदन्तस्य (१.१.७१) द्वारा तदन्तविधि हो कर 'मान्तस्य पदस्य' ऐसा बन जाता है। अर्थः—(हलि) हल् परे होने पर (मः=मान्तस्य) मका- रान्त (पदस्य) पद के स्थान पर (अनुस्वारः) अनुस्वार होता है। अलोऽन्त्यस्य (२१) द्वारा मकारान्त पद के अन्त्य अल् = मकार को ही अनुस्वार होगा। उदाहरण यथा— हरिं वन्दे (मैं हरि को नमस्कार करता हूं)। 'हरिम् + वन्दे' यहां मकारान्त पद 'हरिम्' है; सुबन्त होने से सुप्तिङन्तं पदम् (१४) द्वारा इस की पद सञ्ज्ञा है। इस से परे 'व्' यह हल् विद्यमान है अतः मकारान्त पद के अन्त्य अल् = मकार को अनुस्वार आदेश हो कर 'हरिं वन्दे' प्रयोग सिद्ध होता है।¹ इसके अन्य उदाहरण यथा—मातरम् + वन्दे = मातरं वन्दे, पुस्तकम् + पठति = पुस्तकं पठति, गुरुम् + नमति = गुरुं नमति, शत्रुम् + जयति = शत्रुं जयति। इत्यादि। १. कई लोग 'हरिम्बन्दे, सम्प्रवृत्तः' इत्यादि लिखते हैं, सो ठीक नहीं; अनुस्वार आवश्यक है। हां परसवर्ण वैकल्पिक है—हरिवँ वन्दे, हरिं वन्दे।