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लघुसिद्धान्तकौमुदी (वरदराजाचार्य - भैमी एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)

Laghu Siddhanta Kaumudi of Varadaraja with Hindi Commentary

आचार्य वरदराज द्वारा

DevanagariHindipublished633 पृष्ठ

११२ भैमीव्याख्योपेतायां लघुसिद्धान्तकौमुद्यां दात्तस्वर हो] सूत्र 'ईडे अग्निम्' में प्रवृत्त नहीं होता, क्योंकि 'अग्निम्' इस अतिङन्त पद में 'ईडे' यह तिङन्त पद परे नहीं, पूर्व में वर्त्तमान है। यह परिभाषा-सूत्र है। परिभाषाएं प्रयोगसिद्धि में स्वतन्त्रतया कुछ कार्य नहीं किया करतीं, अपितु सूत्रों के अर्थों में मिश्रित हो कर प्रयोगसिद्धि किया करती हैं, यह हम पीछे लिख चुके हैं। इस के अनुसार यह परिभाषा भी उदः स्था-स्तम्भोः पूर्वस्य (७०)आदि सूत्रों के साथ मिल कर एकार्थ उत्पन्न करेगी। तो अब उदः स्थास्तम्भोः पूर्वस्य (७०) सूत्र का यह अर्थ हो जायेगा—'उद्' से अव्यवहित पर स्था और स्तम्भ् को पूर्व-सवर्ण आदेश हो। इसी प्रकार तिङ्ङतिङ (८।१।२८) सूत्र का यह अर्थ होगा —अतिङन्त पद से अव्यवहित पर तिङन्त के स्थान पर निघात अर्थात् सर्वानुदात्त- स्वर हो। 'उद्+स्थान' 'उद्+स्तम्भन' इन दोनों स्थानों पर 'उद्' से परे अव्यवहित स्था और स्तम्भ् विद्यमान हैं, अतः इन के स्थान पर पूर्व-सवर्ण करना है। अब 'स्था- स्तम्भो' के षष्ठ्यन्त होने से अलोऽन्त्यस्य (२१) सूत्र से इन के अन्त्य अल् के स्थान पर पूर्व-सवर्ण प्राप्त होता है, इस पर अलोऽन्त्यस्य (२१) की अपवाद परिभाषा लिखते हैं— [लघु०] परिभाषा-सूत्रम्—(७२) आदेः परस्य ।१।१।५३॥ परस्य यद् विहितं तत् तस्यादेर्बोध्यम् । इति सस्य थः ॥ अर्थः—पर के स्थान पर जो कार्य विधान किया जाता है, वह कार्य उस (पर) के आदि वर्ण के स्थान पर समझना चाहिये। व्याख्या—आदे ।६।१। अल् ।६।१। (अलोऽन्त्यस्य से)। परस्य ।६।१। अर्थ -- (परस्य) पर के स्थान पर विधान किया कार्य (आदे) उस के आदि (अल्) अल् के स्थान पर होता है। यहां सूत्रार्थ, अनुकूल पदों का अध्याहार कर के ही किया जाता है। 'उद्+स्थान' 'उद्+स्तम्भन' यहां तस्मादित्युत्तरस्य (७१) परिभाषा की सहायता से उदः स्था-स्तम्भोः पूर्वस्य (७०) सूत्र द्वारा परले स्था और स्तम्भ् को पूर्व- सवर्ण होना था, अब वह इस परिभाषा द्वारा पर के आदि अर्थात् सकार को होगा। अब यहां यह विचार प्रस्तुत होता है कि स् को पूर्व (दकार) का कौन सा सवर्ण हो ? क्योंकि पूर्व (दकार) का एक सवर्ण नहीं किन्तु पांच सवर्ण हैं—त्, थ्, द्, ध्, न्। इस शङ्का की निवृत्ति के लिये स्थानेऽन्तरतमः (१७) सूत्र उपस्थित हो कर कहता है कि 'प्राप्त हुए आदेशों में अत्यन्त सदृश आदेश हो'। इस के अनुसार अब हमें 'त्, थ्, द्, ध्, न्' इन पांच वर्णों में से सकार के अत्यन्त सदृश वर्ण ढूंढना है। यदि यहां स्थानकृत आन्तर्य (सादृश्य) देखते हैं तो वह लृतुलसानां दन्ताः के अनुसार सब में समान है; अतः इस आन्तर्य से काम नहीं चल सकता। अर्थकृत और प्रमाण- कृत सादृश्य तो इन में हो ही नहीं सकता। अतः अब शेष बचे गुणकृत आन्तर्य अर्थात् यत्नों

हल्-सन्धि-प्रकरणम् ११३ द्वारा सादृश्य से ही परीक्षा करेंगे। यत्न—आभ्यन्तर और बाह्य दो प्रकार के होते हैं। इन में प्रथम आभ्यन्तर-यत्न तो सकार के साथ उन पांचों में से किसी का भी नहीं मिलता; क्योंकि ईषद्द्विवृतमूष्मणाम् के अनुसार सकार का 'ईषद्विवृत' और उन पांचों का तत्र स्पृष्टं प्रयत्नं स्पर्शानाम् के अनुसार 'स्पृष्ट' है। अतः बाह्य-यत्नों की दृष्टि से ही परीक्षा करते हैं। मकार का 'विवार, श्वास, अघोष और महाप्राण' बाह्य-यत्न है। उन पांचों के बाह्य-यत्न निम्नप्रकारेण हैं— ⎧ त् का बाह्ययत्न—विवार, श्वास, अघोष और अल्पप्राण है। ⎫ ⎪ थ् का बाह्ययत्न—विवार, श्वास, अघोष और महाप्राण है। ⎪ ⎨ द् का बाह्ययत्न—संवार, नाद, घोष और अल्पप्राण है। ⎬ ⎪ ध् का बाह्ययत्न—संवार, नाद, घोष और महाप्राण है। ⎪ ⎩ न् का बाह्ययत्न—संवार, नाद, घोष और अल्पप्राण है। ⎭ इस से सिद्ध होता है कि बाह्ययत्नों की दृष्टि से थकार ही सकार के तुल्य है। अतः सकार के स्थान पर पूर्वसवर्ण थकार ही होता है— उद्+स्थान, उद्+ थ्तम्भन। अब अग्रिमसूत्र प्रवृत्त होता है— [लघु०] विधि-सूत्रम् (७३) झरो झरि सवर्णे ।८।४।६४॥ हलः परस्य झरो वा लोपः सवर्णे झरि ॥ अर्थः—हल् से परे झर् का विकल्प से लोप हो सवर्ण झर् परे हो तो। व्याख्या हलः ।५।१। (हलो यमां यमि लोपः से)। झरः ।६।१। लोपः ।१।१। (हलो यमां यमि लोपः से)। अन्यतरस्याम् ।७।१। (झयो होऽन्यतरस्याम् से)। सवर्णे ।७।१। झरि ।७।१। अर्थः—(हलः) हल् से¹ (झरः) अव्यवहित पर झर् का (अन्यत- रस्र्याम्) एक अवस्था में (लोपः) लोप हो जाता है (सवर्णे) सवर्ण (झरि) झर् परे हो तो। यहां निमित्त² और स्थानियों³ का यथासङ्ख्य नहीं होता; अर्थात् यहां 'झ् का झ् परे होने पर, भ् का भ् परे होने पर, घ् का घ् परे होने पर, ढ् का ढ् परे होने १. हल् से परे झर् का लोप विहित होने से 'पत्रम्, दत्त्वा, तत्त्वम्, सत्त्वम्, कित्त्वम्, डित्त्वम्, मित्रम्, क्षत्रियः, छत्रम्, छात्रः, पुत्रः' इत्यादि में 'त्' का और 'वाग्मी' में 'ग्' का लोप नहीं होगा। पत्र, तत्व, कित्व, वाग्मी आदि लिखना अपाणिनीय है। २. जिसके होने पर कोई कार्य हो उसे 'निमित्त' कहते हैं यथा इको यणचि (१५) में अच् परे होने पर इक् को यण् होता है तो अच् निमित्त है। झरो झरि सवर्णे (७३) सूत्र में झर् परे होने पर झर् का लोप कहा गया है तो परला 'झर्' निमित्त है। ३. जिस के स्थान पर कुछ किया जाता है उसे 'स्थानी' कहते हैं। यथा—झरो झरि सवर्णे (७३) में झर् के स्थान पर लोप विहित होने से 'झर्' स्थानी है; इसी प्रकार इको यणचि (१५) आदि में इक् आदि स्थानी हैं। ल० प्र० (८)

११४ भैमीव्याख्योपेतायां लघुसिद्धान्तकौमुद्यां पर' इत्यादि क्रम से लोप नहीं होता, क्योंकि यदि ऐसा अभीष्ट होता तो आचार्य झरो झरि' इतना ही सूत्र बनाते 'सवर्णे' पद का ग्रहण न करते, अतः विदित होता है कि वे सवर्ण झर् मात्र परे होने पर झर् का लोप चाहते हैं। इस का प्रयोजन 'उद् थ् तम्भन' आदि प्रयोगों में थकार आदि का लोप करना है। 'उद् थ् थान' 'उद् थ् तम्भन' यहां हल् = दकार से परे इस सूत्र द्वारा झर् = प्रथम थकार का विकल्प कर के लोप हो जाता है, क्योंकि इस से परे थकार और तकार क्रमशः सवर्ण झर् विद्यमान हैं। इस प्रकार लोपपक्ष में- उद्+थान, उद्+ तम्भन । लोपाभाव में- उद्+थ्थान उद्+थ्स्तम्भन । अब इन सब स्थानों पर अग्रिमसूत्र प्रवृत्त होता है— [लघु०] विधि-सूत्रम्—(७४) खरि च ।८।४।५४॥ खरि झलां चरः स्युः । इत्युदो दस्य तः । उत्थानम् । उत्तम्भनम् ॥ अर्थ - खर् प्रत्याहार परे होने पर झलों के स्थान पर चर् हो जाता है। इत्युदो दस्य तः - इस सूत्र से उद् के दकार को तकार हो जाता है। व्याख्या-खरि ।७।१। च इत्यव्ययपदम् । झलाम् ।६।३। (झलां जश् झशि से)। चर् ।१।३। (अभ्यासे चर्च से वचन-विपरिणाम कर के) । अर्थ --(खरि) खर् प्रत्याहार परे होने पर (झलाम्) झलों के स्थान पर (चरः) चर् हो जाते हैं। वर्गों के प्रथम, द्वितीय तथा श्, ष्, स् वर्ण—'खर्' कहाते हैं। वर्गों के प्रथम तथा श्, ष्, स् वर्ण—'चर्' कहाते हैं। वर्गों के पञ्चम वर्णों को छोड़ कर शेष सब वर्गस्थ तथा ऊष्म वर्ण—'झल्' प्रत्याहार के अन्तर्गत हो जाते हैं। श्, ष्, स् इन झलों के स्थान पर श्, ष्, स् ही चर् होते हैं। यथा— 'निश्चय', 'रामश्चिनोति' यहां चकार खर् परे होने पर शकार झल् को शकार चर् ही हुआ है। 'वृष्टि', 'दृष्टि' यहां टकार खर् होने पर षकार झल् को षकार चर् ही हुआ है। 'अस्ति, स्त', 'रामस्स्य' यहां खर् परे होने पर सकार झल् को सकार चर् ही हुआ है। झल् प्रत्याहारान्तर्गत हकार से परे कभी खर् नहीं आता, क्योंकि खर् से पूर्व हकार को सदैव हो ढः (२५१) द्वारा ढकार हो जाता है। प्रश्न—यदि 'श्, ष्, स्' के स्थान पर 'श्, ष्, स्' होते हैं और हकार की जरूरत नहीं, तो झल् की बजाय झय् और चर् की बजाय चय् ही क्यों नहीं कह देते ? उत्तर—खरि च (७४) सूत्र में झल् और चर् की पीछे से अनुवृत्ति आ रही है, उसी से यहां काम चल जाता है, अब यदि झय् और चय् कहेंगे तो उन का ग्रहण करना पड़ेगा, इस में लाघव की बजाय गौरव-दोष उत्पन्न होगा, अतः इन अनुवर्तित झल् और चर् पदों से ही काम चलाने में लाघव है, किञ्च इन के ग्रहण से कोई दोष तो उत्पन्न होता ही नहीं। स्थानेऽन्तरतम (१७) सूत्र द्वारा जिस झल् का जिस चर् के साथ स्थान साम्य होगा, वही उसी के स्थान पर आदेश होगा। तालिका यथा—

हल्-सन्धि-प्रकरणम् १२७ रूप में परिणत किया जायेगा । अर्थः---(डः) डकार से परे (वा) विकल्प कर के (सि-सः) सकार का अवयव (धुट्) धुट् हो जाता है । उदाहरण यथा— षड्+सन्तः (छः सज्जन) । यहां खरि च (८.४.५४) के असिद्ध होने से प्रथम इस सूत्र की प्रवृत्ति होती है । यहां डकार से परे 'सन्तः' पद का आदि सकार विद्यमान है, अतः उस सकार का अवयव 'धुट्' यह शब्द-समुदाय विकल्प से होगा । अब प्रश्न यह उत्पन्न होता है कि क्या 'धुट्' सकार का आद्यवयव हो या अन्तावयव? इस शङ्का की निवृत्ति के लिये अग्रिम परिभाषा-सूत्र लिखते हैं— [लघु०] परिभाषा-सूत्रम्—(८५) आद्यन्तौ टकितौ ।१।१।४५॥ टित्कितौ यस्योक्तौ तस्य क्रमादाद्यन्तावयवौ स्तः । षट्सन्तः, षट् सन्तः ॥ अर्थः--टित् और कित् जिस के अवयव कहे गये हों वे उस के क्रमशः आद्य- वयव तथा अन्तावयव होते हैं । व्याख्या—आद्यन्तौ ।१।२। टकितौ ।१।२। समासः—आदिश्च अन्तश्च= आद्यन्तौ । इतरेतरद्वन्द्वः । टश्च क् च =टकौ । टकारादकार उच्चारणार्थः । इतरेतर- द्वन्द्वः । टकौ इतौ ययोस्तौ टकितौ । बहुव्रीहिसमासः । अर्थः--(टकितौ) टकार इत् वाला तथा ककार इत् वाला क्रमशः (आद्यन्तौ) आद्यवयव तथा अन्तावयव होता है । किस का अवयव होता है ? ऐसी जिज्ञासा होने पर सुतरां यह आ जाता है कि जिस का अवयव विधान किया गया हो । 'क्रमशः' शब्द यथासङ्ख्यमनुदेशः समानाम् (२३) परिभाषा द्वारा प्राप्त होता है । 'षड्+सन्तः' यहां डः सि धुट् (८४) सूत्र से सकार का अवयव धुट् विधान किया गया है । धुट् के टकार की हलन्त्यम् (१) सूत्र से इत् सञ्ज्ञा होती है अतः धुट् टित् है । इस लिये यह सकार का आद्यवयव होगा । 'षड्+धुट् सन्तः' ऐसा हो कर हलन्त्यम् (१) द्वारा टकार तथा उपदेशेऽजनुनासिक इत् (२८) द्वारा उकार की इत्सञ्ज्ञा हो जाती है¹ पुनः इन इत्सञ्ज्ञकों का तस्य लोपः (३) से लोप करने पर— हो रहा है । इस शास्त्र में आगम प्रायः टित्, कित् या मित् होते हैं । धुट् आदि टित् हैं । कुँक्, टुंक् आदि कित् हैं । नुँम् आदि मित् आगम कहाते हैं । टित् का आगम जिसे कहा जाये उस के आदि में, कित् का आगम जिसे कहा जाये उस के अन्त में, तथा मित् का आगम जिसे कहा जाये उस के अन्त्य अच् से परे बैठता है । यह सब (८५, २४०) सूत्रों पर आगे स्पष्ट हो जायेगा । १. ध्यान रहे कि कुछ वैयाकरण यहां उकार आदि को उच्चारणार्थक मानते हुए प्रयोजनाभाव के कारण इन की इत्सञ्ज्ञा नहीं करते । परन्तु अन्य वैयाकरणों का कथन है कि उच्चारण भी तो एक प्रयोजन है अतः इन की इत्सञ्ज्ञा और लोप अवश्य करना चाहिये । इसी प्रकार आगे कुँक्-टुंक्-तुँक्-नुँम् अनँङ् आदियों में भी समझ लेना चाहिये ।

१२८ भैमीव्याख्योपेताया लघुसिद्धान्तकौमुद्यां 'षड् + ध् मन्तः' । अत्र खरि च (७४) सूत्र से सकार शर् के परे होने पर धकार को तकार पुन उस तकार को भी खर् मान डकार को भी टकार हो कर षट्त्सन्तःप्रयोग निष्पन्न हुआ । जिस पक्ष में 'धुट्' आगम न हुआ उस पक्ष में खरि च (७४) से डकार को टकार हो कर 'षट सन्तः' प्रयोग सिद्ध हुआ । इस प्रकार इस के दो रूप बन गये । इस के अन्य उदाहरण यथा-१ लिट्त्सु लिट्सु । २ षट्त्सुखानि, षट् सुखानि । ३ तुराषाट्त्सरति तुराषाट् सरति । ४ षट्त्सन्ततय, षट् सन्ततय । ५ षटत्समस्या, षट समस्या । ६ षटत्सन्निकर्षा, षट सन्निकर्षा । इत्यादि । [लघु०] विधि सूत्रम्-(८६) ङणोः कुक्टुक् शरि ।।८।३।२८।। वा म्त ॥ अर्थ-शर् परे होने पर ङकार णकार को क्रमश विकल्प करके कुँक् और टुँक् का आगम हो जाता है । व्याख्या-ङणो ।६।२। कुक्टुँक् ।१।१। शरि ।७।१। वा इत्यव्ययपदम् (हे मपरे वा स) । समास-ङ् च ण् च=ङणौ, तयो = ङणोः । इतरेतरद्वन्द्व । कुँङ् च टुँक् च= कुँक्टुँक्, समाहारद्वन्द्व । अर्थ - (शरि) शर् परे होने पर (ङणो ) ङकार और णकार के अवयव (कुक्टुँक्) कुँक् और टुँक् (वा) विकल्प करके होते हैं। कुंक् और टुँक् कित् हैं अत आद्यन्तौ टकितौ (८५) परिभाषा से ये ङकार और णकार के अन्तावयव होंगे। यथासङ्ख्यपरिभाषा (२३) से ङकार को कुँक् तथा णकार को टुँक् का आगम होगा। उदाहरण यथा- 'प्राङ्+षष्ठ, सुगण्+षष्ठ' यहा ङकार णकार से परे षकार शर् विद्यमान है अत ङकार को कुँक् तथा णकार को टुँक् का आगम हो कर उकार और क्कार अनुबन्धो का लोप हो गया तो- [ कुँक्टुँक्पक्षे ] प्राङ्क्+षष्ठ । सुगण्ट्+षष्ठ । [कुँक्टुँकोरभावे] प्राङ्+षष्ठ । सुगण्+षष्ठ । अब कुँक्-टुँक्-पक्ष में अग्रिम वार्त्तिक प्रवृत्त होता है- [लघु०] वा०-(१४) चयो द्वितीया शरि पौष्करसादेरिति वाच्यम् ॥ प्राङ्ख्षष्ठ, प्राङ्क्षष्ठ, प्राङ्षष्ठ । सुगण्ठ्षष्ठ, सुगण्ट्षष्ठ, सुगण् षष्ठ ॥ अर्थ-शर् परे होने पर चय् प्रत्याहार के स्थान पर वर्गों के द्वितीय वर्ण विकल्प कर के हो जाने हैं। व्याख्या-चय ।६।२। द्वितीया ।१।३। शरि ।७।१। पौष्करसादे ।६।१। इति इत्यव्ययपदम् । वाच्यम् ।१।१। अर्थ -(चय) चय् अर्थात् वर्गों के प्रथम वर्गों के १ यहा चत्वं असिद्ध है अत चयो द्वितीया शरि० (वा० १४) से तकार को थकार नही होना । इसी प्रकार 'षट्त्सन्त' मे भी समझ लेना चाहिये। यहा ष्टुत्व का भी न पदान्ताट् टोरनाम् (६५) सूत्र से निषेध हो जाना है।

ल्-सन्धि-प्रकरणम् ११५ | झल् | साम्य | चर् | | (वे वर्ण जिन के स्थान पर आदेश होते हैं।) | (स्थान) | (आदेश होने वाले वर्ण) | | घ् , ग् , ख् , क् | कण्ठ | क् | | झ् , ज् , छ् , च् | तालु | च् | | ढ् , ड् , ठ् , ट् | मूर्धा | ट् | | ध् , द् , थ् , त् | दन्त | त् | | भ् , ब् , फ् , प् | ओष्ठ | प् | श्, ष्, स् के स्थान पर पूर्णतया तुल्य क्रमशः श्, ष्, स् आदेश होते हैं। भावः—वर्गों के दूसरे, तीसरे तथा चौथे वर्णों को वर्गों के प्रथम वर्ण हो जाते , यदि उन से परे वर्गों के पहले, दूसरे तथा श्, ष्, स्, वर्ण हों तो। अब इस सूत्र से पूर्वोक्त चारों स्थानों में उद् के दकार को चर्=तकार हो र निम्नलिखित रूप सिद्ध होते हैं— (लोपपक्ष में)—उत्थानम्, उत्तम्भनम् । (लोपाभाव में)—उत्थ्यानम्, उत्थम्भनम् । इस प्रकार प्रत्येक के दो-दो रूप सिद्ध होते हैं। ध्यान रहे कि लोपाभाव वाले रूपों में उदः स्था० (८.४.६०) द्वारा किया या पूर्वसवर्ण=थकार खरि च (८.४.५४) की दृष्टि में असिद्ध है अतः उसे सकार ही दीखता है इसलिये उस थकार को तकार आदेश नहीं होता । इस विषय पर शोधपूर्ण विस्तृत विचार हमारे अभिनव प्रकाशित शोधग्रन्थ न्यास-पर्यालोचन के पृष्ठ २६३ से ३००) पर देखें। अभ्यास (१८) (१) सूत्र-समन्वय करते हुए सन्धि करें— १. भेद्+तुम्। २. शिण्ड्+ढि। ३. उद् + स्थापयति। ४. भगवान् +लङ्घते। ५. छेद्+तव्यम् । ६. रुन्ध्+धः। ७. प्रत्+तम्। ८. लिप्+सा। ९ उद्+स्तम्भते। १०. उद्+स्थितः। ११. बन्द्+धुम्। १२. उद्+स्तम्भितुम्। (२) सूत्रोपपत्तिपूर्वक सन्धिच्छेद करें— १. पिण्ढ। २. भिन्नः। ३. धुक्षु। ४. उत्थाय। ५. उत्तम्मिता।

११६ भैमीव्याख्योपेतायां लघुसिद्धान्तकौमुद्यां ६ युयुत्सव । ७ अग्निन्मत्सु । ८ अत्त । ९ रुन्ध । १० ऊर्गीयते¹ । ११ अवत्तम् । १२ उत्थातव्यम् । १३ आरिप्सते । १४ निबन्धा [तृच्] । १५ छिन्धि । १६ भिन्धि । (३) झरो झरि सवर्णे में 'सवर्णे' ग्रहण का प्रयोजन स्पष्ट करें । (४) तोर्लि सूत्र द्वारा नकार को अनुनासिक लकार ही क्यो होता है ? (५) खर् परे होने पर श्, ष्, स् के स्थान पर कौन से चर् होंगे ? (६) निमित्त, स्थानी और आदेश किसे कहते हैं ? सोदाहरण स्पष्ट करें । (७) आदे परस्य और तस्मादित्युत्तरस्य परिभाषाओ की व्याख्या करें । (८) निम्नलिखित प्रश्नो का उत्तर दें— (क) खर् परे होने पर हकार के स्थान पर क्या होगा ? (ख) 'उत्थानम्' यहा खरि च द्वारा थकार को तकार क्यो नही होता ? (ग) 'उद् + प्रस्थानम्' मे सन्धि करें । ० [लघु०] विधि-सूत्रम्—(७५) झयो होऽन्यतरस्याम् ।८।४।६२।। झयः परस्य हस्य वा पूर्वसवर्णः । नादस्य घोषस्य संवारस्य महाप्राणस्य हस्य तादृशो वर्गचतुर्थः । वाग्घरिः, वाग्हरिः ॥ अर्थ—झय् से परे हकार के स्थान पर विकल्प कर के पूर्व-सवर्ण हो । नादस्येति—नाद, घोष, संवार और महाप्राण यत्न वाले हकार के स्थान पर वैसा वर्गों का चतुर्थ होगा । व्याख्या—झयः ।५।१। हः ।६।१। अन्यतरस्याम् ।७।१। पूर्वस्य ।६।१। (उदः स्थास्तम्भोः पूर्वस्य से) । सवर्णः ।१।१। (अनुस्वारस्य ययि परसवर्णः से) । अर्थ— (झयः) झय् से अव्यवहित पर (हः) 'ह्' के स्थान पर (अन्यतरस्याम्) एक अवस्था मे (पूर्वस्य) पूर्व का (सवर्णः) सवर्ण आदेश होता है । भाव— झय् प्रत्याहार में पञ्चम वर्णों को छोड़ कर शेष सब वर्गस्य वर्ण आ जाते हैं । इन से परे हकार हो तो उस के स्थान पर पूर्व (झय्) का सवर्ण (चतुर्थ) विकल्प से आदेश हो जाता है । उदाहरण यथा— वाग्घरि (वाणी का शेर अर्थात् बोलने मे चतुर) । 'वाक् + हरि' यहा प्रथम झलां जशोऽन्ते (६७) से क्कार को गकार आदेश हो—वाग् + हरि । अब यहा झय् गकार है, इस मे परे हकार के स्थान पर पूर्व अर्थात् गकार का सवर्ण आदेश करना है । गकार के—क्, ख्, ग्, घ्, ङ् ये पञ्च सवर्ण हैं । इन मे से यहा कौन हो? ऐसी शङ्का उत्पन्न होने पर स्थानेऽन्तरतमः (१७) सूत्र उपस्थित हो कर कहता है कि जो हकार के साथ अत्यन्त सदृश हो वही हकार के स्थान पर आदेश किया जाये । अब यदि स्थानकृत आन्तर्य देखते हैं तो हकार के सब सदृश ठहरते हैं, क्योकि, अकुह- १ ऊर्क् + गीयते = ऊर्ग् + गीयते = ऊर्गीयते (बल की प्रशंसा होती है) ।

हल्-सन्धि-प्रकरणम् ११७ विसर्जनीयानां कण्ठः के अनुसार हकार और कवर्ग दोनों का कण्ठ स्थान है । अर्थकृत तथा प्रमाणकृत आन्तर्य तो यहां हो ही नहीं सकते । अतः अब शेष बचे गुणकृत आन्तर्य (अर्थात् यत्नों द्वारा सादृश्य) से ही सदृशता जांचेंगे । आभ्यन्तर यत्न तो इन का हकार के साथ तुल्य हो नहीं सकता । ईषद्विवृतमूष्मणाम् के अनुसार हकार ईषद्विवृत तथा तत्र स्पृष्टं प्रयत्नं स्पर्शानाम् के अनुसार कवर्ग स्पृष्ट है । अतः अब बाह्य यत्न देखेंगे । हकार का बाह्ययत्न—संवार, नाद, घोष और महाप्राण है । कवर्ग में इस प्रकार के बाह्ययत्न वाला केवल घकार ही है, इस से हकार के स्थान पर विकल्प कर के घकार हो विभक्ति लाने से पूर्वसवर्णपक्ष में 'वाग्घरिः' और तदभावपक्ष में 'वाग्हरिः' इस प्रकार दो रूप बन जाते हैं । वाचि वाचो वा हरिः (सिंहः) = वाग्घरिः । इस सूत्र के कुछ अन्य उदाहरण यथा - १. तद् + हानि = तद्धानिः । २. अच् + हीन - अज् + हीन = अज्झीनम् । ३. मधुलिङ् + हसति = मधुलिङ्ढसति । ४. अप् + हस्ती = अभ्भस्ती । ५. अज् + ह्रस्व- दीर्घप्लुतः = अज्झ्रस्वदीर्घप्लुतः । ६. स्याद् + ह्रस्वश्च = स्याद्ध्रस्वश्च । ७. दिग् + हस्ती = दिग्घस्ती । ८. सम्पद् + हर्ष = सम्पद्धर्षः । ९. रत्नमुड् + हरति = रत्नमुड्- ढरति । १०. वणिग् + हस्ती = वणिग्घस्ती । ११. दूराद् + हूते = दूराद्धूते । १२. मित्त्वाद्

  • ह्रस्वः = मित्त्वाद्-ध्रस्वः । १३. समुद् + हर्ता = समुद्धर्ता । इन सब स्थानों पर पूर्वसवर्णाभाव-पक्ष में भी प्रयोग जान लेना चाहिये । यहां सर्वत्र हकार के स्थान पर पूर्व अक्षर के वर्ग का चतुर्थ वर्ण ही होता है; क्योंकि आन्तर्यपरीक्षा में वह ही हकार के अत्यन्त सदृश हो सकता है । सार यह है कि झय्- प्रत्याहारान्तर्गत कवर्ग से परे हकार को घकार, चवर्ग से परे हकार को झकार, टवर्ग से परे हकार को ढकार, तवर्ग से परे हकार को धकार तथा पवर्ग से परे हकार को भकार विकल्प से होता है । पक्ष में हकार भी रहता है । [लघु०] विधि-सूत्रम्—(७६) शश्छोऽटि ।८।४।६२॥ झयः परस्य शस्य छो वाऽटि । 'तद् + शिव' इत्यत्र दस्य श्चुत्वेन जकारे कृते 'खरि च' (७४) इति जकारस्य चकारः । तच्छिवः, तच्छिवः ॥ अर्थः—झय् से परे शकार को विकल्प से छकार हो जाता है, अट् परे हो तो । व्याख्या-झयः ।५।१। (झयो होऽन्यतरस्याम् से) । शः ।६।१। छः ।१।१। छकारादकार उच्चारणार्थः । अन्यतरस्याम् ।७।१। (झयो होऽन्यतरस्याम् से) । अटि ।७।१। अर्थः- (झयः) झय् से परे (शः) 'श्' के स्थान पर (छः) छ् हो जाता है (अटि) अट् परे होने पर (अन्यतरस्याम्) एक अवस्था में अर्थात् विकल्प से । यह सूत्र स्तोः श्चुना श्चुः (८.४.३६) और खरि च (८.४.५४) दोनों की दृष्टि में असिद्ध है । इन दोनों में भी स्तोः श्चुना श्चुः (८.४.३६) की दृष्टि में खरि च (८.४.५४) असिद्ध है; अतः सब से प्रथम स्तोः श्चुना श्चुः (६२) फिर खरि च (७४) और तदनन्तर शश्छोऽटि (७६) सूत्र प्रवृत्त होगा । उदाहरण यथा-

११८ भैमीव्याख्योपेतायां लघुसिद्धान्तकौमुद्यां तद् + शिव = तज् + शिव (स्तो श्चुना श्चुः) = तच् शिव (खरि च)। अब यहां झय् चकार है इस से परे शकार वर्तमान है और उस शकार से भी इकार = अट् परे है, अतः प्रकृत सूत्र से शकार को वैकल्पिक छत्व हो कर विभक्ति लाने से छत्व- पक्ष में 'तच्छिव' और छत्वाभाव-पक्ष में 'तच्शिव' ये दो रूप सिद्ध होते हैं। तस्य शिव इति, स चासौ शिव इति वा विग्रह । इस सूत्र के कुछ अन्य उदाहरण यथा -- १ मधुलिट् + शेते = मधुलिट् छेते। २ वाक् + शेते = वाक् छेते। ३ मत् + श्वशुर = मच् + श्वशुर = मच्छ्वशुर । ४ यावत् + शक्यम् = यावच् + शक्यम् = यावच्छक्यम् । ५ जगत् + शान्ति = जगच् + शान्ति = जगच्छान्ति । ६ तद् + श्रुत्वा = तज् + श्रुत्वा = तच् + श्रुत्वा = तच्छ्रुत्वा । ७ कश्चित् + शेते = कश्चिच् + शेते = कश्चिच्छेते । ८ प्राक् + शेते = प्राक्छेते । नोट—यहां पर पदान्तस्य (८।४।५८) सूत्र से 'पदान्तस्य' पद का भी अनु- वर्त्तन होता है । विभक्तिविपरिणाम से वह पञ्चम्यन्त हो कर 'झय् ' का विशेषण बन जाता है । इस से यह अर्थ हो जाता है—पदान्त झय् से परे शकार को छकार हो विकल्प कर के अट् परे हो तो । 'पदान्त' पद लाने का यह प्रयोजन है कि—'विप्शम्, चक्षौ' आदियों में अपदान्त पकार-क्कारादियो से परे शकार को छकार न हो जाये । [लघु०] वा०—(१२) छत्वममीति वाच्यम् ॥ तच्छ्लोकेन ॥ अर्थः—पदान्त झय् से परे शकार को वैकल्पिक छकारादेश—अट् परे की बजाय अम् परे होने पर कहना चाहिये । व्याख्या—पूर्वोक्त शश्छोऽटि (७६) सूत्र से 'तच्छ्लोकेन, तच्छ्मश्रुणा' आदि प्रयोग सिद्ध नहीं हो सकते क्योंकि इन में शकार से परे लकार है, जो अट् प्रत्याहार में नहीं आता । अतः इन की सिद्धि के लिये कात्यायन ने यह वार्त्तिक रचा है (छत्वम् ।१।१।) छत्व (अमि ।७।१।) अम् प्रत्याहार परे होने पर हो (इति) ऐसा (वाच्यम्) कहना चाहिये । कात्यायन का पाणिनि के शश्छोऽटि (७६) सूत्र के अन्य किसी अंश से मतभेद नहीं, केवल 'अटि' अंश में ही मतभेद है । वे चाहते हैं कि 'अटि' को हटा कर इस के स्थान पर 'अमि' कर देना चाहिये । ऐसा करने से 'तच्छ्लोकेन' आदि रूप सिद्ध हो जाते हैं। तथाहि— तद् + श्लोक = तज् + श्लोक (स्तो श्चुना श्चुः) = तच् + श्लोक (खरि च)। अब यहां झय् = चकार से शकार परे विद्यमान है । इस में 'ल्' यह अम् परे है । अतः विकल्प कर के शकार को छकार हो कर विभक्ति लाने से छत्वपक्ष में 'तच्छ्लोकेन' और छत्वाभाव में 'तच्श्लोकेन' ये दो रूप सिद्ध होते हैं। [ स चासौ श्लोक तच्छ्लोक , यद्वा तस्य श्लोक — तच्छ्लोक , तेन = तच्छ्लोकेन । कर्मधारय षष्ठीतत्पुरुषो वा । उस श्लोक से या उस के श्लोक में ] । इस वार्त्तिक के कुछ अन्य उदाहरण यथा — (१) एतद् + श्मश्रु = एतच्छ्मश्रु, एतच्श्मश्रु । (२) तद् + श्लक्ष्ण = तच्छ्लक्ष्ण , तच्श्लक्ष्ण । (३) तद् + श्मशानम् =

हल्-सन्धि-प्रकरणम् ११६ तच्छ्मशानम्, तच्श्मशानम्। (४) तद् + श्लिष्ट = तच्छ्लिष्टः, तच्श्लिष्टः। (५) भूभृत् + श्लाघा = भूभृच्छ्लाघा, भूभृच्श्लाघा। (६) सकृत् + श्लेष्मा = सकृच्छ्लेष्मा, सकृच्श्लेष्मा। नोट—कात्यायनद्वारा शश्छोऽटि सूत्र में 'अटि' की जगह 'अमि' रखने का सुझाव कोई अपूर्वकथन नहीं है। आचार्यवर पाणिनि ने गोत्रचरणाच्छ्लाघात्याकार- तद्वेतेषु (५.१.१३३) सूत्र में 'चरणात् + श्लाघा = चरणाच्छ्लाघा' लिखकर स्वयं अम्पर्क शकार को छत्व किया है। ध्यान रहे कि आचार्यचरण सब बातें मुख द्वारा प्रतिपादन नहीं किया करते। उन की कई बातें इङ्गित आदि के द्वारा भी प्रकट होती हैं। अतएव भाष्यकार पतञ्जलि कहते हैं—इह इङ्गितेन चेष्टितेन निमिषितेन महता वा सूत्रप्रबन्धेनाचार्याणाम् अभिप्रायो गम्यते (महाभाष्य ६.३.३७)। अभ्यास (१६) (१) हकार को पूर्वसवर्ण वर्गचतुर्थ ही क्यों होता है, अन्य क्यों नहीं ? (२) कात्यायन शश्छोऽटि सूत्र को शश्छोऽमि क्यों बनाना चाहते हैं ? (३) विरप्शम्, चक्शीं, तच्च्युतवम्-में छत्व क्यों नहीं होता ? (४) भवान् हसति, प्राङ् हसति—में हकार को पूर्वसवर्ण क्यों नहीं होता ? (५) श्चुत्व, चर्व्व और छत्व में कौन प्रथम और कौन पश्चात् होगा ? --::o::-- [लघु०] विधि-सूत्रम्-(७७) मोऽनुस्वारः ।८।३।२३॥ मान्तस्य पदस्यानुस्वारो हलि। हरिं वन्दे॥ अर्थः—हल् परे हो तो मकारान्त पद के स्थान पर अनुस्वार हो। व्याख्या—मः ।६।१। पदस्य ।६।१। (यह अधिकार पीछे से आ रहा है)। अनुस्वारः ।१।१। हलि ।७।१। (हलि सर्वेषाम् से)। 'मः' यह 'पदस्य' का विशेषण है अतः इस से येन विधिस्तदन्तस्य (१.१.७१) द्वारा तदन्तविधि हो कर 'मान्तस्य पदस्य' ऐसा बन जाता है। अर्थः—(हलि) हल् परे होने पर (मः=मान्तस्य) मका- रान्त (पदस्य) पद के स्थान पर (अनुस्वारः) अनुस्वार होता है। अलोऽन्त्यस्य (२१) द्वारा मकारान्त पद के अन्त्य अल् = मकार को ही अनुस्वार होगा। उदाहरण यथा— हरिं वन्दे (मैं हरि को नमस्कार करता हूं)। 'हरिम् + वन्दे' यहां मकारान्त पद 'हरिम्' है; सुबन्त होने से सुप्तिङन्तं पदम् (१४) द्वारा इस की पद सञ्ज्ञा है। इस से परे 'व्' यह हल् विद्यमान है अतः मकारान्त पद के अन्त्य अल् = मकार को अनुस्वार आदेश हो कर 'हरिं वन्दे' प्रयोग सिद्ध होता है।¹ इसके अन्य उदाहरण यथा—मातरम् + वन्दे = मातरं वन्दे, पुस्तकम् + पठति = पुस्तकं पठति, गुरुम् + नमति = गुरुं नमति, शत्रुम् + जयति = शत्रुं जयति। इत्यादि। १. कई लोग 'हरिम्बन्दे, सम्प्रवृत्तः' इत्यादि लिखते हैं, सो ठीक नहीं; अनुस्वार आवश्यक है। हां परसवर्ण वैकल्पिक है—हरिवँ वन्दे, हरिं वन्दे।

१२० भैमीव्याख्योपेतायां लघुसिद्धान्तकौमुद्या 'हल् परे होने पर' इस लिये कहा है कि गृहम् + आगच्छति = गृहमागच्छति, यम् + ऋषिम् = यमृषिम्, तम् + ऌकारम् = तमॢकारम् इत्यादि स्थानों पर अच् परे रहते अथवा अवसान में अनुस्वार न हो। पद ग्रहण का यह प्रयोजन है कि— गम्यते, नम्यते इत्यादि स्थानों पर हल् परे रहते हुए भी अपदान्त मकार को अनुस्वार न हो। [लघु०] विधि-सूत्रम्—(७८) नश्चापदान्तस्य झलि ।८।३।२४॥ नस्य मस्य चापदान्तस्य झल्यनुस्वारः । यशांसि । आक्रंस्यते । झलि किम् ? मन्यसे ॥ अर्थ—झल् परे होने पर अपदान्त नकार मकार को अनुस्वार हो जाता है। व्याख्या—न ।६।१। च इत्यव्ययपदम् । अपदान्तस्य ।६।१। झलि ।७।१। म ।६।१। अनुस्वारः ।१।१। (मोऽनुस्वारः मः) । अन्वय—अपदान्तस्य न म च झलि अनुस्वारः । अर्थ—(झलि) झल् परे होने पर (अपदान्तस्य) अपदान्त (न) नकार (च) और (म) मकार के स्थान पर (अनुस्वारः) अनुस्वार हो जाता है। उदाहरण यथा— यशांसि (बहुत यश) । 'यशान् + सि' ['यशस्'शब्दाज्जसि जश्शसोः शि (२३७) इति शावादेशे शि सर्वनामस्थानम् (२३८) इति तस्य सर्वनामस्थानतया नपुंसकस्य झलचः (२३६) इति नुमागमे सान्तमहतः संयोगस्य (३४२) इति सान्त- संयोगस्योपधाया दीर्घे च कृते—'यशान् सि' इति निष्पद्यते ।] यहां सकार झल् परे होने से अपदान्त नकार को अनुस्वार करने से 'यशांसि' प्रयोग सिद्ध होता है। आक्रंस्यते (ऊपर जाएगा) । 'आक्रम् + स्यते' [आङ्पूर्वात् क्रमुँ पादविक्षेपे (भ्वा०) इति धातोः कर्तरि लृटि आङ उद्गमने (१.३.४०) इत्यात्मनेपदम् ।] यहां अपदान्त मकार को पूर्वसूत्र (७७) से अनुस्वार प्राप्त नहीं हो सकता था, अब इस सूत्र से सकार झल् परे होने से उसे अनुस्वार हो कर 'आक्रंस्यते' प्रयोग सिद्ध हो जाता है। इस सूत्र में 'झलि' का ग्रहण इस लिये किया गया है कि— 'गम् + यस = गम्यसे, मन् + यसे = मन्यसे, हन् + यसे = हन्यसे' इत्यादि स्थानों में झल् परे न होने के कारण अनुस्वार न हो जाये । 'अपदान्तस्य' ग्रहण करने से 'राजन् याहि, ब्रह्मन् पाहि' इत्यादियों में पदान्त नकार को अनुस्वार नहीं होता। इस सूत्र के कुछ अन्य उदाहरण यथा—१ पयान् + सि = पयांसि । २ आयम्

  • स्यते = आयंस्यते । ३ अनम् + सीत् = अनंसीत् । ४ नम् + स्यति = नंस्यति । ५. श्रेयान् + सि = श्रेयांसि । ६ हन् + सि = हंसि । [लघु०] विधि-सूत्रम्—(७९) अनुस्वारस्य ययि पर-सवर्णः ।८।४।५८॥ स्पष्टम् । शान्तः ॥ अर्थ—यय् परे होने पर अनुस्वार को पर-सवर्ण होता है।

हल्-सन्धि-प्रकरणम् १२१ व्याख्या—अनुस्वारस्य ।६।१। ययि ।७।१। पर-सवर्णः ।१।१। समासः—परस्य सवर्णः = परसवर्णः, षष्ठीतत्पुरुषसमासः । अथवा पर इति लुप्तषष्ठी कं पृथक् पदम्, सवर्ण इति तु स्वरितत्वादधिकृतम् । अर्थः—(ययि) यय् परे होने पर (अनुस्वारस्य) अनुस्वार के स्थान पर (पर-सवर्णः) पर-सवर्ण आदेश होता है। भाव—सब वर्गस्थ वर्ण तथा अन्तःस्थ वर्ण यय् प्रत्याहार के अन्दर आ जाते हैं; इन के परे होने पर अनुस्वार को पर अर्थात् यय् का सवर्ण आदेश हो जाता है। उदाहरण यथा— शान्तः (शान्त वा नष्ट) । ‘शाम्+त’ [शमुँ उपशमे (दिवा०), क्तः, वा दान्तशान्तेत्यादिनिपातनान्नेट्, अनुनासिकस्य क्वीति दीर्घः।] यहां नश्चापदान्तस्य झलि (७८) सूत्र से अपदान्त मकार को अनुस्वार हो ‘शांत’ ऐसा बना; अब इस सूत्र से तकार यय् परे होने पर अनुस्वार को पर-सवर्ण करना है। तकार के सवर्ण—‘त्, थ्, द्, ध्, न्’ ये पञ्च वर्ण हैं। इन में नासिकास्थान के सादृश्य के कारण अनुस्वार के सदृश वर्गपञ्चम नकार है, अतः अनुस्वार को नकार हो कर विभक्ति लाने से ‘शान्तः’ प्रयोग सिद्ध होता है। इसी प्रकार प्रत्येक वर्ग का पञ्चम ही अनुस्वार को परसवर्ण होगा। इस के कुछ अन्य उदाहरण यथा—१. अन्+कित = अंकित = अङ्कितः । २. अन्+चित = अंचित = अञ्चितः । ३. कुन्+ठित = कुंठित = कुण्ठितः । ४. दाम्+त = दांत = दान्तः । ५. गुम्+फित = गुंफित = गुम्फितः । ६. मुन्+क्ते = मुं+क्ते = मुङ्क्ते । ७. गम्+ता = गं+ता = गन्ता । इत्यादि । यहां ‘यय्’ ग्रहण स्पष्टार्थ है। यय् ग्रहण न करने से भी कोई दोष नहीं आ सकता । तथाहि—आक्रंस्यते, दंशनम्, अंहिपः इत्यादि प्रयोगों में रेफोष्मणां सवर्णा न सन्ति इस वचन के कारण परसवर्ण नहीं होगा तथा अचों के परे होने पर तो अनु- स्वार ही नहीं मिल सकेगा । इस सूत्र का ‘य्, व्, र्, ल्’ के परे होने पर यद्यपि कोई उदाहरण नहीं तथापि अग्रिम वा पदान्तस्य (८०) सूत्र में इन का उपयोग दिखाया जायेगा । नोट—ग्रन्थकार ने इस सूत्र की वृत्ति [जो सूत्र पर संस्कृत में उसका अर्थ लिखा होता है उसे ‘वृत्ति’ कहते हैं] नहीं लिखी; केवल ‘स्पष्टम्’ लिखा है। इसका आशय यह है कि इस सूत्र का अर्थ स्पष्ट है अर्थात् इस सूत्र में अन्य किसी सूत्र के पद की अनुवृत्ति नहीं आती । यह सूत्र ही अपनी आप वृत्ति है। एवमन्यत्र भी समझ लेना चाहिये। [लघु०] विधि-सूत्रम्—(८०) वा पदान्तस्य ।८।४।५८॥ (पदान्तस्यानुस्वारस्य ययि परे परसवर्णो वा स्यात्) । त्वङ्करोषि, त्वं करोषि ॥ अर्थः—यय् परे हो तो पदान्त अनुस्वार को विकल्प कर के परसवर्ण हो। व्याख्या—वा इत्यव्ययपदम् । पदान्तस्य ।६।१। अनुस्वारस्य ।६।१। ययि ।७।१। परसवर्णः ।१।१। (अनुस्वारस्य ययि परसवर्णः से)। अर्थः—(ययि) यय् परे होने पर

१२२ भैमीव्याख्योपेतायां लघुसिद्धान्तकौमुद्यां (पदान्तस्य) पदान्त (अनुस्वारस्य) अनुस्वार के स्थान पर (वा) विकल्प कर के (पर-सवर्ण) परसवर्ण आदेश होता है। यह सूत्र पूर्वसूत्र का अपवाद है, अतः पूर्वे- सूत्र अपदान्त अनुस्वार को और यह पदान्त अनुस्वार को यय् परे होने पर परसवर्ण करेगा। उदाहरण यथा-- त्वङ्करोषि त्वं करोषि (तू करता है)। 'त्वम् + करोषि' यहां 'त्वम्' इस पद के अन्त्य मकार को मोऽनुस्वार (७७) सूत्र से अनुस्वार हो कर 'त्वं + करोषि' बना। अब इस सूत्र से पदान्त अनुस्वार को पर = ककार का सवर्ण ङकार करने से--त्वङ् करोषि। परसवर्णभावपक्ष मे--त्वं करोषि। [पर = ककार के 'क्, ख्, ग्, घ्, ङ्' ये पाञ्च सवर्ण हैं, स्थानकृत आन्तर्य से ककार का सवर्ण ङकार ही होगा।]। इसी प्रकार-- तङ् क्यञ् चित्रपक्षण् डयमानन् नभस्थम् पुरुषोऽवधीत् [परसवर्णपक्षे] । तं कथं चित्रपक्षं डयमानं नभस्थं पुरुषोऽवधीत् [परसवर्णभावे] । 'य्, व्, ल्' वर्ण सानुनासिक और निरनुनासिक भेद से दो प्रकार के होते हैं, यह हम पीछे सञ्ज्ञा-प्रकरण मे बता चुके हैं। य्, व्, ल् के परे होने पर अनुस्वार के स्थान पर स्थानी अनुस्वार के अनुनासिक होने से स्थानेऽन्तरतम (१७) द्वारा सानु- नासिक यँ, वँ, लँ ही होंगे। यथा -- १ सम् + वत्सर = स + वत्सर = सवँवत्सर । २ दानम् + यच्छति = दान + यच्छति = दानयँ यच्छति । ३ अहम् + लिखामि = अह

  • लिखामि - अहल्लिखामि । रेफ के परे रहते पदान्त अनुस्वार को परसवर्ण नही होता क्योकि रेफ का कोई सवर्ण नही--कुलं रोदिति । यहा यह विशेष ज्ञातव्य है कि मोऽनुस्वार (७७) से विहित अनुस्वार यद्यपि सामान्यतः प्रकृतसूत्र से वैकल्पिक परसवर्ण को प्राप्त होता है तथापि र्, श्, ष्, स्, ह् के परे होने पर वह परसवर्ण को प्राप्त नही होता अनुस्वार अनुस्वार ही रहता है। यथा-- कुलं रोदिति । शिशुं शाययति । तं षट्पदमपश्य । मित्रं सान्त्वयति । शत्रुं हन्ति । कारण-- रेफोष्मणां सवर्णा न सन्ति, किञ्च श्, ष्, स्, ह्, यय्प्रत्याहार मे भी नही आते । [लघु०] विधि-सूत्रम्-- (८१) मो राजि समः क्वौ ।।८।३।२५।। क्विबन्ते राजतौ परे समो मस्य म एव स्यात् । सम्राट् ॥ अर्थ--क्विबन्त राज् धातु परे हो तो सम् के मकार को मकार ही हो । व्याख्या--सम् ६।१। मः ६।१। (मोऽनुस्वार से)। म १।१। मकारादकार उच्चारणार्थः । क्वौ ७।१। राजि ७।१। क्विप् (प्) यह प्रत्यय है । प्रत्ययग्रहणे तदन्त- ग्रहणम्--इस परिभाषा के अनुसार व्याकरण मे जहा २ प्रत्यय का ग्रहण होता है वहा २ तदन्त अर्थात् वह प्रत्यय जिस के अन्त मे होता है ऐसे शब्दसमूह (प्रकृति + प्रत्यय) का ग्रहण किया जाता है। इस नियम के अनुसार क्विन् से तदन्त-विधि हो कर 'क्विबन्त' बन जायेगा । अर्थ --(क्वौ) क्विबन्त (राजि) राज् धातु परे हो तो (सम्) सम् के (म) मकार के स्थान पर (म) मकार आदेश होता है ।

हल्-सन्धि-प्रकरणम् १२३ 'सम्' यह अव्यय होने के कारण सुबन्त होने से पद-सञ्ज्ञक है। इस के मकार को क्विबन्त 'राज़्' धातु परे होने पर मोऽनुस्वारः (७७) से अनुस्वार प्राप्त था। इस सूत्र से सम् के मकार को मकार किया गया है; इसका अभिप्राय यह है कि मकार, मकार ही बना रहे अनुस्वार न हो जाये। उदाहरण यथा— सम् + राट् [चक्रवर्ती राजा। राजृ दीप्तौ (भ्वा०) इत्यस्मात् सत्सूद्विष० इति क्विपि, क्विव्लोपे, नावागते हल्ङ्याब्भ्यः—इति सोर्लोपे, पदान्ते व्रश्चभ्रस्ज० इति षत्वे, डत्वे, अवसाने चत्त्वे च कृते 'राट्' इति सिध्यति।] यहां रेफ-हल् के परे रहते मकार को मोऽनुस्वारः (७७) सूत्र के अनुसार प्राप्त था जो अब प्रकृतसूत्र से नहीं होता, इस तरह 'सम्राट्' पद सिद्ध होता है। इसी प्रकार—सम्राजी, सम्राजः, सम्राजम्, सम्राजा। सम्राजो भावः—साम्राज्यम्। क्विबन्त कहने से 'सम् + राजते = संराजते' में अनुस्वार हो जाता है। नोट—'सम्राज्ञी' शब्द वेद में देखा जाता है (सम्राज्ञी श्वशुरे भव—ऋ० १०.४६) परन्तु लोक में यह शब्द चिन्तनीय है; 'राज्ञी' की सिद्धि कर के 'सम्' में योग होने पर क्विबन्त न होने से 'म्' नहीं हो सकता। अथवा 'सम्राज्' शब्द से भी ङीप् नहीं हो सकता। तब स्त्रीलिङ्ग में भी 'सम्राट्' ही रहेगा। [लघु०] विधि-सूत्रम् (८२) हे मपरे वा ॥८।३।२६॥ मपरे हकारे मस्य मो वा। किम्ह्मलयति, किं ह्मलयति ॥ अर्थः—जिस हकार से परे मकार हो, उस हकार के परे होने पर मकार के स्थान पर विकल्प कर के मकार होता है। व्याख्या—मपरे। ७।१। हे। ७।१। मः। ६।१। (मोऽनुस्वारः से)। मः। १।१। (मो राजि समः क्वौ से)। वा इत्यव्ययपदम्। समासः—मः परो यस्मादसौ मपरस्तस्मिन् = मपरे। बहुव्रीहि-समासः। अर्थः—(मपरे) मकार परे वाले (हे) हकार के परे होने पर (मः) मकार के स्थान पर (वा) विकल्प कर के (मः) मकार आदेश हो जाता है। यह सूत्र मोऽनुस्वारः (७७) का वैकल्पिक अपवाद है। उदाहरण यथा—'किम् + ह्मलयति' [क्या चलाता वा हिलाता है ? ह्मल चलने (भ्वा०) हेतुमण्णौ मित्त्वाद् ह्रस्वः] यहां मकार परे वाला हकार परे है अतः मकार को मकार अर्थात् अनुस्वाराभाव हो—किम्ह्मलयति। पक्ष में मोऽनुस्वार. (७७) से अनुस्वार हो—किं ह्मलयति। इस प्रकार दो रूप सिद्ध होते हैं। इसी तरह— कथम्ह्मलयति, कथं ह्मलयति इत्यादि रूप होते हैं। [लघु०] वा०—(१३) यवलपरे यवला वा ॥ कियँ् ह्यः, किं ह्यः। किव्ँ ह्वल्यति, किं ह्वल्यति। किलँ् ह्लादयति, किं ह्लादयति ॥ अर्थः—यकार, वकार, अथवा लकार परे वाला हकार परे हो तो मकार के स्थान पर क्रमशः विकल्प कर के यकार, वकार तथा लकार हो जाते हैं।

१२४ भैमीव्याख्योपेतायां लघुसिद्धान्तकौमुद्यां

व्याख्या—यवलपरे ।७।२। हे ।७।२। (हे म्परे वा से)। म ।६।३। (मोऽनु- स्वारः मे)। यवला ।१।३। वा इत्यव्ययपदम्। समास —यश्च वश्च लश्च = य-व-ला, इतरेतरद्वन्द्व । एष्वकार उच्चारणार्थ । यवला परा यस्मादसौ यवलपरस्तस्मिन् = यवलपरे। बहुव्रीहि-समास । अर्थ —(यवलपरे) य्, व्, ल्, परे वाले (हे) हकार के परे होने पर (म ) म् के स्थान पर (वा) विकल्प कर के (यवला ) यकार, वकार, लकार हो जाते। यह वार्त्तिक मोऽनुस्वारः (७७) का वैकल्पिक अपवाद है। जिस पक्ष मे 'य्, व्, ल्' नही होगे उस पक्ष मे मोऽनुस्वारः (७७) से अनुस्वार हो जायेगा। यहा यथासङ्ख्यमनुदेशः समानाम् (२३) से आदेश और निमित्तो को क्रमश समझ लेना चाहिये। अर्थात् यकार परे वाला हकार परे होगा तो मकार को यकार, वकार परे वाला हकार परे होगा तो मकार को वकार तथा लकार परे वाला हकार परे होगा तो मकार को लकार आदेश होगा। उदाहरण यथा— 'किम् + ह्य' (कल क्या था ?) यहा यकार परे वाला हकार परे है अत. मकार को विकल्प कर के यकार होगा। अनुनासिक और अननुनासिक भेद से यकार दो प्रकार का होता है। यहा स्थानेऽन्तरतम (१७) से अनुनासिक मकार को वैसा ही अनुनासिक यकार हो कर—किंयँ ह्य । पक्ष मे मोऽनुस्वारः (७७) से अनुस्वार हो कर 'किं ह्य' इस प्रकार दो रूप सिद्ध हुए। 'किम् + ह्वलयति' [क्या हिलाता है ? ह्वल चलने (भ्वा०) हेतुमण्णौ मित्त्वाद् ह्रस्व] यहा वकार परे वाला हकार परे है अत मकार को विकल्प कर के अनुनासिक वकार होकर—किंवँ ह्वलयति। पक्ष मे मोऽनुस्वारः (७७) से अनुस्वार हो कर—'किं ह्वलयति' इस प्रकार दो रूप सिद्ध हुए। 'किम् + ह्लादयति' (कौन वस्तु प्रसन्न करती है?) यहा लकार परे वाला हकार परे है। अत मकार को विकल्प कर के अनुनासिक लकार हो कर—किंलँ ह्लादयति। पक्ष मे मोऽनुस्वारः (७७) से अनुस्वार हो कर—'किं ह्लादयति' ये दो रूप सिद्ध होते हैं। इसी प्रकार १ मित्रंलँ ह्लादते, मित्रं ह्लादते। २ इदंयँ ह्यस्तनम्, इदं ह्यस्तनम्। ३. किंवँ ह्वयतु, किं ह्वयतु। इत्यादि। नोट—सर्वत्र कौमुदीग्रन्थो मे यहा मकार के स्थान पर अनुनासिक 'यँ, वँ, लँ' ही मुद्रित प्राप्त होते हैं। टीकाकारो का कथन है कि 'य्, व्, ल्' अनुनासिक और निरनुनासिक भेद से दो प्रकार के होते है। यहा अनुनासिक मकार के स्थान पर दोनो के प्राप्त होने पर स्थानेऽन्तरतम (१७) से अनुनासिक यकार वकार लकार ही होते हैं। परन्तु शेखरकार नागेशभट्ट ने इस मत का खण्डन किया है। उन का कथन है कि 'य्, व्, ल्' यहा विधान किये गये हैं। विधीयमान अण् अपने सवर्णियो के ग्राहक नहीं होते [देखो—अणुदित्सवर्णस्य चाप्रत्यय (११)]। अत यहा अनु- नासिक 'य्, व्, ल्' नही हो सकेंगे किन्तु जैसे विधान किये गये हैं वैसे निरनुनासिक

हल्-सन्धि-प्रकरणम् १२५ ही होंगे । यथा—'मतुँप्' के अनुनासिक मकार के स्थान पर मादुपधायाश्च मतोर्वोऽ- यवादिभ्यः (१०६२) से अनुनासिक वकार नहीं होता किन्तु निरनुनासिक वकार ही होता है वैसे यहां पर भी करना चाहिये । अर्थवदधातुरप्रत्ययः प्रातिपदिकम् (११६), संयोगादेरातो धातोर्यण्वतः (८१७) इत्यादि सूत्रों के 'अर्थवत्' 'यण्वतः' आदि शब्दों में आचार्य पाणिनि ने स्वयं भी मतुँप् के अनुनासिक मकार के स्थान पर अनुनासिक वकार नहीं किया इस से भी यही सिद्ध होता है कि आचार्य विधीयमान अण् के सवर्णग्रहण के पक्ष में नहीं हैं। कौमुदीपक के समर्थकों का कथन है कि ऋत उत् (२०८) में 'उ' विधीयमान है वह अपने सवर्णियों का ग्रहण नहीं करा सकता, तो पुनः इसे क्यों मुनि ने तपर किया है ? अतः इस से प्रतीत होता है कि विधीयमान भी अण् कहीं-कहीं अपने सवर्णियों का ग्रहण कराते हैं । इस विषय का विस्तृत विचार हमारे नवीन मुद्रित शोधग्रन्थ न्यास-पर्यालोचन में पृष्ठ (२६०) पर देखें । [लघु०] विधि-सूत्रम्—(८३) नपरे नः ।८।३।२७॥ नपरे हकारे (परे) मस्य नो वा। किन्ह्नुते किं ह्नुते ॥ अर्थः—नकार परे वाला हकार परे हो तो मकार के स्थान पर विकल्प कर के नकार हो जाता है व्याख्या—नपरे ।७।१। हे ।७।१। (हे मपरे वा से) । मः ।६।१। (मोऽनुस्वारः से)। नः ।१।१। (नकारादकार उच्चारणार्थः) । वा इत्यव्ययपदम् (हे मपरे वा से) । समासः—नः परो यस्मात् स नपरस्तस्मिन् = नपरे । बहुव्रीहिसमासः । अर्थः— (नपरे) नकार परे वाला (हे) हकार परे हो तो (मः) म् के स्थान पर (वा) विकल्प कर के (नः) न् आदेश हो जाता है। यह सूत्र भी मोऽनुस्वारः (७७) का वैकल्पिक अपवाद है। पक्ष में मोऽनुस्वारः (७७) से अनुस्वार आदेश होगा। उदाहरण यथा— 'किम् + ह्नुते' (क्या छिपाता है ?) यहां नकार परे वाला हकार परे है अतः प्रकृतसूत्र (८३) से मकार को वैकल्पिक नकार होकर—किन्ह्नुते । पक्ष में मोऽनुस्वारः (७७) से अनुस्वार हो कर 'किं ह्नुते' इस प्रकार दो रूप सिद्ध हुए । इसी प्रकार—१. कथन्ह्नुते, कथं ह्नुते । २. यन्ह्नुते, यं ह्नुते । ३. तन् ह्लोतुम्, तं ह्लोतुम् । ह्नुङ् अपनयने (अदा०) के सिवाय अन्य धातु के उदाहरण यहां दुर्लभ हैं। अभ्यास (२०) (१) निम्नलिखित रूपों में सूत्रसमन्वयपूर्वक सन्धिच्छेद करें— १. तपांसि । २. भूमिङ् खनति । ३. आम्रन् चूपति । ४. फलन् ह्नुते । ५. पुलिंलिङ्गम् । ६. ऊर्ध्वण्डयते । ७. विद्वांसः । ८. तलूूँ लिखामि । ९. निष्फलवूँ वित्तम् । १०. नदीन्तरति । ११. कथयूं ह्यः । १२. सत्यं शिवं सुन्दरम् । १३. धनयूं यच्छति । १४. कान्तः । १५. साम्रा- ज्यम् । १६. त्वलूँ लोमशः । १७. रामं रमेशम् भजे । १८. सर्वम्वल-

१२६ भैमीव्याख्योपेतायां लघुसिद्धान्तकौमुद्यां

वताम्पथ्यम् । १६ त्वँ वक्ता । २० पण्डित । २१ अहङ्कार । २२ अहँ वलामि । २३ कुलं ह्लादते । २४ इत्थम् ह्वलयति । (२) 'मा गृधः कस्यस्विद्धनम्' यहां अन्त्य मकार को अनुस्वार क्यों नहीं होता? अपदान्त (?) है तो नश्चापदान्तस्य झलि से हो जाये । (३) 'एव लृकारोऽपि आ, पुंस्त्वम्'—क्या ये शुद्ध हैं ? सप्रमाण लिखें । (४) 'राजन् + पाहि' यहां नकार को अनुस्वार क्यों न हो ? (५) 'तन्यते' यहां नश्चापदान्तस्य झलि सूत्र क्या प्रवृत्त नहीं होता ? (६) 'अनुस्वारस्य ययि पर सवर्ण' यहां 'पर' पद को पृथक् क्यों मानते हैं ? (७) 'सम्राज्ञी' शब्द क्या अशुद्ध है ? (८) 'किं ह्य' में अनुनासिक यँ करना कहां तक शुद्ध है ? टिप्पण करें । (९) 'नपरे, मपरे यवलपरे' पदों में समास बता कर उन का विग्रह लिखें । (१०) डुल रोदिति यहां अनुस्वार को परसवर्ण क्यों नहीं होता ?

[लघु०] विधिसूत्रम्—(८४) ङः सि धुँट् ।८।३।२६॥ ङात् परस्य सस्य धुँड् वा ॥ अर्थ—ङकार से परे सकार का अवयव धुँट् हो जाता है विकल्प से । व्याख्या—ङः ।५।१। सि ।७।१। धुँट् ।१।१। वा इत्यव्ययपदम् (हे मपरे वा म) । 'ङः' यह पञ्चम्यन्त है । तस्मादित्युत्तरस्य (७१) के अनुसार ङकार से अव्य- वहित पर का अवयव 'धुँट्' होना चाहिये । 'सि' यह सप्तम्यन्त पद है । तस्मिन्निति निर्दिष्टे पूर्वस्य (१६) के अनुसार सकार से अव्यवहित पूर्व का अवयव 'धुँट्' होना चाहिये । अब 'धुँट्' किस का अवयव हो ? यह शङ्का उत्पन्न होती है । इस का समा- धान यह है—उभयनिर्देशे पञ्चमीनिर्देशो बलीयान् अर्थात् जहां पञ्चमी और सप्तमी दोनों से निर्देश किया गया हो वहां पञ्चमी का निर्देश ही बलवान् होता है । इस नियम के अनुसार 'ङः' यहां पञ्चमी का निर्देश ही बलवान् हुआ । अत ङकार से अव्यवहित पर=सकार को ही धुँट् का आगम¹ होगा। एवं 'सि' को 'सः' इस षष्ठ्यन्त-


१ व्याकरण प्रक्रिया में जब किसी के साथ कुछ अंश जोड़ा जाता है तो उस जुड़ने वाले अंश को आगम कहते हैं । आगम मित्र की तरह होते हैं जैसे मित्र घर में आकर गृहपति के मेहमान वत उस के समीप बैठते हैं वैसे आगमों की स्थिति होती है । अत एव कहा है—मित्रवदागमा भवन्ति । जिस आगम होता है उसे प्रायः षष्ठ्यन्ततया प्रस्तुत किया जाता है । जैसे —आर्धधातुकस्येड् वलादेः(४०१), इदितो नुम् धातोः (४६३), ड्णोः कुक्टुक् शरि (८६) आदि । परन्तु जब पञ्चमी और सप्तमी दोनों विभक्तियों से निर्देश होता है तब पञ्चम्यन्त निर्देश के बलवान् होने से सप्तम्यन्त पद को षष्ठ्यन्त के रूप में परिणत होना पड़ता है और तब आगम उसी का ही अवयव माना जाता है जैसे कि इस प्रकृतसूत्र में

हल्-सन्धि-प्रकरणम् १२६ स्थान पर (द्वितीयाः) वर्गों के द्वितीय वर्ण हों (शरि) शर् प्रत्याहार परे होने पर (इति) यह (पौष्करसादेः) पौष्करसादि आचार्य के मत में (वाच्यम्) कहना चाहिये । अन्य आचार्यों के मत में न होने से विकल्प सिद्ध हो जायेगा । पौष्करसादि पाणिनि से पूर्ववर्त्ती वैयाकरण थे । आन्तर्य के कारण वर्गप्रथम को उसी वर्ग का द्वितीय वर्ण हो जायेगा । भाव यह है कि श्, ष्, स् के परे होने पर क् को ख्, च् को छ्, ट् को ठ्, त् को थ् तथा प् को फ् आदेश विकल्प से हो जाता है । उदाहरण यथा— १ संवथ्सरः, संवत्सरः । २ अभीप्सा, अभीप्सा । ३ अख्परम्, अक्परम् । ४ ख्षीरम्, क्षीरम् । ५ ख्षमा, क्षमा । ६ ख्यितिः, क्षितिः । ७ थ्सरुः, त्सरुः । ८ अफ्सरसः, अप्सरसः । ९ विर्फ्शिन्, विर्प्शिन् । १० अख्षि, अक्षि । इत्यादि । ‘प्राङ् क्+षष्ठः, सुगण् ट्+षष्ठः’ इन दोनों स्थानों पर पकार=शर् परे रहने के कारण ककार और टकार को क्रमशः खकार और ठकार होकर निम्नलिखित रूप बने— कुँक् पक्ष में { १ प्राङ्ख्षष्ठः । (पौष्करसादि के मत में) { २ प्राङ्क्षष्ठः¹ । कुँक्-अभाव में— ३ प्राङ् षष्ठः । टुँक् पक्ष में { १ सुगण्ठ्षष्ठः । (पौष्करसादि के मत में) { २ सुगण्ट्षष्ठः । टुँक्-अभाव में— ३ सुगण् षष्ठः । इस के अन्य उदाहरण यथा—१ प्राङ्ख्षु, प्राङ्क्षु, प्राङ्षु । २ गवाङ्ख्षु, गवाङ्क्षु, गवाङ्षु । ३ तिर्यङ्ख् स्वपिति, तिर्यङ्क् स्वपिति, तिर्यङ् स्वपिति । ४ क्रुङ्ख् श्वसिति, क्रुङ्क् श्वसिति, क्रुङ् श्वसिति । ५ उदङ्ख् शृणोति, उदङ्क् शृणोति, उदङ् शृणोति । ६ सुगण्ख् सहते, सुगण्क् सहते, सुगण् सहते । इत्यादि । नोट — चयो द्वितीयाः शरि० वार्तिक अनचि च (८.४.४६) सूत्र पर पढ़ा गया है । यद्यपि खरि च (८.४.५४) सूत्र त्रिपादी में इस वार्तिक से परे होने के कारण इसे असिद्ध नहीं समझ सकता, तथापि वार्तिक के आरम्भसामर्थ्य से उस की यहां प्रवृत्ति नहीं होती । अन्यथा वार्तिक बनाने का कुछ प्रयोजन ही न रहे । [लघु०] विधि-सूत्रम्—(८७) नश्च ।८।३।३०॥ नान्तात् परस्य सस्य धुँट् वा । सन्त्सः, सन्सः ॥ अर्थः—नकारान्त से परे सकार को विकल्प कर के धुँट् का आगम होता है । व्याख्या—नः ।५।१। सि ।७।१। धुँट् ।१।१। (ङः सि धुँट् से) । च इत्यव्यय- पदम् । वा इत्यव्ययपदम् (हे मपरे वा से) । अर्थः—(नः) न् से परे (सि=सः) १. ककार और षकार मिल कर ‘क्ष’ हो जाता है । क्+ष्+अ=क्ष । ल० प्र० (६)

१३० भैमीव्याख्योपेतायां लघुसिद्धान्तकौमुद्यां सकार का अवयव (धुट्) धुँट् (वा) विकल्प करके हो जाता है। आद्यन्तौ टकितौ (८५) द्वारा धुँट् सकार का आद्यवयव होगा। उदाहरण यथा— 'सन् + स' (वह सज्जन है) यहा न् से सकार परे है अतः सकार को धुँट् का वैकल्पिक आगम हो कर उँट् अनुबन्ध का लोप हो जाता है। अब खरि च (७४) सूत्र से चर्त्व अर्थात् धकार को तकार करने से—सन्त्स। धुँट्-अभाव पक्ष मे—सन्स। इस प्रकार दो रूप सिद्ध होते हैं। इस सूत्र के कुछ अन्य उदाहरण यथा— १ अस्मिन्त्समये, अस्मिन्समये। २ भवान्त्सखा, भवान्सखा। ३ सन्त्साधु, सन्साधु। ४ तान्त्सपत्नान्, तान्सपत्नान्। ५ धनवान्त्सहोदर, धनवान्सहोदर। ६ पठन्त्साद्‌दृश्यम्, पठन्माद्‌दृश्यम्। ७ विद्वान्त्सहते, विद्वान्सहते। ८ पुमान्त्स्त्रिया, पुमा- न्स्त्रिया। ९ नेन्त्सिद्बध्नातिषु च, नेन्सिद्बध्नातिषु च। १० तान्साध्यान्त्साधय, तान्माध्यान्साधय। इत्यादि। नोट—वृत्ति में नान्तात्' पद 'न' को 'पदात्' का विशेषण कर देने से येन विधिस्तदन्तस्य द्वारा प्राप्त होता है। इस से हानि लाभ कुछ नही। शङ्का—ङ सि धुँट् (८४) नश्च (८७) इन दो ही सूत्रो में 'सि' का ग्रहण होता है। इन्ही दोना स्थानो पर उभयनिर्देशे पञ्चमीनिर्देशो बलीयान् इस परिभाषा का आश्रय कर 'सस्य' ऐसा मानना पडता है। इस से तो यही अच्छा होता कि यहा 'सि' पद की बजाय 'स' पद ग्रहण कर लेते। समाधान—'स' ऐसा स्पष्ट षष्ठ्यन्त पद न कह कर 'सि' इस प्रकार सप्त- म्यन्त पद के ग्रहण का प्रयोजन लाघव करना ही है। 'सि' मे डेढ मात्रा है परन्तु 'स' मे दो मात्रा होती थी। [स् की आधी, इ की एक, कुल डेढ। स् की आधी, अ की एक, विसर्गों की आधी, कुल दो। अर्धमात्रा का लाघवगौरव है। अर्धमात्रा- लाघवेन पुत्रोत्सवं मन्यन्ते वैयाकरणा—यह उक्ति यहा चरितार्थ होती है।] [लघु०] विधि सूत्रम्—(८८) शि तुँक् ।।८।३।३१॥ पदान्तस्य नस्य शे परे तुंग्वा। सञ्छम्भु, सञ्छ्शम्भु, सञ्शम्भु, सन्शम्भु॥ अर्थ—शकार परे होने पर पदान्त नकार को विकल्प कर के तुंक का आगम होता है। व्याख्या—शि ।७।१। न ।६।१। (नश्च से)। पदस्य ।६।१। (यह अधिकृत है)। वा इत्यव्ययपदम् (हे मपरे वा रो)। तुँक् ।१।१। 'न' यह 'पदस्य' का विशेषण है अतः इस मे तदन्तविधि होती है। अर्थ—(शि) शकार परे होने पर (न०) नान्त (पदस्य) पद का अवयव (वा) विकल्प करके (तुँक्) तुंक हो जाता है। 'तुँक्' कित् होने से आद्यन्तौ टकितौ (८५) के अनुसार नान्त पद का अन्तावयव होगा। उदाहरण यथा— 'सन्+शम्भु' (शम्भु भगवान् सत्स्वरूप है) यहा शकार परे है, अतः 'सन्'

हल्-सन्धि-प्रकरणम् १३१ इस नान्त पद को तुँक् का आगम हो कर उँक् की इत्सञ्ज्ञा लोप करने पर—सन्त् शम्भुः। स्तोः श्चुना श्चुः (६२) से त् को च् और न् को ञ् हो कर—सञ्त् शम्भुः। अब शश्छोऽटि (७६) से विकल्प कर के शकार को छकार हो—सञ्त् छम्भुः। पुनः झरो झरि सवर्णे(७३)से चकार का विकल्प करके लोप किया तो—(१) सञ्छम्भुः। जहां चकार का लोप न हुआ वहां (२) सञ्च्छम्भुः। जहां छत्व न हुआ वहां (३) सञ्श्चाम्भुः। जहां तुँक् ही न हुआ वहां श्चुत्व हो (४) सञ्शम्भुः। इस प्रकार चार रूप सिद्ध हुए। रूपों के विषय में निम्नलिखित एक श्लोक प्रसिद्ध है— ञ्छौ ञ्च्छा ञ्चशा ञशाविति चतुष्टयम्। रूपाणामिह तुँक्-छत्व-चलोपानां विकल्पनात्॥ नोट—विद्यार्थी प्रायः इस रूप की सिद्धि में भूल कर जाया करते हैं। भूल से बचने के लिये सब से प्रथम एक ही रूप को पकड़ें; जितने विकल्प हों उन सब को छोड़ दें। अर्थात् प्रथम एक ही रूप में तुँक्, छत्व तथा चकारलोप कर के उसे सम्पूर्ण सिद्ध कर लेना चाहिये। इसके बाद अन्तिम विकल्प से वैकल्पिक रूपों को पकड़ना आरम्भ करना चाहिये। अन्तिम विकल्प चकारलोप है जहां चकारलोप नहीं हुआ उस रूप को सिद्ध करना चाहिये। इसके बाद छत्व के विकल्प को पकड़ उसे सिद्ध करना चाहिये। तदनन्तर तुँक् का विकल्प सिद्ध करना चाहिये। इस प्रकार करने से रूपों में कोई अशुद्धि नहीं आयेगी। याद रखें कि शुद्ध-सिद्धि के रूपों का वही क्रम होता है जो ऊपर श्लोक में दिया गया है। इस सूत्र के अन्य उदाहरण यथा—१. बालाञ्छास्ति। २. विद्वाञ्छोभते। ३. पुत्राञ्श्यायति। ४. नमञ् शाखी। ५. श्वसञ्छेते। ६. भजञ्छि्वम्। ७. बुद्धि- माञ्छृणोति। ८. धनवाञ् शूद्रः। ६. पठञ्शोचति। १०. आगच्छञ्छीनकादयः। ११. पुमाञ्श्रूयते। १२. मतिमाञ् श्लाघते। इत्यादि। प्रत्येक के चार चार रूप जानने चाहियें। [लघु०] विधि-सूत्रम्—(८६) ङमो ह्रस्वादचि ङमुँणित्यम्।८।३।३२॥ ह्रस्वात् परो यो ङम् तदन्तं यत्पदं तस्मात्परस्याचो नित्यं ङमुँट्। प्रत्यङ्ङात्मा। सुगण्णीशः। सन्नच्युतः॥ अर्थः—ह्रस्व से परे जो ङम्, वह है अन्त में जिस के ऐसा जो पद उस से परे अच् को नित्य ङमुँट् का आगम होता है। व्याख्या—ङमः ।५।१। ह्रस्वात् ।५।१। अचि ।७।१। ङमुँट् ।१।१। नित्यम् इति क्रियाविशेषणं द्वितीयाैकवचनान्तम्। यहां पीछे से अधिकृत 'पदात्' पद आ रहा है। 'ङमः' यह 'पदात्' का विशेषण है, अतः 'ङमः' से तदन्त-विधि होगी। उभयनिर्देशे पञ्चमी-निर्देशो बलीयान् इस परिभाषा के द्वारा ङमुँट् 'अचि' का ही अवयव समझा जायेगा। अर्थः—(ह्रस्वात्) ह्रस्व से परे (ङमः) जो ङम् तदन्त (पदात्) पद से परे (अचि=अचः) अच् का अवयव (नित्यम्) नित्य (ङमुँट्) ङमुँट् हो जाता है। 'ङमुँट्' में ङम् प्रत्याहार है उँकार उच्चारणार्थ तथा ट् हलन्त्यम् (१) से इत्सञ्ज्ञक है। ङम् प्रत्याहार को टित् करने का कोई प्रयोजन नहीं अतः सञ्ज्ञियों