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लघुसिद्धान्तकौमुदी (वरदराजाचार्य - भैमी एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)

Laghu Siddhanta Kaumudi of Varadaraja with Hindi Commentary

आचार्य वरदराज द्वारा

DevanagariHindipublished633 पृष्ठ

१०२ भैमीव्याख्योपेतायां लघुसिद्धान्तकौमुद्यां नोट—‘ष्टु परे होने पर’ ऐसा न कह कर ‘ष्टु के साथ योग होने पर’ ऐसा इस लिये कहा है कि ‘पेष्टा’ आदि में ‘ष्टु’ का पूर्वयोग होने पर भी ‘स्तु’ को ‘ष्टु’ हो जाए। सूत्रे ‘ष्टुना’ इत्यत्र सहयोगे तृतीया बोध्या। (४) तट्टीका (उस की टीका, अथवा वह टीका)। ‘तद्+टीका’ [यहां ‘तस्य टीका’ ऐसा षष्ठी-तत्पुरुष अथवा कर्मधारयसमास हो सर्वनाम्नो वृत्तिमात्रे पुंव- द्भावः वार्त्तिक से पुंवद्भाव समझना चाहिये।] यहां टकार के योग में दकार को डकार हो कर खरि च (७४) सूत्र से डकार को टकार करने से ‘तट्टीका’ प्रयोग सिद्ध होता है। ग्रन्थकार को यहां पर बल्कि ‘सच्चित्’ प्रयोग पर ही खरि च (७४) सूत्र दर्शाना उचित था। नोट—यहां पर कुछ लोग ‘तत् + टीका’ ऐसा छेद करके सीधा ष्टुत्व कर दिया करते हैं, यह नितान्त अशुद्ध है, क्योंकि ष्टुना ष्टुः (८.४.४०) सूत्र की दृष्टि में खरि च (८.४.५४) सूत्र असिद्ध है अतः ष्टुत्व से पूर्व चर्व नहीं हो सकता, और यदि ‘तद्’ शब्द को दकारान्त न मान कर तकारान्त मानते हैं तो ‘अतितद्, अतितदौ, अतितदः’ इत्यादि प्रयोग उपपन्न नहीं हो सकते। (५) चक्रिण्ढौकसे (हे चक्रधारिन् ! तुम जाते हो)। ‘चक्रिन्+ढौकसे’ यहां ढकार का योग होने से नकार को णकार हो कर ‘चक्रिण्ढौकसे’ प्रयोग सिद्ध होता है। [लघु०] निषेध-सूत्रम्—(६५) न पदान्ताट्टोरनाम् ।८।४।४१॥ पदान्तात् टवर्गात् परस्याऽनामः स्तोः ष्टुर्न स्यात्। षट् सन्तः। षट् ते। पदान्तात् किम् ? ईट्टे। टोः किम् ? सर्पिष्टमम्॥ अर्थः—पदान्त टवर्ग से परे ‘नाम्’ के नकार को छोड़ कर अन्य सकार तवर्ग को षकार टवर्ग नहीं होता। व्याख्या—न इत्यव्ययपदम्। पदान्तात् ।५।१। टोः ।५।१। अनाम् ।६।१। (यहां षष्ठी के एकवचन ‘ङस्’ का लुक् हुआ है)। स्तोः ।६।१। (स्तोः श्चुना श्चुः से)। ष्टुः ।१।१। (ष्टुना ष्टुः से)। अर्थ —(पदान्तात्) पदान्त (टोः) टवर्ग से परे (अनाम्) नाम्शब्द के अवयव से भिन्न (स्तोः) सकार तवर्ग के स्थान पर (ष्टुः) षकार टवर्ग (न) नहीं होता। यह सूत्र ष्टुना ष्टुः (६४) सूत्र का अपवाद है। उदाहरण यथा— (१) षट् सन्तः (छः सज्जन)। ‘षड्+सन्तः’ [यहां ‘षड्’ सुबन्त होने से पदसंज्ञक है। इस रूप में प्रथम ङः सि धुँट् (८४) द्वारा वैकल्पिक ‘धुट्’ होता है। जहां ‘धुट्’ नहीं होता, उस पक्ष का यहां ग्रहण समझना चाहिये] यहां खरि च (८.४.५४) के असिद्ध होने से ष्टुना ष्टुः (८.४.४०) द्वारा सकार को षकार प्राप्त होता है। पुन इस सूत्र से उस का निषेध हो जाता है क्योंकि यहां पदान्त टवर्ग (डकार) से परे स्तु (सकार) को ष्टुत्व (षकार) करना है। अब खरि च (७४) से डकार को टकार हो कर—‘षट् सन्तः’ प्रयोग सिद्ध होता है। (२) षट् ते (वे छः)। ‘षड्+ते’ यहां खरि च (८.४.५४) के असिद्ध होने से ष्टना ष्टुः (८.४.४०) द्वारा ष्टुत्व अर्थात् तकार को टकार प्राप्त होता है, इस

हल्-सन्धि-प्रकरणम् १०३ पर इस सूत्र से निषेध हो कर पुनः खरि च (७४) से चर्त्व टकार करने से 'षट् ते' प्रयोग सिद्ध होता है। इसी प्रकार—लिण्निमित्तः, इण्, लिट्सु आदि प्रयोगों में भी ष्टुत्व का निषेध समझ लेना चाहिये । पदान्तात् किम् ? ईट्टे । अब यहां यह प्रश्न उत्पन्न होता है कि पदान्त टवर्ग क्यों कहा ? केवल टवर्ग ही कह देते तो क्या हानि थी ? इस का उत्तर यह है कि यदि 'पदान्त' न कहते तो 'ईट्टे' (वह स्तुति करता है) यह प्रयोग अशुद्ध हो जाता। तथाहि—'ईड् + ते' [ईड् स्तुतौ (अदा०) धातु से लँट्, उसे 'त' आदेश, शप्, उस का लुक् तथा 'त' की टि= अकार को एकार हो यह रूप निष्पन्न होता है] यहां खरि च (८.४.५४) के असिद्ध होने से प्रथम ष्टुना ष्टुः (८.४.४०) से तकार को टकार तदनन्तर खरि च (८.४.५४) से डकार को टकार हो कर 'ईट्टे' प्रयोग सिद्ध होता है। अब यदि न पदान्ताट्टोर- नाम् (६५) सूत्र में 'टोः' पद का विशेषण 'पदान्तात्' नहीं बनाते तो यहां अपदान्त डकार से परे भी तवर्ग को टवर्ग करने का निषेध हो जाता; जो अनिष्ट था। अब 'पदान्तात्' कहने से कुछ भी दोष नहीं आता । टोः किम् ? सर्पिष्टमम् । प्रश्न—इस सूत्र में 'टवर्ग' का ग्रहण क्यों किया है ? केवल न पदान्तादनाम् इतना ही कह देते; अर्थात् 'पदान्त वर्ण से परे नाम् के नकार को छोड़ अन्य सकार तवर्ग को षकार टवर्ग नहीं होता' इतने मात्र के कथन से क्या हानि हो सकती थी ? उत्तर—यदि 'टवर्ग' का ग्रहण न करते तो पदान्त षकार से परे भी 'स्तु' को 'ष्टु' होने का निषेध हो जाता; इस से 'सर्पिष्टमम्' आदि प्रयोगों में ष्टुत्व न हो सकने से अनिष्ट हो जाता। तथाहि—'सर्पिस्' शब्द से 'तमप्' प्रत्यय करने पर ह्रस्वात्तादौ तद्धिते (८.३.१०१) सूत्र से सकार को षकार हो 'सर्पिष् + तम'। अब ष्टुना ष्टुः (६४) से ष्टुत्व अर्थात् तकार को टकार करने से 'सर्पिष्टमम्' (उत्तम घृत) प्रयोग निष्पन्न होता है। यहां स्वादिष्वसर्वनामस्थाने (१६४) सूत्र से 'सर्पिष्' की पद सञ्ज्ञा होने के कारण षकार पदान्त हो जाता है¹। अब यदि न पदान्ताट्टोरनाम् (६५) सूत्र में 'टोः' का ग्रहण न करते तो यहां पदान्त षकार से परे तकार को टकार होने का निषेध हो अनिष्ट रूप हो जाता; अतः सूत्र में 'टोः' का ग्रहण परमावश्यक है। [लघु०] वा०—(१०) अनाम्नवति-नगरीणामिति वाच्यम् ॥ षण्णाम् । षण्णवतिः । षण्णगर्यः ॥ अर्थ:—पदान्त टवर्ग से परे नाम्, नवति तथा नगरी शब्दों के नकार को छोड़ अन्य सकार तवर्ग को षकार टवर्ग न हो—ऐसा कहना चाहिये । १. यहां यह शङ्का नहीं करनी चाहिये कि झलाञ्जशोऽन्ते (६७) से षकार को डकार हो टवर्ग हो जाने से न पदान्ताट्टोरनाम् (६५) द्वारा ष्टुत्व का निषेध क्यों न हो जाये ? स्मरण रहे कि ह्रस्वात्तादौ तद्धिते (८.३.१०१) द्वारा किया गया षत्व झलाञ्जशोऽन्ते (८.२.३६) की दृष्टि में असिद्ध है। अतः डकारादेश नहीं होता।

१०४ भैमीव्याख्योपेतायां लघुसिद्धान्तकौमुद्यां व्याख्या = सूत्रकार [भगवान् पाणिनि] ने न पदान्ताट्टोरनाम् (६५) में केवल नाम् के नकार को ही ष्टुत्वनिषेध से मुक्त किया था, अतः नवति तथा नगरी शब्दों में ष्टुत्व-निषेध प्राप्त होने से दोष उत्पन्न होता था। यह देख कर वार्त्तिककार कात्यायन ने वार्त्तिक बनाया कि केवल 'नाम्' के नकार को ही ष्टुत्वनिषेध से मुक्त नहीं करना चाहिये, अपितु 'नवति' और 'नगरी' शब्दों को भी ष्टुत्वनिषेध से मुक्त कर देना चाहिये। वार्त्तिक में पुनः 'नाम्' का ग्रहण अनुवादार्थ है। उस के ग्रहण न करने में उस का बाध हो जाता, क्योंकि वार्त्तिक सूत्र का बाधक होता है। इन के उदाहरण यथा— (१) षण्णाम् (छः का)। षड्+नाम्' ['षष्' शब्द से षष्ठी का बहुवचन 'आम्' प्रत्यय करने पर 'षष्+आम्'। ष्णान्ता षट् (२६७) से 'षष्' की षट्-सञ्ज्ञा हो कर षट्चतुर्भ्यश्च (२६६) से 'आम्' को नुट्कागम कर 'षष्+नाम्'। अब स्वादि- ष्वसर्वनामस्थाने (१६४) से पद-सञ्ज्ञा हो झलाञ्जशोऽन्ते (६७) से षकार को डकार करने से 'षड्+नाम्' रूप बनता है] यहां न पदान्ताट्टोरनाम् (६५) सूत्र में ष्टुत्व-निषेध से 'नाम्' को मुक्त कर देने के कारण पदान्त टवर्ग=डकार से परे नकार को ष्टुना ष्टुः (६४) से ष्टुत्व=णकार हो, प्रत्यये भाषायां नित्यम् (वा० ११) 'वार्त्तिक द्वारा डकार को भी नित्य णकार करने से 'षण्णाम्' प्रयोग सिद्ध होता है। (२) षण्णवतिः (छियानवे)। 'षड्+नवति' ('षडधिका नवति' या 'षट् च नवतिश्च' इस विग्रह में क्रमशः तत्पुरुष और द्वन्द्व करने पर विभक्तियों का लुक् हो 'षड्+नवति' होता है। यहां उसी का ग्रहण है।) यहां अनाम्नवति० (वा० १०) इस प्रकृत वार्त्तिक में ष्टुत्वनिषेध से 'नवति' के मुक्त हो जाने के कारण पदान्त टवर्ग= डकार से परे नकार को ष्टुना ष्टुः (६४) से ष्टुत्व=णकार हो कर यरोऽनुनासिकेऽनु- नासिको वा (६८) सूत्र द्वारा डकार को भी विकल्प कर के णकार करने पर विभक्ति लाने से 'षण्णवति' तथा 'षड्णवति' ये दो प्रयोग सिद्ध होते हैं। (३) षण्णगर्यं (छः नगरियां हैं)। 'षड्+नगर्यं' यहां अनाम्नवति० (वा० १०) इस प्रकृत वार्त्तिक में ष्टुत्व-निषेध से 'नगरी' के भी मुक्त हो जाने के कारण पदान्त टवर्ग=डकार से परे नकार को ष्टुना ष्टुः (६४) से ष्टुत्व=णकार हो, यरोऽनुनासिकेऽनुनासिको वा (६८) सूत्र द्वारा डकार को भी विकल्प करके णकार करने से 'षण्णगर्यं' तथा 'षड् णगर्यं' ये दो प्रयोग सिद्ध होते हैं। ध्यान रहे कि यहां समास नहीं है। [लघु०] निषेध-सूत्रम्—(६६) तोः षि ।८।४।४२॥ (तवर्गस्य षकारे परे) न ष्टुत्वम्। सन्षष्ठः॥ अर्थः—षकार परे होने पर तवर्ग के स्थान पर षकार टवर्ग नहीं होता। व्याख्या—तो ।६।१। षि ।७।१। न इत्यव्ययपदम् (न पदान्ताट्टोरनाम् में)। ष्टु ।१।१। (ष्टुना ष्टुः से)। अर्थ—(षि) षकार परे होने पर (तो ) तवर्ग के

हल्-सन्धि-प्रकरणम् १०५ स्थान पर (ष्टुः) षकार टवर्ग (न) नहीं होता। यह सूत्र ष्टुना ष्टुः (६४) का अप- वाद है। उदाहरण यथा— 'सन् + षष्ठः' यहां षकार के योग में ष्टुना ष्टुः (६४) से नकार को णकार प्राप्त होता है, जो अब इस सूत्र से निषेध कर देने के कारण नहीं होता—सन्षष्ठः (छठा श्रेष्ठ है)। स्मरण रहे कि यद्यपि यहां 'ष्टु' की अनुवृत्ति आती है तथापि तवर्ग के स्थान पर प्राप्त टवर्ग का ही इस सूत्र से निषेध होता है, क्योंकि षकार तो तवर्ग के स्थान पर प्राप्त ही नहीं, जो प्राप्त नही उस का पुनः निषेध कैसा ? यद्यपि यह तोः षि (८.४.४२) सूत्र ष्टुना ष्टुः (८.४.४०) सूत्र की दृष्टि में असिद्ध है, तथापि वचनसामर्थ्य से यह उस का अपवाद है। अपवादो वचनप्रामाण्याद् इति भाष्यम्। अभ्यास (१६) (१) अधोलिखित रूपों में सन्धिविच्छेद कर सन्धि-विधायक सूत्र लिखें— १. न पदान्ताट्टोरनाम्। २. कृपीट्। ३. गरुत्माण्डयते। ४. टिड्ढा- णञ्०। ५. पेष्टुम्। ६. सोमसुड्डौकसे। ७. ष्टष्टः। ८. स्याण्णी। (२) निम्नलिखित रूपों में सूत्र-निर्देश-पूर्वक सन्धि करें— १. भवान् + षण्डः। २. हरिस् + षडङ्गमधीते। ३. परिव्राट् + साधुः। ४. सोमसुत् + षडङ्गमधीते। ५. अग्निचित् + ठकार। ६. राट् + नगरी। ७. इट् + न। ८. हेतुमत् + णी। (३) ष्टुना ष्टुः (८.४.४०) की दृष्टि में तोः षि (८.४.४२) सूत्र त्रिपादी पर होने से असिद्ध है; तो पुनः किस प्रकार यह उस का अपवाद हो सकता है ? ---------::o::--------- [लघु०] विधि-सूत्रम्—(६७) झलां जशोऽन्ते ॥८।२।३६॥ पदान्ते झलां जशः स्युः। वागीशः॥ अर्थः—पद के अन्त में झलों के स्थान पर जश् हों। व्याख्या—पदस्य ।८।१। (यह अधिकृत है)। अन्ते ।७।१। झलाम् ।६।३। जशः ।१।३। अर्थः—(पदस्य) पद के (अन्ते) अन्त में (झलाम्) झलों के स्थान पर (जशः) जश् हो जाते हैं। भाव—झल् प्रत्याहार में वर्गों के चौथे, तीसरे, दूसरे, पहले तथा ऊष्म वर्ण आते हैं। ये वर्ण यदि पद के अन्त में स्थित होंगे तो इन के स्थान पर 'जश्', अर्थात् वर्गों के तीसरे वर्ण हो जाएंगे। स्थानेऽन्तरतमः (१७) से जिस का जिस के साथ स्थान तुल्य होगा; उस के स्थान पर वही आदेश होगा। यहां हम संपूर्ण स्थानी और आदेश वर्णों की तालिका नीचे दे रहे हैं—

१०६ भैमीव्याख्योपेतायां लघुसिद्धान्तकौमुद्यां झल् वर्ण | साम्य (स्थान) | जश् वर्ण (जो आदेश होते हैं) (जिन के स्थान पर 'जश्' होता है) | | झ् ज् छ् च् श् | तालु | ज् भ् ब् फ् प् | ओष्ठ | ब् घ् ग् ख् क् ह्¹ | कण्ठ | ग् ढ् ड् ठ् ट् ष् | मूर्धा | ड् ध् द् थ् त् स्² | दन्त | द् उदाहरण यथा- वागीश (वाणी का पति-बृहस्पति) । 'वाक्+ईश' [वाचामीश = वागीश । षष्ठीतत्पुरुष । यहां समास म विभक्तियों का लुक् होने पर चोः कुः (३०६) से पदान्त चकार को ककार हो जाता है ।] यहां इस सूत्र से पदान्त झल् = ककार के स्थान पर जश् = गकार हो कर विभक्ति लाने से 'वागीश' प्रयोग सिद्ध होता है । इस सूत्र के कुछ अन्य उदाहरण यथा- १ सुप्+अन्त = सुबन्त (सुप् अन्ते यस्य स सुबन्त) । २ तिप्+अन्त = तिबन्त (तिप् अन्ते यस्य स तिबन्त) । ३ समिध्+अत्र = समिदत्र । ४ समिध्+ आधानम् = समिदाधानम् । ५ सम्राट्+इच्छति = सम्राडिच्छति । ६ विद्युत्+ गच्छति = विद्युद् गच्छति । ७ त्रिष्टुभ्+आदि = त्रिष्टुब्वादि । ८ अनुष्टुभ्+एव = अनुष्टुब्वेव । ९ वाक्+अत्र = वागत्र । १० जगत्+ईश = जगदीश (जगत ईश = जगदीश ) । ११ अग्निमथ्+भ्याम् = अग्निमद्भ्याम् । १२ पद्+आगच्छन्ति = पदागच्छन्ति । १३ अप्+ज = अब्जम् (अद्भ्यो जायत इत्यब्जम्) । १४ त्विष्+ भ्याम् = त्विड्भ्याम् । १५ अच्+अन्त = अजन्त । इस सूत्र का फल प्रायः तभी दिखाई देता है जब झलों से परे 'खर्' न हो । खर् परे होने पर इस के किये कार्य को खरि च (७४) नष्ट कर देता है । यथा- 'जगत्+तिष्ठति' यहां झलां जशोऽन्ते (६७) से त् को द् हो खरि च (७४) से पुनः दकार को 'त्' हो गया है । इस लिये इस का फल अश् प्रत्याहार परे होने पर ही प्रतीत होता है । ध्यान रहे कि इस सूत्र की दृष्टि में खरि च (८.४.५५) तथा स्तोः श्चुना श्चुः (८.४.४०) आदि सूत्र असिद्ध हैं, परन्तु उन की दृष्टि में यह असिद्ध नहीं । १ हो ढः (२५१) आदि सूत्र 'ह्' के जश्त्व का बाध कर लेते हैं । २ ससजुषो रुः (१०५) सूत्र पदान्त में 'स्' के जश्त्व का बाध कर लेता है ।

हल्-सन्धि-प्रकरणम् १०७ [लघु०] विधि-सूत्रम् - (६८) यरोऽनुनासिकेऽनुनासिको वा ।८।४।४५॥ यरः पदान्तस्यानुनासिके परेऽनुनासिको वा स्यात् । एतन्मुरारिः, एतद्मुरारिः ॥ अर्थः—अनुनासिक परे होने पर पदान्त यर् के स्थान पर विकल्प कर के अनु- नासिक हो जाता है। व्याख्या—पदान्तस्य ।६।१। (न पदान्ताट्टोरनाम् से विभक्तिविपरिणाम द्वारा)। यरः ।६।१। अनुनासिके ।७।१। अनुनासिकः ।१।१। वा इत्यव्ययपदम् । अर्थः— (अनुनासिके) अनुनासिक परे होने पर (पदान्तस्य) पदान्त (यरः) यर् के स्थान पर (वा) विकल्प कर के (अनुनासिकः) अनुनासिक आदेश हो जाता है। जो वर्ण मुख और नासिका दोनों से बोला जाये उसे 'अनुनासिक' कहते हैं [मुखनासिकावचनो- ऽनुनासिकः (६)]। अनुनासिक अच् और हल् दोनों प्रकार के होते हैं। पदान्त यर् से परे अनुनासिक अच् कहीं नहीं देखा जाता; अतः यहां हल् अनुनासिकों का ही ग्रहण होगा। हल् अनुनासिक पांच हैं—१. ङ्, २. ञ्, ३. ण्, ४. न्, ५. म् । इन पांच वर्णों में से किसी वर्ण के परे होने पर पदान्त यर् को विकल्प कर के अनुनासिक होगा। स्थानेऽन्तरतमः (१७) से वही अनुनासिक होगा; जिस का यर् के साथ स्थान तुल्य होगा। यथा—कवर्ग को ङ्, चवर्ग को ञ्, टवर्ग को ण्, तवर्ग को न्, पवर्ग को म्। उदाहरण यथा— 'एतद् + मुरारि' (एतस्य मुरारिः—एतद्मुरारिः, षष्ठीतत्पुरुषः, एष मुरारिः —एतद्मुरारिः, कर्मधारयसमासो वा) यहां समास में विभक्तियों का लुक् हो चुकने पर प्रत्ययलोपे प्रत्ययलक्षणम् (१६०) की सहायता से सुप्तिङन्तम्पदम् (१४) द्वारा एतद् की पद-सञ्ज्ञा हो जाती है; इस प्रकार दकार पद का अन्त ठहरता है। इस से परे मकार मुखनासिकावचनोऽनुनासिकः (६) के अनुसार अनुनासिक है। इस के परे होने पर अब दकार = यर् को अनुनासिक करना है। स्थानेऽन्तरतमः (१७) से दकार को नकार ही अनुनासिक होगा (लृतुलसानां दन्ताः) । तो इस प्रकार दकार को विकल्प कर के अनुनासिक नकार हो कर विभक्ति लाने से 'एतन्मुरारिः, एतद्मुरारिः' ये दो प्रयोग सिद्ध होते हैं। इस सूत्र के कुछ उदाहरण यथा— १. अग्निचित् + नयति = अग्निचिद् + नयति (झलां जशोऽन्ते) = अग्नि- चिन्नयति । २. तद् + न = तन्न । ३. दिग् + नाग = दिङ्नागः । इसी प्रकार—षत्रेमंम् नित्यम्, नद्याम्नीभ्यः, आङ् नद्याः । अन्य उदाहरण अभ्यास में देखें। यर् प्रत्याहार में यद्यपि ह् को छोड़ सब व्यञ्जन आ जाते हैं तथापि यहां यर् से केवल स्पर्श (वर्गगत) वर्णों का ही ग्रहण अभीष्ट है—स्पर्शस्यैवेष्यते। अत एव चतुर्मुखः, प्रातर्नयति, स्वनर्म आदि में पदान्त भी रेफ को अनुनासिक = णकार नहीं होता। इस का स्पष्टीकरण सिद्धान्तकौमुदी में देखें। यहां पर यर्ग्रहण अचो रहाभ्यां द्वे (६०) आदि उत्तरसूत्रों में अनुवृत्ति के लिये है।

१०८ भैमीव्याख्योपेतायां लघुसिद्धान्तकौमुद्यां पदान्त ग्रहण का यह प्रयोजन है कि—'शङ्खध्मा' आदि में अपदान्त यर् को अनुनासिक न हो। [लघु०] वा०—(११) प्रत्यये भाषायां नित्यम्॥ तन्मात्रम्। चिन्मयम्॥ अर्थ—लोक में अनुनासिकादि प्रत्यय परे होने पर पदान्त यर् को नित्य अनु- नासिक हो जाता है। - व्याख्या—प्रत्यये ।७।१। भाषायाम् ।७।१। नित्यम् ।२।१। (क्रियाविशेषणम्)। यह वार्त्तिक यरोऽनुनासिकेऽनुनासिको वा (६८) सूत्र पर भाष्य में पढ़ा गया है, अतः तद्विषयक ही समझना चाहिये। अतः इस का अर्थ होगा—(भाषायाम्) लोक में (अनुनासिके) अनुनासिकादि (प्रत्यये) प्रत्यय परे होने पर (पदान्तस्य) पदान्त (यर्) यर् के स्थान पर (नित्यम्) नित्य (अनुनासिक) अनुनासिक हो। पूर्वसूत्र से विकल्प प्राप्त होने पर इस से नित्य अनुनासिक होता है। उदाहरण यथा— (१) तन्मात्रम् (उतना ही)। 'तद्+मात्र' [तत् प्रमाणमस्येति तन्मात्रम्, प्रमाणे द्वयसज्दघ्नञ्मात्रच (११६४) इति मात्रच्-प्रत्यय।] यहां 'मात्रच्' प्रत्यय हो कर तद्धितान्त की प्रातिपदिक-संज्ञा होने से सुपो धातु-प्रातिपदिकयो (७२१) द्वारा तद् शब्द से परे सुं प्रत्यय का लुक् हो जाता है, अतः 'एतद्मुरारि' प्रयोग- गत 'एतद्' शब्द की तरह यहां भी दकार पदान्त है। इस पदान्त दकार=यर् से परे 'मात्रच्' यह अनुनासिकादि प्रत्यय किया गया है, अतः दकार को तत्सदृश नकार नित्य अनुनासिक हो कर विभक्ति लाने से 'तन्मात्रम्' प्रयोग सिद्ध हो जाता है¹। (२) चिन्मयम् (चेतनस्वरूप)। 'चित्+मय' [चिदेव चिन्मयम्, नित्यं वृद्धशरादिभ्य (१११०) इत्यत्र 'नित्यम्' इति योग-विभागात् स्वार्थे मयट्] यहां 'मयट्' प्रत्यय हो कर तद्धितान्त की प्रातिपदिक-संज्ञा होने से सुपो धातु-प्रातिपदिकयो (७२१) द्वारा सुं प्रत्यय का लुक् हो जाता है, अतः तकार पदान्त है। इस पदान्त तकार को प्रथम झलां जशोऽन्ते (६७) सूत्र से दकार हो कर पुनः इस वार्त्तिक से नित्य अनुनासिक नकार हो जाता है, तब विभक्ति लाने से 'चिन्मयम्' प्रयोग सिद्ध होता है। ध्यान रहे कि इस वार्त्तिक से भी पूर्ववत् पदान्त यर् को ही अनुनासिक विधान किया जाता है, अपदान्त यर् को नहीं। अतः एव—'स्वप्न, यत्न, क्षुभ्नाति, मथ्नाति, बध्नाति, मृद्नाति, वेद्मि' आदि प्रयोगों में अनुनासिकादि प्रत्यय परे होने पर भी अपदान्त यर् को अनुनासिक नहीं होता। नोट—यहां यह विशेष ज्ञातव्य है कि झलां जशोऽन्ते (८।२।३६) की दृष्टि में यह सूत्र (८।४।४४) असिद्ध है, अतः जहां झलां जशोऽन्ते (६७) सूत्र का विषय होगा वहां प्रथम जश्त्व हो कर पश्चात् अनुनासिक होगाँ। १ यहां नकार के असिद्ध होने से न लोप प्रातिपदिकान्तस्य द्वारा नलोप नहीं होता।

हल्-सन्धि-प्रकरणम् १०६ अभ्यास (१७) (१) निम्नलिखित रूपों में सूत्र-समन्वय करते हुए सन्धिच्छेद करें— १. षण्मासाः। २. एतन्मनोहरः। ३. इणिन्पेघः। ४. तण्णकारः¹। ५. त्रिष्टुम्नाम। ६. तन्न। ७. सन्मार्गः। ८. मृन्मयम्²। ९. क्षुद्भिः। १०. सोमसुन्नयति। ११. त्वङ्मनसी। १२. ककुबीशः। १३. ककु- म्नायकः। १४. वाङ्मयम्। १५. अम्मयम्। १६. कियन्मात्रम्। (२) निम्न-लिखित प्रयोगों में सूत्रोपन्यासपूर्वक सन्धि करें— १. विपद् + मय। २. यद् + नैति। ३. तद् + लकार³। ४. मनाक् + हसति। ५. अप् + माय। ६. अग्निचित् + लकार। ७. कतिचित् + दिनानि। ८. मद् + नीतिः। ९. धिक् + मूर्खम्। १०. सत् + आचार। ११. वाक् + मलम्। १२. जगत् + नाथ। १३. ऋक् + मन्त्र। (३) निम्न-लिखित रूपों में सन्धि न करने का कारण बताओ। १. वेद् + मि। २. गरुत् + मत्⁴। ३. गृभ् + णाति। ४. प्रश् + न। ५. चतुर् + मुख। ६. प्रातर् + नमामि। (४) (क) खर् परे होने पर झलां जशोऽन्ते का फल क्यों प्रतीत नहीं होता? (ख) 'शङ्खध्माः' में धकार को अनुनासिक क्यों नहीं होता ? • (ग) सुँप् परे न होने पर भी 'एतन्मुरारिः' में दकार कैसे पदान्त है ? ――:०:―― [लघु०] विधि-सूत्रम्—(६६) तोर्लि ।८।४।६०॥ तवर्गस्य लकारे परे परसवर्णः। तल्लयः। विद्वाँल्लिखति। नस्या- ऽनुनासिको लः॥ अर्थः—लकार परे होने पर तवर्ग के स्थान पर पर-सवर्ण आदेश होता है। व्याख्या—तोः ।६।१। लि ।७।१। पर-सवर्णः ।१।१। (अनुस्वारस्य ययि पर- सवर्णः से)। समासः—परस्य सवर्णः=परसवर्णः, षष्ठी-तत्पुरुषः। अर्थः—(लि) लकार परे होने पर (तोः) तवर्ग के स्थान पर (पर-सवर्णः) पर-सवर्ण आदेश होता है। भाव यह है कि तवर्ग से जब लकार परे होगा तो तवर्ग के स्थान पर—पर अर्थात् लकार का सवर्ण आदेश किया जायेगा। लकार का लकार के सिवाय अन्य कोई सवर्ण नहीं, अतः तवर्ग के स्थान पर लकार ही आदेश होगा। लकार दो प्रकार का होता है; एक अनुनासिक (लँ) और दूसरा अननुना- १. यहां अनुनासिक-विधायक सूत्र के असिद्ध होने से प्रथम ष्टुत्व कर लेना चाहिये। २. यहां पर पदान्त होने से न् को ण् नहीं होता— पदान्तस्य (१३६)। ३. यहां पर प्रथम श्चुत्व कर लेना चाहिये। ४. यहां पर तसौ मत्वर्थे (११८२) सूत्र से भ सञ्ज्ञा होती है। पदान्त न होने से अनुनासिक नहीं होता।

भिन्न (ल्) । स्थानेऽन्तरतम (१७) के अनुसार तवर्गस्थ अनुनासिक वर्ण के स्थान पर अनुनासिक लकार तथा अननुनासिक वर्ण के स्थान पर अननुनासिक लकार होगा । तवर्गो में नकार के सिवाय अन्य कोई अनुनासिक नहीं, अतः केवल नकार के स्थान पर ही अनुनासिक लकार तथा शेष तवर्गीय वर्णों के स्थान पर अननुनासिक लकार होगा । उदाहरण यथा- तल्लय (उस में नाश या उस का नाश) । 'तद् + लय' (तस्मिंस्तस्य वा लय - तल्लय, सप्तमीतत्पुरुष, षष्ठी-तत्पुरुषो वा) यहां तवर्ग = दकार से परे लकार विद्यमान है, अतः तोर्लि (६६) सूत्र से दकार के स्थान पर पर-सवर्ण = लकार कर के विभक्ति लाने से 'तल्लय' प्रयोग सिद्ध होता है । विद्वाँल् लिखति (विद्वान् लिखता है) । 'विद्वान् + लिखति' इस दशा में तोर्लि (६६) सूत्र से नकार को पर-सवर्ण लकार आदेश होता है, परन्तु नकार के अनुना- सिक होने से लकार भी अनुनासिक आदेश हो कर 'विद्वाँल् लिखति' प्रयोग सिद्ध होता है। इस के कुछ अन्य उदाहरण यथा -१ विपद् + लीन = विपल्लीन् । २ कश्चिद् + लभते = कश्चिल्लभते । ३ कुशान् + लुनाति = कुशाँल् लुनाति । ४ महान्

  • लाभ = महाँल् लाभ । ५ उद् + लेख = उल्लेख । ६ धनवान् + लुनीते = धन- वाँल् लुनीते । ७ हनुमान् + लङ्का दहति = हनुमाँल् लङ्का दहति । ८ हसन् + लेढि = हसँल् लेढि । ६ जगद् + लीयते = जगल्लीयते । १०. तद् + लीला = तल्लीला । ११ तद् + लीन = तल्लीन । १२ यद् + लक्षणम् = यल्लक्षणम् । १३ चिद् + लय = चिल्लय । १४ विद्युद् + लेखा = विद्युल्लेखा । 'तस्मात् + लुवारात्' इत्यादि में तोर्लि (६६) प्रवृत्त नहीं होगा, क्योंकि इस में 'ल' -सदृश है, 'ल' नहीं। केवल जश्त्व ही होगा 'तस्माद् लुवारात्' । ध्यान रहे कि यह सूत्र झलां जशोऽन्ते (६७) की दृष्टि में असिद्ध है, अतः जहां उस का विषय होगा वहां प्रथम जश्त्व हो कर पश्चात् तोर्लि (६६) सूत्र प्रवृत्त होगा । यथा - जगत् + लीयते = जगद् + लीयते = जगल्लीयते । [लघु०] विधि-सूत्रम् - (७०) उदः स्था-स्तम्भोः पूर्वस्य ।८।४।६०॥ उद परयोः स्था-स्तम्भोः पूर्व-सवर्णः ॥ अर्थ - 'उद्' से (परे) स्था और स्तम्भ् को पूर्वसवर्ण हो । व्याख्या - उद ५।१। स्था-स्तम्भोः ६।२। पूर्वस्य ।६।१। सवर्ण १।१। (अनुस्वारस्य ययि परसवर्णः म०) । अर्थ -(उद ) 'उद्' उपसर्ग से (स्था-स्तम्भो ) स्था और स्तम्भ् के स्थान पर (पूर्वस्य) पूर्व का (सवर्ण) सवर्ण आदेश होता है । १ यद्यपि अनुस्वारस्य ययि पर-सवर्ण (७६) सूत्र में 'पर सवर्ण' है, तथापि अनु- वृत्ति केवल 'सवर्ण' की ही आनी है। इस का कारण यह है कि अनुवृत्ति अधि- कृत पदों की ही आया करती है और अधिकृति स्वरितेनाधिकारः (१।३।११) इस सूत्र में स्वरित-स्वर के बल से होती है। पूर्व समय में उक्त सूत्र में स्वरित-

हल्-सन्धि-प्रकरणम् १११ 'उदः' यहां दिग्योग में पञ्चमी है; अर्थात् 'उद्' से किसी दिशा में स्थित स्था और स्तम्भ् को पूर्वसवर्ण होगा। वर्णों में दो ही दिशा सम्भव हो सकती हैं, एक पर और दूसरी पूर्व। अब यहां यह प्रश्न उत्पन्न होता है कि क्या 'उद्' से पूर्वस्थित स्था और स्तम्भ् को पूर्व-सवर्ण हो या परस्थित स्था और स्तम्भ् को पूर्वसवर्ण हो ? किञ्च—यह भी प्रश्न उत्पन्न होता है कि क्या व्यवधान से रहित पूर्व या पर-स्थित स्था और स्तम्भ् को पूर्व-सवर्ण हो या व्यवहित पूर्व या पर स्थित स्था और स्तम्भ् को भी पूर्वसवर्ण हो ? इन शङ्काओं की निवृत्ति के लिये अग्रिम परिभाषा-सूत्र लिखते हैं। [लघु०] परिभाषा-सूत्रम्—(७१) तस्मादित्युत्तरस्य ।१।१।६६॥ पञ्चमी-निर्देशेन क्रियमाणं कार्यं वर्णान्तरेणाऽव्यवहितस्य परस्य ज्ञेयम् ॥ अर्थः—पञ्चम्यन्त के निर्देश से क्रियमाण कार्य अन्य वर्णों के व्यवधान से रहित पर के स्थान पर जानना चाहिये। व्याख्या - तस्माद् इति पञ्चम्यन्तानुकरणं लुप्तपञ्चम्येकवचनान्तम् [उदः स्था-स्तम्भोः आदि सूत्रों में स्थित 'उदः' आदि पञ्चम्यन्त पदों का अनुकरण यहां 'तस्मात्' शब्द से किया गया है, इस के आगे पञ्चमी के एकवचन का सुपां सुलुक्० (७.१.३६) सूत्र से लुक् हुआ समझना चाहिये]। इति इत्यव्ययपदम्। निर्द्दिष्टात् ।५।१। (तस्मिन्निति निर्दिष्टे पूर्वस्य सूत्र से विभक्ति-विपरिणाम द्वारा) । उत्तरस्य ।६।१। अर्थः—(तस्माद् इति निर्द्दिष्टात्) उदः स्था-स्तम्भोः पूर्वस्य आदि सूत्रों में स्थित 'उदः' आदि पञ्चम्यन्त पदों के निरन्तर उच्चारण किये गये अर्थों से (उत्तरस्य) परले के स्थान पर कार्य होता है। पञ्चम्यन्त पदों के अर्थों का निरन्तर उच्चारण तभी हो सकता है जब उन से अव्यवहित [व्यवधान-रहित] उत्तर को कार्य्य हो; अतः यह सुतराम् आ जाता है कि सूत्रों में स्थित पञ्चम्यन्त पदों के अर्थों से अव्यवहित पर को कार्य हो। इस सूत्र की विशेष व्याख्या तस्मिन्निति निर्दिष्टे पूर्वस्य (१६) सूत्र के समान समझ लेनी चाहिये। हम यहां पिष्ट-पेषण करना नहीं चाहते। इस सूत्र से अन्ततोगत्वा यह ज्ञात होता है कि उदाहरणों में पञ्चम्यन्त पद के अर्थ से अव्यवहित पर को ही कार्य हो, पूर्व को अथवा व्यवहित पर को कार्य न हो। यथा—'उद्+प्रस्थानम्' यहां यद्यपि 'उद्' से 'स्था' परे है, तथापि 'प्र' शब्द का मध्य में व्यवधान होने से उदः स्थास्तम्भोः० (७०) सूत्र द्वारा पूर्व-सवर्ण नहीं होता। इसी प्रकार तिङ्ङतिङः (८.१.२८) [अतिङन्त से तिङन्त को निघात अर्थात् सर्वानु- स्वर केवल 'सवर्णः' पर था, 'पर' पर नहीं। यद्यपि अब स्वरितादि-स्वर-चिह्न नहीं रहे; तथापि प्रतिज्ञाऽनुनासिक्याः पाणिनीयाः की तरह प्रतिज्ञास्वरिताः पाणि- नीयाः भी जानना चाहिये। अथवा 'पर' में षष्ठी का लोप समझना चाहिये।

११२ भैमीव्याख्योपेतायां लघुसिद्धान्तकौमुद्यां दात्तस्वर हो] सूत्र 'ईडे अग्निम्' में प्रवृत्त नहीं होता, क्योंकि 'अग्निम्' इस अतिङन्त पद में 'ईडे' यह तिङन्त पद परे नहीं, पूर्व में वर्त्तमान है। यह परिभाषा-सूत्र है। परिभाषाएं प्रयोगसिद्धि में स्वतन्त्रतया कुछ कार्य नहीं किया करतीं, अपितु सूत्रों के अर्थों में मिश्रित हो कर प्रयोगसिद्धि किया करती हैं, यह हम पीछे लिख चुके हैं। इस के अनुसार यह परिभाषा भी उदः स्था-स्तम्भोः पूर्वस्य (७०)आदि सूत्रों के साथ मिल कर एकार्थ उत्पन्न करेगी। तो अब उदः स्थास्तम्भोः पूर्वस्य (७०) सूत्र का यह अर्थ हो जायेगा—'उद्' से अव्यवहित पर स्था और स्तम्भ् को पूर्व-सवर्ण आदेश हो। इसी प्रकार तिङ्ङतिङ (८।१।२८) सूत्र का यह अर्थ होगा —अतिङन्त पद से अव्यवहित पर तिङन्त के स्थान पर निघात अर्थात् सर्वानुदात्त- स्वर हो। 'उद्+स्थान' 'उद्+स्तम्भन' इन दोनों स्थानों पर 'उद्' से परे अव्यवहित स्था और स्तम्भ् विद्यमान हैं, अतः इन के स्थान पर पूर्व-सवर्ण करना है। अब 'स्था- स्तम्भो' के षष्ठ्यन्त होने से अलोऽन्त्यस्य (२१) सूत्र से इन के अन्त्य अल् के स्थान पर पूर्व-सवर्ण प्राप्त होता है, इस पर अलोऽन्त्यस्य (२१) की अपवाद परिभाषा लिखते हैं— [लघु०] परिभाषा-सूत्रम्—(७२) आदेः परस्य ।१।१।५३॥ परस्य यद् विहितं तत् तस्यादेर्बोध्यम् । इति सस्य थः ॥ अर्थः—पर के स्थान पर जो कार्य विधान किया जाता है, वह कार्य उस (पर) के आदि वर्ण के स्थान पर समझना चाहिये। व्याख्या—आदे ।६।१। अल् ।६।१। (अलोऽन्त्यस्य से)। परस्य ।६।१। अर्थ -- (परस्य) पर के स्थान पर विधान किया कार्य (आदे) उस के आदि (अल्) अल् के स्थान पर होता है। यहां सूत्रार्थ, अनुकूल पदों का अध्याहार कर के ही किया जाता है। 'उद्+स्थान' 'उद्+स्तम्भन' यहां तस्मादित्युत्तरस्य (७१) परिभाषा की सहायता से उदः स्था-स्तम्भोः पूर्वस्य (७०) सूत्र द्वारा परले स्था और स्तम्भ् को पूर्व- सवर्ण होना था, अब वह इस परिभाषा द्वारा पर के आदि अर्थात् सकार को होगा। अब यहां यह विचार प्रस्तुत होता है कि स् को पूर्व (दकार) का कौन सा सवर्ण हो ? क्योंकि पूर्व (दकार) का एक सवर्ण नहीं किन्तु पांच सवर्ण हैं—त्, थ्, द्, ध्, न्। इस शङ्का की निवृत्ति के लिये स्थानेऽन्तरतमः (१७) सूत्र उपस्थित हो कर कहता है कि 'प्राप्त हुए आदेशों में अत्यन्त सदृश आदेश हो'। इस के अनुसार अब हमें 'त्, थ्, द्, ध्, न्' इन पांच वर्णों में से सकार के अत्यन्त सदृश वर्ण ढूंढना है। यदि यहां स्थानकृत आन्तर्य (सादृश्य) देखते हैं तो वह लृतुलसानां दन्ताः के अनुसार सब में समान है; अतः इस आन्तर्य से काम नहीं चल सकता। अर्थकृत और प्रमाण- कृत सादृश्य तो इन में हो ही नहीं सकता। अतः अब शेष बचे गुणकृत आन्तर्य अर्थात् यत्नों

हल्-सन्धि-प्रकरणम् ११३ द्वारा सादृश्य से ही परीक्षा करेंगे। यत्न—आभ्यन्तर और बाह्य दो प्रकार के होते हैं। इन में प्रथम आभ्यन्तर-यत्न तो सकार के साथ उन पांचों में से किसी का भी नहीं मिलता; क्योंकि ईषद्द्विवृतमूष्मणाम् के अनुसार सकार का 'ईषद्विवृत' और उन पांचों का तत्र स्पृष्टं प्रयत्नं स्पर्शानाम् के अनुसार 'स्पृष्ट' है। अतः बाह्य-यत्नों की दृष्टि से ही परीक्षा करते हैं। मकार का 'विवार, श्वास, अघोष और महाप्राण' बाह्य-यत्न है। उन पांचों के बाह्य-यत्न निम्नप्रकारेण हैं— ⎧ त् का बाह्ययत्न—विवार, श्वास, अघोष और अल्पप्राण है। ⎫ ⎪ थ् का बाह्ययत्न—विवार, श्वास, अघोष और महाप्राण है। ⎪ ⎨ द् का बाह्ययत्न—संवार, नाद, घोष और अल्पप्राण है। ⎬ ⎪ ध् का बाह्ययत्न—संवार, नाद, घोष और महाप्राण है। ⎪ ⎩ न् का बाह्ययत्न—संवार, नाद, घोष और अल्पप्राण है। ⎭ इस से सिद्ध होता है कि बाह्ययत्नों की दृष्टि से थकार ही सकार के तुल्य है। अतः सकार के स्थान पर पूर्वसवर्ण थकार ही होता है— उद्+स्थान, उद्+ थ्तम्भन। अब अग्रिमसूत्र प्रवृत्त होता है— [लघु०] विधि-सूत्रम् (७३) झरो झरि सवर्णे ।८।४।६४॥ हलः परस्य झरो वा लोपः सवर्णे झरि ॥ अर्थः—हल् से परे झर् का विकल्प से लोप हो सवर्ण झर् परे हो तो। व्याख्या हलः ।५।१। (हलो यमां यमि लोपः से)। झरः ।६।१। लोपः ।१।१। (हलो यमां यमि लोपः से)। अन्यतरस्याम् ।७।१। (झयो होऽन्यतरस्याम् से)। सवर्णे ।७।१। झरि ।७।१। अर्थः—(हलः) हल् से¹ (झरः) अव्यवहित पर झर् का (अन्यत- रस्र्याम्) एक अवस्था में (लोपः) लोप हो जाता है (सवर्णे) सवर्ण (झरि) झर् परे हो तो। यहां निमित्त² और स्थानियों³ का यथासङ्ख्य नहीं होता; अर्थात् यहां 'झ् का झ् परे होने पर, भ् का भ् परे होने पर, घ् का घ् परे होने पर, ढ् का ढ् परे होने १. हल् से परे झर् का लोप विहित होने से 'पत्रम्, दत्त्वा, तत्त्वम्, सत्त्वम्, कित्त्वम्, डित्त्वम्, मित्रम्, क्षत्रियः, छत्रम्, छात्रः, पुत्रः' इत्यादि में 'त्' का और 'वाग्मी' में 'ग्' का लोप नहीं होगा। पत्र, तत्व, कित्व, वाग्मी आदि लिखना अपाणिनीय है। २. जिसके होने पर कोई कार्य हो उसे 'निमित्त' कहते हैं यथा इको यणचि (१५) में अच् परे होने पर इक् को यण् होता है तो अच् निमित्त है। झरो झरि सवर्णे (७३) सूत्र में झर् परे होने पर झर् का लोप कहा गया है तो परला 'झर्' निमित्त है। ३. जिस के स्थान पर कुछ किया जाता है उसे 'स्थानी' कहते हैं। यथा—झरो झरि सवर्णे (७३) में झर् के स्थान पर लोप विहित होने से 'झर्' स्थानी है; इसी प्रकार इको यणचि (१५) आदि में इक् आदि स्थानी हैं। ल० प्र० (८)

११४ भैमीव्याख्योपेतायां लघुसिद्धान्तकौमुद्यां पर' इत्यादि क्रम से लोप नहीं होता, क्योंकि यदि ऐसा अभीष्ट होता तो आचार्य झरो झरि' इतना ही सूत्र बनाते 'सवर्णे' पद का ग्रहण न करते, अतः विदित होता है कि वे सवर्ण झर् मात्र परे होने पर झर् का लोप चाहते हैं। इस का प्रयोजन 'उद् थ् तम्भन' आदि प्रयोगों में थकार आदि का लोप करना है। 'उद् थ् थान' 'उद् थ् तम्भन' यहां हल् = दकार से परे इस सूत्र द्वारा झर् = प्रथम थकार का विकल्प कर के लोप हो जाता है, क्योंकि इस से परे थकार और तकार क्रमशः सवर्ण झर् विद्यमान हैं। इस प्रकार लोपपक्ष में- उद्+थान, उद्+ तम्भन । लोपाभाव में- उद्+थ्थान उद्+थ्स्तम्भन । अब इन सब स्थानों पर अग्रिमसूत्र प्रवृत्त होता है— [लघु०] विधि-सूत्रम्—(७४) खरि च ।८।४।५४॥ खरि झलां चरः स्युः । इत्युदो दस्य तः । उत्थानम् । उत्तम्भनम् ॥ अर्थ - खर् प्रत्याहार परे होने पर झलों के स्थान पर चर् हो जाता है। इत्युदो दस्य तः - इस सूत्र से उद् के दकार को तकार हो जाता है। व्याख्या-खरि ।७।१। च इत्यव्ययपदम् । झलाम् ।६।३। (झलां जश् झशि से)। चर् ।१।३। (अभ्यासे चर्च से वचन-विपरिणाम कर के) । अर्थ --(खरि) खर् प्रत्याहार परे होने पर (झलाम्) झलों के स्थान पर (चरः) चर् हो जाते हैं। वर्गों के प्रथम, द्वितीय तथा श्, ष्, स् वर्ण—'खर्' कहाते हैं। वर्गों के प्रथम तथा श्, ष्, स् वर्ण—'चर्' कहाते हैं। वर्गों के पञ्चम वर्णों को छोड़ कर शेष सब वर्गस्थ तथा ऊष्म वर्ण—'झल्' प्रत्याहार के अन्तर्गत हो जाते हैं। श्, ष्, स् इन झलों के स्थान पर श्, ष्, स् ही चर् होते हैं। यथा— 'निश्चय', 'रामश्चिनोति' यहां चकार खर् परे होने पर शकार झल् को शकार चर् ही हुआ है। 'वृष्टि', 'दृष्टि' यहां टकार खर् होने पर षकार झल् को षकार चर् ही हुआ है। 'अस्ति, स्त', 'रामस्स्य' यहां खर् परे होने पर सकार झल् को सकार चर् ही हुआ है। झल् प्रत्याहारान्तर्गत हकार से परे कभी खर् नहीं आता, क्योंकि खर् से पूर्व हकार को सदैव हो ढः (२५१) द्वारा ढकार हो जाता है। प्रश्न—यदि 'श्, ष्, स्' के स्थान पर 'श्, ष्, स्' होते हैं और हकार की जरूरत नहीं, तो झल् की बजाय झय् और चर् की बजाय चय् ही क्यों नहीं कह देते ? उत्तर—खरि च (७४) सूत्र में झल् और चर् की पीछे से अनुवृत्ति आ रही है, उसी से यहां काम चल जाता है, अब यदि झय् और चय् कहेंगे तो उन का ग्रहण करना पड़ेगा, इस में लाघव की बजाय गौरव-दोष उत्पन्न होगा, अतः इन अनुवर्तित झल् और चर् पदों से ही काम चलाने में लाघव है, किञ्च इन के ग्रहण से कोई दोष तो उत्पन्न होता ही नहीं। स्थानेऽन्तरतम (१७) सूत्र द्वारा जिस झल् का जिस चर् के साथ स्थान साम्य होगा, वही उसी के स्थान पर आदेश होगा। तालिका यथा—

हल्-सन्धि-प्रकरणम् १२७ रूप में परिणत किया जायेगा । अर्थः---(डः) डकार से परे (वा) विकल्प कर के (सि-सः) सकार का अवयव (धुट्) धुट् हो जाता है । उदाहरण यथा— षड्+सन्तः (छः सज्जन) । यहां खरि च (८.४.५४) के असिद्ध होने से प्रथम इस सूत्र की प्रवृत्ति होती है । यहां डकार से परे 'सन्तः' पद का आदि सकार विद्यमान है, अतः उस सकार का अवयव 'धुट्' यह शब्द-समुदाय विकल्प से होगा । अब प्रश्न यह उत्पन्न होता है कि क्या 'धुट्' सकार का आद्यवयव हो या अन्तावयव? इस शङ्का की निवृत्ति के लिये अग्रिम परिभाषा-सूत्र लिखते हैं— [लघु०] परिभाषा-सूत्रम्—(८५) आद्यन्तौ टकितौ ।१।१।४५॥ टित्कितौ यस्योक्तौ तस्य क्रमादाद्यन्तावयवौ स्तः । षट्सन्तः, षट् सन्तः ॥ अर्थः--टित् और कित् जिस के अवयव कहे गये हों वे उस के क्रमशः आद्य- वयव तथा अन्तावयव होते हैं । व्याख्या—आद्यन्तौ ।१।२। टकितौ ।१।२। समासः—आदिश्च अन्तश्च= आद्यन्तौ । इतरेतरद्वन्द्वः । टश्च क् च =टकौ । टकारादकार उच्चारणार्थः । इतरेतर- द्वन्द्वः । टकौ इतौ ययोस्तौ टकितौ । बहुव्रीहिसमासः । अर्थः--(टकितौ) टकार इत् वाला तथा ककार इत् वाला क्रमशः (आद्यन्तौ) आद्यवयव तथा अन्तावयव होता है । किस का अवयव होता है ? ऐसी जिज्ञासा होने पर सुतरां यह आ जाता है कि जिस का अवयव विधान किया गया हो । 'क्रमशः' शब्द यथासङ्ख्यमनुदेशः समानाम् (२३) परिभाषा द्वारा प्राप्त होता है । 'षड्+सन्तः' यहां डः सि धुट् (८४) सूत्र से सकार का अवयव धुट् विधान किया गया है । धुट् के टकार की हलन्त्यम् (१) सूत्र से इत् सञ्ज्ञा होती है अतः धुट् टित् है । इस लिये यह सकार का आद्यवयव होगा । 'षड्+धुट् सन्तः' ऐसा हो कर हलन्त्यम् (१) द्वारा टकार तथा उपदेशेऽजनुनासिक इत् (२८) द्वारा उकार की इत्सञ्ज्ञा हो जाती है¹ पुनः इन इत्सञ्ज्ञकों का तस्य लोपः (३) से लोप करने पर— हो रहा है । इस शास्त्र में आगम प्रायः टित्, कित् या मित् होते हैं । धुट् आदि टित् हैं । कुँक्, टुंक् आदि कित् हैं । नुँम् आदि मित् आगम कहाते हैं । टित् का आगम जिसे कहा जाये उस के आदि में, कित् का आगम जिसे कहा जाये उस के अन्त में, तथा मित् का आगम जिसे कहा जाये उस के अन्त्य अच् से परे बैठता है । यह सब (८५, २४०) सूत्रों पर आगे स्पष्ट हो जायेगा । १. ध्यान रहे कि कुछ वैयाकरण यहां उकार आदि को उच्चारणार्थक मानते हुए प्रयोजनाभाव के कारण इन की इत्सञ्ज्ञा नहीं करते । परन्तु अन्य वैयाकरणों का कथन है कि उच्चारण भी तो एक प्रयोजन है अतः इन की इत्सञ्ज्ञा और लोप अवश्य करना चाहिये । इसी प्रकार आगे कुँक्-टुंक्-तुँक्-नुँम् अनँङ् आदियों में भी समझ लेना चाहिये ।

१२८ भैमीव्याख्योपेताया लघुसिद्धान्तकौमुद्यां 'षड् + ध् मन्तः' । अत्र खरि च (७४) सूत्र से सकार शर् के परे होने पर धकार को तकार पुन उस तकार को भी खर् मान डकार को भी टकार हो कर षट्त्सन्तःप्रयोग निष्पन्न हुआ । जिस पक्ष में 'धुट्' आगम न हुआ उस पक्ष में खरि च (७४) से डकार को टकार हो कर 'षट सन्तः' प्रयोग सिद्ध हुआ । इस प्रकार इस के दो रूप बन गये । इस के अन्य उदाहरण यथा-१ लिट्त्सु लिट्सु । २ षट्त्सुखानि, षट् सुखानि । ३ तुराषाट्त्सरति तुराषाट् सरति । ४ षट्त्सन्ततय, षट् सन्ततय । ५ षटत्समस्या, षट समस्या । ६ षटत्सन्निकर्षा, षट सन्निकर्षा । इत्यादि । [लघु०] विधि सूत्रम्-(८६) ङणोः कुक्टुक् शरि ।।८।३।२८।। वा म्त ॥ अर्थ-शर् परे होने पर ङकार णकार को क्रमश विकल्प करके कुँक् और टुँक् का आगम हो जाता है । व्याख्या-ङणो ।६।२। कुक्टुँक् ।१।१। शरि ।७।१। वा इत्यव्ययपदम् (हे मपरे वा स) । समास-ङ् च ण् च=ङणौ, तयो = ङणोः । इतरेतरद्वन्द्व । कुँङ् च टुँक् च= कुँक्टुँक्, समाहारद्वन्द्व । अर्थ - (शरि) शर् परे होने पर (ङणो ) ङकार और णकार के अवयव (कुक्टुँक्) कुँक् और टुँक् (वा) विकल्प करके होते हैं। कुंक् और टुँक् कित् हैं अत आद्यन्तौ टकितौ (८५) परिभाषा से ये ङकार और णकार के अन्तावयव होंगे। यथासङ्ख्यपरिभाषा (२३) से ङकार को कुँक् तथा णकार को टुँक् का आगम होगा। उदाहरण यथा- 'प्राङ्+षष्ठ, सुगण्+षष्ठ' यहा ङकार णकार से परे षकार शर् विद्यमान है अत ङकार को कुँक् तथा णकार को टुँक् का आगम हो कर उकार और क्कार अनुबन्धो का लोप हो गया तो- [ कुँक्टुँक्पक्षे ] प्राङ्क्+षष्ठ । सुगण्ट्+षष्ठ । [कुँक्टुँकोरभावे] प्राङ्+षष्ठ । सुगण्+षष्ठ । अब कुँक्-टुँक्-पक्ष में अग्रिम वार्त्तिक प्रवृत्त होता है- [लघु०] वा०-(१४) चयो द्वितीया शरि पौष्करसादेरिति वाच्यम् ॥ प्राङ्ख्षष्ठ, प्राङ्क्षष्ठ, प्राङ्षष्ठ । सुगण्ठ्षष्ठ, सुगण्ट्षष्ठ, सुगण् षष्ठ ॥ अर्थ-शर् परे होने पर चय् प्रत्याहार के स्थान पर वर्गों के द्वितीय वर्ण विकल्प कर के हो जाने हैं। व्याख्या-चय ।६।२। द्वितीया ।१।३। शरि ।७।१। पौष्करसादे ।६।१। इति इत्यव्ययपदम् । वाच्यम् ।१।१। अर्थ -(चय) चय् अर्थात् वर्गों के प्रथम वर्गों के १ यहा चत्वं असिद्ध है अत चयो द्वितीया शरि० (वा० १४) से तकार को थकार नही होना । इसी प्रकार 'षट्त्सन्त' मे भी समझ लेना चाहिये। यहा ष्टुत्व का भी न पदान्ताट् टोरनाम् (६५) सूत्र से निषेध हो जाना है।

ल्-सन्धि-प्रकरणम् ११५ | झल् | साम्य | चर् | | (वे वर्ण जिन के स्थान पर आदेश होते हैं।) | (स्थान) | (आदेश होने वाले वर्ण) | | घ् , ग् , ख् , क् | कण्ठ | क् | | झ् , ज् , छ् , च् | तालु | च् | | ढ् , ड् , ठ् , ट् | मूर्धा | ट् | | ध् , द् , थ् , त् | दन्त | त् | | भ् , ब् , फ् , प् | ओष्ठ | प् | श्, ष्, स् के स्थान पर पूर्णतया तुल्य क्रमशः श्, ष्, स् आदेश होते हैं। भावः—वर्गों के दूसरे, तीसरे तथा चौथे वर्णों को वर्गों के प्रथम वर्ण हो जाते , यदि उन से परे वर्गों के पहले, दूसरे तथा श्, ष्, स्, वर्ण हों तो। अब इस सूत्र से पूर्वोक्त चारों स्थानों में उद् के दकार को चर्=तकार हो र निम्नलिखित रूप सिद्ध होते हैं— (लोपपक्ष में)—उत्थानम्, उत्तम्भनम् । (लोपाभाव में)—उत्थ्यानम्, उत्थम्भनम् । इस प्रकार प्रत्येक के दो-दो रूप सिद्ध होते हैं। ध्यान रहे कि लोपाभाव वाले रूपों में उदः स्था० (८.४.६०) द्वारा किया या पूर्वसवर्ण=थकार खरि च (८.४.५४) की दृष्टि में असिद्ध है अतः उसे सकार ही दीखता है इसलिये उस थकार को तकार आदेश नहीं होता । इस विषय पर शोधपूर्ण विस्तृत विचार हमारे अभिनव प्रकाशित शोधग्रन्थ न्यास-पर्यालोचन के पृष्ठ २६३ से ३००) पर देखें। अभ्यास (१८) (१) सूत्र-समन्वय करते हुए सन्धि करें— १. भेद्+तुम्। २. शिण्ड्+ढि। ३. उद् + स्थापयति। ४. भगवान् +लङ्घते। ५. छेद्+तव्यम् । ६. रुन्ध्+धः। ७. प्रत्+तम्। ८. लिप्+सा। ९ उद्+स्तम्भते। १०. उद्+स्थितः। ११. बन्द्+धुम्। १२. उद्+स्तम्भितुम्। (२) सूत्रोपपत्तिपूर्वक सन्धिच्छेद करें— १. पिण्ढ। २. भिन्नः। ३. धुक्षु। ४. उत्थाय। ५. उत्तम्मिता।

११६ भैमीव्याख्योपेतायां लघुसिद्धान्तकौमुद्यां ६ युयुत्सव । ७ अग्निन्मत्सु । ८ अत्त । ९ रुन्ध । १० ऊर्गीयते¹ । ११ अवत्तम् । १२ उत्थातव्यम् । १३ आरिप्सते । १४ निबन्धा [तृच्] । १५ छिन्धि । १६ भिन्धि । (३) झरो झरि सवर्णे में 'सवर्णे' ग्रहण का प्रयोजन स्पष्ट करें । (४) तोर्लि सूत्र द्वारा नकार को अनुनासिक लकार ही क्यो होता है ? (५) खर् परे होने पर श्, ष्, स् के स्थान पर कौन से चर् होंगे ? (६) निमित्त, स्थानी और आदेश किसे कहते हैं ? सोदाहरण स्पष्ट करें । (७) आदे परस्य और तस्मादित्युत्तरस्य परिभाषाओ की व्याख्या करें । (८) निम्नलिखित प्रश्नो का उत्तर दें— (क) खर् परे होने पर हकार के स्थान पर क्या होगा ? (ख) 'उत्थानम्' यहा खरि च द्वारा थकार को तकार क्यो नही होता ? (ग) 'उद् + प्रस्थानम्' मे सन्धि करें । ० [लघु०] विधि-सूत्रम्—(७५) झयो होऽन्यतरस्याम् ।८।४।६२।। झयः परस्य हस्य वा पूर्वसवर्णः । नादस्य घोषस्य संवारस्य महाप्राणस्य हस्य तादृशो वर्गचतुर्थः । वाग्घरिः, वाग्हरिः ॥ अर्थ—झय् से परे हकार के स्थान पर विकल्प कर के पूर्व-सवर्ण हो । नादस्येति—नाद, घोष, संवार और महाप्राण यत्न वाले हकार के स्थान पर वैसा वर्गों का चतुर्थ होगा । व्याख्या—झयः ।५।१। हः ।६।१। अन्यतरस्याम् ।७।१। पूर्वस्य ।६।१। (उदः स्थास्तम्भोः पूर्वस्य से) । सवर्णः ।१।१। (अनुस्वारस्य ययि परसवर्णः से) । अर्थ— (झयः) झय् से अव्यवहित पर (हः) 'ह्' के स्थान पर (अन्यतरस्याम्) एक अवस्था मे (पूर्वस्य) पूर्व का (सवर्णः) सवर्ण आदेश होता है । भाव— झय् प्रत्याहार में पञ्चम वर्णों को छोड़ कर शेष सब वर्गस्य वर्ण आ जाते हैं । इन से परे हकार हो तो उस के स्थान पर पूर्व (झय्) का सवर्ण (चतुर्थ) विकल्प से आदेश हो जाता है । उदाहरण यथा— वाग्घरि (वाणी का शेर अर्थात् बोलने मे चतुर) । 'वाक् + हरि' यहा प्रथम झलां जशोऽन्ते (६७) से क्कार को गकार आदेश हो—वाग् + हरि । अब यहा झय् गकार है, इस मे परे हकार के स्थान पर पूर्व अर्थात् गकार का सवर्ण आदेश करना है । गकार के—क्, ख्, ग्, घ्, ङ् ये पञ्च सवर्ण हैं । इन मे से यहा कौन हो? ऐसी शङ्का उत्पन्न होने पर स्थानेऽन्तरतमः (१७) सूत्र उपस्थित हो कर कहता है कि जो हकार के साथ अत्यन्त सदृश हो वही हकार के स्थान पर आदेश किया जाये । अब यदि स्थानकृत आन्तर्य देखते हैं तो हकार के सब सदृश ठहरते हैं, क्योकि, अकुह- १ ऊर्क् + गीयते = ऊर्ग् + गीयते = ऊर्गीयते (बल की प्रशंसा होती है) ।

हल्-सन्धि-प्रकरणम् ११७ विसर्जनीयानां कण्ठः के अनुसार हकार और कवर्ग दोनों का कण्ठ स्थान है । अर्थकृत तथा प्रमाणकृत आन्तर्य तो यहां हो ही नहीं सकते । अतः अब शेष बचे गुणकृत आन्तर्य (अर्थात् यत्नों द्वारा सादृश्य) से ही सदृशता जांचेंगे । आभ्यन्तर यत्न तो इन का हकार के साथ तुल्य हो नहीं सकता । ईषद्विवृतमूष्मणाम् के अनुसार हकार ईषद्विवृत तथा तत्र स्पृष्टं प्रयत्नं स्पर्शानाम् के अनुसार कवर्ग स्पृष्ट है । अतः अब बाह्य यत्न देखेंगे । हकार का बाह्ययत्न—संवार, नाद, घोष और महाप्राण है । कवर्ग में इस प्रकार के बाह्ययत्न वाला केवल घकार ही है, इस से हकार के स्थान पर विकल्प कर के घकार हो विभक्ति लाने से पूर्वसवर्णपक्ष में 'वाग्घरिः' और तदभावपक्ष में 'वाग्हरिः' इस प्रकार दो रूप बन जाते हैं । वाचि वाचो वा हरिः (सिंहः) = वाग्घरिः । इस सूत्र के कुछ अन्य उदाहरण यथा - १. तद् + हानि = तद्धानिः । २. अच् + हीन - अज् + हीन = अज्झीनम् । ३. मधुलिङ् + हसति = मधुलिङ्ढसति । ४. अप् + हस्ती = अभ्भस्ती । ५. अज् + ह्रस्व- दीर्घप्लुतः = अज्झ्रस्वदीर्घप्लुतः । ६. स्याद् + ह्रस्वश्च = स्याद्ध्रस्वश्च । ७. दिग् + हस्ती = दिग्घस्ती । ८. सम्पद् + हर्ष = सम्पद्धर्षः । ९. रत्नमुड् + हरति = रत्नमुड्- ढरति । १०. वणिग् + हस्ती = वणिग्घस्ती । ११. दूराद् + हूते = दूराद्धूते । १२. मित्त्वाद्

  • ह्रस्वः = मित्त्वाद्-ध्रस्वः । १३. समुद् + हर्ता = समुद्धर्ता । इन सब स्थानों पर पूर्वसवर्णाभाव-पक्ष में भी प्रयोग जान लेना चाहिये । यहां सर्वत्र हकार के स्थान पर पूर्व अक्षर के वर्ग का चतुर्थ वर्ण ही होता है; क्योंकि आन्तर्यपरीक्षा में वह ही हकार के अत्यन्त सदृश हो सकता है । सार यह है कि झय्- प्रत्याहारान्तर्गत कवर्ग से परे हकार को घकार, चवर्ग से परे हकार को झकार, टवर्ग से परे हकार को ढकार, तवर्ग से परे हकार को धकार तथा पवर्ग से परे हकार को भकार विकल्प से होता है । पक्ष में हकार भी रहता है । [लघु०] विधि-सूत्रम्—(७६) शश्छोऽटि ।८।४।६२॥ झयः परस्य शस्य छो वाऽटि । 'तद् + शिव' इत्यत्र दस्य श्चुत्वेन जकारे कृते 'खरि च' (७४) इति जकारस्य चकारः । तच्छिवः, तच्छिवः ॥ अर्थः—झय् से परे शकार को विकल्प से छकार हो जाता है, अट् परे हो तो । व्याख्या-झयः ।५।१। (झयो होऽन्यतरस्याम् से) । शः ।६।१। छः ।१।१। छकारादकार उच्चारणार्थः । अन्यतरस्याम् ।७।१। (झयो होऽन्यतरस्याम् से) । अटि ।७।१। अर्थः- (झयः) झय् से परे (शः) 'श्' के स्थान पर (छः) छ् हो जाता है (अटि) अट् परे होने पर (अन्यतरस्याम्) एक अवस्था में अर्थात् विकल्प से । यह सूत्र स्तोः श्चुना श्चुः (८.४.३६) और खरि च (८.४.५४) दोनों की दृष्टि में असिद्ध है । इन दोनों में भी स्तोः श्चुना श्चुः (८.४.३६) की दृष्टि में खरि च (८.४.५४) असिद्ध है; अतः सब से प्रथम स्तोः श्चुना श्चुः (६२) फिर खरि च (७४) और तदनन्तर शश्छोऽटि (७६) सूत्र प्रवृत्त होगा । उदाहरण यथा-

११८ भैमीव्याख्योपेतायां लघुसिद्धान्तकौमुद्यां तद् + शिव = तज् + शिव (स्तो श्चुना श्चुः) = तच् शिव (खरि च)। अब यहां झय् चकार है इस से परे शकार वर्तमान है और उस शकार से भी इकार = अट् परे है, अतः प्रकृत सूत्र से शकार को वैकल्पिक छत्व हो कर विभक्ति लाने से छत्व- पक्ष में 'तच्छिव' और छत्वाभाव-पक्ष में 'तच्शिव' ये दो रूप सिद्ध होते हैं। तस्य शिव इति, स चासौ शिव इति वा विग्रह । इस सूत्र के कुछ अन्य उदाहरण यथा -- १ मधुलिट् + शेते = मधुलिट् छेते। २ वाक् + शेते = वाक् छेते। ३ मत् + श्वशुर = मच् + श्वशुर = मच्छ्वशुर । ४ यावत् + शक्यम् = यावच् + शक्यम् = यावच्छक्यम् । ५ जगत् + शान्ति = जगच् + शान्ति = जगच्छान्ति । ६ तद् + श्रुत्वा = तज् + श्रुत्वा = तच् + श्रुत्वा = तच्छ्रुत्वा । ७ कश्चित् + शेते = कश्चिच् + शेते = कश्चिच्छेते । ८ प्राक् + शेते = प्राक्छेते । नोट—यहां पर पदान्तस्य (८।४।५८) सूत्र से 'पदान्तस्य' पद का भी अनु- वर्त्तन होता है । विभक्तिविपरिणाम से वह पञ्चम्यन्त हो कर 'झय् ' का विशेषण बन जाता है । इस से यह अर्थ हो जाता है—पदान्त झय् से परे शकार को छकार हो विकल्प कर के अट् परे हो तो । 'पदान्त' पद लाने का यह प्रयोजन है कि—'विप्शम्, चक्षौ' आदियों में अपदान्त पकार-क्कारादियो से परे शकार को छकार न हो जाये । [लघु०] वा०—(१२) छत्वममीति वाच्यम् ॥ तच्छ्लोकेन ॥ अर्थः—पदान्त झय् से परे शकार को वैकल्पिक छकारादेश—अट् परे की बजाय अम् परे होने पर कहना चाहिये । व्याख्या—पूर्वोक्त शश्छोऽटि (७६) सूत्र से 'तच्छ्लोकेन, तच्छ्मश्रुणा' आदि प्रयोग सिद्ध नहीं हो सकते क्योंकि इन में शकार से परे लकार है, जो अट् प्रत्याहार में नहीं आता । अतः इन की सिद्धि के लिये कात्यायन ने यह वार्त्तिक रचा है (छत्वम् ।१।१।) छत्व (अमि ।७।१।) अम् प्रत्याहार परे होने पर हो (इति) ऐसा (वाच्यम्) कहना चाहिये । कात्यायन का पाणिनि के शश्छोऽटि (७६) सूत्र के अन्य किसी अंश से मतभेद नहीं, केवल 'अटि' अंश में ही मतभेद है । वे चाहते हैं कि 'अटि' को हटा कर इस के स्थान पर 'अमि' कर देना चाहिये । ऐसा करने से 'तच्छ्लोकेन' आदि रूप सिद्ध हो जाते हैं। तथाहि— तद् + श्लोक = तज् + श्लोक (स्तो श्चुना श्चुः) = तच् + श्लोक (खरि च)। अब यहां झय् = चकार से शकार परे विद्यमान है । इस में 'ल्' यह अम् परे है । अतः विकल्प कर के शकार को छकार हो कर विभक्ति लाने से छत्वपक्ष में 'तच्छ्लोकेन' और छत्वाभाव में 'तच्श्लोकेन' ये दो रूप सिद्ध होते हैं। [ स चासौ श्लोक तच्छ्लोक , यद्वा तस्य श्लोक — तच्छ्लोक , तेन = तच्छ्लोकेन । कर्मधारय षष्ठीतत्पुरुषो वा । उस श्लोक से या उस के श्लोक में ] । इस वार्त्तिक के कुछ अन्य उदाहरण यथा — (१) एतद् + श्मश्रु = एतच्छ्मश्रु, एतच्श्मश्रु । (२) तद् + श्लक्ष्ण = तच्छ्लक्ष्ण , तच्श्लक्ष्ण । (३) तद् + श्मशानम् =

हल्-सन्धि-प्रकरणम् ११६ तच्छ्मशानम्, तच्श्मशानम्। (४) तद् + श्लिष्ट = तच्छ्लिष्टः, तच्श्लिष्टः। (५) भूभृत् + श्लाघा = भूभृच्छ्लाघा, भूभृच्श्लाघा। (६) सकृत् + श्लेष्मा = सकृच्छ्लेष्मा, सकृच्श्लेष्मा। नोट—कात्यायनद्वारा शश्छोऽटि सूत्र में 'अटि' की जगह 'अमि' रखने का सुझाव कोई अपूर्वकथन नहीं है। आचार्यवर पाणिनि ने गोत्रचरणाच्छ्लाघात्याकार- तद्वेतेषु (५.१.१३३) सूत्र में 'चरणात् + श्लाघा = चरणाच्छ्लाघा' लिखकर स्वयं अम्पर्क शकार को छत्व किया है। ध्यान रहे कि आचार्यचरण सब बातें मुख द्वारा प्रतिपादन नहीं किया करते। उन की कई बातें इङ्गित आदि के द्वारा भी प्रकट होती हैं। अतएव भाष्यकार पतञ्जलि कहते हैं—इह इङ्गितेन चेष्टितेन निमिषितेन महता वा सूत्रप्रबन्धेनाचार्याणाम् अभिप्रायो गम्यते (महाभाष्य ६.३.३७)। अभ्यास (१६) (१) हकार को पूर्वसवर्ण वर्गचतुर्थ ही क्यों होता है, अन्य क्यों नहीं ? (२) कात्यायन शश्छोऽटि सूत्र को शश्छोऽमि क्यों बनाना चाहते हैं ? (३) विरप्शम्, चक्शीं, तच्च्युतवम्-में छत्व क्यों नहीं होता ? (४) भवान् हसति, प्राङ् हसति—में हकार को पूर्वसवर्ण क्यों नहीं होता ? (५) श्चुत्व, चर्व्व और छत्व में कौन प्रथम और कौन पश्चात् होगा ? --::o::-- [लघु०] विधि-सूत्रम्-(७७) मोऽनुस्वारः ।८।३।२३॥ मान्तस्य पदस्यानुस्वारो हलि। हरिं वन्दे॥ अर्थः—हल् परे हो तो मकारान्त पद के स्थान पर अनुस्वार हो। व्याख्या—मः ।६।१। पदस्य ।६।१। (यह अधिकार पीछे से आ रहा है)। अनुस्वारः ।१।१। हलि ।७।१। (हलि सर्वेषाम् से)। 'मः' यह 'पदस्य' का विशेषण है अतः इस से येन विधिस्तदन्तस्य (१.१.७१) द्वारा तदन्तविधि हो कर 'मान्तस्य पदस्य' ऐसा बन जाता है। अर्थः—(हलि) हल् परे होने पर (मः=मान्तस्य) मका- रान्त (पदस्य) पद के स्थान पर (अनुस्वारः) अनुस्वार होता है। अलोऽन्त्यस्य (२१) द्वारा मकारान्त पद के अन्त्य अल् = मकार को ही अनुस्वार होगा। उदाहरण यथा— हरिं वन्दे (मैं हरि को नमस्कार करता हूं)। 'हरिम् + वन्दे' यहां मकारान्त पद 'हरिम्' है; सुबन्त होने से सुप्तिङन्तं पदम् (१४) द्वारा इस की पद सञ्ज्ञा है। इस से परे 'व्' यह हल् विद्यमान है अतः मकारान्त पद के अन्त्य अल् = मकार को अनुस्वार आदेश हो कर 'हरिं वन्दे' प्रयोग सिद्ध होता है।¹ इसके अन्य उदाहरण यथा—मातरम् + वन्दे = मातरं वन्दे, पुस्तकम् + पठति = पुस्तकं पठति, गुरुम् + नमति = गुरुं नमति, शत्रुम् + जयति = शत्रुं जयति। इत्यादि। १. कई लोग 'हरिम्बन्दे, सम्प्रवृत्तः' इत्यादि लिखते हैं, सो ठीक नहीं; अनुस्वार आवश्यक है। हां परसवर्ण वैकल्पिक है—हरिवँ वन्दे, हरिं वन्दे।