लघुसिद्धान्तकौमुदी (वरदराजाचार्य - भैमी एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)
Laghu Siddhanta Kaumudi of Varadaraja with Hindi Commentary
आचार्य वरदराज द्वारा
पृष्ठ 406, कुल 633 में से
संदर्भ में पढ़ेंहलन्त-पुल्लिङ्ग-प्रकरणम् ३६१ अनर्थक 'इन्' होने पर भी इन्हुन्० आदि सूत्रों की प्रवृत्ति हो जाती है। इस बात को जनाने के लिये ही ग्रन्थकार ने यहां 'यशस्विन्' यह इन् का दूसरा उदाहरण दिया है, अन्यथा 'शार्ङ्गिन्' यह उदाहरण तो वे दे ही चुके थे। मघवन् (इन्द्र)। श्वन्नुक्षन्० (उणा० १५७) इति सूत्रेण मह पूजायाम् (भ्वा० प०) इति धातोः कनिन्प्रत्ययो हस्य घो वुंगागमश्च निपात्यते । [लघु०] विधि-सूत्रम्— (२८८) मघवा बहुलम् ।६।४।१२८॥ 'मघवन्' शब्दस्य वा तृँ इत्यन्तादेशः स्यात् । ऋ इत्¹॥ अर्थः— मघवन् शब्द को विकल्प कर के 'तृँ' अन्तादेश हो। ऋ इत्—ऋकार की इत्सञ्ज्ञा हो जाती है। व्याख्या—मघवा ।१।१। (छन्दोवत्सूत्राणि भवन्ति—के अनुसार यहां षष्ठी विभक्ति के अर्थ में प्रथमा विभक्ति जाननी चाहिये)। बहुलम् ।१।१। तृँ ।१।१। (अर्वणस्त्रसावनञः से। यहां प्रथमा विभक्ति का लुक् जानना चाहिये)। अर्थः— (मघवा) मघवन् शब्द के स्थान पर (बहुलम्) विकल्प कर के² (तृँ) 'तृँ' यह आदेश हो। यद्यपि यह तृँ आदेश अनेकाल् होने से अनेकालशित्सर्वस्य (४५) सूत्र द्वारा सम्पूर्ण 'मघवन्' शब्द के स्थान पर होना चाहिये; तथापि नानुबन्धकृतमनेकाल्त्वम् (अनुबन्धों के कारण अनेकाल्ता नहीं माननी चाहिये) इस परिभाषा से इस के अने- काल् न होने से सर्वादेश नहीं होता किन्तु अलोऽन्त्यपरिभाषा से अन्तादेश हो जाता है। 'मघवत्' यहां ऋकार की उपदेशेऽजनुनासिक इत् (२८) सूत्र से इत्सञ्ज्ञा और तस्य लोपः (३) से लोप हो कर 'मघवत्' शब्द बन जाता है। जिस पक्ष में तृँ आदेश नहीं होता उस पक्ष में मघवन् ही रहता है उस का विवेचन आगे करेंगे। 'मघवत् + सु' (सुं) इस अवस्था में अग्रिमसूत्र प्रवृत्त होता है— [लघु०] विधि-सूत्रम्— (२८६) उगिदचां सर्वनामस्थानेऽधातोः ।७।१।७०॥ अधातोरुगितो नलोपिनोऽञ्चतेश्च नुमागमः स्यात् सर्वनामस्थाने परे। मघवान् । मघवन्तौ । मघवन्तः । हे मघवन् ! मघवद्भ्याम् । तृँत्वा- ऽभावे—मघवा । सुंटि राजवत् ॥ अर्थः—सर्वनामस्थान परे होने पर धातुभिन्न उगित् को तथा जिस के नकार का लोप हो चुका हो ऐसी 'अञ्चु' धातु को नुँम् का आगम हो जाता है। व्याख्या—उगिदचाम् ।६।३। सर्वनामस्थाने ।७।१। अधातोः।६।१। नुँम् ।१।१। १. यहां 'ऋ' यह विभक्तिरहित निर्दिष्ट किया गया है। प्रक्रियादशा में अविभक्तिक निर्देश करने में भी कोई दोष नहीं होता। २. 'बहुलम्' पद केवल विकल्प के लिये ही नहीं है अपितु—'मघवान्' रूप में उपधा- दीर्घ करने पर संयोगान्तलोप असिद्ध न हो—इस के लिये भी समझना चाहिये।