लघुसिद्धान्तकौमुदी (वरदराजाचार्य - भैमी एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)
Laghu Siddhanta Kaumudi of Varadaraja with Hindi Commentary
आचार्य वरदराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें३६२ भैमीव्याख्योपेतायां लघुसिद्धान्तकौमुद्यां (इदितो नुम् धातोः) । समास - उक् इत् येषां त=उगित्, बहुव्रीहिसमासः । उगितश्च अञ्च् च=उगिदञ्च्, तेषाम्=उगिदञ्चाम्, इतरेतरद्वन्द्वः । 'अञ्च्'शब्देनह लुप्तनकारस्य अञ्चुँ गतिपूजनयोः (भ्वा० प०) इति धातोर्ग्रहणं भवति । न धातुः = अधातुस्तस्य-अधातोः, नञ्समासः । अधातोरिति उगित्तावशेषणं सम्भवति न तु अञ्चतेरिति वाच्यम् । अर्थ -(सर्वनामस्थाने) सर्वनामस्थान परे होने पर (अधातोः) धातु से भिन्न (उगिदञ्चाम्) उक्-प्रत्याहार इत् वाले शब्दों का तथा नकार लुप्त हुई अञ्चुँ धातु का अवयव (नुँम्) नुँम् हो जाता है। भाव - जिन शब्दों में उकार, ऋकार, ऌकार वर्णों की इत्सञ्ज्ञा होती है और यदि वे धातु नहीं तो सर्वनामस्थान परे होने पर उन को नुँम् का आगम हो जाता है। 'मघवत् + सुँ' यहां 'तु' के ऋकार की इत्सञ्ज्ञा हुई है अतः यह उगित् है, इस से पर 'सुँ' यह सर्वनामस्थान भी विद्यमान है। इसलिये मिदचोऽन्त्यात्परः (२६०) परिभाषा की सहायता से प्रकृतसूत्र से अन्त्य अच् से परे नुँम् का आगम हो कर- मघवन्ुँम् त् + सुँ = 'मघवन् त् + सुँ' हुआ। अब हल्ङ्याब्भ्यो० (१७६) से सकार तथा संयोगान्तस्य लोपः (२०) से तकार का लोप हो कर- 'मघवन्' । पुनः प्रत्यय- लक्षण द्वारा सुँ को मान कर सर्वनामस्थाने चाऽसम्बुद्धौ (१७७) से उपधादीर्घ करने से 'मघवान्' रूप निष्पन्न होता है। नोट-यहां संयोगान्तस्य लोपः (८.२.२३) द्वारा किया लोप उपधा को दीर्घ करने में असिद्ध नहीं होता। इस का कारण मघवा बहुलम् (२८६) सूत्र में 'बहुल' का ग्रहण है। 'बहुल' ग्रहण का तात्पर्य यह होता है कि लोकप्रसिद्ध इष्टरूप में जितनी बाधाएं उपस्थित होती हैं न हों। 'मघवान्' रूप लोक में प्रसिद्ध है यथा- हविर्भक्षिति विशङ्को मखेषु मघवानसौ (भट्टि०)। अतः इस की सिद्धि के अनुरूप उपधादीर्घ करने में संयोगान्तलोप असिद्ध नहीं होता। नकार का लोप भी इसी कारण नहीं होता। 'बहुल' शब्द पर विशेष विचार कृदन्तो में कृत्यल्युटो बहुलम् (७७२) सूत्र पर किया जायेगा। तुँत्वपक्ष में 'मघवन्'शब्द की रूपमाला यथा- प्र० मघवान् मघवन्तौ* मघवन्तः | प० मघवतः मघवद्भ्याम् मघवद्भ्यः द्वि० मघवन्तम् मघवन्तौ मघवतः | ष० मघवतः मघवतोः मघवताम् तृ० मघवता मघवद्भ्याम् मघवद्भिः | स० मघवति मघवतोः मघवत्सु च० मघवते मघवद्भ्याम् मघवद्भ्यः | सं० हे मघवन् ! हे मघवन्तौ ! हे मघवन्तः ! *यहाँ इतना विशेष है कि नुँम् का आगम होकर नश्चाऽपदान्तस्य झलि (७८) १ लुप्तनकार अञ्चुँ धातु को नुँम् के उदाहरण-'प्राङ्, प्राञ्चौ, प्राञ्चः' आदि आगे इसी प्रकरण में (३३४) सूत्र पर देखें।