लघुसिद्धान्तकौमुदी (वरदराजाचार्य - भैमी एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)
Laghu Siddhanta Kaumudi of Varadaraja with Hindi Commentary
आचार्य वरदराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंहलन्त-पुलूँल्लिङ्ग-प्रकरणम् ३६३ सूत्र से अनुस्वार और अनुस्वारस्य ययि परसवर्णः (७६) से परसवर्ण—णकार हो जाता है। इसी प्रकार जस्, अम् और औट् में भी प्रक्रिया होती है। ‡इत्यादियों में झलां जशोऽन्ते (६७) से जश्त्व-दकार हो जाता है। †यहां नुम् का आगम हो कर हल्ङ्यादिलोप तथा संयोगान्तलोप हो जाता है। सम्बुद्धि परे होने से सर्वनामस्थाने चासम्बुद्धौ (१७७) द्वारा उपधादीर्घ नहीं होता। नकारलोप का निषेध पूर्ववत् न ङिसम्बुद्ध्योः (२८१) द्वारा हो जाता है। तृँत्व के अभाव में— जहां तृँ आदेश नहीं होता वहां सुट् अर्थात् सर्वनामस्थान तक तो मघवन् शब्द के 'राजन्' शब्दवत् रूप बनते हैं। मघवा, मघवानौ, मघवानः, मघवानम्, मघवानौ। 'मघवन् + अस्' (शस्) यहां अग्रिमसूत्र प्रवृत्त होता है— [लघु०] विधि-सूत्रम्—(२६०) श्वयुवमघोनामतद्धिते¹ ।६।४।१३३॥ अनन्तानां भसञ्ज्ञकानाम् एषाम् अतद्धिते परे सम्प्रसारणं स्यात्। मघोनः। मघवभ्याम्। एवं श्वन्, युवन्॥ अर्थः—'अन्' शब्द जिन के अन्त में है ऐसे भसञ्ज्ञक श्वन्, युवन्, मघवन् शब्दों को तद्धितभिन्न प्रत्यय परे होने पर सम्प्रसारण हो जाता है। व्याख्या—अनाम् ।६।३। (अल्लोपोऽनः सूत्र से वचनविपरिणाम करके)। भानाम् ।६।३। (भस्य इस अधिकार का वचनविपरिणाम हो जाता है)। श्वयुवमघो- नाम् ।६।३। सम्प्रसारणम् ।१।१। (वसोः सम्प्रसारणम् से)। अतद्धिते ।७।१। समासः— श्वा च युवा च मघवा च=श्वयुवमघवानः, तेषाम् = श्वयुवमघोनाम्, इतरेतरद्वन्द्वः। न तद्धितः = अतद्धितस्तस्मिन् =अतद्धिते, नञ्समासः। यहां पर्युदास प्रतिषेध होने से तद्धित से भिन्न तत्सदृश अर्थात् प्रत्यय का ग्रहण होता है। 'अनाम्' से तदन्तविधि १. इस सूत्र पर एक सुभाषित अत्यन्त प्रसिद्ध है— प्रश्नः— काचं मणिं काञ्चनमेकसूत्रे ग्रथ्नासि बाले! किमिदं विचित्रम्? उपजातिवृत्तम् उत्तरम्ः— विचारवान् पाणिनिरेकसूत्रे श्वानं युवानं मघवानमाह ॥ माला गूंथती हुई किसी बाला से प्रश्न किया गया कि तुम कांच, मणि और सोने को एक—ही सूत्र (तागे) में क्यों गूंथ रही हो? वह उत्तर देती है—विचार- वान् पाणिनिमुनि ने भी तो एक सूत्र में कुत्ते, युवा और इन्द्र को घसीट मारा है। अत्यन्त समुचित उत्तर है। जब पाणिनि जैसे बुद्धिमान् लोग भी असमान वस्तुओं को एक स्थान में बिठाते हैं तो भला मैं बाला (मूर्खा) ऐसा करूं तो इसमें आश्चर्य की क्या बात है? वस्तुतः यह कोई काव्य नहीं कि 'सहचरभिन्नता' दोष हो। शब्दशास्त्र में ऐसी बात नहीं देखी जानी चाहिये। इस पद्य को कवि का विनोद समझना चाहिये।