भारतकोश
लघुसिद्धान्तकौमुदी (वरदराजाचार्य - भैमी एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)

लघुसिद्धान्तकौमुदी (वरदराजाचार्य - भैमी एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)

Laghu Siddhanta Kaumudi of Varadaraja with Hindi Commentary

आचार्य वरदराज द्वारा

DevanagariHindipublished633 पृष्ठ

पृष्ठ 409, कुल 633 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 409

३६४ भौमीव्याख्योपेतायां लघुसिद्धान्तकौमुद्यां होती है। अर्थ — (अनाम्) अन्नन्त (भानाम्) भसञ्ज्ञक (श्वयुवमघोनाम्) श्वन्, युवन् तथा मघवन् शब्दों को (अतद्धिते) तद्धितभिन्न प्रत्यय परे होने पर (सम्प्रसार- णम्) सम्प्रसारण हो जाता है। 'मघवन् + अस्' यहाँ मघवन् शब्द अन्नन्त भी है, भसञ्ज्ञक भी है और इस पर तद्धितभिन्न 'शस्' प्रत्यय भी विद्यमान है अतः इग्यण सम्प्रसारणम् (२५६) के अनुसार प्रकृतसूत्र से वकार को उकार सम्प्रसारण हो कर—'मघ् उ अन् + अस्' । सम्प्रसारणाच्च (२५८) से उकार और अकार के स्थान पर पूर्वरूप उकार हो— 'मघ् उ न् + अस्' । अब आद् गुणः (२७) सूत्र से गुण एकादेश करने पर—मघोन्

  • अस् = मघोनस् = 'मघोनः' रूप सिद्ध होता है। इसी प्रकार अन्य भसञ्ज्ञकों में भी जानना चाहिये। भ्याम् आदियों में राजन्शब्दवत् नकार का लोप (१८०) हो जाता है—मघवभ्याम्, मघवद्भिः, मघवभ्यः। इस तृत्वाभावपक्ष में मघवन् शब्द की रूप- माला यथा— प्र० मघवा मघवानौ मघवानः | पं० मघोनः मघवभ्याम् मघवभ्यः द्वि० मघवानम् ,, मघोनः | ष० ,, मघोनोः मघोनाम् तृ० मघोना मघवभ्याम् मघवद्भिः | स० मघोनि ,, मघवसु च० मघोने ,, मघवभ्यः | सं० हे मघवन् ! मघवानौ ! मघवानः ! यद्यपि श्वन्, युवन् तथा मघवन् शब्द स्वयम् अन्नन्त ('अन्' अन्त वाले) हैं, इन के लिये 'अनाम्' पद का अनुवर्त्तन करना कुछ उचित प्रतीत नहीं होता, तथापि यदि यहाँ 'अनाम्' पद का अनुवर्त्तन न करते तो तृँ आदेश के पक्ष में 'मघवत, मघ- वन्तौ' आदि रूपों में एकदेशविकृतमनन्यवत् के न्यायानुसार 'मघवन्' शब्द समझ लिये जाने से सम्प्रसारण हो जाता जो अनिष्ट था। परन्तु अब 'अन्नन्त मघवन्' इस प्रकार के कथन से कुछ भी दोष नहीं होता, क्योंकि तृत्त्वपक्ष में अन्नन्त मघवन् नहीं किन्तु तान्त मघवत् है। यदि यहाँ कोई यह शङ्का करे कि एकदेशविकृतन्याय से इसे अन्नन्त भी मान लेंगे अतः आप का 'अनाम्' यह वचन दोषनिवृत्ति के लिये नहीं बन सकता तो उस का उत्तर यह है कि एकदेशविकृतन्याय लोकमूलक है। जैसे लोक में पुच्छकटे कुत्ते में कुत्ते का तो व्यवहार होता है परन्तु पूंछ के विषय में पूंछ का व्यवहार नहीं होता, इसी प्रकार यहाँ 'मघवत्' शब्द में 'मघवन्' शब्द का तो व्यवहार होता है परन्तु अन्नन्तत्व का व्यवहार नहीं होता अतः 'अनाम्' का अनुवर्त्तन करने से दोष निवृत्त हो जाता है। 'तद्धितभिन्न' कथन का यह अभिप्राय है कि माघवनम् [मघवा देवता अस्य हविष तत् = माघवनम्। साऽस्य देवता (१०३८) इति मघवञ्छब्दादरण तद्धितेऽव्- त्वाभावे (६३८) इत्यादिवृद्धौ विभक्त्युत्पत्तौ—'माघवनम्' इति सिध्यति] यहाँ 'अण्' तद्धित के परे होने पर सम्प्रसारण आदेश न हो। श्वन् (कुत्ता)। यह शब्द व्युत्पत्तिपक्ष में श्वन्नुक्षन्० (उणा० १५३) सूत्र