भारतकोश
लघुसिद्धान्तकौमुदी (वरदराजाचार्य - भैमी एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)

लघुसिद्धान्तकौमुदी (वरदराजाचार्य - भैमी एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)

Laghu Siddhanta Kaumudi of Varadaraja with Hindi Commentary

आचार्य वरदराज द्वारा

DevanagariHindipublished633 पृष्ठ

पृष्ठ 410, कुल 633 में से

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पृष्ठ 410

हलन्त-पुंल्लिङ्ग-प्रकरणम् ३६५ द्वारा टुओँश्वि गतिवृद्ध्योः (भ्वा० प०) धातु से कनिँन् प्रत्यय तथा इकारलोप करने पर निपातित हुआ है। इस की रूपमाला यथा— प्र० श्वा श्वानौ श्वानः प० शुनः श्वभ्याम् श्वभ्यः द्वि० श्वानम् ,, शुनः† प० ,, शुनोः शुनाम् तृ० शुना श्वभ्याम् श्वभिः स० शुनि ,, श्वसु च० शुने ,, श्वभ्यः सं० हे श्वन्! हे श्वानौ! हे श्वानः! † 'श्वन्+शस्' (शस्) यहां श्वयुवमघोनामतद्धिते (२६०) सूत्र से सम्प्रसारण हो—शु अन्+अस् । सम्प्रसारणाच्च (२५८) से पूर्वरूप हो—शुन्+अस् = 'शुनः' । इसी प्रकार आगे भी भसञ्ज्ञकों में समझ लेना चाहिये । युवन् (जवान, श्रेष्ठ) । [व्युत्पत्तिपक्षे यु मिश्रणामिश्रणयोः (अदा० प०) इति धातोः कनिँन् यु-वृषि-तक्षि-राजि-धन्वि-द्यु-प्रतिदिवः (उणा० १५४) इति सूत्रेण कनिँन्प्रत्यये युवन्शब्दः सिध्यति] । सर्वनामस्थानों में इस की प्रक्रिया राजन्शब्दवत् होती है । युवा, युवानौ, युवानः, युवानम्, युवानौ । 'युवन्+अस्' (शस्) यहां श्वयुवमघोनामतद्धिते (२६०) सूत्र से वकार को सम्प्रसारण-उकार हो जाता है—यु उ अन्+अस् । अब सम्प्रसारणाच्च (२५८) से पूर्वरूप तथा अकः सवर्णे दीर्घः (४२) से सवर्णदीर्घ करने पर—'यून्+अस्' बन जाता है । अब इस स्थिति में श्वयुवमघोनामतद्धिते (२६०) सूत्र से यकार को भी इकार सम्प्रसारण प्राप्त होता है। इस पर अग्रिमसूत्र निषेध करता है— [लघु०] निषेध-सूत्रम्—(२६१) न सम्प्रसारणे सम्प्रसारणम् ।६।१।३६॥ सम्प्रसारणे परतः पूर्वस्य यणः सम्प्रसारणं न स्यात् । इति यकारस्य नेत्वम् । अत एव ज्ञापकादन्त्यस्य यणः पूर्वं सम्प्रसारणम् । यूनः । यूना । युवभ्याम् इत्यादि ॥ अर्थः—सम्प्रसारण परे होने पर पूर्व यण् को सम्प्रसारण नहीं होता । इति यस्येति—इस सूत्र के कारण यकार को इकार नहीं होता । अत एवेत्यादि—इस ज्ञापक से यह भी सिद्ध हो जाता है कि प्रथम अन्त्य यण् को सम्प्रसारण करना चाहिये । व्याख्या—सम्प्रसारणे ।७।१। सम्प्रसारणम् ।१।१। न इत्यव्ययपदम् । अर्थः— (सम्प्रसारणे) सम्प्रसारण परे होने पर (सम्प्रसारणम्) सम्प्रसारण (न) नहीं होता । 'यून्+अस्' यहां सम्प्रसारण परे है अतः पूर्व यकार को सम्प्रसारण नहीं होता— यूनस् = 'यूनः' । अब यहां एक शङ्का उत्पन्न होती है कि यदि पूर्व यकार को पहले सम्प्रसारण कर लिया जाये और वकार को बाद में सम्प्रसारण करें तो न सम्प्रसारणे सम्प्रसारणम् (२६१) सूत्र निषेध न कर सकेगा, अतः यहां ऐसा क्यों न किया जाये ? इस के समाधान में कहा है—अत एव ज्ञापकादित्यादि । अर्थात् यदि ऐसा किया जाये तो न सम्प्रसारणे सम्प्रसारणम् (२६१) सूत्र व्यर्थ हो जायेगा, क्योंकि तब इसे कोई

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