लघुसिद्धान्तकौमुदी (वरदराजाचार्य - भैमी एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)
Laghu Siddhanta Kaumudi of Varadaraja with Hindi Commentary
आचार्य वरदराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें३६६ भैमीव्याख्योपेतायां लघुसिद्धान्तकौमुद्यां भी स्थान प्रवृत्ति के लिये न मिल सकेगा। जब सम्प्रसारण परे होने पर कहीं पर भी सम्प्रसारण न मिलेगा तब निषेध कैसा ? अतः इस निषेधकरणसामर्थ्य से यह सूचित होता है कि जहां दो यण् हों वहां यदि सम्प्रसारण करना हो तो पहले अन्तिम यण् को सम्प्रसारण करना चाहिये। इस नियमानुसार अन्तिम यण् को सम्प्रसारण हो चुकने पर जब प्रथम यण् को सम्प्रसारण प्राप्त होता है तब इस सूत्र से निषेध हो जाता है। 'युवन्' शब्द की रूपमाला यथा— प्र० युवा युवानौ युवान प० यून युवभ्याम् युवभ्य द्वि० युवानम् ” यून ष० ” यूनोः यूनाम् तृ० यूना युवभ्याम् युवभि स० यूनि ” युवसु च० यूने ” युवभ्य स० हे युवन्! हे युवानौ! हे युवान! [लघु०] अर्वा। हे अर्वन् !॥ व्याख्या—ऋ गतौ(भ्वा० प०) इत्यस्माद्धातोर् अन्येभ्योऽपि दृश्यन्ते (७६६) इतिसूत्रेण वनिँप्प्रत्यये, गुणे, रपरत्वे 'अर्वन्' इतिशब्दः सिध्यति। 'अर्वन्' शब्द का अर्थ 'घोड़ा' है। सुँ और सम्बुद्धि में 'अर्वा, हे अर्वन्' । राजन्शब्द के समान बनते हैं। 'अर्वन्+औ' यहां अग्रिमसूत्र प्रवृत्त होता है— [लघु०] विधि-सूत्रम्— (२६२) अर्वणस्त्रसावनञः ।६।४।१२७॥ नञा रहितस्य 'अर्वन्' इत्यस्याङ्गस्य 'तृ' इत्यन्तादेशो न तु सौ। अर्वन्तौ। अर्वन्तः। अर्वद्भ्याम् इत्यादि॥ अर्थः—'नञ्' से रहित 'अर्वन्' इस अङ्ग को 'तृ' यह अन्तादेश होता है परन्तु सुं परे होने पर नहीं होता। व्याख्या—अनञ् ।६।१। अर्वणः ।६।१। अङ्गस्य ।६।१। (यह अधिकृत है)। तृँ ।१।१। (यहां विभक्ति का लुक् हुआ है)। असौ ।७।१। समास —न विद्यते नञ् यस्य स =अनञ्, तस्य =अनञः । नञ्बहुव्रीहिसमासः । न सु =असु, तस्मिन्= असौ। नञ्तत्पुरुषः । अर्थ—(अनञ्) नञ् से रहित (अङ्गस्य) अङ्गसञ्ज्ञक (अर्वणः) अर्वन् शब्द के स्थान पर (तृँ) 'तृ' यह आदेश हो जाता है परन्तु (असौ) सुँ परे होने पर नहीं होता। यह आदेश अलोऽन्त्यविधि से अन्त्य अल् = नकार के स्थान पर प्रवृत्त होता है। यहां अनेकाल्परिभाषा से सर्वादेश नहीं हो सकता, क्योंकि 'तृँ' में अनुनासिक ऋकार की इत्सञ्ज्ञा (२८) हो जाती है—नानुबन्धकृतमनेकाल्त्वम् । 'अर्वन्+औ' यहां नकार को तृँ आदेश हो—अर्वतृ+औ। उगिदचां सर्व- नामस्थानेऽधातो (२८६) से नुँम् का आगम हो—अर्वन्ँनुँम्तृ+औ = अर्वन्त्+औ । नश्चापदान्तस्य झलि (७८) सूत्र से नकार को अनुस्वार तथा अनुस्वारस्य ययि पर- सवर्णः (७६) से परसवर्ण—नकार हो कर 'अर्वन्तौ' प्रयोग सिद्ध होता है।