लघुसिद्धान्तकौमुदी (वरदराजाचार्य - भैमी एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)
Laghu Siddhanta Kaumudi of Varadaraja with Hindi Commentary
आचार्य वरदराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें• हलन्त-पुंल्लिङ्ग-प्रकरणम् ४०३ सूत्र में 'अष्टाभ्यः' पद की बजाय 'अष्टभ्यः' ऐसा लिखते, क्योंकि इस से एक मात्रा का लाघव हो सकता था । परन्तु मुनि ने ऐसा न कर 'अष्टाभ्यः' लिखा, इस से यह विदित होता है कि वे आत्व किये हुए 'अष्टन्' शब्द की ओर निर्देश कर रहे हैं। परन्तु जस् और शस् में आत्व करने वाला कोई सूत्र नहीं है, अतः यहां पाणिनि के निर्देशसामर्थ्य से ही जस्, शस् में भी वैकल्पिक आत्व का होना विदित होता है। 'अष्टन् + अस्' (जस् वा शस्) यहां अष्टाभ्य औश् (३००) इस प्रकृत सूत्र में आत्व-निर्देश के कारण आकार अन्तादेश तथा सूत्र से जस् वा शस् को 'औश्' सर्वादेश हो कर 'अष्ट आ + औ' । अब अकः सवर्णे दीर्घः (४२) से सवर्णदीर्घ तथा वृद्धिरेचि (३३) से वृद्धि एकादेश करने पर 'अष्टौ' प्रयोग सिद्ध होता है । भिस् और भ्यस् में हलादि विभक्ति परे होने के कारण अष्टन आ विभक्तौ (२६६) से नकार को आकार आदेश हो कर सवर्णदीर्घ करने से—'अष्टाभिः, अष्टाभ्यः' । अष्टन् + आम् । यहां ष्णान्ता षट् (२६७) सूत्र से षट्सञ्ज्ञा हो कर षट्- चतुर्भ्यश्च (२६६) सूत्र द्वारा नुट् का आगम करने से—अष्टन् + नाम् । अब 'नाम्' के हलादि होने से अष्टन आ विभक्तौ (२६६) सूत्र से नकार को आकार आदेश हो कर सवर्णदीर्घ करने से 'अष्टानाम्' प्रयोग सिद्ध होता है । अष्टन् + सुप् = अष्टासु (अष्टन आ विभक्तौ) । जहां आत्व न होगा वहां सम्पूर्ण रूपमाला और सिद्धि 'पञ्चन्' शब्दवत् होगी। विशेष—आत्व अनात्व दोनों पक्षों में आम् विभक्ति में 'अष्टानाम्' एक सा रूप बनता है। परन्तु दोनों पक्षों की प्रक्रियाओं के अन्तर को ध्यान में रखना चाहिये। आत्वपक्ष में पहले नुट् का आगम और तदनन्तर आत्व करने से रूप सिद्ध होता है। परन्तु आत्वाभाव में नुट् का आगम हो कर नोपधायाः (२६८) से उपधादीर्घ तथा न लोपः० (१८०) से नकार का लोप करने से रूप सिद्ध होता है । दोनों पक्षों में रूपमाला यथा— विभक्ति एकवचन द्विवचन बहुवचन ╭──────────┴──────────╮ (आत्वपक्षे) (अनात्वपक्षे) प्रथमा ० ० अष्टौ अष्ट द्वितीया ० ० ,, ,, तृतीया ० ० अष्टाभिः अष्टभिः चतुर्थी ० ० अष्टाभ्यः अष्टभ्यः पञ्चमी ० ० ,, ,, षष्ठी ० ० अष्टानाम् अष्टानाम् सप्तमी ० ० अष्टासु अष्टसु