भारतकोश
लघुसिद्धान्तकौमुदी (वरदराजाचार्य - भैमी एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)

लघुसिद्धान्तकौमुदी (वरदराजाचार्य - भैमी एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)

Laghu Siddhanta Kaumudi of Varadaraja with Hindi Commentary

आचार्य वरदराज द्वारा

DevanagariHindipublished633 पृष्ठ

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पृष्ठ 419

४०४ भैमीव्याख्योपेतायां लघुसिद्धान्तकौमुद्यां 'अष्टन्' शब्द के अनन्तर 'नवन्' (नौ) और दशन्' (दस) आते हैं। ये भी सदा बहुवचनान्त हैं। इन की रूपमाला और सिद्धि 'पञ्चन्' शब्दवत् होती है। नवन् (नौ) | दशन् (दस) प्र० * * नव | प्र० * * दश द्वि० * * " | द्वि० * * " तृ० * * नवभिः | तृ० * * दशभिः च० * * नवभ्यः | च० * * दशभ्यः प० * * " | प० * * " ष० * * नवानाम् | ष० * * दशानाम् स० * * नवसु | स० * * दशसु इसी प्रकार—एकादशन् (ग्यारह), द्वादशन् (बारह), त्रयोदशन् (तेरह), चतुर्दशन् (चौदह), पञ्चदशन् (पन्द्रह), षोडशन् (सोलह), सप्तदशन् (सत्रह), अष्टादशन् (अठारह), नवदशन् (उन्नीस) शब्दों के रूप होते हैं। (यहाँ नकारान्त पुँल्लिङ्ग शब्दों का विवेचन समाप्त होता है।) अभ्यास (४०) (१) नोपधाया सूत्र की व्यर्थता बतला कर उस का समाधान करें। (२) (क) नलोपः सुप्स्वरसंज्ञा० नियम का क्या लाभ है ? (ख) थर्वणस्तृसावमत्र सूत्र में 'अनङ्' ग्रहण का क्या प्रयोजन है ? (ग) श्वयुव० सूत्र पर प्रसिद्ध सूक्ति का विवेचन करें। (घ) षट्संज्ञा की अन्वर्थता पर संक्षिप्त नोट लिखें। (ङ) 'मघवन्' शब्द की दोनों पक्षों में रूपमाला लिखें। (३) निम्नलिखित वचनों की प्रकरणनिर्देशपूर्वक व्याख्या करें— (क) अत एव ज्ञापकात्त्यस्य यणं पूर्वं सम्प्रसारणम्। (ख) अष्टम्य इति वक्तव्ये कृतात्त्वनिर्देशो जश्शसोर्विषय आत्वं ज्ञापयति। (ग) यनिनस्मन्ग्रहणा न्यर्थवता चानर्थकेन तदन्तविधि प्रयोजयन्ति। (४) अधोलिखित रूपों की ससूत्र सिद्धि करें— १ यज्वनि। २ राज्ञः। ३ ब्रह्मा। ४ वृत्रहणि। ५ पथा। ६ मन्था। ७ अष्टौ। ८. पञ्च। ६ वृत्रहा। १० अर्वन्तो। ११ मघोनः। १२ यूनि। (५) निम्नलिखित शब्दों का केवल शस् में रूप लिखें— १ अश्वत्थामन्। २ पुष्पधन्वन्। ३ मथिन्। ४ मघवन्। ५. श्वन्। ६ पञ्चन्। ७ अष्टन्। ८ अर्वन् ६ भ्रूणहन्। १० पूषन्।