भारतकोश
संग्रह पर लौटें

लघुसिद्धान्तकौमुदी (वरदराजाचार्य - भैमी एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)

Laghu Siddhanta Kaumudi of Varadaraja with Hindi Commentary

आचार्य वरदराज द्वारा

DevanagariHindipublished633 पृष्ठ

• हलन्त-पुंल्लिङ्ग-प्रकरणम् ४०३ सूत्र में 'अष्टाभ्यः' पद की बजाय 'अष्टभ्यः' ऐसा लिखते, क्योंकि इस से एक मात्रा का लाघव हो सकता था । परन्तु मुनि ने ऐसा न कर 'अष्टाभ्यः' लिखा, इस से यह विदित होता है कि वे आत्व किये हुए 'अष्टन्' शब्द की ओर निर्देश कर रहे हैं। परन्तु जस् और शस् में आत्व करने वाला कोई सूत्र नहीं है, अतः यहां पाणिनि के निर्देशसामर्थ्य से ही जस्, शस् में भी वैकल्पिक आत्व का होना विदित होता है। 'अष्टन् + अस्' (जस् वा शस्) यहां अष्टाभ्य औश् (३००) इस प्रकृत सूत्र में आत्व-निर्देश के कारण आकार अन्तादेश तथा सूत्र से जस् वा शस् को 'औश्' सर्वादेश हो कर 'अष्ट आ + औ' । अब अकः सवर्णे दीर्घः (४२) से सवर्णदीर्घ तथा वृद्धिरेचि (३३) से वृद्धि एकादेश करने पर 'अष्टौ' प्रयोग सिद्ध होता है । भिस् और भ्यस् में हलादि विभक्ति परे होने के कारण अष्टन आ विभक्तौ (२६६) से नकार को आकार आदेश हो कर सवर्णदीर्घ करने से—'अष्टाभिः, अष्टाभ्यः' । अष्टन् + आम् । यहां ष्णान्ता षट् (२६७) सूत्र से षट्सञ्ज्ञा हो कर षट्- चतुर्भ्यश्च (२६६) सूत्र द्वारा नुट् का आगम करने से—अष्टन् + नाम् । अब 'नाम्' के हलादि होने से अष्टन आ विभक्तौ (२६६) सूत्र से नकार को आकार आदेश हो कर सवर्णदीर्घ करने से 'अष्टानाम्' प्रयोग सिद्ध होता है । अष्टन् + सुप् = अष्टासु (अष्टन आ विभक्तौ) । जहां आत्व न होगा वहां सम्पूर्ण रूपमाला और सिद्धि 'पञ्चन्' शब्दवत् होगी। विशेष—आत्व अनात्व दोनों पक्षों में आम् विभक्ति में 'अष्टानाम्' एक सा रूप बनता है। परन्तु दोनों पक्षों की प्रक्रियाओं के अन्तर को ध्यान में रखना चाहिये। आत्वपक्ष में पहले नुट् का आगम और तदनन्तर आत्व करने से रूप सिद्ध होता है। परन्तु आत्वाभाव में नुट् का आगम हो कर नोपधायाः (२६८) से उपधादीर्घ तथा न लोपः० (१८०) से नकार का लोप करने से रूप सिद्ध होता है । दोनों पक्षों में रूपमाला यथा— विभक्ति एकवचन द्विवचन बहुवचन ╭──────────┴──────────╮ (आत्वपक्षे) (अनात्वपक्षे) प्रथमा ० ० अष्टौ अष्ट द्वितीया ० ० ,, ,, तृतीया ० ० अष्टाभिः अष्टभिः चतुर्थी ० ० अष्टाभ्यः अष्टभ्यः पञ्चमी ० ० ,, ,, षष्ठी ० ० अष्टानाम् अष्टानाम् सप्तमी ० ० अष्टासु अष्टसु

४०४ भैमीव्याख्योपेतायां लघुसिद्धान्तकौमुद्यां 'अष्टन्' शब्द के अनन्तर 'नवन्' (नौ) और दशन्' (दस) आते हैं। ये भी सदा बहुवचनान्त हैं। इन की रूपमाला और सिद्धि 'पञ्चन्' शब्दवत् होती है। नवन् (नौ) | दशन् (दस) प्र० * * नव | प्र० * * दश द्वि० * * " | द्वि० * * " तृ० * * नवभिः | तृ० * * दशभिः च० * * नवभ्यः | च० * * दशभ्यः प० * * " | प० * * " ष० * * नवानाम् | ष० * * दशानाम् स० * * नवसु | स० * * दशसु इसी प्रकार—एकादशन् (ग्यारह), द्वादशन् (बारह), त्रयोदशन् (तेरह), चतुर्दशन् (चौदह), पञ्चदशन् (पन्द्रह), षोडशन् (सोलह), सप्तदशन् (सत्रह), अष्टादशन् (अठारह), नवदशन् (उन्नीस) शब्दों के रूप होते हैं। (यहाँ नकारान्त पुँल्लिङ्ग शब्दों का विवेचन समाप्त होता है।) अभ्यास (४०) (१) नोपधाया सूत्र की व्यर्थता बतला कर उस का समाधान करें। (२) (क) नलोपः सुप्स्वरसंज्ञा० नियम का क्या लाभ है ? (ख) थर्वणस्तृसावमत्र सूत्र में 'अनङ्' ग्रहण का क्या प्रयोजन है ? (ग) श्वयुव० सूत्र पर प्रसिद्ध सूक्ति का विवेचन करें। (घ) षट्संज्ञा की अन्वर्थता पर संक्षिप्त नोट लिखें। (ङ) 'मघवन्' शब्द की दोनों पक्षों में रूपमाला लिखें। (३) निम्नलिखित वचनों की प्रकरणनिर्देशपूर्वक व्याख्या करें— (क) अत एव ज्ञापकात्त्यस्य यणं पूर्वं सम्प्रसारणम्। (ख) अष्टम्य इति वक्तव्ये कृतात्त्वनिर्देशो जश्शसोर्विषय आत्वं ज्ञापयति। (ग) यनिनस्मन्ग्रहणा न्यर्थवता चानर्थकेन तदन्तविधि प्रयोजयन्ति। (४) अधोलिखित रूपों की ससूत्र सिद्धि करें— १ यज्वनि। २ राज्ञः। ३ ब्रह्मा। ४ वृत्रहणि। ५ पथा। ६ मन्था। ७ अष्टौ। ८. पञ्च। ६ वृत्रहा। १० अर्वन्तो। ११ मघोनः। १२ यूनि। (५) निम्नलिखित शब्दों का केवल शस् में रूप लिखें— १ अश्वत्थामन्। २ पुष्पधन्वन्। ३ मथिन्। ४ मघवन्। ५. श्वन्। ६ पञ्चन्। ७ अष्टन्। ८ अर्वन् ६ भ्रूणहन्। १० पूषन्।

हलन्त-पुंल्लिङ्ग-प्रकरणम् ४०५ (६) सूत्रों की व्याख्या करें— १. एकाजुत्तरपदे णः । २. हो हन्तेर्जिण्णन्नेषु । ३. सौ च । ४. न संयोगाद्वमन्तात् । ५. उगीदचां सर्वनामस्थानेऽधातोः । ६. न ङिसम्बु- द्ध्योः । ७. थो न्थः । ८. अष्टाभ्य औश् । ६. इन्हन्पूषार्यम्णां शौ । १०. अर्वणस्त्रसावनञः । (७) ऽनुत्तरपदे प्रतिषेधो वक्तव्यः वार्त्तिक का भाव प्रतिपादन करें । (८) (क) क्या 'ज्ञ' तथा 'क्ष' स्वतन्त्र वर्ण हैं ? विवेचनात्मक नोट लिखें । (ख) अर्वणस्त्रसावनञः द्वारा प्रतिपादित 'तृ' आदेश अनेकाल् होने पर भी क्यों सर्वादेश नहीं होता ? (ग) मघवा बहुलम् सूत्र में 'बहुलम्' ग्रहण का क्या प्रयोजन है ? (घ) 'अष्टानाम्' पर दोनो पक्षो की प्रक्रियाएं स्पष्ट करें । (ङ) अष्टन आ विभक्तौ द्वारा विहित आकार कैसे वैकल्पिक है ? --:: ० ::-- अब जकारान्त पुंल्लिङ्गों का वर्णन करते हैं— [लघु०] विधि-सूत्रम्— (३०१) ऋत्विग्दधृक्स्रग्दिगुष्णिगञ्चुयुजिक्रुञ्चां च ।३।२।५६॥ एभ्यः क्विन् स्यात् १। अञ्चेः सुँप्युपपदे । युजिक्रुञ्चोः केवलयोः । क्रुञ्चेर्नलोपाभावश्च निपात्यते । कनावितौ ॥ अर्थः—ऋत्विज्, दधृष्, स्रज्, दिश्, उष्णह्—ये पांच क्विन्नन्त शब्द नि- पातित किये जाते हैं; तथा सुबन्त उपपद होने पर 'अञ्चु' धातु से, उपपदरहित युजिं और क्रुञ्च् धातु से भी क्विन् प्रत्यय हो जाता है। किञ्च क्विन् परे रहते क्रुञ्च् के नकार का लोप भी नहीं होता । व्याख्या—ऋत्विग्दधृक्स्रग्दिगुष्णिफ् ।१।१। अञ्चुयुजिक्रुञ्चाम् ।६।३। च इत्य- व्ययपदम् । क्विन् ।१।१। (स्पृशोऽनुदके क्विन् से)। समासः—ऋत्विक् च दधृक् च स्रक् च दिक् च उष्णिफ् च = ऋत्विग्दधृक्स्रग्दिगुष्णिफ्, समाहारद्वन्द्वः । अञ्चुँश्च युजिश्च क्रुङ् चँ = अञ्चुयुजिक्रुञ्चः, तेषाम् = अञ्चुयुजिक्रुञ्चाम्, इतरेतरद्वन्द्वः । पञ्चम्यर्थे सौत्रत्वात्षष्ठी । इस सूत्र में दो वाक्य हैं—१. ऋत्विग्दधृक्स्रग्दिगुष्णिफ् । २. अञ्चुं- युजिक्रुञ्चां च क्विन् । पहले वाक्य में पाणिनि ने बने बनाये पांच शब्द गिनाये है । सूत्रकार का स्वयं सब कार्य कर के पढ़ देना निपातन कहाता है२। इन पांच शब्दों का निपातन किया गया है । 'क्विन्' के प्रकरण में पढ़े जाने के कारण इन शब्दों को १. एभ्यः क्विन् स्यात् — यह वचन ऋत्विज् आदि पांच शब्दों के अन्तर्गत यज् आदि पञ्च धातुओं को तथा सूत्र में साक्षात् पढ़े अञ्चु आदि तीन धातुओं को लक्ष्य कर के कहा गया है । २. लक्षणं विनैव निपतति = प्रवर्त्तते लक्ष्येषु इति निपातनम् ।

४०६ भैमीव्याख्योपेतायां लघुसिद्धान्तकौमुद्यां भी क्विबन्त समझना चाहिये। दूसरे वाक्य में तीन धातुओं से 'क्विँन्' प्रत्यय का विधान किया गया है। अर्थ - (ऋत्विग्दधृक्स्रग्दिश्युष्णिञ्च्) ऋत्विज्, दधृष्, स्रज्, दिश् और उष्णिह्, ये पांच क्विबन्त शब्द निपातित किये जाते हैं। (च) तथा (अञ्चुयुजि- क्रुञ्चाम्) अञ्चु, युजि तथा क्रुञ्च् धातुओ से (क्विँन्) क्विँन् प्रत्यय हो जाता है। निपातनों के साथ २ अञ्चु आदि तीन धातुओ से 'क्विँन्' प्रत्यय विधान करने से यह विदित होता है कि इन धातुओं में भी कुछ २ निपातन कार्य होते हैं। वे निपातन-कार्य शिष्टग्रन्थों के अनुसार निम्नलिखित हैं— (१) सुबन्त उपपद होने पर ही 'अञ्चु' धातु से क्विन् होता है। (२) उपपदरहित 'युजि' और 'क्रुञ्च्' धातु से क्विन् होता है। (३) 'क्विन्' परे होने पर 'क्रुञ्च्' के उपधाभूत नकार का अनिदितां हल उपधायाः क्ङिति (३३४) द्वारा लोप नहीं होता। ऋत्विज् आदि पांच शब्दों में महामुनि ने निम्नलिखित कार्य किये हैं— (१) ऋत्विज्—में 'ऋतु' उपपद वाली यज्' (भ्वा० उ०) धातु से क्विन्, उस का सर्वापहार लोप, वचि-स्वपि० (५४७) से सम्प्रसारण, सम्प्रसारणाच्च (२५८) से पूर्वरूप तथा इको यणचि (१५) से यण् किया गया है। (२) दधृष्—में धृष्' (स्वा० प०) धातु से क्विन्, उस का सर्वापहारलोप, द्वित्वादिक कार्य तथा अन्तोदात्तत्व किया गया है। यह शब्द पुँल्लिङ्ग है। आगे षका- रान्तो में इस का विवेचन किया जायेगा। (३) स्रज्—में 'सृज्' (तुदा० प०) धातु से क्विन्, उस का सर्वापहारलोप, ऋकार से परे अम् का आगम तथा यणादेश किया गया है। यह शब्द जकारान्त स्त्री- लिङ्गप्रकरण में आगे कहा जायेगा। (४) दिश्—में 'दिश' (तुदा० प०) धातु से कर्मकारक में क्विन् प्रत्यय कर उस का सर्वापहारलोप किया गया है। यह शब्द शकारान्त स्त्रीलिङ्गप्रकरण में आगे कहा जायेगा। (५) उष्णिह्—में 'उत्' पूर्वक 'स्निह्' (दिवा० प०) धातु से क्विन्, उस का सर्वापहारलोप, उद् के दकार का भी लोप तथा सकार को षकार किया गया है। यह शब्द भी आगे हकारान्तस्त्रीलिङ्गप्रकरण में कहा जायेगा। अब क्रमप्राप्त जकारान्त पुंल्लिङ्ग शब्दों में प्रथम 'ऋत्विज्' शब्द का विवेचन किया जाना है। यह शब्द क्विबन्त निपातन किया गया है। 'क्विँन्' प्रत्यय आ जाने से क्या क्या लाभ होते हैं तथा उस का किस प्रकार सर्वापहारलोप किया जाता है— यह बतलाने के लिये अब अग्रिमसूत्रों का विवेचन किया जाता है— 'ऋत्विज् + क्विँन्' यहां हलन्त्यम् (१) से नकार तथा लशक्वतद्धिते (१३६) १ वस्तुत क्विबन्त 'ऋत्विज्' शब्द बना बनाया निपातन किया गया है, इस की सिद्धि करने की आवश्यकता नहीं। और यदि सिद्धि करनी भी हो तो 'ऋत्विज् +

हलन्त-पुंल्लिङ्ग-प्रकरणम् ४०७ से ककार की इत्सञ्ज्ञा हो लोप हो जाता है¹। इकार उच्चारणार्थ है। तो इस प्रकार —‘ऋत्विज्+व्’ हुआ। अब अग्रिम-सूत्र प्रवृत्त होता है— [लघु०] सञ्ज्ञा-सूत्रम्—(३०२) कृदतिङ्।३।१।९३॥ अत्र धात्वधिकारे तिङ्भिन्नः प्रत्ययः कृत्सञ्ज्ञः स्यात् ॥ अर्थः—धातोः (३.१.६१) इस अधिकार में पठित प्रत्यय कृत्सञ्ज्ञक हो। व्याख्या—तत्र इत्यव्ययपदम्। (तत्रोपपदं सप्तमीस्थम् से)। अतिङ् १।१। (यह अधिकृत है)। कृत् १।१। अर्थः—(तत्र) उस धातोः के अधिकार में (अतिङ्) तिङ्भिन्न (प्रत्ययः) प्रत्यय (कृत्) कृत्सञ्ज्ञक हो। इस सूत्र से एक सूत्र पीछे अष्टाध्यायी में धातोः (७६६) इस प्रकार का एक अधिकार चलाया गया है। इस अधिकार का तात्पर्य यह है कि तृतीय अध्याय की समाप्ति तक जितने प्रत्यय विधान किये जायें वे सब धातु से परे हों। इस अधिकार को चला कर अब ‘तत्र अतिङ् प्रत्ययः कृत्’ ऐसा कथन किया गया है। अर्थात् उस धात्वधिकार में तिङ्भिन्न प्रत्यय कृत्सञ्ज्ञक होता है। यह सूत्र अष्टाध्यायी के तृतीय अध्याय के प्रथम पाद में स्थित है। इस पाद में दो धात्वधिकार हैं। एक—धातो- रेकाचो हलादेः क्रियासमभिहारे यङ् (३.१.२२) सूत्र में और दूसरा धातोः (३.१.६१) यह उपर्युक्त। यहां ‘तत्र’ शब्द द्वितीय धात्वधिकार को लक्ष्य कर के प्रयुक्त किया गया है। इसलिये वृत्ति में ‘अत्र’ कहा गया है। अतः प्रथम धात्वधिकार में धातु से परे विहित प्रत्यय की कृत्सञ्ज्ञा नहीं होती। ‘अतिङ्’ कहने से इस धात्वधिकार में पठित होने पर भी तिङ्प्रत्यय कृत्सञ्ज्ञक न होंगे। यथा—भवति, पठति, पठन्तु आदि। यदि यहां भी कृत्सञ्ज्ञा हो जाती तो कृत्तद्धितसमासाश्च (११७) सूत्र से प्रातिपदिकसञ्ज्ञा हो कर स्वादिप्रत्यय उत्पन्न हो जाने से—‘भवतिः, पठतिः, पठन्तुः’ इस प्रकार अनिष्ट रूप हो जाते। ऋत्विज्+व् (क्विन्न्)। यहां क्विन्न् की कृत्सञ्ज्ञा हो जाती है, क्योंकि यह द्वितीय धात्वधिकार में पठित तथा तिङ्भिन्न प्रत्यय है। अब यहां अग्रिम-सूत्र प्रवृत्त होता है— [लघु०] विधि-सूत्रम्—(३०३) वेरपृक्तस्य ।६।१।६५॥ अपृक्तस्य वस्य लोपः ॥ अर्थः—अपृक्तसञ्ज्ञक वकार का लोप हो जाता है। व्याख्या—वेः ।६।१। अपृक्तस्य ।६।१। लोपः ।१।१। (लोपो व्योर्वलि से)। ‘क्विन्न्’ ऐसा नहीं लिखा जा सकता, क्योंकि तब प्रथम ऋतूपपद ‘यज्’ धातु से क्विन्न् कर उसका सर्वापहारलोप कर बाद में उसको मान सम्प्रसारण आदि होने चाहियें, लोप से पूर्व नहीं। अतः बालकों के ज्ञान वा सौकर्य के लिये ही यह अलीक मार्ग अवलम्बन किया गया समझना चाहिये। १. ‘क्विन्न्’ प्रत्यय में नकार का ग्रहण क्विन्न् और क्विँप् में भेद कराने के लिये तथा ककार का ग्रहण कित् कार्यों के लिये है।

४०८ भैमीव्याख्योपेताया लघुसिद्धान्तकौमुद्यां यहा 'वि' मे इकार उच्चारणार्थ है, क्योकि 'वि' अपृक्त नही हो सकता। अपृक्त एका- ल्प्रत्यय (१७८) द्वारा एकाल् प्रत्यय की ही अपृक्तसञ्ज्ञा होती है। अर्थ -- (अपृक्त- स्य) अपृक्तसञ्ज्ञक (वे ) वकार का (लोप ) लोप हो जाता है। ऋत्विज् + व्' यहा वकार अपृक्त है, अत प्रकृतसूत्र से इस का लोप होकर 'ऋत्विज्' ही अवशिष्ट रहता है। अब इस के कृदन्त होने से प्रातिपदिक सञ्ज्ञा हो कर सुं आदि प्रत्यय उत्पन्न होते है— 'ऋत्विज् + स्' (सुं) यहा हल्ङ्याब्भ्यो ० (१७६) सूत्र मे सुं का लोप हो जाता है। अब 'ऋत्विज्' इस अवस्था मे अग्रिम-सूत्र प्रवृत्त होता है— [लघु०] विधिसूत्रम्— (३०४) क्विन्प्रत्ययस्य कुः ।८।२।६२॥ क्विन्प्रत्ययो यस्मात् तस्य कवर्गोन्तादेश स्यात् पदान्ते। अस्यासिद्ध- त्वाच् 'चो कु' (३०६) इति कुत्वम्। ऋत्विक्, ऋत्विग्। ऋत्विजौ। ऋत्विग्भ्याम् ॥ अर्थ—'क्विन्' प्रत्यय जिस से किया जाये, उस को पदान्त मे कवर्ग अन्ता- देश हो जाता है। इस सूत्र के असिद्ध होने से चोः कु (३०६) द्वारा कुँत्व हो जाता है। व्याख्या—क्विन्प्रत्ययस्य ।६।१। कु १।१। पदस्य ।६।१। (यह अधिकृत है)। अन्ते ।७।१। (स्को संयोगाद्योरन्ते च से) । समास —क्विन्प्रत्ययो यस्मात् स क्विन्- प्रत्यय, तस्य=क्विन्प्रत्ययस्य । बहुव्रीहिसमास । अर्थ --(क्विन्प्रत्ययस्य) 'क्विन्' प्रत्यय जिस से किया गया हो उस के स्थान पर (कु ) कवर्ग आदेश हो जाता है (पदस्य) पद के (अन्ते) अन्त मे। अलोन्त्यविधि से यह आदेश अन्त्य अल् के स्थान पर होना है। अत एव वृत्ति मे 'अन्तादेश.' लिखा है। यहा 'कु' से अणुदित् सवर्णस्य० (११) द्वारा कवर्ग समझा जाता है--यह सञ्ज्ञाप्रकरण मे उसी सूत्र मे स्पष्ट कर चुके हैं। यहा इस सूत्र से केवलमात्र यह अभिप्राय नही समझना चाहिये कि 'पदान्त मे क्विबन्त शब्द के अन्त को कवर्ग आदेश होता है'। यदि केवल इतना ही अभीष्ट होता तो 'क्विन् कु' सूत्र रचते, 'प्रत्यय' शब्द साथ मे न जोडते। अत 'प्रत्यय' शब्द साथ लगाने का यह प्रयोजन है कि 'क्विन्प्रत्ययो यस्मात्' इस प्रकार बहुव्रीहि-समास मान कर अब अक्विन्नन्तो अर्थात् क्विन्भिन्न अन्यप्रत्ययान्तो को भी कवर्ग अन्तादेश हो जावे यदि कही उन मे क्विन्प्रत्यय हो चुका हो। यह सब आगे हलन्तस्त्रीलिङ्ग- प्रकरण मे मूल मे ही स्पष्ट हो जायेगा । प्रकृत मे 'ऋत्विज्' यह शब्द क्विबन्त है अत पदान्त मे इस सूत्र से जकार को कवर्ग-गकार प्राप्त होता है। इस के अतिरिक्त आगे आने वाले चो कुः (३०६) सूत्र से भी जकार को कवर्ग अर्थात् गकार प्राप्त होता है। पूर्वत्रासिद्धम् (३१) द्वारा चो कु. (८.२.३०) की दृष्टि मे क्विन्प्रत्ययस्य कुः (८.२ ६२) सूत्र असिद्ध है, अत.

हलन्त-पुंल्लिङ्ग-प्रकरणम् ४०६

चोः कुः द्वारा ही कुत्व-गकार हो कर—ऋत्विग्वाऽवसाने (१४६) से विकल्प कर के चर्त्व ककार करने से—'ऋत्विक्, ऋत्विग्' ये दो रूप सिद्ध होते हैं। यद्यपि क्विन्प्रत्ययस्य कुः (३०४) और चोः कुः (३०६) इन दोनों सूत्रों में से किसी एक के द्वारा यहां कार्य सिद्ध हो सकता है, तथापि अन्यत्र भिन्न २ उदाह- रणों में कार्यसिद्धि के लिये दोनों सूत्रों का होना आवश्यक है। यथा--'युङ्' यहां चवर्ग न होने से चोः कुः (३०६) प्रवृत्त नहीं होता, क्विन्प्रत्ययस्य कुः (३०४) से ही कार्य होता है। 'सुयुक्, सुयुग्' यहां क्विन्प्रत्यय न होने से क्विन्प्रत्ययस्य कुः (३०४) सूत्र प्रवृत्त नही होता, चोः कुः (३०६) से ही कुत्व होता है। विशेष—वस्तुतः 'ऋत्विक्-ग्' में क्विन्प्रत्ययस्य कुः द्वारा ही कुत्व होता है चोः कुः द्वारा नहीं। यह सब विस्तारपूर्वक सिद्धान्तकौमुदी की व्याख्याओं में देखें। भ्याम्, भिस्, भ्यस् और सुप् में स्वादिष्वसर्वनामस्थाने (१६४) द्वारा पदसंज्ञा हो कर चोः कुः (३०६) से कुत्व-गकार हो जाता है। सुप् में कुत्व के अनन्तर आदेश- प्रत्यययोः (१५०) से सकार को षकार तथा खरि च (७४) से गकार को चर्त्व- ककार कर क् + ष् के योग से क्ष् आकृति हो जाती है। 'ऋत्विज्' शब्द की रूपमाला यथा— प्र० ऋत्विक्-ग् ऋत्विजौ ऋत्विजः | प० ऋत्विजः ऋत्विग्भ्याम् ऋत्विग्भ्यः द्वि० ऋत्विजम् ,, ,, | प० ,, ऋत्विजोः ऋत्विजाम् तृ० ऋत्विजा ऋत्विग्भ्याम् ऋत्विग्भिः | स० ऋत्विजि ,, ऋत्विक्षु च० ऋत्विजे ,, ऋत्विग्भ्यः | सं० हे ऋत्विक्-ग् ! ऋत्विजौ ! ऋत्विजः ! युज् (योगी)। युजिर् योगे (रुधा० उभ०) धातु से ऋत्विग्दधृक्० (३०१) सूत्र से क्विन्प्रत्यय होकर उस का सर्वापहार लोप हो जाता है। इस प्रकार 'युज्' शब्द के कृदन्त हो जाने से प्रातिपदिकसञ्ज्ञा हो कर स्वादिप्रत्यय उत्पन्न होते हैं। युज्+स्(सुँ)। यहां अग्रिम सूत्र प्रवृत्त होता है— [लघु०] विधि-सूत्रम्—(३०५) युजेरसमासे ।७।१।७१॥ युजेः सर्वनामस्थाने नुँम् स्यादसमासे । सुँलोपः । संयोगान्तलोपः । कुत्वेन नस्य ङः । युङ् । अनुस्वारपरसवर्णौ—युञ्जौ, युञ्जः । युग्भ्याम् ॥ अर्थः—सर्वनामस्थान परे होने पर युज् को नुँम् का आगम होता है, परन्तु समास में नहीं होता। व्याख्या—सर्वनामस्थाने ७।१। (उगिदचां सर्वनामस्थानेऽधातोः से) । युजेः ।६।१। नुँम् ।१।१। (इदितो नुँम् धातोः से)। असमासे ।७।१। अर्थः—(सर्वनामस्थाने) सर्वनामस्थान परे होने पर (युजेः) युज् धातु का अवयव (नुँम्) नुँम् हो जाता है (असमासे) परन्तु समास में नहीं होता। ध्यान रहे कि ऋत्विग्दधृक्० (३०१) सूत्र में तथा युजेरसमासे (३०५) इस सूत्र में 'युजि' इस प्रकार इकार ग्रहण करना 'कार' प्रत्यय की भांति स्वार्थ में

४१० भैमीव्याख्ययोपेतायां लघुसिद्धान्तकौमुद्यां इक्श्तिपौ धातुनिर्देशे इस इक् प्रत्यय द्वारा नही समझना चाहिये, किन्तु इस मे युजिँर् योगे (रुधा० उभ०) धातु का अनुकरण किया गया है। अत इन सूत्रो मे युज समाधौ (दिवा०) धातु का ग्रहण नही होता । विस्तार के लिये सिद्धान्तकौमुदी देखें। 'युज् + स्' यहा सर्वनामस्थान परे है, अत युजेरसमासे सूत्र से नुँम् का आगम हो—यु नुँम् ज् + स् । मकार और उकार अनुबन्धो का लोप हो कर—युन्ज् + स् । हल्ङ्याब्भ्यो ० (१७६) से सकार का लोप—युन्ज् । सयोगान्तस्य लोप (२०) से जकार का लोप कर क्विन्प्रत्ययस्य कु. (३०४) से नकार को ङकार करने से—'युङ्' प्रयोग सिद्ध होता है । युज् + औ' यहा भी सर्वनामस्थान परे होने के कारण युजेरसमासे (३०५) सूत्र द्वारा नुँम् का आगम—यु नुँम् ज्+औ । मश्चापदान्तस्य झलि (७८) सूत्र से नकार को अनुस्वार तथा अनुस्वारस्य ययि परसवर्ण (७६) सूत्र द्वारा अनुस्वार को परसवर्ण- ञकार हो कर 'युञ्जौ' सिद्ध होता है। ध्यान रहे कि परसवर्ण—के असिद्ध होन स चो कु (३०६) द्वारा ञकार को ङकार नही होता । रूपमाला यथा— प्र० युङ् युञ्जौ युञ्ज | प० युज युग्भ्याम्* युग्भ्य * द्वि० युञ्जम् " युज | प० " युजो युजाम् तृ० युजा युग्भ्याम्* युग्भि * | स० युजि " युक्षु‡ च० युजे ,"* युग्म्य * | स० हे युङ् ! हे युञ्जौ ! हे युञ्ज !

  • इन स्थानो पर चो कु (३०६) द्वारा कुत्व हो जाता है। क्विन्प्रत्ययस्य कु (३०४) सूत्र उस की दृष्टि मे असिद्ध है । ‡ चो. कु (३०६), आदेशप्रत्ययो (१५०), खरि च (७४) । सुयुज् (उत्तम योगी) । सुपूर्वक युजिँर् योगे (रुधा० उभ०) धातु से क्विप् प्रत्यय करने पर 'सुयुज्' शब्द निष्पन्न होता है। ध्यान रहे कि यहा ऋत्विग्दधृक्० (३०१) सूत्र द्वारा क्विन् प्रत्यय नही होता, क्योकि वहा निरुपपद युज् मे क्विन् विधान किया गया है, यहा 'सु' यह उपपद विद्यमान है । सुयुज् + स् (सू) । यहा समास मे निषेध होने से युजेरसमासे (३०५) द्वारा नुँम् का आगम नही होता । हल्ङ्याब्भ्य ० (१७६) से सकार का लोप हो कर अग्रिम- सूत्र प्रवृत्त होता है— [लघु०] विधि-सूत्रम्— (३०६) चोः कुः ।८।२।३०॥ चवर्गस्य कवर्ग स्याज्झलि पदान्ते च । सुयुक्, सुयुग् । सुयुजौ । सुयुग्भ्याम् । खन् । खञ्जौ । खन्भ्याम् ॥ अर्थ—झल् परे होने पर या पदान्त मे चवर्ग को कवर्ग हो । व्याख्या—चो ।६।१। कु ।१।१। झलि ।७।१। (झलो झलि से) । पदस्य ।६।१। (यह अधिकृत है) । अन्ते ।७।१। (स्को. संयोगाद्योरन्ते च से) । अर्थ —

हलन्त-पुंल्लिङ्ग-प्रकरणम् ४११ (झलि) झल् परे होने पर या (पदस्य) पद के (अन्ते) अन्त में (चोः) चवर्ग के स्थान पर (कुः) कवर्ग आदेश हो जाता है। 'सुयुज्' यहां पद के अन्त में चवर्ग-जकार को कवर्ग-गकार हो कर वाऽवसाने (१४६) सूत्र से वैकल्पिक चर्त्व-ककार करने पर—'सुयुक्, सुयुग्' ये दो रूप सिद्ध होते हैं। रूपमाला यथा— प्र० सुयुक्-ग् सुयुजौ सुयुजः | प० सुयुजः सुयुग्भ्याम्* सुयुग्भ्यः* द्वि० सुयुजम् ,, ,, | प० ,, सुयुजोः सुयुजाम् तृ० सुयुजा सुयुग्भ्याम्* सुयुग्भिः* | स० सुयुजि ,, सुयुक्षु‡ च० सुयुजे ,,* सुयुग्भ्यः* | सं० हे सुयुक्-ग् ! हे सुयुजौ ! हे सुयुजः!

  • चोः कुः (३०६) से कुंत्व हो जाता है। ‡ चोः कुः (३०६) से जकार को गकार, आदेशप्रत्यययोः(१५०) से सकार को षकार तथा खरि च (७४) से गकार को ककार हो कर क्+ष् के योग से 'क्ष्' आकृति बन जाती है। खञ्ज् (लङ्गड़ा)। खजिँ गतिवैकलव्ये (भ्वा० प०) इत्यस्माद्धातोः क्विपि, इदित्त्वान्नुमि, नश्चापदान्तस्य झलि (७८) इत्यनुस्वारे, अनुस्वारस्य ययि परसवर्णः (७६) इति परसवर्णे ञकारे च कृते 'खञ्ज्' इति शब्दो निष्पद्यते। कृदन्त होने से 'खञ्ज्' शब्द की प्रातिपदिकसञ्ज्ञा हो कर स्वादि प्रत्यय उत्पन्न होते हैं। खञ्ज् + स् (सुँ) । हल्ङ्याब्भ्यः० (१७६) से सुँलोप, संयोगान्तस्य लोपः (२०) से जकारलोप, निमित्तापाये नैमित्तिकस्याप्यपायः इस न्यायानुसार ञकार को पुनः नकार हो कर 'खन्' प्रयोग सिद्ध होता है। यहां संयोगान्तलोप के असिद्ध होने से न लोपः प्रातिपदिकान्तस्य(१८०)द्वारा नकार का लोप नहीं होता। किञ्च—क्विन्- प्रत्ययान्त न होने से क्विन्प्रत्ययस्य कुः (३०४) द्वारा नकार को ङकार आदेश भी नहीं होता। रूपमाला यथा— प्र० खन् खञ्जौ खञ्जः | प० खञ्जः खन्भ्याम्† खन्भ्यः† द्वि० खञ्जम् ,, ,, | प० ,, खञ्जोः खञ्जाम् तृ० खञ्जा खन्भ्याम्† खन्भिः† | स० खञ्जि ,, खन्त्सु, खन्सु* च० खञ्जे ,,† खन्भ्यः† | सं० हे खन् ! हे खञ्जौ ! हे खञ्जः ! † संयोगान्तस्य लोपः (२०) से जकार का लोप हो जाता है।
  • संयोगान्तलोप हो कर नश्च (८७) से वैकल्पिक 'धुट्' पुनः चर्त्व। राज् (दीप्तिमान्, राजा)। राजूँ दीप्तौ (भ्वा० उ०) इत्यस्मात्क्विपि तस्य च सर्वापहारलोपे 'राज्' इति शब्दो निष्पद्यते। कृदन्त होने से स्वादिप्रत्यय उत्पन्न होते हैं। राज् + स् (सुँ)। यहां हल्ङ्याब्भ्यः० (१७६) से सुँलोप हो कर अग्रिमसूत्र प्रवृत्त होता है—

४१२ भैमीव्याख्योपेतायां लघुसिद्धान्तकौमुद्यां [लघु०] विधि-सूत्रम्—(३०७) व्रश्च-भ्रस्ज-सृज-मृज-यज-राज-भ्राजच्छशां षः ।८।२।३६॥ व्रश्चादीनां सप्तानां छशान्तयोश्च षकारोऽन्तादेशः स्याज् झलि पदान्ते च । जश्त्व-चर्वे । राट्, राड् । राजौ । राजः । राड्भ्याम् । एवं विभ्राट् । देवेद् । विश्वसृट् ॥ अर्थ—झल् परे होने पर या पदान्त में व्रश्च्, भ्रस्ज्, सृज्, मृज्, यज्, राज्, भ्राज् इन सात धातुओं को तथा छकारान्त और शकारान्तों को षकार अन्तादेश हो जाता है। व्याख्या—व्रश्च-भ्रस्ज—छशाम् ।८।२। षः ।१।१। झलि ।८।२। (झलो झलि से) । पदस्य ।८।१। (यह अधिकृत है) । अन्ते ।८।२। (स्कोः संयोगाद्योरन्ते च से)। समास—व्रश्चश्च भ्रस्जश्च सृजश्च मृजश्च यजश्च राजश्च भ्राजश्च छश्च शश्च— व्रश्च-भ्रस्ज—भ्राजच्छशः, तेषाम् = व्रश्च-भ्रस्ज—भ्राजच्छशाम्, इतरेतरद्वन्द्वः । व्रश्चा- दिष्वकार उच्चारणार्थः । यहां 'व्रश्च्' आदि सात धातु हैं तथा छ्, श् ये दो वर्ण हैं। ये दोनों वर्ण 'शब्दस्वरूपम्' विशेष्य के विशेषण हैं। शब्दानुशासन का सम्पूर्ण अष्टा- ध्यायी में अधिकार होने से 'शब्दस्वरूपम्' यह उपलब्ध हो जाता है। तब तदन्तविधि हो कर शकारान्त छकारान्त शब्दस्वरूप ऐसा अर्थ हो जाता है। अर्थः—(व्रश्च-भ्रस्ज —छशाम्) व्रश्च्, भ्रस्ज्, सृज्, मृज्, यज्, राज्, भ्राज् तथा छकारान्त और शकारान्त शब्दों के स्थान पर (ष) 'ष्' आदेश हो जाता है (झलि) झल् परे होने पर या (पदस्य) पद के (अन्ते) अन्त में। अलोऽन्त्यविधि से यह आदेश अन्त्य अल् के स्थान पर होता है। 'राज्' यहां पदान्त में प्रकृत-सूत्र से जकार को षकार हो कर झलां जशोऽन्ते (६७) से षकार को डकार तथा वाऽवसाने (१४६) सूत्र से वैकल्पिक चर्व-टकार करने पर 'राट्, राड्' ये दो रूप सिद्ध होते हैं। सम्पूर्ण रूपमाला यथा— प्र० राट्-ड् राजौ राजः प० राजः राड्भ्याम्† राड्भ्यः† द्वि० राजम् ,, ,, ष० ,, राज्ञो राजाम् तृ० राज्ञा राड्भ्याम्† राड्भिः† स० राज्ञि ,, राट्सु-ट्त्सु* च० राज्ञे ,,† राड्भ्यः† स० हे राट्-ड् ! हे राजौ ! हे राजः ! † व्रश्च-भ्रस्ज० (३०७) इति षत्वे, झलां जशोऽन्ते (६७) इति डकारः ।

  • षत्वे जश्त्वे च कृते ङः सि धुँट् (८४) इति वा धुँडागमे खरि च (७४) इति चर्वम् । विभ्राज् (विशेष शोभायुक्त) । 'वि' पूर्वक भ्राजृ दीप्तौ (भ्वा० आ०) धातु से कर्त्ता में क्विप् प्रत्यय करने पर 'विभ्राज्' शब्द सिद्ध होता है। कृदन्त होने से इस की प्रातिपदिकसञ्ज्ञा हो कर सुं आदि प्रत्यय उत्पन्न होते हैं— विभ्राज्+स् (सुँ) । हल्ङ्याब्भ्यो ० (१७६) से सकारलोप, व्रश्च-भ्रस्ज०

•हलन्त-पुंल्लिङ्ग-प्रकरणम् ४१३ (३०७) से जकार को षकार, झलां जशोऽन्ते (६७) से षकार को डकार तथा वाऽव- साने (१४६) से वैकल्पिक चर्त्व-टकार करने से 'विभ्राट्, विभ्राड्' ये दो रूप सिद्ध होते हैं। रूपमाला यथा— प्र० विभ्राट्-ड् विभ्राजौ विभ्राजः | प० विभ्राजः विभ्राड्भ्याम् विभ्राड्भ्यः द्वि० विभ्राजम् ,, ,, | ष० ,, विभ्राजोः विभ्राजाम् तृ० विभ्राजा विभ्राड्भ्याम् विभ्राड्भिः | स० विभ्राजि ,, विभ्राट्सु,ट्सु च० विभ्राजे ,, विभ्राड्भ्यः | सं० हे विभ्राट्! विभ्राजौ! विभ्राजः! भ्यामादिषु व्रश्च-भ्रस्ज० (३०७) इति षत्वे झलां जशोऽन्ते (६७) इति जश्त्वम् । सुपि षत्वे, जश्त्वे, वा धुँडागमे चर्त्वम् । देवेज् (देवताओं का यजन करने वाला) । देवान् यजत इति देवेद् । 'देव'- कर्मोपपदाद् यजतेः (भ्वा० उभ०) क्विपि, कित्त्वाद्, वचिस्वपिजादीनां किति (५४७) इति सम्प्रसारणे, सम्प्रसारणाच्च (२५८) इति पूर्वरूपे, गुणे च कृते 'देवेज्' इति शब्दो निष्पद्यते । कृदन्त होने से प्रातिपदिक-सञ्ज्ञा हो कर स्वादि प्रत्यय उत्पन्न होते हैं । इस की रूपमाला यथा— प्र० देवेद्-ड् देवेजौ देवेजः | प० देवेजः देवेड्भ्याम् देवेड्भ्यः द्वि० देवेजम् ,, ,, | ष० ,, देवेजोः देवेजाम् तृ० देवेजा देवेड्भ्याम् देवेड्भिः | स० देवेजि ,, देवेद्त्सु-ट्सु च० देवेजे ,, देवेड्भ्यः | सं० हे देवेद् ! हे देवेजौ ! हे देवेजः ! यहां 'यज्' होने से पदान्त में पूर्ववत् व्रश्च-भ्रस्ज० (३०७) सूत्र से षत्व तथा झलां जशोऽन्ते (६७) से जश्त्व-डकार हो जाता है । विशेष—क्विन्प्रत्ययस्य कुः (३०४) सूत्र में बहुव्रीहिसमास के आश्रयण के कारण यहां कुत्व प्राप्त था परन्तु भाष्यकार के 'उपयद् काम्यति' प्रयोग के निर्देश से नहीं होता । यह विषय विस्तारपूर्वक सिद्धान्तकौमुदी में देखें । विश्वसृज् (जगत् के रचयिता, भगवान्) । विश्वं सृजतीति विश्वसृट् । विश्व- कर्मोपपदात् सृज विसर्गे (तुदा० प०) इत्यस्मात्कर्त्तरि क्विपि 'विश्वसृज्' इतिशब्दो निष्पद्यते । इस की रूपमाला यथा— प्र० विश्वसृट्-ड्, विश्वसृजौ, विश्वसृजः । द्वि० विश्वसृजम्, विश्वसृजौ, विश्वसृजः । तृ० विश्वसृजा, विश्वसृड्भ्याम्, विश्वसृड्भिः । च० विश्वसृजे, विश्वसृड्- भ्याम्, विश्वसृड्भ्यः । प० विश्वसृजः, विश्वसृड्भ्याम्, विश्वसृड्भ्यः । ष० विश्वसृजः, विश्वसृजोः, विश्वसृजाम् । स० विश्वसृजि, विश्वसृजोः, विश्वसृट्सु-ट्सु । सं० हे विश्व- सृट्-ड् ! हे विश्वसृजौ ! हे विश्वसृजः ! । यहां 'सृज्' धातु होने से व्रश्च-भ्रस्ज० (३०७) सूत्र से पदान्त में जकार को षकार तथा झलां जशोऽन्ते (६७) से षकार को डकार हो जाता है । 'रज्जुसृड्भ्याम्' इस भाष्यप्रयोग से यहां पर कुत्व नहीं होता । विशेष सिद्धान्तकौमुदी में देखें ।

४१४ भैमीव्याख्योपेतायां लघुसिद्धान्तकौमुद्यां परिव्राज् (सन्न्यासी) । इस की सिद्धि के लिये उणादिसूत्र उद्धृत करते हैं— [लघु०] विधि-सूत्रम्—परौ व्रजेः षः पदान्ते (उणादि० २।१८) । परावुपपदे व्रजेः क्विब्व् स्याद् दीर्घश्च पदान्ते षत्वमपि। परिव्राट्, परिव्राड्। परिव्राजौ ॥ अर्थ —'परि' उपपद होने पर 'व्रज्' (भ्वा० प०) धातु से क्विब्व् प्रत्यय हो और धातु के अकार को दीर्घ हो। किञ्च—पदान्त में षत्व भी होना चाहिये। व्याख्या —यह शाकटायनमुनिप्रणीत उणादिसूत्र (२।१८) है। परौ ।७।१। व्रजेः ।५।१। क्विव्व् ।१।१। (क्विव्व् वचिप्रच्छ्यायस्तू० से) । पदान्ते ।७।१। षः ।१।१। अर्थ —(परौ) 'परि' उपपद होने पर (व्रजेः) व्रज् धातु से (क्विव्व्) क्विब्व् प्रत्यय तथा (दीर्घः) दीर्घ होता है। किञ्च (पदान्ते) पदान्त में (षः) षकार भी हो जाता है। जिस पद के साथ रहने पर कोई कार्य विधान किया जाता है उसे 'उपपद' कहते हैं, उपपद सदा पूर्व में ही प्रयुक्त हुआ करता है। [देखें—तत्रोपपदं सप्तमीस्थम् (६५३), उपपदमतिङ् (६५४)]। यहां 'परि' उपपद होने पर 'व्रज्' धातु से क्विब्व् का विधान है। इस का तात्पर्य यह हुआ कि परिपूर्वक व्रज् धातु से क्विब्व् हो अन्यथा नहीं। क्विब्व् के साथ धातु को दीर्घ करने का भी विधान है। ह्रस्व, दीर्घ और प्लुत अचों के ही धर्म हैं अतः बिना कहे भी ये अचों के स्थान पर समझने चाहियें। अतः यहां 'व्रज्' धातु के अन्तर्गत रेफोत्तर अकार को ही दीर्घ होगा। पदान्त में विहित षत्व अलोऽन्त्यविधि से जकार के स्थान पर होगा। परि+व्रज्+क्विब्व् = परिव्राज्+क्विब्व्। क्विब्व् का सर्वापहार लोप करने से — परिव्राज्। कृदन्त होने से प्रातिपदिकसञ्ज्ञा हो कर स्वादियो की उत्पत्ति होती है। परिव्राज्+स् (सुं) यहां हल्ङ्याब्भ्यो० (१७६) से सकार का लोप कर पदान्त में षत्व करने पर—परिव्राष्। झलां जशोऽन्ते (६७) से जश्त्व—डकार तथा वाऽवसाने (१४६) से वैकल्पिक चर्त्व-टकार करने से 'परिव्राट्, परिव्राड्' ये दो रूप सिद्ध होते हैं। रूपमाला यथा— प्र० परिव्राट्-ड्, परिव्राजौ, परिव्राजः। द्वि० परिव्राजम्, परिव्राजौ, परिव्राजः। तृ० परिव्राजा, परिव्राड्भ्याम्, परिव्राड्भिः। च० परिव्राजे, परिव्राड्भ्याम्, परिव्राड्भ्यः। प० परिव्राजः, परिव्राड्भ्याम्, परिव्राड्भ्यः। ष० परिव्राजः, परिव्राजोः, परिव्राजाम्। स० परिव्राजि, परिव्राजोः, परिव्राट्सु-ट्सु। सं० हे परिव्राट्-ड् !, हे परिव्राजौ !, हे परिव्राजः ! । पदान्त में सर्वत्र परौ व्रजेः षः पदान्ते द्वारा षत्व तथा झलां जशोऽन्ते (६७) से जश्त्व हो जाता है। विश्वराज् (विश्वपति, भगवान्) । विश्वस्मिन् राजत इति विश्वाराट्।

हलन्त-पुंल्लिङ्ग-प्रकरणम् ४१५ विश्वोपपदाद् राजतेः (भ्वा० उ०) सत्सूद्विष० (३.२.६१) इति क्विपि, उपपदसमासे 'विश्वराज्' इतिशब्दो निष्पद्यते । विश्वराज् + स् (सुँ) । यहां सकारलोप हो व्रश्च-भ्रस्ज० (३०७) सूत्र से जकार को षकार, झलां जशोऽन्ते (६७) द्वारा षकार को डकार तथा वाऽवसाने (१४६) से वैकल्पिक चर्त्व-टकार करने पर—'विश्वराट्, विश्वराड्' । अब इन दोनों अवस्थाओं में अग्रिम-सूत्र प्रवृत्त होता है— [लघु०] विधि-सूत्रम्—(३०८) विश्वस्य वसुराटोः ।६।३।१२७॥ विश्वशब्दस्य दीर्घोऽन्तादेशः स्याद् वसौ राट्शब्दे च परे । विश्वाराट्, विश्वाराड् । विश्वराजौ । विश्वाराड्भ्याम् ॥ अर्थः—वसु अथवा राट् परे होने पर विश्व शब्द को दीर्घ अन्तादेश हो । व्याख्या—विश्वस्य ।६।१। दीर्घः ।१।१। (ढ्रलोपे पूर्वस्य दीर्घोऽणः से) । वसु- राटोः ।७।२। अर्थः—(वसुराटोः) वसु अथवा राट् शब्द परे होने पर (विश्वस्य) 'विश्व' शब्द के स्थान पर (दीर्घः) दीर्घ आदेश हो जाता है । अलोऽन्त्यविधि से यह दीर्घ अन्त्य अच् के स्थान पर होगा । यहां 'राट्' का ग्रहण पदान्त का उपलक्षण है; अतः 'राट्' हो या 'राड्', दोनों अवस्थाओं में दीर्घ हो जाता है । इस सूत्र से दीर्घ करने पर—'विश्वाराट्, विश्वाराड्' ये दो प्रयोग सिद्ध होते हैं। रूपमाला यथा— प्र० विश्वाराट्-ड्, विश्वराजौ, विश्वराजः । द्वि० विश्वराजम्, विश्वराजौ, विश्वराजः । तृ० विश्वराजा, विश्वाराड्भ्याम्, विश्वाराड्भिः । च० विश्वराजे, विश्वाराड्भ्याम्, विश्वाराड्भ्यः । प० विश्वराजः, विश्वाराड्भ्याम्, विश्वाराड्भ्यः । ष० विश्वराजः, विश्वराजोः, विश्वराजाम् । स० विश्वराजि, विश्वराजोः, विश्वराट्त्सु- ट्सु । सं० हे विश्वाराट्-ड् !, हे विश्वराजौ !, हे विश्वराजः ! । भ्याम्, भिस्, भ्यस् और सुप् में षत्व और डत्व हो कर दीर्घ हो जाता है । सुप् में डत्व हो कर वैकल्पिक धुँट् का आगम तथा चर्त्व विशेष हैं । भ्रूस्ज् (भठियारा वा भड़भूंजा) । भ्रस्जँ पाके (तुदा० उभ०) धातु से क्विँप्, ग्रहिज्या० (६३४) से सम्प्रसारण तथा सम्प्रसारणाच्च (२५८) से पूर्वरूप करने से 'भृस्ज्' शब्द बनता है । भृज्जतीति = भृट् । भृस्ज् + स् । सकार का लोप (१७६) हो कर—भृस्ज् । अब संयोगान्तस्य लोपः (२०) से जकारलोप के प्राप्त होने पर अग्रिमसूत्र प्रवृत्त होता है— [लघु०] विधि-सूत्रम् —(३०६) स्कोः संयोगाद्योरन्ते च ।८।२।२६॥ पदान्ते झलि च परे यः संयोगस्तदाद्योः सकारककारयोर्लोपः स्यात् । भृट् । सस्य श्चुत्वेन शः। झलां जश्झशि (१६) इति शस्य जः। भृज्जौ। भृड्भ्याम् ॥

४१६ भैमीव्याख्योपेतायां लघुसिद्धान्तकौमुद्यां अर्थ—पदान्त में या झल् परे होने पर संयोग के आदि वाले सकार ककार का लोप हो जाता है। व्याख्या—स्कोः ।६।२। संयोगाद्योः ।६।२। लोपः ।१।१। (संयोगान्तस्य लोपः से)। झलि ।७।१। (झलो झलि से)। पदस्य ।६।१। (यह अधिकृत है)। अन्ते ।७।१। च इत्यव्ययपदम्। समास—स् च् क् च=स्कौ, तयोः =स्कोः। इतरेतरद्वन्द्वः। संयो- गस्य आदी =संयोगादी तयोः =संयोगाद्योः। षष्ठीतत्पुरुषः। अर्थः--(झलि) झल् परे होने पर या (पदस्य) पद के (अन्ते) पदान्त में स्थित (संयोगाद्योः) जो संयोग, उस के आदि सकार ककार का (लोपः) लोप हो जाता है। यद्यपि यह सूत्र संयोगान्तस्य लोपः (२०) की दृष्टि में असिद्ध है तथापि वचनसामर्थ्य से यह उस का अपवाद है—अपवादो वचनप्रामाण्यात्। 'भ्रस्ज्' यहां पदान्त में प्रकृतसूत्र से संयोग के आदि सकार का लोप हो— 'भृज्'। व्रश्च-भ्रस्ज० (३०७) सूत्र से जकार को षकार, जश्त्व से षकार को डकार तथा वैकल्पिक चर्त्व में टकार करने पर—'भृट्, भृड्' ये दो रूप सिद्ध होते हैं। 'भ्रस्ज्+औ' यहां पदान्त वा झल् परे न होने से संयोगादि सकार का लोप नहीं होता। झलां जश्झशि (१६) और स्तोः श्चुना श्चुः (६२) दोनों प्राप्त हैं। जश्त्व के असिद्ध होने से प्रथम श्चुत्व से सकार को शकार हो—भृश्ज्+औ। पुनः झलां जश्झशि (१६) से तालुस्थानिक शकार के स्थान पर तादृश जश्—जकार करने पर 'भृज्जौ' प्रयोग सिद्ध होता है। रूपमाला यथा— प्र० भृट्-ड् भृज्जौ भृज्जः प० भृज्जः भृड्भ्याम् भृड्भ्यः द्वि० भृज्जम् ,, ,, ष० ,, भृज्ज्योः भृज्जाम् तृ० भृज्जा भृड्भ्याम् भृड्भिः स० भृज्जि ,, भृट्त्सु-ड्त्सु च० भृज्जे ,, भृड्भ्यः सं० हे भृट्-ड् ! हे भृज्जौ ! हे भृज्ज ! अभ्यास (४१) (१) 'ऋत्विक्' आदि में चोः कुः अथवा क्विन्प्रत्ययस्य कुः किसी एक के द्वारा कार्य्य सिद्ध हो सकता है, पुनः दो सूत्रों का निर्माण क्यों ? (२) युञ्जौ, युञ्जः—आदि में चोः कुः द्वारा कुत्व क्यों नहीं होता ? (३) क्विन् का सर्वापहार लोप कैसे और क्यों किया जाता है ? ससूत्र लिखें। (४) युजेरसमासे में 'युजि' के साथ इकार जोड़ने का क्या अभिप्राय है ? (५) निम्नलिखित सूत्रों की सोदाहरण विस्तृत व्याख्या करें— स्कोः ०, ऋत्विग्दधृक्०, क्विन्प्रत्ययस्य कुः, युजेरसमासे। (६) १ स्रग्भ्यां २ परिव्राट्, ३. विश्वराट्, ४. भृट्, ५ भृज्जौ, ६ यु- ङ्भ्याम्, ७ विदवत्सृट्, ८ देवेड्भ्याम्, ६ ऋत्विक्षु—इन प्रयोगों की ससूत्र सिद्धि लिखें। (७) जब संयोगान्तलोप की दृष्टि में स्कोः संयोगाद्योरन्ते च सूत्र असिद्ध है, तो पुनः वह उस का कैसे बाध कर लेता है ?

हलन्त-पुंल्लिङ्ग-प्रकरणम् ४१७ (८) पदान्त में पकार के स्थान पर किस सूत्र से जश्त्व होता है ? और वह जश्त्व कौन सा वर्ण होना चाहिये ? सोपपत्तिक स्पष्ट करें। (६) कृदतिङ् सूत्र पर 'अत्र धात्वधिकारे' का क्या अभिप्राय है ? (१०) 'राजा' यह किस शब्द का किस विभक्ति का रूप है ? (उत्तर—राजन् सुँ, राज् टा) (यहां जकारान्त पुंल्लिङ्ग शब्दों का विवेचन समाप्त होता है।) —::o::— अब दकारान्त पुंल्लिङ्गों का वर्णन करते हैं— त्यद् (वह)। त्यजि-तनि-यजिभ्यो डित् (उणा० १२६) इस सूत्र द्वारा त्यज हानौ (भ्वा० प०) धातु से डित् 'अदि' प्रत्यय करने से टि का लोप कर देने पर 'त्यद्' शब्द निष्पन्न होता है। इस का लोक में प्रयोग नहीं देखा जाता। वेद में इस का प्रचुर प्रयोग होता है¹। अकेले ऋग्वेद में ही पुंल्लिङ्ग त्यद् के प्रथमा के एकवचन का प्रायः छत्तीस बार प्रयोग हुआ है। सर्वादिगणान्तर्गत होने से इसे सर्वनामकार्य होते हैं। त्यद् + स् (सुँ)। यहां त्यदादीनामः (१६३) सूत्र द्वारा दकार को अकार तथा अतो गुणे (२७४) सूत्र से पररूप एकादेश करने पर—त्य+स्। यही बात ग्रन्थकार निर्देश करते हैं— [लघु०] त्यदाद्यत्वम्पररूपत्वञ्च ॥ अब अग्रिमसूत्र प्रवृत्त होता है— [लघु०] विधि-सूत्रम्— (३१०) तदोः सः सावनन्त्ययोः ।७।२।१०६॥ त्यदादीनां तकारदकारयोरनन्त्ययोः सः स्यात् सौ। स्यः। त्यौ। त्ये। सः। तौ। ते। यः। यौ। ये। एषः। एतौ। एते। अन्वादेशे —एनम्। एनौ। एनान्। एनेन। एनयोः २ ॥ १. परन्तु स्यश्छन्दसि बहुलम् (६.१.१२६) सूत्र के निर्देश से इस का लोक में भी प्रयोग अशुद्ध प्रतीत नहीं होता। अत एव वेणीसंहारनाटक में—सूतो वा सूतपुत्रो वा यो वा स्यो वा भवाम्यहम् (३.३५) ऐसा क्वचित् पाठ-भेद पाया जाता है। त्यजि-तनि० (उणा० १२६) सूत्र पर पेरुसूरि के श्लोक भी द्रष्टव्य हैं— त्यत्तद्यदस्त्रयः सर्वादिगणे पठिता अमी। तत्राद्यौ तु परोक्षार्थौ तृतीयस्तन्निरूपकः ॥१॥ आद्यस्य लोके न क्वापि प्रयोगः परिदृश्यते। वेदे त्वेष स्य वाजीति प्रभृतिष्वथ गम्यते ॥२॥ स्यश्छन्दसीतिसूत्रस्थच्छन्दोग्रहणलिङ्गतः। लोकेऽप्यस्य प्रयोगोऽस्तीत्येतदभ्युपगम्यते ॥३॥ ल० प्र० (२७)

४१८ भैमीव्याख्योपेतायां लघुसिद्धान्तकौमुद्यां अर्थ —'सुं' परे होने पर त्यदादियो के अनन्त्य (अन्त मे न रहने वाले) तकार दकार को सकार आदेश हो जाता है । व्याख्या—त्यदादीनाम् ।६।३। (त्यदादीनाम से)। तदो ।६।२। स ।१।१। सौ ।७।१। अनन्त्ययो ।६।२। समास —न अन्त्ययो =अनन्त्ययो, नञ्समास । अर्थ — (सौ) सुं परे होने पर (त्यदादीनाम्) त्यदादियो के (अनन्त्ययो ) अनन्त्य (तदो ) तकार दकार को (स ) सकार आदेश हो जाता है ! त्य + स् । यहा प्रकृतसूत्र स त्यद् शब्द के अनन्त्य तकार को सकार हो कर— स्य् + स् । प्रत्यय के सकार को रुत्व और रेफ को विसर्ग करने पर—'स्य ' प्रयोग सिद्ध हुआ । इस की रूपमाला यथा— प्र० स्य त्यौ त्ये | प० त्यस्मात् त्याभ्याम् त्येभ्य द्वि० त्यम् ,, त्यान् | ष० त्यस्य त्ययो त्येषाम् तृ० त्येन त्याभ्याम् त्यै | स० त्यस्मिन् ,, त्येषु च० त्यस्मै ,, त्येभ्य | सम्बोधन प्राय नही होता । यहा सर्वत्र त्यदाद्यत्व और पररूप कर प्रथम 'त्य' इस प्रकार अदन्त सर्वनाम बना लेना चाहिये । तब इस की प्रक्रिया 'सर्व'शब्दवत् चलती है । केवल 'स्य ' मे कुछ विशेष है जो बताया जा चुका है । तद् (वह) । यह शब्द भी तनुं विस्तारे (तना० उभ०) धातु से त्यजि-तनि० (उणा० १२६) सूत्र द्वारा डित् 'अदि' प्रत्यय करने मे निष्पन्न होता है । तद् + स्(सुँ)। यहा भी त्यदाद्यत्व तथा पररूप होकर—'त + स' । पुन तदो' स ० (३१०) सूत्र से अनन्त्य तकार को सकार आदेश कर रुँत्व विसर्ग करने मे-- 'स ' प्रयोग सिद्ध होता है । इस की रूपमाला यथा— प्र० सः तौ ते | प० तस्मात् ताभ्याम् तेभ्य द्वि० तम् ,, तान् | ष० तस्य तयो तेषाम् तृ० तेन ताभ्याम् तै | स० तस्मिन् ,, तेषु च० तस्मै ,, तेभ्य | ———०——— यहा भी पूर्ववत् त्यदादीनाम (१६३) से दकार को अकार तथा अतो गुणे (२७४) से पररूप होकर 'त' इस प्रकार अदन्त सर्वनाम बन जाता है । तब इस की प्रक्रिया 'सर्व'शब्दवत् होती है । सुँ विभक्ति मे ही विशेष है । यद् (जो)। यह शब्द भी यजं देवपूजासगतिकरणदानेषु (भ्वा० उभ०) धातु से त्यजि-तनि-यजिभ्यो डित् (उणा० १२६) सूत्र द्वारा 'अदि' प्रत्यय करने से सिद्ध होता है । इस की रूपमाला यथा— प्र० य यौ ये | प० यस्मात् याभ्याम् येभ्य द्वि० यम् ,, यान् | ष० यस्य ययो येषाम् तृ० येन याभ्याम् यै | स० यस्मिन् ,, येषु च० यस्मै ,, येभ्य | ———०———

हलन्त-पुंल्लिङ्ग-प्रकरणम् ४१६ यहाँ भी पूर्ववत् त्यदाद्यत्व और पररूप कर सर्वनामकार्य हो जाते हैं । अनन्त्य तकार दकार न होने से सुँ में तदोः सः० (३१०) प्रवृत्त नहीं होता । एतद् (यह) । इण् गतौ (अदा० प०) धातु से एतेस्तुट् च (उणा० १३०) सूत्र द्वारा अदि प्रत्यय तथा 'तुट्' का आगम करने पर 'एतद्' शब्द निष्पन्न होता है । एतद् + स् (सु) । यहां त्यदादीनामः (१६३) से दकार को अकार, अतो गुणे (२७४) से पररूप, तदोः सः० (३१०) से अनन्त्य तकार को सकार तथा आदेश- प्रत्यययोः (१५०) से उस सकार को षकार करने पर—एषस् = 'एषः' प्रयोग सिद्ध होता है । रूपमाला यथा— प्र० एषः एतौ एते | प० एतस्मात् एताभ्याम् एतेभ्यः द्वि० एतम् ” एतान् | प० एतस्य एतयोः एतेषाम् तृ० एतेन एताभ्याम् एतैः | स० एतस्मिन् ” एतेषु च० एतस्मै ” एतेभ्यः | ——————०—————— यहाँ भी सर्वत्र त्यदाद्यत्व और पररूप होकर 'एत' शब्द बन जाने पर सर्व- शब्द की तरह सर्वनामकार्य होते हैं । सुँ विभक्ति का विशेष बता चुके हैं । अन्वादेश में द्वितीयाटौस्स्वेनः (२८०) सूत्र द्वारा द्वितीया, टा और ओस् विभक्तियों में 'एतद्' शब्द के स्थान पर 'एन' आदेश हो जाता है । शेष विभक्तियों में कुछ अन्तर नहीं पड़ता । अन्वादेश में रूपमाला यथा— प्र० एषः एतौ एते | प० एतस्मात् एताभ्याम् एतेभ्यः द्वि० एनम्* एनौ* एनान्* | ष० एतस्य एनयोः* एतेषाम् तृ० एनेन* एताभ्याम् एतैः | स० एतस्मिन् ” * एतेषु च० एतस्मै ” एतेभ्यः | *द्वितीयाटौस्स्वेनः (२८०) नोट—त्यदादियों का प्रायः सम्बोधन नहीं हुआ करता—यह हम पीछे लिख चुके हैं । यदि बनेगा भी तो प्रथमावत् बनेगा । सम्बुद्धि में एड्ह्रस्वात्० (१३४) का ध्यान रख लेना चाहिये । सूचना—ऊपर त्यदादियों के पुंल्लिङ्ग के रूप दिये गये हैं । स्त्रीलिङ्ग और नपुंसकलिङ्ग के रूप आगे तत्तत्प्रकरणों में देखें । अब दकारान्तों में युष्मद् और अस्मद् शब्दों का प्रकरण आरम्भ किया जाता है । युष्मद् और अस्मद् शब्द तीनों लिङ्गों में एक समान होते हैं—यह हम पीछे अजन्त-पुंल्लिङ्ग-प्रकरण में 'कति' शब्द पर लिख चुके हैं । युष्मद् और अस्मद् शब्दों की सिद्धि में अनेक सूत्र प्रयुक्त होते हैं, अतः यह बालकों को कठिन प्रतीत होती है । हम इसे यथाशक्ति सरल तथा सुबोध बनाने का प्रयास करेंगे । बालकों को इन की सिद्धि से पूर्व इन के उच्चारण भली-भांति कण्ठस्थ कर लेने चाहियें । ऐसा करने से एक तो ये शब्द सरल दूसरे झटिति समझ में आ जाते हैं । इन दोनों की रूपमाला यथा—

४२० भैमीव्याख्योपेतायां लघुसिद्धान्तकौमुद्यां युष्मद्¹ = तुम अस्मद् = मैं प्र० त्वम् युवाम् यूयम् प्र० अहम् आवाम् वयम् द्वि० त्वाम् " युष्मान् द्वि० माम् " अस्मान् तृ० त्वया युवाभ्याम् युष्माभि तृ० मया आवाभ्याम् अस्माभि च० तुभ्यम् " युष्मभ्यम् च० मह्यम् " अस्मभ्यम् प० त्वत्-द् " युष्मत्-द् प० मत्-द् " अस्मत्-द् ष० तव युवयो युष्माकम् ष० मम आवयो अस्माकम् स० त्वयि " युष्मासु स० मयि " युष्मासु युष्मद् और अस्मद् दोनों शब्दों में एक समान सूत्र प्रवृत्त होते हैं अतः हम भी इन की सिद्धि इकट्ठी दिखायेंगे । युष्मद् + सुँ, अस्मद् + सुँ । यहां अग्रिम-सूत्र प्रवृत्त होता है— [लघु०] विधि-सूत्रम्—(३११) ङे प्रथमयोरम् ।७।२।२८॥ युष्मदस्मद्भ्यां परस्य 'ङे' इत्येतस्य प्रथमाद्वितीययोश्चामादेश ॥ अर्थ—युष्मद् और अस्मद् शब्दों से परे 'ङे' को तथा प्रथमा और द्वितीया विभक्ति को अम् आदेश हो । व्याख्या—युष्मदस्मद्भ्याम् ।५।२। (युष्मदस्मद्भ्यां ङसोऽश् मे) । ङे ।६।१। (यहां षष्ठीविभक्ति का लुक् समझना चाहिये) । प्रथमयो ।६।२। अम् ।१।१। समास— प्रथमा च प्रथमा च = प्रथमे, तयो = प्रथमयो, एकशेष । यहां पहले 'प्रथमा' शब्द से प्रथमाविभक्ति तथा दूसरे 'प्रथमा' शब्द से द्वितीया विभक्ति अभिप्रेत है²। अर्थ— (युष्मदस्मद्भ्याम्) युष्मद् और अस्मद् शब्दो से परे (ङे) ङे के स्थान पर तथा (प्रथमयो ) प्रथमा वा द्वितीया विभक्ति के स्थान पर (अम्) 'अम्' आदेश हो जाता है । इस सूत्र से सुँ को अम् आदेश हो कर—युष्मद् + अम्, अस्मद् + अम् । यहां हलन्त्यम् (१) द्वारा अम् के मकार की इत्संज्ञा नही होती । न विभक्तौ तुस्मा (१३१) सूत्र से निषेध हो जाता है । अब अग्रिम सूत्र प्रवृत्त होना है— [लघु०] विधि-सूत्रम्—(३१२) त्वाहौ सौ ।७।२।९४॥ अनयोर्मपर्यन्तस्य त्वाहावादेशौ स्त (सौ परे) ॥ अर्थ.—सुँ परे होने पर युष्मद् और अस्मद् शब्दों को म्पर्यन्त (म् भी साथ लेना है) क्रमशः त्व, अह आदेश हो जाते हैं ।

१ युष्यसिभ्यां मद्दिकू (उणा० १३६) इति शब्दावेतो सिध्यतः । युषि मौत्र । २ पहले 'प्रथमा' शब्द से मात्र विभक्तियों में से प्रथमाविभक्ति का ग्रहण हो जाता है, शेष द्वितीया आदि छ विभक्तियां बच रहती हैं। अब दूसरे 'प्रथमा' शब्द से उन छ अवशिष्ट विभक्तियो में से प्रथमाविभक्ति अर्थात् द्वितीया विभक्ति का ग्रहण हो जाना है ।

हलन्त-पुंल्लिङ्ग-प्रकरणम् ४२१ व्याख्या—युष्मदस्मदोः ।६।२। (युष्मदस्मदोरनादेशे से) । मपर्यन्तस्य ।६।१। (यह अधिकृत है) । त्वाहौ ।१।२। सौ ।७।१। समासः—त्वश्च अहश्च = त्वाहौ, इतरे- तरद्वन्द्वः । अर्थः—(सौ) सुँ परे होने पर (मपर्यन्तस्य = मपर्यन्तयोः) 'म्' तक (युष्मद- स्मदोः) युष्मद् और अस्मद् के स्थान पर (त्वाहौ) क्रमशः त्व और अह आदेश हो जाते हैं । युष्मद् में युष्म् और अस्मद् में अस्म् ये म्पर्यन्त भाग हैं । सुँ परे होने पर इन के स्थान पर क्रमशः 'त्व' और 'अह' आदेश होते हैं । युष्मद् + अम्, अस्मद् + अम्—यहां सुं के स्थान पर हुए अम् आदेश को स्थानिवद्भाव से सुँ मान कर प्रकृतसूत्र से क्रमशः म्पर्यन्त त्व और अह आदेश करने से—'त्व अद् + अम्, अह अद् + अम्' । अब अग्रिमसूत्र प्रवृत्त होता है— [लघु०] विधि-सूत्रम्—(३१३) शेषे लोपः ।७।२।९०॥ एतयोष्टिलोपः । त्वम् । अहम् ॥ अर्थः—युष्मद् और अस्मद् की टि अर्थात् 'अद्' भाग का लोप हो जाता है । व्याख्या—युष्मदस्मदोः ।६।२। (युष्मदस्मदोरनादेशे से) । मपर्यन्तात् ।५।१। (मपर्यन्तस्य इस अधिकृत का अपकर्ष कर विभक्तिविपरिणाम हो जाता है) । शेषे ।७।१। (स्थानषष्ठी के अर्थ में अधिकरणत्व की विवक्षा से सप्तमी हुई है) । लोपः ।१।१। अर्थः—(युष्मदस्मदोः) युष्मद् और अस्मद् शब्दों के (मपर्यन्तात्) म्पर्यन्त भाग से आगे (शेषे) शेष भाग में (लोपः) लोप प्रवृत्त होता है । म्पर्यन्त भाग से आगे शेष भाग 'अद्' होता है। इस के लोप का इस सूत्र से विधान किया गया है। यह 'अद्' भाग युष्मद् और अस्मद् का 'टि' भाग ही होता है, अतः वृत्ति में टि के लोप का कथन किया गया है। सावधानता—यहां यह नहीं समझना चाहिये कि युष्मद् और अस्मद् शब्द में म्पर्यन्त आदेशों से अवशिष्ट शेष भाग का लोप होता है, यथा यहां त्व और अह आदेश हो चुकने पर 'अद्' भाग शेष रहता है। यदि ऐसा मानेंगे तो यहां तो कार्य्य चल जायेगा, परन्तु 'युष्मभ्यम्, अस्मभ्यम्' आदियों में न हो सकेगा । क्योंकि वहां 'युष्मद्, अस्मद्' शब्दों के स्थान पर कुछ आदेश नहीं होता । अतः यहां 'मपर्यन्तस्य' का अपकर्षण कर म् से आगे के भाग अर्थात् 'अद्' को शेष समझना चाहिये । इस सूत्र का दूसरा अर्थ भी होता है और कही २ लघुकौमुदी में वह उपलब्ध भी होता है । वह यह है— आत्व-यत्वनिमित्तेतरविभक्तौ परतो युष्मदस्मदोरन्त्यस्य लोपः स्यात् । अर्थः—जिस विभक्ति के परे होने पर आत्व और यत्व विधान नहीं होते, उस विभक्ति के परे होने पर युष्मद् और अस्मद् शब्दों के अन्त्य अर्थात् दकार का लोप हो जाता है । व्याख्या—अष्टन आ विभक्तौ से 'विभक्तौ' पद की अनुवृत्ति आ जाने से इस

४२२ भैमीव्याख्योपेतायां लघुसिद्धान्तकौमुद्यां अर्थ की उत्पत्ति इस प्रकार होती है—(शेषे) शेष (विभक्तौ) विभक्ति परे होने पर (युष्मदस्मदो) युष्मद् और अस्मद् का (लोप) लोप हो जाता है। अलोऽन्त्यविधि से यह लोप अन्त्य अल् दकार के स्थान पर होता है। इस सूत्र से पूर्व अष्टाध्यायी में—युष्मदस्मदोरनादेशे (७।२।८६), द्वितीया- याञ्च (७।२।८७), प्रथमायाश्च द्विवचने भाषायाम् (७।२।८८), योऽचि (७।२।८६) —इन चार सूत्रों के द्वारा कुछ विशिष्ट विभक्तियों के परे होने पर आत्व और यत्व का विधान किया गया है। यदि आत्व और यत्व निमित्तक विभक्तियों से भिन्न अन्य शेष विभक्तियां परे हों तो दकार का लोप हो जाता है। काशिकाकार ने उन सब शेष विभक्तियों की गणना एक श्लोक में कर दी है जिन में आत्व और यत्व प्रवृत्त नहीं हो सकते। तथाहि— पञ्चम्यांश्च चतुर्थ्यांश्च, षष्ठीप्रथमयोरपि। यान्यद्विवचनान्यत्र, 'शेषे लोपो' विधीयते॥ अर्थात् पञ्चमी, चतुर्थी, षष्ठी तथा प्रथमा विभक्तियों के एकवचन और बहु- वचन शेषविभक्तियां हैं। इन के परे होने पर शेषे लोपः (३१३) से युष्मद् और अस्मद् के अन्त्य दकार का लोप हो जाता है। त्व अद्+अम्, अह अद्+अम् –यहां अन्तरङ्ग होने से प्रथम अतो गुणे (२७४) से पररूप एकादेश हो 'त्वद्+अम्, अहद्+अम्'। अब शेषे लोपः (३१३) से अद् भाग का लोप हो कर—'त्व्+अम्=त्वम्, अह्+अम्=अहम्' ये रूप सिद्ध होते हैं।¹ अन्त्यलोप वाले पक्ष में केवल दकार का लोप हो कर अमि पूर्वः (१३५)से पूर्वरूप करने से इन प्रयोगों की निष्पत्ति होती है—यही विशेष है। १. त्व अद्+अम्, अह अद्+अम्—यहां शेषे लोप (३१३) से अद् भाग का लोप और अतो गुणे (२७४) से पररूप दोनों युगपत् प्राप्त होते हैं। शेषे लोप (३१३) सूत्र अष्टाध्यायी में पर होते हुए भी प्रथम प्रवृत्त नहीं होता क्योंकि वह अङ्गाधि- कार में पठित होने से विभक्ति प्रत्यय सापेक्ष होने के कारण बहिरङ्ग है और अतो गुणे (२७४) सूत्र अन्तर्गतवर्णद्वयापेक्ष होने से अन्तरङ्ग है। असिद्धं बहिरङ्ग- मन्तरङ्गे—इस परिभाषा के अनुसार अन्तरङ्गकार्य अतो गुणे प्रथम हो जाता है। शेषे लोपः बहिरङ्ग होने से अन्तरङ्ग के बाद प्रवृत्त होता है। यहां यह भी ध्यातव्य है कि वार्णादाङ्गं बलीयः (वर्णकार्य की अपेक्षा अङ्गकार्य बलवान् होता है) परिभाषा के आश्रय से वर्णकार्य अतो लोप की अपेक्षा अङ्गकार्य शेषे लोपः को बलवान् नहीं माना जा सकता, क्योंकि जहां याङ्ग और वार्ण कार्य समानाश्रय हों वहीं पर यह परिभाषा प्रवृत्त होती है। जैसे धृ+ण्वुल्=धृ+अक यहां 'ऋ' को प्रत्यय के णित् होने से आङ्गकार्य अचो ञ्णिति (१८२) से वृद्धि प्राप्त होती है तथा इसी ऋ को वार्णकार्य यण् (र्) भी प्राप्त होता है। इस परिभाषा से आङ्गकार्य वृद्धि हो जाती है। परन्तु